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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

सतीश राठी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना: एक अध्ययन | चंद्रेश कुमार छतलानी


सतीश राठी: एक संक्षिप्त स्मरण

सतीश राठी (23 फरवरी 1956 – 1 सितंबर 2026) हिंदी लघुकथा के उन रचनाकारों में रहे जिन्होंने इस विधा को केवल लिखा नहीं, बल्कि उसके विकास के लिए लगातार काम भी किया। इंदौर की साहित्यिक भूमि से जुड़े राठी ‘क्षितिज’ संस्था के संस्थापक अध्यक्ष रहे और कई दशकों तक लघुकथा के लेखन, संपादन और प्रसार से जुड़े रहे। उनकी साहित्यिक यात्रा में शब्द साक्षी हैं और जिस्मों का तिलिस्म जैसे लघुकथा-संग्रह, पिघलती आँखों का सच जैसा कविता-संग्रह तथा अनेक संपादित संकलन उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाएँ मराठी, कन्नड़, पंजाबी, गुजराती और बांग्ला सहित विभिन्न भाषाओं में अनूदित हुईं।

राठी का साहित्य आम आदमी के जीवन से गहरे जुड़ा रहा। भूख, गरीबी, श्रम, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, स्त्री-पुरुष संबंध और बदलती मानवीय संवेदनाएँ उनकी लघुकथाओं के प्रमुख सरोकार रहे। उनकी भाषा सहज थी, लेकिन उनके प्रश्न गहरे थे। वे छोटी-सी घटना के भीतर छिपे बड़े सामाजिक अर्थ को पहचानते थे। ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’, ‘खुली किताब’ और ‘जिस्मों का तिलिस्म’ जैसी रचनाएँ इसका प्रमाण हैं।

उनका निधन हिंदी लघुकथा के लिए केवल एक रचनाकार की विदाई नहीं है। यह उस पीढ़ी के एक सक्रिय प्रतिनिधि का जाना है जिसने लघुकथा को एक सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित होते देखा, उसमें लिखा और उसके लिए साहित्यिक वातावरण तैयार किया। ‘क्षितिज’ के माध्यम से उनका संपादकीय और संगठनात्मक योगदान आने वाले समय में भी लघुकथा के इतिहास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।

प्रस्तुत शोध-पत्र उनके इसी रचनात्मक अवदान को उनकी लघुकथाओं के पाठ के आधार पर समझने का एक विनम्र प्रयास है।


सारांश

हिंदी लघुकथा ने आधुनिक हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान उस समय बनाई, जब कम शब्दों में जीवन की बड़ी सच्चाइयों को व्यक्त करने की आवश्यकता महसूस हुई। इस विधा के विकास में अनेक रचनाकारों का योगदान रहा है। सतीश राठी उनमें ऐसे लेखक हैं जिनकी पहचान केवल लघुकथाकार के रूप में नहीं, बल्कि संपादक और लघुकथा के सक्रिय संवाहक के रूप में भी बनी है। इंदौर के साहित्यिक परिवेश से जुड़े राठी जी ने लंबे समय तक ‘क्षितिज’ के माध्यम से लघुकथा लेखन और उसके आलोचनात्मक विमर्श को आगे बढ़ाया। उनकी रचनाओं में भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, स्त्री की स्थिति, पारिवारिक संबंध, वृद्धावस्था और सामाजिक व्यवस्था की विडंबनाएँ बार-बार दिखाई देती हैं।

प्रस्तुत शोध-पत्र में सतीश राठी की प्रतिनिधि लघुकथाओं, ‘जिस्मों का तिलिस्म’, ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’, का विश्लेषण किया गया है। साथ ही उनके साहित्यिक और संपादकीय योगदान को ‘क्षितिज’ के संदर्भ में देखा गया है। अध्ययन का उद्देश्य राठीजी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के संबंध को समझना है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उनकी लघुकथा का सामाजिक सरोकार केवल समस्या-चित्रण तक सीमित नहीं है। वे व्यवस्था के भीतर मौजूद असमानता को सामने लाते हुए व्यक्ति की गरिमा, नैतिकता और संवेदना के प्रश्न को भी उठाते हैं। उनकी भाषा सामान्य जीवन के करीब है और कथ्य को प्रभावी बनाने के लिए संवाद, प्रतीक, विडंबना और अर्थपूर्ण अंत का उपयोग किया गया है।

बीज शब्द: सतीश राठी, हिंदी लघुकथा, सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना, क्षितिज, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, स्त्री-विमर्श

प्रस्तावना

साहित्य अपने समय से अलग नहीं रह सकता। विशेषकर लघुकथा जैसी विधा के लिए यह बात और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। लघुकथा का आकार तो छोटा होता है, लेकिन उसका अनुभव छोटा नहीं होता। कुछ पंक्तियों में लेखक ऐसी स्थिति सामने रख सकता है जो पाठक को लंबे समय तक सोचने के लिए मजबूर करे।
आधुनिक हिंदी लघुकथा के विकास में मध्यप्रदेश के योगदान पर विचार करें तो, इंदौर इस विकास का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा और इस परिवेश में सतीश राठी की भूमिका विशेष ध्यान खींचती है। राठी ने स्वयं लेखन के साथ-साथ संपादन और अपने साहित्यिक संगठन 'क्षितिज' के माध्यम से भी लघुकथा के विकास में काम किया। उपलब्ध लेखक-परिचयों के अनुसार उनका जन्म 23 फरवरी 1956 को इंदौर में हुआ और उन्होंने एम.कॉम. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में शब्द साक्षी हैं और पिघलती आँखों का सच शामिल हैं। उन्होंने तीसरा क्षितिज, मनोबल और अन्य संकलनों का संपादन भी किया। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com) राठी जी की साहित्यिक पहचान को केवल उनकी व्यक्तिगत रचनाओं के आधार पर समझना अधूरा होगा। ‘क्षितिज’ संस्था और उससे जुड़े प्रकाशन उनके साहित्यिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।  (Sahityakunj)

उनकी लघुकथाओं में सामान्य मनुष्य का जीवन केंद्र में आता है। भूख और गरीबी के प्रसंग हों या भ्रष्ट व्यवस्था की आलोचना, स्त्री-पुरुष संबंध हों या परिवार में बदलते मूल्य—राठी का लेखन अपने समय की सामाजिक बेचैनी से संवाद करता है।

इसी कारण इस अध्ययन का मूल प्रश्न है:
सतीश राठी की लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ को किस तरह मानवीय संवेदना में बदलती हैं और इस प्रक्रिया में उनका कथ्य तथा शिल्प किस प्रकार एक-दूसरे का साथ देते हैं?

2. अध्ययन के उद्देश्य
इस अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं:
  • सतीश राठी के लघुकथा-साहित्य की प्रमुख सामाजिक प्रवृत्तियों की पहचान करना।
  • उनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ के स्वरूप का अध्ययन करना।
  • आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और लैंगिक संबंधों के उनके चित्रण को समझना।
  • उनकी लघुकथाओं में मानवीय संवेदना की भूमिका का विश्लेषण करना।
  • उनकी भाषा और शिल्प की प्रमुख विशेषताओं की पहचान करना।
  • ‘क्षितिज’ के माध्यम से उनके संपादकीय और साहित्यिक योगदान का मूल्यांकन करना।
3. शोध-प्रश्न
अध्ययन निम्न प्रश्नों पर केंद्रित है:
1. सतीश राठी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ किन प्रमुख रूपों में सामने आता है?
2. क्या उनकी लघुकथाएँ केवल सामाजिक विसंगतियों की आलोचना करती हैं, या उनमें मानवीय संबंधों और संवेदना के लिए भी कोई जगह बनती है?
3. आर्थिक असमानता और भूख को प्रस्तुत करने के लिए राठी किन कथात्मक युक्तियों का प्रयोग करते हैं?
4. उनकी लघुकथाओं में स्त्री-पुरुष संबंधों की प्रस्तुति किस प्रकार सामाजिक नैतिकता पर प्रश्न उठाती है?
5. ‘क्षितिज’ के माध्यम से राठी का योगदान उनके व्यक्तिगत लेखन से किस तरह आगे जाता है?

