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मंगलवार, 12 मार्च 2019

लघुकथा | प्राइस टेग | दिलीप भाटिया


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कैलाश और उसका परिवार रिश्ता जोड़ने के उद्देश्य से कला के घर आया था। हालांकि बातचीत में तिलक-दहेज की वही रुकावटें एवं नकारात्मक विचार।

अगले दिन कैलाश को व्हाट्सएप्प पर कला का मैसेज मिला - तुम कल 5 लाख का प्राइस टेग लगाकर आए। मैं स्वयं शिक्षिका हूँ, पापा को कष्ट नहीं दूँगी, तुम्हें खरीद सकती हूँ। हालांकि तुम स्वयं आत्मनिर्भर होकर क्यों इतना सा अहसान ले रहे हो? स्वयं को पहचानो तो अनमोल हो तुम। शिक्षित भी हो ही। कुछ महीनों की बचत से इतना जोड़ने में सक्षम भी हो। विचार करना। तुम्हारे निर्णय के बाद ही अपना निर्णय सूचित करूँगी।

कैलाश ने विचार कर उत्तर दिया - मुझे एक नई राह दिखाने के लिए धन्यवाद। मैनें अपना प्राइस टेग हटा दिया है।

कला का उत्तर  - प्रिय जीवन साथी, कला अब कैलाश की ही है।

- दिलीप भाटिया 
रावतभाटा राजस्थान

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