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गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

साक्षात्कार: कमलेश भारतीय (वरिष्ठ लघुकथाकार) | साक्षात्कारकर्ता: डॉ. लता अग्रवाल

सीसीटीवी कैमरे की तरह जीवन की हर सूक्ष्म बात को पकड़ लेती है : लघुकथा 

खेमे शेमे में साहित्य नहीं पनपता - कमलेश भारतीय

वरिष्ठ लघुकथाकार श्री कमलेश भारतीय से डॉ. लता अग्रवाल की बातचीत


महज सत्रह वर्ष की आयु में कलम थाम, शिक्षक से , प्राध्यापक एवं प्राचार्य के पदों पर अपनी सेवाएं देने के बाद दैनिक ट्रिब्यून चंडीगढ़ में मुख्य संवाददाता रहे, तत्पश्चात हरियाणा ग्रंथ अकादमी में उपाध्यक्ष के पद पर रहे स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाने वाली बेहद जिंदादिल शख्सियत श्री कमलेश भारतीय जी साहित्य के क्षेत्र में भी बेहद लोकप्रिय नाम है । अब तक आपके दस कथा संग्रह हिंदी साहित्य की धरोहर बन चुके हैं । पंजाबी, उर्दू, अंग्रेजी, मराठी, डोगरी, बंगला आदि भाषाओँ में आपकी रचनाएँ अनुवादित हो चुकी हैं । आपकी कृति ’एक संवाददाता की डायरी’ को केन्द्रीय हिंदी निदेशालय नयी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत किया गया । पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने निवास पर इस सम्मान से सम्मानित किया। इसके अलावा आप हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला द्वारा भी सम्मानित हो चुके हैं ।

2017 में पंचकूला साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित लघुकथा सम्मेलन में आपका सान्निध्य मिला तो जाना बेहद विनम्र और बुध्दिजीवी, अनुशासित व्यक्तित्व ...जिनसे प्रेरणा ली जानी चाहिए । आप लघुकथा के आरंभ के सहयात्री रहे हैं अत: लगा आपसे भी लघुकथा पर चर्चा की जानी चाहिए । बातचीत के कुछ अंश आपसे साझा करती हूँ ।


डॉ. लता अग्रवाल - जीवन और समाज में साहित्य की क्या भूमिका है आपसे जानना चाहेंगे ?

कमलेश भारतीय- जीवन और समाज साहित्य के बिना सूने । साहित्य मनुष्य को संवेदनशील बनाता है । जीवन को सरस बनाता है । जीवन को महकाता है । जिस समाज में साहित्य नहीं वह समाज निर्मम और क्रूर हो जाता है । साहित्य हृदय को परिवर्तित कर देता है । बाबा भारती की कहानी यही संदेश देती है । 


डॉ. लता अग्रवाल – जी हम सभी ने पढ़ी है यह कहानी । भारत कथा/कहानी का केंद्र रहा है, लघुकथा भी कथा विधा का ही अंग है। आप साहित्य में इसकी क्या भूमिका देखते हैं ?

कमलेश भारतीय- लघुकथा प्राचीन समय से है। पंचतंत्र व हितोपदेश जाने कितने इसके प्रमाण हैं। लघुकथा बहुत कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कहने में सक्षम विधा है। लघुकथा ने इसीलिए इतनी लोकप्रियता पाई है। आज साहित्य की केंद्रीय विधा बन चुकी है जिसे कभी अखबार के फिलर के रूप में उपयोग किया जाता था। 


 डॉ. लता अग्रवाल -  सहमत हूँ, हमारे यहां साहित्य को कला नहीं विधा माना जाता है कला को आनन्द की वस्तु कहा गया है जबकि साहित्य के मूल में  स+ हित है। लघुकथा एक विधा के रूप में इस कसौटी पर कितनी खरी उतरती है।

कमलेश भारतीय- लघुकथा हर कसौटी पर खरी उतर रही है। ‘सहित’ तो सभी विधाओं की मूल शर्त है। इसके बिना लेखन किसलिए और किसके लिए ? लघुकथा आज सीसीटीवी कैमरे की तरह जीवन के हर सूक्ष्म बात को पकड़ लेती है। यही इसकी खूबी है। गुण है।


डॉ. लता अग्रवाल – जी ,आज पाठ्यक्रमों में लघुकथा को स्थान देने की मांग की जा रही है। आप शिक्षा में इसका कहां तक उपयोग देखते हैं ?