4. शोध-पद्धति
यह अध्ययन गुणात्मक और पाठ-आधारित है। इसमें प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया है। प्राथमिक सामग्री के रूप में सतीश राठी की उपलब्ध लघुकथाओं को लिया गया है। विशेष रूप से ‘जिस्मों का तिलिस्म’, ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’। इन रचनाओं को उपलब्ध ऑनलाइन स्रोतों से भी सत्यापित किया गया है। (रचनाकार)

द्वितीयक सामग्री में लेखक-परिचय, साहित्यिक साक्षात्कार, समीक्षाएँ, ‘क्षितिज’ के इतिहास से संबंधित लेख तथा सतीश राठी के साहित्य पर हुए पूर्व शोध के संदर्भ शामिल हैं। उपलब्ध स्रोत बताते हैं कि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. स्तर का शोधकार्य किया गया था। (laghukathaduniya.blogspot.com)

अध्ययन में निम्न विश्लेषणात्मक आधार अपनाए गए हैं:
  • विषय-वस्तु का विश्लेषण
  • पात्र और सामाजिक स्थिति का अध्ययन
  • प्रतीक और व्यंजना का अध्ययन
  • संवाद तथा भाषा का विश्लेषण
  • अंत की भूमिका
  • सामाजिक संदर्भ और मानवीय संवेदना का संबंध
यह अध्ययन मात्र लेखक-परिचय प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं है। इसका केंद्र उनकी रचनाओं के भीतर मौजूद सामाजिक अर्थ हैं।

5. पूर्ववर्ती अध्ययन और शोध-अंतराल
सतीश राठी पर उपलब्ध सामग्री को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में देखा जा सकता है।
पहला, लेखक-परिचय और साहित्यिक गतिविधियों से संबंधित सामग्री है। इसमें उनके प्रकाशन, संपादन, पुरस्कार और ‘क्षितिज’ से जुड़े कार्यों का विवरण मिलता है। (Sahityakunj)

दूसरा, उनकी लघुकथाओं और संग्रहों पर लिखी गई समीक्षाएँ हैं। जिस्मों का तिलिस्म पर प्रकाशित समीक्षा में उसकी 72 लघुकथाओं के माध्यम से सामाजिक शोषण, आर्थिक विषमता और मानवीय संवेदना की चर्चा की गई है। समीक्षा उनकी भाषा को सहज और संप्रेषणीय भी मानती है। (hastaksher.com)

तीसरा, विश्वविद्यालयीय शोध का संदर्भ है। 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. शोध का उल्लेख मिलता है। (laghukathaduniya.blogspot.com)

इन स्रोतों से राठी की साहित्यिक स्थिति का एक आधार बनता है, लेकिन उनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के परस्पर संबंध के आधार पर एक साथ पढ़ने की आवश्यकता बनी रहती है। प्रस्तुत अध्ययन इसी बिंदु पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।

6. सतीश राठी : रचनाकार और संपादक
सतीश राठी का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे लघुकथा के साथ कविता, व्यंग्य, कहानी और निबंध जैसी विधाओं में भी लिखते रहे हैं। (Sahityakunj)

उनका संपादकीय कार्य भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। तीसरा क्षितिज, मनोबल और समक्ष जैसे संकलनों से उनका नाम जुड़ा है। 1991 में समक्ष के माध्यम से मध्यप्रदेश के पाँच लघुकथाकारों की सौ लघुकथाओं को एक साथ प्रस्तुत किया गया था। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है। संपादन किसी विधा के विकास में केवल तकनीकी काम नहीं होता। इससे यह भी तय होता है कि किन रचनाओं को सामने लाया जाए, किन प्रश्नों पर चर्चा हो और नए लेखक किस साहित्यिक वातावरण में प्रवेश करें। राठी जी का ‘क्षितिज’ से जुड़ाव इसी कारण महत्त्वपूर्ण है।

7. ‘क्षितिज’ और लघुकथा का साहित्यिक परिवेश
इंदौर में ‘क्षितिज’ ने लघुकथा को केंद्र में रखकर लंबे समय तक साहित्यिक गतिविधियाँ संचालित कीं। राठी जी के संस्मरणात्मक लेख में इसके विकास, प्रकाशनों और विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। 1986 में 1981 से 1985 तक की श्रेष्ठ लघुकथाओं का संकलन तीसरा क्षितिज प्रकाशित हुआ था। बाद में समक्ष जैसे संकलनों के माध्यम से यह प्रयास आगे बढ़ा। (jangatha.blogspot.com)

‘क्षितिज’ की भूमिका केवल प्रकाशन तक सीमित नहीं रही। इसके माध्यम से लघुकथा की कथावस्तु, शिल्प और आलोचना पर चर्चा हुई। बाद के वर्षों में इससे जुड़े साहित्यिक आयोजनों में देश के विभिन्न क्षेत्रों के लघुकथाकारों की भागीदारी भी दिखाई देती है। (laghukathaduniya.blogspot.com)

मध्यप्रदेश में लघुकथा के विकास पर लिखे गए एक आलेख में भी इंदौर और ‘क्षितिज’ के योगदान को रेखांकित किया गया है। उसमें राठी जी के संपादकीय कार्य और 2018 में अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन के आयोजन में उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है। (Setu)

इसलिए राठी जी की रचनाओं का अध्ययन करते समय ‘लेखक’ और ‘संपादक’ की भूमिकाओं को अलग-अलग करके देखना उचित नहीं होगा। दोनों मिलकर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को पूरा करते हैं।

8. आर्थिक असमानता और भूख
राठी जी की लघुकथाओं का एक मजबूत पक्ष आर्थिक असमानता का चित्रण है। उनके यहाँ गरीबी कोई दूर की समस्या नहीं है। वह पात्र के घर, शरीर और संबंधों में उतरती हुई दिखाई देती है। ‘आटा और जिस्म’ इसका स्पष्ट उदाहरण है। सुजान मशीन दुर्घटना में अपने दोनों हाथ खो देता है और काम करने में असमर्थ हो जाता है। मिलने वाला मुआवजा जल्दी खत्म हो जाता है। उसकी पत्नी रमिया दूसरे लोगों के घरों में काम करके परिवार चलाती है। एक समय ऐसा आता है जब घर में दो दिन से आटा नहीं है। (रचनाकार)
कथा यहीं से अपना असली तनाव पैदा करती है। रमिया किसी तरह आटा लेकर लौटती है और उसे गूँधने लगती है। भूखा सुजान उस आटे और अपनी पत्नी के शरीर के बीच फर्क महसूस नहीं कर पाता। यही वह क्षण है जहाँ शीर्षक अपना पूरा अर्थ खोलता है। ‘आटा’ यहाँ केवल भोजन नहीं है। वह जीवन की मूल जरूरत है। ‘जिस्म’ केवल शरीर नहीं है। वह उस आर्थिक व्यवस्था की ओर संकेत करता है जिसमें भूख मनुष्य की गरिमा तक को संकट में डाल देती है। रचना की ताकत यह है कि लेखक इस स्थिति पर लंबा भाषण नहीं देता। दृश्य स्वयं बोलता है।

9. ‘जिस्मों का तिलिस्म’: शरीर से अस्मिता तक
‘जिस्मों का तिलिस्म’ राठीजी की सामाजिक दृष्टि को समझने वाली महत्त्वपूर्ण रचना है। लघुकथा में राशन की दुकान के सामने खड़े लोग झुके हुए हैं। कथावाचक को वे दूर से ‘सिरकटे जिस्म’ दिखाई देते हैं। जब वह कारण पूछता है तो पता चलता है कि वे पेट भरने के लिए राशन की कतार में खड़े हैं। कथा में उनके हाथों का न होना भी एक महत्त्वपूर्ण संकेत बनता है। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)

यहाँ शरीर का रूपक कई स्तरों पर काम करता है।
  • पहला स्तर है भूख।
  • दूसरा है निर्भरता।
  • तीसरा है असहायता।
  • और चौथा है सामाजिक agency का खो जाना।
हाथ मनुष्य की कार्य-क्षमता और प्रतिरोध की शक्ति का प्रतीक हो सकते हैं। जब हाथ ही नहीं हैं, तो राशन की बंद व्यवस्था के सामने खड़ा व्यक्ति केवल प्रतीक्षा कर सकता है। इस अर्थ में लघुकथा भूख से आगे जाकर नागरिक असहायता की ओर पहुँचती है।

10. भ्रष्टाचार का सामान्यीकरण : ‘पेट का सवाल’
‘पेट का सवाल’ भ्रष्टाचार को लेकर राठी जी की सबसे स्पष्ट और प्रभावशाली रचनाओं में रखी जा सकती है।लघुकथा में सड़क निर्माण के दौरान एक नया मजदूर पर्याप्त डामर मिलाने की कोशिश करता है। ठेकेदार उसे रोकता है और समझाता है कि डामर में कई लोगों का ‘हिस्सा’ है। इसलिए सड़क का अच्छा बन जाना ही समस्या बन जाएगा। (रचनाकार)

यहाँ व्यंग्य का तरीका दिलचस्प है। ठेकेदार भ्रष्टाचार को अपराध नहीं मानता। वह उसे व्यवस्था का सामान्य नियम मानता है और यही लघुकथा का सबसे तीखा बिंदु है।
भ्रष्टाचार तब अधिक खतरनाक हो जाता है जब वह गलत काम नहीं, बल्कि ‘काम करने का तरीका’ बन जाए।शीर्षक ‘पेट का सवाल’ भी इसी दोहरे अर्थ को सामने लाता है। एक तरफ गरीब व्यक्ति की वास्तविक भूख है।दूसरी तरफ उन लोगों की आर्थिक लालसा है जिनका ‘पेट’ कभी भरता नहीं।
राठीजी की व्यंग्यात्मक शक्ति इसी जगह दिखाई देती है। वे भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अलग से भाषण नहीं देते। वे भ्रष्ट व्यक्ति को अपनी भाषा में बोलने देते हैं। पाठक स्वयं निष्कर्ष तक पहुँचता है।

11. स्त्री और पुरुष के दोहरे नैतिक मानदंड : ‘खुली किताब’
राठी जी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ केवल गरीबी या भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है। निजी संबंध भी उनके लिए सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं। ‘खुली किताब’ में पति अपने पुराने प्रेम-प्रसंगों को पत्नी के सामने सहजता से सुनाता है। उसे लगता है कि ऐसा करना उसकी ‘खुली’ और ईमानदार जिंदगी का प्रमाण है। फिर वही व्यक्ति पत्नी से उसके अतीत के बारे में बताने को कहता है। (रचनाकार)

पत्नी का उत्तर लघुकथा की दिशा बदल देता है। वह पूछती है कि अगर उसकी जिंदगी की किताब में भी ऐसे ही कुछ पन्ने हों तो क्या पति उसी तरह मुस्कुरा पाएगा?
पति का मौन उत्तर बन जाता है।
इस लघुकथा में राठी ने स्त्री-विमर्श को किसी नारे के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने घरेलू बातचीत के भीतर मौजूद दोहरे मानदंड को पकड़ा है। पुरुष के लिए जो ‘अनुभव’ है, वही स्त्री के लिए ‘चरित्र’ क्यों बन जाता है?
लघुकथा इसी प्रश्न को पाठक के सामने छोड़ देती है।

12. सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना
राठी जी के साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उनका सामाजिक यथार्थ केवल कठोर नहीं है। उसमें करुणा भी है। जिस्मों का तिलिस्म पर प्रकाशित समीक्षा में भी उनकी रचनाओं को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के मेल के रूप में देखा गया है। समीक्षा विशेष रूप से निम्नवर्गीय जीवन, आर्थिक विषमता और मानवीय स्थिति की ओर ध्यान दिलाती है। (hastaksher.com)

यह बात ‘आटा और जिस्म’ में साफ दिखाई देती है। वहाँ गरीबी केवल आर्थिक तथ्य नहीं है। वह पति-पत्नी के संबंध, शरीर और आत्मसम्मान को प्रभावित करती है।
‘पेट का सवाल’ में भ्रष्टाचार है, लेकिन उसके पीछे सड़क इस्तेमाल करने वाले आम लोगों का जीवन भी है।
‘खुली किताब’ में लैंगिक असमानता है, लेकिन उसके भीतर पति-पत्नी के संबंध की नैतिकता का प्रश्न भी है।
इसलिए राठीजी की लघुकथाओं को केवल ‘सामाजिक समस्या की लघुकथाएँ’ कहना पर्याप्त नहीं होगा।
उनकी चिंता अंततः मनुष्य की स्थिति को लेकर है।

13. सहज भाषा
सतीश राठी की भाषा को समझने के लिए उनकी रचनाओं के संवाद पढ़ लेना पर्याप्त है। ‘पेट का सवाल’ में ठेकेदार जिस तरह बोलता है, वह किसी साहित्यिक भाषण की तरह नहीं लगता। ‘खुली किताब’ में पति-पत्नी की बातचीत भी रोजमर्रा के जीवन के करीब है। (रचनाकार)
यह सहजता उनकी लघुकथाओं को पाठक के करीब लाती है। उनकी भाषा में सामान्यतः छोटे और सीधे वाक्य, बोलचाल के संवाद, पात्रानुकूल शब्द, सीमित लेकिन प्रभावी प्रतीक, और अंत में अर्थ का विस्तार मिलता है।
जिस्मों का तिलिस्म की समीक्षा भी उनकी भाषा को सहज, स्वाभाविक और संप्रेषणीय मानती है। (hastaksher.com)
लघुकथा के लिए यह गुण विशेष महत्त्व रखता है। छोटी रचना में भाषा यदि अनावश्यक रूप से भारी हो जाए तो कथ्य का प्रभाव कम हो सकता है। राठी सामान्यतः इस समस्या से बचते हैं।

14. शीर्षक और प्रतीक
राठीजी की कई लघुकथाओं में शीर्षक स्वयं कथा का अर्थ खोलने की कुंजी बन जाता है।



यहाँ शीर्षक केवल पहचान नहीं है। वह कथा के भीतर प्रवेश करने का रास्ता बन जाता है। ‘आटा और जिस्म’ में दो अलग चीजों को एक साथ रखकर लेखक आर्थिक विवशता की भयावहता को सामने लाता है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में ‘जिस्म’ शब्द व्यक्ति की पहचान को शरीर तक सीमित करने वाली व्यवस्था का संकेत बन जाता है। इस तरह शीर्षक और कथ्य के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है।

15. अंत की भूमिका
लघुकथा के प्रभाव में उसका अंत बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। राठी की प्रतिनिधि रचनाओं में अंतिम स्थिति कथा को नया अर्थ देती है। ‘खुली किताब’ में पति का सिर झुका लेना लघुकथा का निर्णायक क्षण है। लेखक यह नहीं कहता कि पुरुष गलत था। उसका मौन ही यह बात कह देता है। (रचनाकार) ‘पेट का सवाल’ में भ्रष्टाचार को ‘सबके पेट’ से जोड़ना व्यंग्य को अंतिम धार देता है। (रचनाकार) ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में शरीर के हाथों का गायब होना लघुकथा के सामाजिक अर्थ को अचानक गहरा कर देता है। (pradeepkant.blogspot.com) इस प्रकार अंत केवल घटना को समाप्त नहीं करता। वह पाठक की सोच को आगे बढ़ाता है।

16. राठी के साहित्य में निम्नवर्गीय जीवन
राठी की सामाजिक दृष्टि का सबसे मजबूत क्षेत्र निम्न और निम्न-मध्यवर्गीय जीवन दिखाई देता है। उनके पात्र बड़े शहरों की चमकदार दुनिया के केंद्र में नहीं हैं। वे अक्सर उस दुनिया के किनारे खड़े हैं।
  • राशन की कतार में खड़े लोग।
  • मशीन दुर्घटना के बाद काम खो चुका मजदूर।
  • दूसरों के घरों में काम करने वाली स्त्री।
  • भ्रष्ट ठेकेदारी व्यवस्था में काम करता मजदूर।
इन पात्रों के माध्यम से राठी उस समाज को सामने लाते हैं जो अक्सर साहित्य और सार्वजनिक विमर्श में दिखाई तो देता है, लेकिन उसकी आवाज कम सुनाई देती है। जिस्मों का तिलिस्म की समीक्षा में भी उच्चवर्गीय जीवन और निम्नवर्गीय विवशता के बीच मौजूद आर्थिक अंतर को राठी के लेखन की प्रमुख विशेषता माना गया है। (hastaksher.com)

17. व्यवस्था-बोध
राठीजी की रचनाओं में व्यक्ति और व्यवस्था के बीच तनाव बार-बार आता है। व्यक्ति अकेला है - व्यवस्था बड़ी है। लेकिन उनकी लघुकथा इस असमानता को केवल स्वीकार नहीं करती। वह उसे दिखाती है और पाठक को असहज करती है। ‘पेट का सवाल’ में व्यवस्था भ्रष्टाचार को सामान्य बनाती है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में व्यवस्था के सामने व्यक्ति के हाथ ही नहीं बचे। ‘आटा और जिस्म’ में आर्थिक व्यवस्था व्यक्ति की देह तक पहुँच जाती है। इन रचनाओं को साथ पढ़ने पर एक साझा प्रश्न उभरता है:
क्या आर्थिक और संस्थागत व्यवस्था मनुष्य की गरिमा से बड़ी हो सकती है?
राठीजी का साहित्य इस प्रश्न का सीधा सैद्धांतिक उत्तर नहीं देता। वह ऐसी स्थितियाँ बनाता है जिनमें पाठक स्वयं उत्तर खोजे।