कमलेश भारतीय-  मांग कहां ? मेरी लघुकथाएं पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों में शामिल रही हैं। मेरी तरह अन्य रचनाकारों की लघुकथाएं भी अलग अलग पाठ्यक्रमों में लगी होंगीं। 


डॉ. लता अग्रवाल – मतलब निकट भविष्य में मुख्य विषय के रूप में इसकी कल्पना कई जा सकती है। लघुकथा में पुनर्लेखन को आप किस रूप में देखते हैं, मेरा आशय प्राचीन लघुकथाओं से भी है और पौराणिक से भी।

कमलेश भारतीय-  लघुकथाओं का पुनर्लेखन यानी नये समाज व प्रसंग के साथ जोड़ कर लिखना। ऐसी लघुकथाएं बहुतायत में हैं। मैंने इस तरह का प्रयोग जनता और नेता में किया है। राजा विक्रमादित्य में किया है।


डॉ. लता अग्रवाल – हाँ, आज पुस्तकालयों में सन्नाटे झांक रहे हैं, मुफ्त में भी किताब भेंट करें तो उन्हें पढ़ने के संस्कार नहीं दिखते। क्या कारण है   .पढ़ने में रुचि कम हो रही है या इस भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान के भीतर की बेचैनी है जो उसे एकाग्र नहीं होने देती।

कमलेश भारतीय-  इसीलिए मैं अपनी किताबें स्वयं प्रकाशित कर एक एक पाठक तक पहुंचा रहा हूं। मैंने लिखा है यादों की धरोहर में कि होम डिलीवरी करने में भी संकोच नहीं। मेरी इस पुस्तक के दो संस्करण हाथों हाथ पाठकों तक पहुंच गये। दो माह में संस्करण खत्म। मेरी खुद से चुनौती थी कि दो संस्करण निकाल कर दिखाऊंगा।  पुस्तक कम मूल्य कम हो और पेपरबैक हो। तभी पाठक स्वीकार करता है। महंगे मूल्य क्यों ? 


डॉ. लता अग्रवाल – पुस्तकों का महंगा होना भी एक अहम् कारण है। आज लघुकथा में किन विषय वस्तु को उठाने की दरकार आप महसूस करते हैं जो समाज को संबोधित करने की ताकत रखती है और आवश्यक है।

कमलेश भारतीय-  विषय की कोई कमी नहीं। मोबाइल , इंटरनेट और सोशल मीडिया तक इसके विषयों में शुमार हो चुके हैं। लघुकथा में सबको समा लेने की क्षमता है।


डॉ. लता अग्रवाल – बिलकुल, इधर कुछ समय से लघुकथा में काव्यात्मकता की आवश्यकता महसूस की जा रही है , कहीं - कहीं इस पर काम भी हुआ है। आप इस संबंध में क्या कहना चाहेंगे।

कमलेश भारतीय-  काव्यात्मकता से आपका आश्य सरसता से है। मैंने प्रेम लघुकथाएं ऐसे ही प्रयोग के तौर पर लिखी हैं। सरसता और कथारस जरूरी है। 


डॉ. लता अग्रवाल – ठीक कहा, लघुकथा के अनेक मंच तैयार हो गए हैं ऐसा महसूस किया जा रहा है कि इन मंचों के दबाव में लघुकथा कहीं दब सी गई है। इसमें कितनी सच्चाई है ?

कमलेश भारतीय-  हां। कुछ अति हो रही है। ज्यादा मंच और कम काम। कोई भी मंच वर्ष की श्रेष्ठ लघुकथाओं का संकलन प्रकाशित नहीं करता। यह सुझाव है मेरा।


डॉ. लता अग्रवाल – पूर्णत: सहमत, लघुकथा में भाषा और शिल्प को लेकर जो नए- नए प्रयोग किए जा रहे हैं आप उसे लघुकथा के लिए कितना हितकर मानते हैं ?