18. साहित्यिक योगदान और पुरस्कार
राठी की साहित्यिक सक्रियता को विभिन्न स्तरों पर मान्यता मिली है। उनके लेखक-परिचय में शब्द साक्षी हैं के लिए 2006 में साहित्य कलश, इंदौर द्वारा ईश्वर पार्वती स्मृति सम्मान का उल्लेख है। 2012 में लघुकथा के क्षेत्र में योगदान के लिए माँ शरबती देवी सम्मान मिलने की जानकारी भी उपलब्ध है। (Sahityakunj)
लेकिन उनके योगदान को केवल पुरस्कारों से नहीं आँका जाना चाहिए। उनकी वास्तविक उपलब्धि उनके लंबे साहित्यिक जुड़ाव में दिखाई देती है। उन्होंने लिखा भी, संपादित भी किया और लघुकथा को लेकर साहित्यिक गतिविधियाँ भी संचालित कीं। यही तीनों स्तर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाते हैं।

19. अकादमिक स्वीकृति
सतीश राठी के साहित्य पर विश्वविद्यालय स्तर पर शोध हुआ है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. शोधकार्य किया गया था। (laghukathaduniya.blogspot.com)
यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि राठी जी का साहित्य केवल समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं तक सीमित नहीं रहा। उस पर अकादमिक स्तर पर भी विचार हुआ। हालाँकि वर्तमान अध्ययन उस पूर्व शोध की पुनरावृत्ति नहीं करता। इसका जोर विशेष रूप से सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के संबंध पर है।

20. चर्चा
अब तक के विश्लेषण से राठीजी की लघुकथा-दृष्टि के कुछ स्पष्ट बिंदु सामने आते हैं।
  • पहला, उनका यथार्थ जमीन से जुड़ा है। वे बड़े सिद्धांतों को पात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी में पकड़ते हैं।
  • दूसरा, उनके यहाँ आर्थिक प्रश्न बहुत बार नैतिक प्रश्न बन जाता है। भूख केवल भोजन की कमी नहीं रहती। वह गरिमा और निर्णय की स्वतंत्रता को भी प्रभावित करती है।
  • तीसरा, उनका व्यंग्य व्यवस्था को बाहर से देखकर नहीं आता। कई बार व्यवस्था के भीतर का पात्र ही अपनी भाषा में उसकी पोल खोल देता है।
  • चौथा, स्त्री-पुरुष संबंधों में वे बराबरी और दोहरे मानदंड पर प्रश्न उठाते हैं।
  • पाँचवाँ, उनकी भाषा सहज है। यह सहजता उनकी रचनाओं को सरल बनाती है, लेकिन उनका अर्थ सरल नहीं करती।
  • और अंत में, राठी की लघुकथाओं में संवेदना और सामाजिक आलोचना साथ-साथ चलती हैं।
21. निष्कर्ष
सतीश राठी की लघुकथाएँ अपने समय और समाज को देखने का एक मानवीय तरीका प्रस्तुत करती हैं। उनके यहाँ गरीबी केवल आँकड़ा नहीं है। वह भूखे शरीर की पीड़ा है। भ्रष्टाचार केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है। वह उस सड़क की खराबी है जिस पर आम आदमी चलता है। लैंगिक असमानता केवल सामाजिक सिद्धांत नहीं है। वह पति-पत्नी के बीच बोले गए एक छोटे-से वाक्य में सामने आ सकती है। यही उनकी लघुकथा की खासियत है।
‘आटा और जिस्म’ में भूख और शरीर का संबंध सामाजिक व्यवस्था की कठोरता को सामने लाता है। ‘पेट का सवाल’ भ्रष्टाचार के सामान्यीकरण पर चोट करती है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ भूख, असहायता और नागरिक अस्मिता का तीखा रूपक बन जाती है। ‘खुली किताब’ निजी संबंधों के भीतर छिपे लैंगिक दोहरेपन को उजागर करती है। (रचनाकार)
राठीजी की साहित्यिक भूमिका इन रचनाओं से भी आगे जाती है। ‘क्षितिज’ के माध्यम से उन्होंने लघुकथा को केवल लिखने की विधा नहीं रहने दिया; उसके लिए एक साहित्यिक संवाद का वातावरण तैयार किया। तीसरा क्षितिज और समक्ष जैसे संपादित संकलन तथा लंबे समय तक किया गया संपादकीय कार्य इस बात का प्रमाण हैं। (jangatha.blogspot.com)
इसलिए सतीश राठी का मूल्यांकन केवल उनके लघुकथा-संग्रहों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। उनका साहित्यिक अवदान तीन स्तरों पर दिखाई देता है—रचना, संपादन और लघुकथा-संवर्धन।
उनकी श्रेष्ठ लघुकथाएँ पाठक को कोई तैयार निष्कर्ष नहीं देतीं। वे एक स्थिति सामने रखती हैं और फिर चुप हो जाती हैं। उस चुप्पी में प्रश्न बचा रहता है।
और यही उनकी लघुकथा की सबसे बड़ी शक्ति है।

संदर्भ सूची
  • राठी, सतीश. शब्द साक्षी हैं. लघुकथा-संग्रह, 2002. इस प्रकाशन वर्ष का उल्लेख उपलब्ध लघुकथा-सूची में मिलता है। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • राठी, सतीश. जिस्मों का तिलिस्म. ऋषिराज प्रकाशन, ग्राम ईटावदी, तहसील महेश्वर, जिला खरगोन, मध्य प्रदेश. ISBN 978-81-956080-2-7. उपलब्ध समीक्षा के अनुसार संग्रह में 72 लघुकथाएँ हैं। (hastaksher.com)
  • राठी, सतीश. ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’. रचनाकार, 26 अक्टूबर 2018. (रचनाकार)
  • राठी, सतीश. ‘जिस्मों का तिलिस्म’. विभिन्न साहित्यिक प्रकाशनों में प्रकाशित पाठ। उपलब्ध पाठ के आधार पर अध्ययन। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • राठी, सतीश. ‘लघुकथा, इंदौर और क्षितिज’. जनगाथा, 2022. (jangatha.blogspot.com)
  • द्वितीयक स्रोत
  • गिरकर, दीपक. ‘जिस्मों का तिलिस्म: मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती लघुकथाएँ’. हस्ताक्षर, अगस्त 2023. (hastaksher.com)
  • सुपेकर, संतोष. ‘लघुकथा और उज्जैन’. लघुकथा दुनिया. (laghukathaduniya.blogspot.com)
  • ‘मध्यप्रदेश में लघुकथा, अतीत और वर्तमान’. सेतु. 2018. (Setu)
  • ‘सतीश राठी’. साहित्य कुंज. लेखक-परिचय एवं कृतियों की सूची. (Sahityakunj)
  • ‘सतीश राठी’. लघुकथा-वार्ता, मार्च 2017. लेखक-परिचय एवं कृतियों की जानकारी. (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • ‘साहित्य समाचार // प्राची—फरवरी 2018’. रचनाकार. ‘क्षितिज’ की साहित्यिक गतिविधियों संबंधी विवरण. (रचनाकार)
  • सुपेकर, संतोष. ‘लघुकथा और उज्जैन’. (विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में भारती ललवानी द्वारा डॉ. शैलेंद्र कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए एम.फिल. शोध ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ का उल्लेख) (laghukathaduniya.blogspot.com)

रविवार, 29 दिसंबर 2019

ज्योति जैन के लघुकथा संग्रह 'निन्यानवे के फेर में' का विमोचन


December 29, 2019

किसी भी रचनाकार के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण होता है कि उसकी सारी रचनाएं हर अर्थ में भिन्न हों। इस दृष्टि से शहर की ख्यातनाम लेखिका ज्योति जैन की रचनाएं आकर्षित करती हैं। वे हमारे ही आसपास के परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। भाषा,शैली और शिल्प का रचाव और कसाव ही उनकी लघुकथाओं का सम्मोहन है। उक्त विचार जाने माने उपन्यासकार और शिवना प्रकाशन के श्री पंकज सुबीर ने व्यक्त किए।

वे लेखिका ज्योति जैन के लघुकथा संग्रह निन्यानवे के फेर में के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे। मुख्य अतिथि का दायित्व निभाते हुए पंकज सुबीर ने कहा कि लेखिका ज्योति जैन ने साहित्य की लगभग हर विधा में स्वयं को सुव्यक्त किया है जबकि लेखन और समाज की तमाम जिम्मेदारियों के बीच एक साथ सभी विधाओं को साधना मुश्किल होता है। लेखिका ने यह साधना बड़ी खूबी से की है।


उन्होंने लेखिका की खूबसूरत कथाओं का वाचन भी किया। पुस्तक पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ लघुकथाकार सतीश राठी ने कहा कि निन्न्यानवे का फेर में शामिल लघुकथाएं सुंदर जीवन जीने की दिशा को इंगित करती है।उनकी जीवन दृष्टि उच्च मानवीय मूल्यों को स्थापित करने की है। उनकी लघुकथा में पात्रों का प्रवेश बड़ी ही सरलता से होता है जितनी कि वे स्वयं सरल और सहज हैं। उनमें रचना के भीतर की संवेदना को पाठकों तक उसी रूप में पहुंचाने का कौशल है जिस रूप में वे स्वयं अनुभव करती हैं।

लेखिका ज्योति जैन ने अपनी लघुकथा और सृजनप्रक्रिया पर कहा कि मेरा छोटा सा लेखन संसार अपनी अनुभूतियों,परिवेश,संबंधों और समाज के आसपास आकार लेता है।मेरी लघुकथाओं ने मुझसे बहुत मेहनत करवाई है। कुछ कथानक और पात्र फोन सुनते सुनते या आटा सानते मानस में उभरते हैं और सारा काम परे रख कागज पर उतरने को बेताब हो जाते हैं और कुछ बरसों अवचेतन में सुप्तावस्था में होते हैं और सुदीर्घ प्रतीक्षा के उपरांत उचित समय पर यकायक लघुकथा के रूप में प्रकट हो जाते हैं।

पाठक के रूप में संगीतकार सलिल दाते ने भी अपने विचार रखे। वामा साहित्य मंच के बैनर तले सम्पन्न इस आयोजन के आरंभ में संगीता परमार ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।

अतिथि द्वय का स्वागत वामा साहित्य मंच की भावी अध्यक्ष अमर चड्ढा, और भावी सचिव इंदु पराशर ने किया। स्वागत उद्बोधन वर्तमान अध्यक्ष पद्मा राजेन्द्र ने किया। अतिथियों को पौधे बड़जात्या परिवार के आत्मीय सदस्यों द्वारा प्रदान किए गए। कार्यक्रम का संचालन गरिमा संजय दुबे ने किया व अंत में आभार श्री शरद जैन ने माना।

Source:
https://hindi.webdunia.com/hindi-literature-articles/jyoti-jain-book-inauguration-119122900016_1.html

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

रिपोर्ट: क्षितिज अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन 2019,इंदौर | सतीश राठी

कोई भी कला संयम और समय के साथ ही विकसित होती है--- सुकेश साहनी


‘क्षितिज’ संस्था,इंदौर द्वारा द्वितीय ‘अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन 2019’ का आयोजन दिनांक 24 नवम्बर 2019, रविवार को श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति, इन्दौर में किया गया। यह कार्यक्रम चार विभिन्न सत्रों में आयोजित हुआ। प्रथम उद्घाटन, लोकार्पण एवम सम्मान सत्र रहा। इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार, कला मर्मज्ञ श्री नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने की। मंच पर क्षितिज साहित्य संस्था के अध्यक्ष श्री सतीश राठी, श्री सूर्यकांत नागर, श्री सुकेश साहनी, श्री श्याम सुंदर अग्रवाल, श्री माधव नागदा एवमश्री कुणाल शर्मा उपस्थित थे। 

संस्था परिचय एवं अतिथियों के लिए स्वागत भाषण श्री सतीश राठी ने दिया। लघुकथा विधा को लेकर वर्ष 1983 से संस्था द्वारा किए गए कार्यों की उन्होंने जानकारी दी एवं संस्था के विभिन्न प्रकाशनों पर जानकारी देते हुए लघुकथा विधा के पिछले 35 वर्ष के इतिहास पर एक दृष्टि डाली। उन्होंने संस्था के इतिहास व कार्यों से सभी को परिचित करवाया। अतिथियों का परिचय देते हुए लघुकथा विधा के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों की जानकारी प्रस्तुत की तथा लघुकथा विधा के लिए दिए जाने वाले सम्मानो की चयन प्रक्रिया वहां पर प्रस्तुत की।

इस सत्र में सत्र अध्यक्ष श्री नर्मदा प्रसाद उपाध्याय को कला साहित्य सृजन सम्मान 2019, श्री सुकेश साहनी को क्षितिज लघुकथा शिखर सम्मान 2019, श्री श्याम सुंदर अग्रवाल को क्षितिज लघुकथा सेतु शिखर सम्मान 2019, श्री माधव नागदा को क्षितिज लघुकथा समालोचना सम्मान 2019, श्री कुणाल शर्मा को क्षितिज लघुकथा नवलेखन सम्मान 2019 एवं श्री हीरालाल नागर को, लघुकथा शिखर सम्मान 2019 से सम्मानित किया गया। इस सत्र में पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। 

क्षितिज पत्रिका के सार्थक लघुकथा अंक का विमोचन सर्वप्रथम हुआ। पुस्तक सार्थक लघुकथाएँ, इंदौर के 10 लघुकथा कारों के लघुकथा संकलन शिखर पर बैठ कर श्री सुकेश साहनी के लघुकथा संग्रह सायबर मैन, श्री भागीरथ परिहार की पुस्तक कथा शिल्पी सुकेश साहनी की सृजन चेतना, ज्योति जैन के लघुकथा संग्रह जलतरंग का अंग्रेजी अनुवाद, डॉ अश्विनी कुमार दुबे के गजल संग्रह कुछ अशहार हमारे भी, श्री चरण सिंह अमी की पुस्तक हिंदी सिनेमा के अग्रज, श्री बृजेश कानूनगो की दो पुस्तके रात नौ बजे का इंद्रधनुष व अनुगमन का विमोचन इस कार्यक्रम के लोकार्पण सत्र में हुआ। उद्घाटन के पश्चात इस तरह कुल 11 पुस्तकों का विमोचन हुआ।

अतिथियों का स्वागत पुरुषोत्तम दुबे, अरविंद ओझा, सतीश राठी, अश्विनी कुमार दुबे, योगेन्द्र नाथ शुक्ल, आशा गंगा शिरढोनकर एवं प्रदीप नवीन ने किया। प्रथम सत्र का संचालन अंतरा करबड़े ने किया। मां सरस्वती के पूजन एवं दीप प्रज्वलन के वक्त सरस्वती वंदना विनीता शर्मा ने प्रस्तुत की।

व्याख्यान सत्र में कुणाल शर्मा ने लघुकथा के आधुनिक स्वरूप पर बात की। श्री माधव नागदा ने शैक्षणिक पाठ्यक्रम में लघुकथा की उपादेयता विषय पर अपने विचार रखे। किशोर और युवा को लघुकथा पाठ्यक्रम में शामिल करवा कर ही साहित्य से परिचित करवाया जा सकता है, उससे उनमें साहित्यिक अभिरुचि का विकास होता है। इतिहास भले ही पुराना हो किंतु यह एक नई विधा है। विधार्थी इससे अंजान हैं इसलिए यदि विधिवत पाठ्यक्रम के द्वारा उन्हें विधा से परिचित करवाया जाए तो आगे शोध के रास्ते खुलते हैं।पंचतंत्र भी लघुकथा का ही रूप है, बुद्ध महावीर भी लघुकथा के माध्यम से अपनी बात कहते थे। समय का अभाव व भाव की तीव्रता के कारण यह विधा अधिक ग्राहय है।

हिंदी और पंजाबी भाषा में समान रूप से लघुकथा लिख रहे श्री जगदीश कुलारिया सम्मेलन में एक सत्र में अतिथि के रूप में मंच पर विराजमान रहे।

कहानी उपन्यास की तरह यह भी सभी विषयों पर अपनी उपयोगिता सिद्ध करेगी।

सुकेश साहनी ने अपने भाषण में लघुकथा के विचार पक्ष एवम विभिन्न विषयों पर रची जा रही लघुकथाओं के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, लघुकथा विषय पर अपने विचार लेखक को व्यक्त करते हुए विषय के साथ न्याय करना प्राथमिकता में होना चाहिए। घटना व विषय विविध हैं। लिखते वक़्त समय देते हुए लिखा जाए। कोई भी कला संयम और समय के साथ विकसित होती है इसलिए किसी भी विषय के साथ समय देकर ही न्याय किया जा सकता है।विचार वह धुरी है जिस पर कल्पना घुमती है। सीप में मोती बनने वाली प्रक्रिया की तरह लघुकथा का सृजन हो सकता है लेकिन शीघ्र मोती पाने के चक्कर में लघुकथा को नोच कर नहीं परोसा जा सकता उसका पूरी तरह से परिपक्व होना जरूरी है।

श्री श्याम सुंदर अग्रवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि पंजाबी लघुकथा से आगे अब हिंदी लघुकथा विकास की बात हो। इंदौर शहर के योगदान को याद करते हुए उन्होंने विविध भाषाओं में लिखने वाली लघुकथा के विकास की बात की। निरंतरता सबसे बड़ा गुण है वह सफलता की और ले जाती है। लघुकथा में भी यह बात उल्लेखनीय है कि तमाम आलोचना के बाद भी लेखकों ने लिखना जारी रखा और आज लघुकथा एक विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। पंजाबी भाषा एवं हिंदी भाषा के आपसी जुड़ाव की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि क्षितिज पत्रिका ने कभी पंजाबी लघुकथाओं पर भी अंक निकाला और मिनी पत्रिका में भी हिंदी के लघुकथाकारों की लघुकथाओं के अनुवाद प्रकाशित किए गए।