कमलेश भारतीय-  बात को हटकर कहने का अंदाज ही नये प्रयोग की ओर ले जाता है। पर सायास नहीं होने चाहिएं।


डॉ. लता अग्रवाल – जी, आज जिस परिमाण में लघुकथाएं लिखी जा रही हैं ,इससे अच्छी लघुकथाओं को लेकर चिंतन उत्पन्न हो रहा है। अच्छी लघुकथा की परिभाषा आपसे जानना चाहेंगे ? 

कमलेश भारतीय-  अच्छी लघुकथा जिसे सायास नहीं अनायास सहज ही लिखा जाए। स्वाभाविक। यह आकाश में बिजली कौंधने के समान है। इसे अनावश्यक विस्तार नहीं दिया जाना चाहिए। जितने कम शब्दों व प्रतीकों में बात कही जाए तो सुखद व श्रेयस्कर।


डॉ. लता अग्रवाल -  कम शब्दों पर जानना चाहूंगी, लघुकथा को जो मैं समझ पाई हूँ कम से कम शब्दों में व्यक्त करने की कला है। मगर आज इसकी शब्द सीमा में निरंतर विकास हो रहा है। आप इस बढ़ती शब्द सीमा से कितनी सहमति रखते हैं ?

कमलेश भारतीय-  ज्यादा लम्बी नहीं होनी चाहिए। शब्द संख्या तय नहीं लेकिन यदि कुछ बढ़ती है तो इसे छोटी कहानी के रूप में लें। कुछ रचनाएं मेरी भी बड़ी हैं और इनके बाद काफी सतर्क होना पड़ा। अपने आलोचक बनना सीखें।


डॉ. लता अग्रवाल – मतलब कम शब्दों में गहरी बात कही जाय, इसी से जुड़ा अगला सवाल, आज बड़ी मात्रा में लघुकथाकारों का आगमन हो रहा है। क्या यह मान लिया जाए कि लघुकथा लिखना आसान है ?

कमलेश भारतीय-  नहीं। आसान नहीं। पर यदि सिर्फ रविवारी लघुकथा ही लिखना है तो कोई लाभ नहीं विधा को। ज्यादा बाढ़  नवम् दशक में आई और फिर उतार भी आया। सोच समझ कर लिखा जाए। गुलेरी का उदाहरण।कम लिखो। उसने कहा था ने उन्हें अमर कर दिया।


डॉ. लता अग्रवाल -  यह भी कहा जाता है कि विषय को शब्द सीमा में नहीं बांधा जा सकता, किन्तु मेरा सवाल फिर वहीं आता है। शब्दों की मितव्ययता ही तो इस विधा की मौलिक पहचान है !

कमलेश भारतीय- शब्द कम से कम और मारक व बेधक शक्ति ज्यादा। शब्दभेदी बाण जैसी।


डॉ. लता अग्रवाल – प्रेरक उदाहरण, जीवन की कठिनाई, मुसीबतों, जटिलताओं और अंतर विरोधों के बीच ही श्रेष्ठ लघुकथाओं का सृजन होता है ? आप इस विचार से कितनी सहमति रखते हैं ?

कमलेश भारतीय- यह तो सारे साहित्य का मूल है  संघर्ष , चुनौतियां जीवन की और सुख दुख सभी तो इसके अंगसंग हैं और लेखन का आधार। लेखन की नींव।


डॉ. लता अग्रवाल –बिलकुल, वर्तमान में लघुकथा प्राचीन नियमों की दीवार फांद कर अपने लिए नए दायरे स्थापित कर रही है इसे कहां तक स्वीकृति की संभावना आप देखते हैं ?

कमलेश भारतीय- नये समय के अनुसार परिवर्तन के लिए हमें तैयार रहना चाहिए और बदलाव सहर्ष स्वीकार करने चाहिएं।


डॉ. लता अग्रवाल – जी, 21वीं सदी के दूसरे दशक में लघुकथा की स्थिति और उपस्थिति के बारे में आपसे जानना चाहेंगे ?