विशेष योगदान हेतु, सर्वश्री उमेश नीमा, चरण सिंह अमी, नई दुनिया के अनिल त्रिवेदी, पत्रिका अखबार की संपादक क रुखसाना, दैनिक भास्कर के श्री रविंद्र व्यास श्री प्रदीप नवीन आदि को सम्मानित किया गया। कला सहयोग के लिए वरिष्ठ कलाकार श्री संदीप राशिनकर को भी सम्मानित किया गया।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने अपने वक्तव्य में कहा कि, साहित्य का यात्री सृजन से एकाकर हो जाता है। जो बुद्धि न समझ सके वह चमत्कार कहा जाता है, लघुकथा भी एक सहज चमत्कार है, कहने को लघु किंतु प्रभाव में विराट है। यह विधा, वामन के विराट पग की तरह अपने प्रभाव क्षेत्र में व्यापक रूप से लोकप्रिय है। एक स्वतंत्र विधा के रूप में इसका बड़ा सम्मान है।

लघुकथा की यात्रा की तुलना उन्होंने गंगा की यात्रा से कर कहा कि, अब यह संगम की तरह महत्वपूर्ण हो गई है। संस्कृत आख्यायिका यह नहीं है, उपन्यास का साररूप भी यह नहीं है। लघुकथा भिन्न विधा है एडगर एलान पो अंग्रेजी में इसे पुरोधा रहे। लघुकथा संवेदना का सार रूप है जिसकी तेजस्विता अपूर्व है। प्राचीन ग्रंथों में हर जगह यह विधा भिन्न-भिन्न स्वरूप में उपस्थित रही है।सार्थक संदेश, विसंगति पर चोट व व्यंग्य भी लघुकथा के तत्व माने जाते हैं।

विधाओं के अंतर अवगमन पर उन्होंने कहा विधाओं का आपस में संवाद होना आवश्यक है, अधिक से अधिक अध्ययन यह विवाद समाप्त किया जा सकता है।

श्री नरेंद्र जैन, श्री राजेंद्र मूंदड़ा, श्री नितिन पंजाबी, को भी सम्मानित किया गया। इस सत्र का आभार प्रदर्शन पुरुषोत्तम दुबे ने किया।

कार्यक्रम का द्वितीय सत्र लघुकथा पाठ का था जिसमें 35 से अधिक लघुकथाकारों ने अपनी प्रतिनिधि रचनाओं का पाठ किया। इस सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ लघुकथाकार श्री भागीरथ परिहार ने की। मंच पर अतिथि थे सर्वश्री योगेन्द्र नाथ शुक्ल, पवन जैन, संतोष सुपेकर।

श्रीमती जया आर्य, सुषमा दुबे, सुषमा व्यास, पुष्परानी गर्ग, स्नेहलता, कोमल वाधवानी प्रेरणा, राम मुरत राही, कपिल शास्त्री, दीपा व्यास, आदि ने लघुकथा पाठ किया।

अपने उद्बोधन में श्री योगेंद्रनाथ शुक्ल, श्री पवन जैन, श्री भागीरथ परिहार ने पढ़ी गई लघुकथाओं के कथ्य शिल्प की समीक्षा की। इस सत्र का संचालन निधि जैन ने किया।

तृतीय सत्र नारी अस्मिता व लघुकथा लेखन पर मूल रूप से केंद्रित था। मुख्य अतिथि श्री सूर्यकांत नागर थे। सत्र अध्यक्षता श्री बलराम अग्रवाल ने की। डॉ पुरुषोत्तम दुबे, हीरालाल नागर, ज्योति जैन व वसुधा गाडगिल सत्र में अतिथि के रूप में मौजूद थे। इस सत्र का संचालन श्रीमती सीमा व्यास एवं वत्सला त्रिवेदी ने किया।

श्री सूर्यकांत नागर ने स्त्री पुरुष की संवेदना में भेद बताते हुए स्त्री विमर्श को आवश्यकता पर बल दिया।

श्री बलराम अग्रवाल ने कहा - साहस के साथ स्त्री अस्मिता व अधिकार की बात करने के लिए लेखन से बेहतर कोई माध्यम नहीं है, वेदो से लेकर अब तक स्त्री के विमर्श में गिरावट आई है और अब धीरे-धीरे स्थितियाँ बदली है, भारतीय साहित्य भाषा की मर्यादा के साथ आधुनिक विषय को विस्तार द्वारा सकते हैं।

श्री हीरालाल नागर ने अपने वक्तव्य में स्त्री विर्मश में लघुकथा की उपयोगिता व उसकी यात्रा पर प्रकाश डाला। डॉ पुरुषोत्तम दुबे ने लघुकथा के कालखंड व शिल्प पर चर्चा की। ज्योति जैन ने स्त्री अस्मिता पर कुछ लघुकथाओं के माध्यम से अपनी बात प्रभावी ढंग से प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि स्त्री और पुरुष की तुलना नहीं की जा सकती।

वसुधा गाडगिल ने अपने वक्तव्य में स्त्री के विविध स्वरूप पर लिखे जाने वाले साहित्य पर प्रकाश डाला। नवीन प्रतिमान नवीन विचार आज की आवश्यकता है।

आखिरी महत्वपूर्ण सत्र प्रश्न उत्तर सत्र व मुक्त संवाद व परिचर्चा का था जिसमें लघुकथा विधा से जुड़ी विभिन्न जिज्ञासा, दुविधा उसके कथा शिल्प व प्रभाव पर चर्चा हुई। सत्र की अध्यक्षता श्रीमध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के श्री राकेश शर्मा, संपादक वीणा पत्रिका ने की। मंच पर विभिन्न प्रश्नों का जवाब देने के लिए देश भर में लघुकथा की अलख जगाने के लिए निरंतर सक्रिय श्री सुकेश साहनी, श्री बलराम अग्रवाल, श्री श्याम सुंदर अग्रवाल व श्री ब्रजेश कानूनगो ने विभिन्न प्रश्नों का उचित समाधान करते हुए जवाब दिये। 

लघुकथा में शब्द सीमा क्या हो? लघुकथा व अंग्रेजी की शॉर्ट स्टोरी में क्या भेद है? लघुकथा में संवाद की भूमिका कितनी है? एक चरित्र पर आधारित लघुकथा को मान्य किया जायेगा? लघुकथा व कथा में क्या भेद है? लघुकथा के मापदंड क्या हैं? लघुकथा में व्यंग्य की भूमिका पर प्रश्न क्यों उठाये जाते हैं? लघुकथा में कथ्य का विकास कैसा हो? जैसे और कई प्रश्नों के जवाब देकर नव लेखकों, शोधर्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। सत्र का संचालन डॉ गरिमा संजय दुबे ने किया।

समूचे आयोजन के संदर्भ में, आयोजन में पधारे अतिथियों का उपस्थित लघुकथाकारों का एवं स्थानीय अतिथियों का, क्षितिज संस्था के सचिव श्री अशोक शर्मा भारती ने आभार व्यक्त किया।

इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि लघुकथा की रचना प्रक्रिया एवं विभिन्न विषयों पर लिखी जाने वाली लघुकथा पर चर्चा करने के साथ-साथ सार्थक लघुकथा पर चर्चा विशेष रुप से की गई। क्षितिज संस्था का प्रथम सम्मेलन लघुकथा की सजगता पर केंद्रित था और यह द्वितीय सम्मेलन लघुकथा की सार्थकता पर केंद्रित था।

श्री सतीश राठी 





सोमवार, 25 नवंबर 2019

लघुकथा समाचार | क्षितिज मंच द्वारा इंदौर में आयोजित अ. भा. लघुकथा सम्मेलन

दैनिक भास्कर | Nov 25, 2019.

कहानियां दवा पर लघुकथा इंजेक्शन हैं, फौरन असर करेंगी, बच्चों के पाठ्यक्रम में इन्हें शामिल कर हम जागरूक पीढ़ी तैयार कर सकेंगे


"लघुकथा जातीय भेदभाव, लिंगभेद, स्त्री पर अत्याचारों और साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ किशोरों-युवाओं को प्रभावी ढंग से जागरूक कर सकती है। इसलिए देश के तमाम स्कूल-काॅलेज के पाठ्यक्रमों में श्रेष्ठ लघुकथाओं को शामिल किया जाना चाहिए। कहानी के मुकाबले लघुकथा इंजेक्शन की तरह फौरन असर करती है। आकार में लघु होने और बेहतर संप्रेषण के कारण ये ज्यादा असरदार साबित हुई हैं।' शुक्रवार को क्षितिज के अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन में साहित्यकार माधव नागदा संबोधित कर रहे थे। मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति में हुए सम्मेलन में कई सत्रों में वक्ताओं ने विचार रखे। 


सीप में मोती बनने की प्रक्रिया पीड़ादायक होती है, लघुकथाकार के मन में हो यह पीड़ा 

सुकेश साहनी ने कहा कि सीप में मोती बनने की प्रक्रिया बहुत पीड़ादायक होती है इसी तरह मन में लघुकथा बनने की प्रक्रिया भी पीड़ादायक होना चाहिए। जैसे मोती को निकालने के लिए नाज़ुक शल्य क्रिया होती है, उसी तरह लघुकथा को भी संवारना होता है। रचनायात्रा तपती रेत पर चलने के समान है और पुरस्कार मिलना शीतल छाया है। साहित्यकार श्यामसुंदर अग्रवाल ने कहा कि क्षितिज लघुकथा पत्रिका में पंजाबी लघुकथा पर एक लेख पढ़कर मैंने लघुकथा रचने को चुनौती की तरह लिया और खूब लिखा। आज पंजाब में 25 लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। नर्मदाप्रसाद उपाध्याय ने कहा कि लघुकथाकार दूसरे अनुशासनों में झांककर ही बेहतर लिख सकता है। दृष्टिसम्पन्न होकर ही पुनरावृत्ति के दोष और शिल्पगत वैविध्य के अभाव से मुक्त हुआ जा सकता है। कुणाल शर्मा ने भी संबोधित किया। दूसरे सत्र में 35 लघुकथाकारों ने पाठ किया। 

तीसरे सत्र में नारी अस्मिता और लघुकथा पर सूरीकांत नागर बलराम अग्रवाल, ज्योति जैन और वसुधा गाडगिल ने बातचीत की। आखरी सत्र कथा शिल्प और प्रभाव पर साहित्यकार राकेश शर्मा, सुकेश साहनी, बलराम अग्रवाल, श्याम सुंदर अग्रवाल और ब्रजेश कानूनगो ने सवालों के जवाब दिए। संचालन अंतरा करवेड़े, सीमा व्यास, निधि जैन और डॉ. गरिमा संजय दुबे ने किया। आभार सतीश राठी, पुरुषोत्तम दुबे ने माना। 

श्री नर्मदा प्रसाद उपाध्याय को कला साहित्य सृजन सम्मान, श्री हीरालाल नागर को लघुकथा सम्मान, श्री श्याम सुंदर अग्रवाल को क्षितिज लघुकथा शिखर सेतु सम्मान 2019 हिंदी और पंजाबी भाषा में मिनी पत्रिका के माध्यम से सेतु का काम करने के संदर्भ में दिया गया है जबकि श्री सुकेश साहनी को क्षितिज लघुकथा शिखर सम्मान 2019 प्रदान किया गया है जो गत वर्ष श्री बलराम अग्रवाल को दिया गया था श्री माधव नागदा को क्षितिज लघुकथा समालोचना सम्मान 2019 प्रदान किया गया है गत वर्ष यह सम्मान श्री बीएल आच्छा को दिया गया था। श्री कुणाल शर्मा को क्षितिज लघुकथा नवलेखन सम्मान 2019 से सम्मानित किया गया है गत वर्ष यह सम्मान श्री कपिल शास्त्री को दिया गया था



Sources:
1. https://www.bhaskar.com/news/mp-news-stories-are-short-lived-injections-on-medicine-they-will-make-an-immediate-impact-by-including-them-in-the-curriculum-of-children-we-will-be-able-to-create-a-conscious-generation-075624-6019212.html

2. Shri Satish Rathi

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गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

पुस्तक समीक्षा | श्रापित योद्धा की कष्ट कथा | सतीश राठी

महाभारत हमारे प्राचीन इतिहास की एक ऐसी कथा है, जिसमें धर्म भी है धर्मराज भी है और अधर्म भी है, कृपा भी है पीड़ा भी है, स्वार्थ भी है सेवा भी है, वैमनस्य भी है प्रेम भी है, राजनीति भी है त्याग भी है ,प्रतिशोध भी है दया भी है, कपट भी है निश्चलता भी है, छल भी है और ईमानदारी भी । यह कथा जीवन का एक ऐसा सत्य है जिसमें सारे सुख भी हैं ,सारे दुख भी और इसी कथा का एक पात्र ऐसा भी है जिसके क्रोध ने उसके जीवन को ऐसा नष्ट किया कि वह अपनी यातना, अपनी पीड़ा को सहते हुए आज तक भटक रहा है। ऐतिहासिक किंवदंती को उपन्यास का मुख्य विषय बना कर अश्वत्थामा जैसे खलनायक पात्र को नायक बनाकर श्रीमती अनघा जोगलेकर ने अपना उपन्यास रचा है, 'अश्वत्थामा: यातना का अमरत्व'।

 जीवन में सुख का घंटों का समय भी क्षण मात्र लगता है और दुख का क्षण भी व्यतीत ही नहीं होता । यदि किसी व्यक्ति को दुख और यातना का जीवन भर का श्राप मिल जाए और जीवन अमर हो जाए, तो फिर उसका भटकाव कैसा होगा, इसे शब्द देना शायद  बड़ा कठिन है और एक कड़ी परीक्षा भी। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मुझे यह लगा कि अनघा जी इस कड़ी परीक्षा में मेरिट लिस्ट में पास हुई हैं। उन्होंने महाभारत के इस सूक्ष्म से विषय को उठाकर विस्तार दिया है।  उनकी भाषा पर पकड़ और लेखन के शिल्प पर उनका आधिपत्य ,इतना अधिक तैयारी से परिपूर्ण है कि उपन्यास को पढ़ते हुए कहीं पर भी यह नहीं लगा कि हम कहीं उससे अलग हो रहे हैं। एक चुनौतीपूर्ण बात थी  कि अनघा जी ने अश्वत्थामा पर उपन्यास लिखने का विचार बना लिया और यह विचार पूरे शोध के साथ प्रस्तुत भी किया।

 ऐसा कहा जाता है कि जब कोई व्यक्ति लिखने बैठता है, तो पात्र उसके सामने जीवंत हो जाते हैं। यहां पर अश्वत्थामा जैसे पात्र पर उसे जीवंत कर लिखना कितना पीड़ादायक होगा यह समझा जा सकता है। उपन्यास का प्रारंभ शारण देव नामक एक ब्राह्मण को कथा का सूत्रधार बनाकर किया गया है। शारण देव, उसका पुत्र शत और उसकी पत्नी भगवती इस कथा के सूत्रधार पात्र हैं जो कहीं ना कहीं अपनी भावनाओं के साथ इसमें जुड़ भी जाते हैं। यह तो दंतकथा है कि अश्वत्थामा जो दुर्योधन के अंतिम सेनापति रहे कृष्ण के श्राप से आज भी वन वन भटक रहे हैं, लेकिन क्या वाकई में श्राप होता है या फिर कर्मफल जीवन के साथ यात्रा करते हैं।लेखिका ने प्रत्येक अध्याय के पहले ऐसे कुछ प्रश्न भी उठाए हैं और उनके समाधान भी दिए हैं। महाभारत में कई सारी चमत्कारिक घटनाएं वर्णित है, उनके पीछे के तथ्य और तर्क को  विभिन्न अध्यायों के  पूर्व तार्किक समाधान के साथ प्रस्तुत किया गया है ।

आचार्य द्रोणाचार्य का पुत्र, आचार्य कृपाचार्य का भांजा ,दुर्योधन और कर्ण का प्रिय मित्र अश्वत्थामा जब अपनी कथा खुद शारण देव के सामने वर्णित करता है तो अध्याय दर अध्याय उसका दुख, उसका पश्चाताप उसके शरीर से निकल रहे मवाद की तरह सामने बहता हुआ दिखता है। जन्म के समय अश्व की तरह हिनाहिनाने की आवाज करते हुए पैदा होने से पिता ने उनका नाम अश्वत्थामा रख दिया और यह अभिशापित नाम इतिहास का एक ऐसा हिस्सा बना जो दर-दर भटकने के लिए शापित हो गया है।  इसकी पूर्व पीठिका  के रूप में कृपा कृपी के जन्म की भी कथा है और वहीं से सूत्र जोड़कर कथा को विस्तार दिया है। अनावश्यक हिस्से को बड़ी कुशलता के साथ उपन्यास का हिस्सा बनने से हटा दिया गया है। कृष्ण भी हर पृष्ठ पर विद्यमान होते हुए शायद कहीं नहीं है। यह लेखिका की कुशलता की बात है। कौरव और पांडव और महाभारत के पात्र इतने महत्वपूर्ण रहे हैं कि, उनकी छाया में कोई दूसरा पात्र खड़ा ही नहीं हो सकता, पर यह अनघा जी का लेखकीय कौशल्य है कि उन्होंने  अन्य समस्त महत्वपूर्ण पात्रों को छाया रूप में रखते हुए अश्वत्थामा का अंतर्मन यहां पर प्रस्तुत किया है ।क्रोध भी आता है और दया भी पैदा होती है। उसका दुख एक खलनायक का दुख है, पर पाठक वहां पर भी जाकर जुड़ता है। खलनायक को कहीं पर भी नायक बनाने की कोशिश नहीं की गई है पर रचना कौशल से उसका पश्चाताप भी सामने आया है और उसका क्रोध तथा अहंकार भी । यह सब एक साथ किसी पुस्तक में रखना जिस अतिरिक्त कौशल की  जरूरत की ओर इशारा करता है वह इस युवा लेखिका के पास है, और इसी कौशल के साथ लिखे जाने से यह उपन्यास विश्वसनीय भी हो गया है।

उस समय के सारे तथ्यों पर खोजबीन के साथ प्रत्येक अध्याय के पहले जो समाधान टिप्पणियां दी गई हैं वह सारी टिप्पणियां अपने आप में बड़ी महत्वपूर्ण हैं ,क्योंकि उनमें उठाए गए प्रश्न और उनके समाधान फिर कुछ नए प्रश्न भी खड़े कर देते हैं, और पाठक की सोच को विस्तार भी देते हैं। शायद यह विस्तार पाना ही तो किसी उपन्यासकार की इच्छा होती है, और उसके लिखे जाने की सफलता भी। इस मायने में अनघा जी पूरी तरह सफल हैं और बधाई की हकदार भी।

यह पुस्तक अमेज़ॉन पर उपलब्ध है। इसे लेखिका से सीधे प्राप्त करने हेतु नीचे दिये ईमेल पर सम्पर्क कर सकते हैं
anaghajoglekar@yahoo.co.in


- सतीश राठी
आर 451, महालक्ष्मी नगर ,
इंदौर 452 010
मोबाइल 94250 67204

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Note:

हालांकि अश्वत्थामा: यातना का अमरत्व एक उपन्यास है लेकिन लेखिका ने उपसंहार में एक लघुकथा को उद्धरित किया है। एक उपन्यास और लघुकथा में सहसंबंध स्थापित करना स्वागत योग्य है।

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

लघुकथा कलश (तृतीय महाविशेषांक) की समीक्षा श्री सतीश राठी द्वारा

श्री योगराज प्रभाकर के संपादन में 'लघुकथा कलश' का तीसरा महाविशेषांक प्रकाशित हो चुका है और तकरीबन सभी लघुकथा पाठकों को प्राप्त भी हो चुका है। मुझे भी पिछले दिनों यह विशेषांक प्राप्त हो गया और इसे पूरा पढ़ने के बाद मुझे यह जरूरी लगा कि इस विशेषांक पर चर्चा जरूरी है।

इस विशेषांक के पहले भाग में डॉ अशोक भाटिया, प्रोफेसर बीएल आच्छा और रवि प्रभाकर ने श्री महेंद्र कुमार, श्री मुकेश शर्मा एवं डॉ कमल चोपड़ा की लघुकथाओं के बहाने समकालीन लघुकथा लेखन पर बातचीत की है। यह इसलिए महत्वपूर्ण कहा जा सकता है कि इसमें एक नया लघुकथाकार दो वरिष्ठ लघुकथाकारों के साथ अपनी लघुकथाओं को लेकर प्रस्तुत हुआ है और यह लघुकथाएं विधा की नई संभावनाओं की और दिशा देने वाली लघुकथाएं हैं जिसके बारे में डॉ अशोक भाटिया ने भी इंगित किया है। लघुकथाओं को देखने के बाद लघुकथाओं को लेकर कोई चिंता नहीं रखना चाहिए। बहुत सारी अच्छी लघुकथाएं विशेषांक में समाहित है। नौ आलेख इसे समृद्ध करते हैं। कल्पना भट्ट का पिता पात्रों को लेकर लिखा गया आलेख, डॉ ध्रुव कुमार का लघुकथा के शीर्षक पर आलेख, लघुकथा की परंपरा और आधुनिकता पर डॉक्टर पुरुषोत्तम दुबे ,लघुकथा के द्वितीय काल परिदृश्य पर डॉ रामकुमार घोटड, लघुकथा के भाषिक प्रयोगों पर श्री रामेश्वर कांबोज, खलील जिब्रान की लघुकथाओं पर डॉक्टर वीरेंद्र कुमार भारद्वाज, लघुकथा के अतीत पर डॉक्टर सतीशराज पुष्करणा और राजेंद्र यादव की लघुकथा पर सुकेश साहनी, इनके साथ में तीन साक्षात्कार जो मुझसे,  डॉ कमल चोपड़ा एवं डॉ श्याम सुंदर दीप्ति से लिए गए हैं, कुछ पुस्तकों की समीक्षा, कुछ गतिविधियों की जानकारी, दिवंगत लघुकथाकारों को श्रद्धांजलि, कुछ गतिविधियों का जिक्र और 177 हिंदी लघुकथाओं के साथ नेपाली, पंजाबी, सिंधी भाषा के विभिन्न लघुकथाकारों की लघुकथाएं इतना सब एकत्र कर प्रस्तुत करने के पीछे भाई योगराज प्रभाकर की कड़ी मेहनत हमारे सामने आती है। ऐसे काम जुनून से ही पूरे होते हैं और वह जुनून इस विशेषांक में दृष्टिगत होता है। पाठक यदि इस विधा को लेकर कोई प्रश्न खड़े करते हैं तो उसका जवाब भी उन्हें इस तरह के विशेषांक में प्राप्त हो जाता है। मैं श्री योगराज प्रभाकर जी की पूरी टीम को विशिष्ट उपलब्धि के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं। पिछले दोनों अंको से और आगे जाकर यह तीसरा अंक सामने आया है और यह आश्वस्ति देता है कि चौथा अंक और अधिक समृद्ध साहित्य के साथ में हम सबके सामने प्रस्तुत होगा। पुनः बधाई।

- सतीश राठी

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

लघुकथा समाचार: सरल काव्यांजलि की इंदौर में गोष्ठी आयोजित




उज्जैन 2 फरवरी 2019 

संस्था सरल काव्यांजलि द्वारा एक साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन इंदौर में किया गया। अध्यक्षता साहित्यकार श्री पुरुषोत्तम दुबे ने की।

अतिथि उपन्यासकार अश्विनी कुमार दुबे थे। कार्यक्रम में सतीश राठी द्वारा परिवर्तन एवं ठोकर नाम की लघुकथाएं प्रस्तुत की गईं। राम मूरत राही ने भूमि एवं तरक्की लघुकथाएं, संतोष सुपेकर द्वारा लघुकथा नया नारा,दीपक गिरकर ने तफ्तीश जारी ह नामक लघुकथा प्रस्तुत किया।

अशोक शर्मा भारती ने कविता आकलन एवं मार्मिक कविता बसंत प्रस्तुत की। अश्विनी कुमार दुबे ने अपनी व्यंग्य रचना शैतान के दिलचस्प कारनामे प्रस्तुत की। संचालन सतीश राठी ने किया। आभार संतोष सुपेकर ने माना।

News Source:
http://avnews.in/%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8C%E0%A4%B0-%E0%A4%AE/

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

लघुकथा समाचार

शहर में आज : दिल की आवाज़ भी सुन / लघुकथा संगोष्ठी
Dainik Bhaskar | Aug 23, 2018 | Indore

लघुकथा संगोष्ठी

समय : शाम 4 बजे से
कहां : लोकमान्य नगर
प्रवेश : सभी के लिए

डिटेल : लघुकथा संगोष्ठी में लघुकथाओं का पाठ होगा। क्षितिज की इस गोष्ठी में डॉ. वसुधा गाडगिल ,सतीश राठी, अंतरा करवडे, विनीता शर्मा, डॉ लीला मोरे, नयना कानिटकर, राममूरत राही, जितेंद्र गुप्ता, बी आर रामटेके, सुरेश बजाज, अखिलेश शर्मा, शारदा गुप्ता, ज्योति जैन, पदमा राजेंद्र, दीपा व्यास, अश्विनी कुमार दुबे, गरिमा दुबे, रश्मि वागले पाठ करेंगे। इसकी अध्यक्षता भोपाल की कथा लेखिका डॉ. मालती बसंत करेंगी।

News Source:
https://www.bhaskar.com/mp/indore/news/city-event-23-august-mp-5943386.html