कमलेश भारतीय-  नयी सदी में लघुकथा और अधिक लोकप्रिय होगी। सबके पास समय का अभाव। व्यस्तता के बीच लघुकथा को तुरंत पढ़ा जाता है। यह इसकी खूबी है। गुण है और लोककथाओं की तरह प्रचलित हो रही हैं।


डॉ. लता अग्रवाल – ठीक बात, लघुकथा में अनुभव और अनुभूति को आप किस तरह स्वीकार करते हैं?

कमलेश भारतीय- अनुभव को अनुभूति तक ले जाना और अभिव्यक्त करना ही लेखन की कला है। यदि हमने जो अनुभव किया है उसे लिखने में असमर्थ होते हैं तो निश्चय ही हम अनुभूति तक ले जाने में विफल रहे हैं। यह समझ लीजिए।


डॉ. लता अग्रवाल – जी, जो कुछ भी जीवन में है; साहित्य में वह त्याज्य नहीं, न ही वर्जित है। इस दृष्टि से लघुकथा में कई विषय अनछुए रह गए हैं। अगर आप सहमत हैं तो उन विषयों के बारे में आपसे जानना चाहेंगे ?

कमलेश भारतीय-  नहीं। मेरा ख्याल है कि यह भ्रम है। सभी विषयों को छू रही है लघुकथा। अभी आपने डा. घोटड़ के साथ किन्नर समाज तक की लघुकथाएं दी हैं। क्या पहले कभी इस विषय को छुआ गया ?



डॉ. लता अग्रवाल
–जी धन्यवाद , जब भी कोई विचार या भाव आपके मन में घुमडता है ,आप कैसे तय करते हैं कि उसे किस विधा और किस शिल्प में ढाला जाए ? क्योंकि एक साहित्यकार लघुकथाकार के अतिरिक्त कई विधाओं से जुड़ा होता है।

कमलेश भारतीय-  हां। यहआपने सही कहा। कुछ विषय लघुकथा के लिए चुने लेकिन वे कहानी का रूप ले गये तो कुछ कहानियां लघुकथा बन गयीं। जैसे ताजा लघुकथा तिलस्म। कहानी लिखना चाहता था पर लगा कि लघुकथा में ही बात कह सकता हूं। इस तरह लिखने की प्रक्रिया में अपने आप लेखक मन तय कर लेता है।बस , थोड़ा सा झूठ कहानी लघुकथा के रूप में लिखनी शुरू की लेकिन कहानी बन गयी और खूब चर्चित रही । 


डॉ. लता अग्रवाल –वाह, लघुकथा का वास्तविक उद्देश्य और सार्थकता क्या है ?

कमलेश भारतीय-  हर साहित्यिक विधा का उद्देश्य अपना संदेश देना है। समाज को बदलने में भूमिका निभाना है। मुंशी प्रेमचंद के अनुसार मनोरंजन करना साहित्य लेखन नहीं।   


डॉ. लता अग्रवाल - निर्मल जी ने कहा है कि, 'ठिठुरती आत्मा को गर्माहट देना साहित्य का काम है।' इसी वाक्य को यदि कुछ इस तरह मैं कहूं कि जड़ मानवीय संवेदना में भावों का संचार करना ही लघुकथा का काम है आप कितनी सहमति रखते हैं ?

कमलेश भारतीय- जी बिलकुल सही है ,संवेदना को झकझोरने का काम साहित्य करता है। आत्मा को जगाए रखने का काम साहित्य करता है।


डॉ. लता अग्रवाल – जी साहित्य रागात्मक सम्बन्ध उत्पन्न करता है। लघुकथाकार को धैर्यवान होना चाहिए, ताकि वह विसंगतियों को कटघरे में खड़ा कर सके। क्या आज लघुकथाकार इस कसौटी पर खरे उतर रहे हैं ? 

कमलेश भारतीय- कोशिश। कोशिश। कोशिश।


डॉ. लता अग्रवाल – बहुत खूब , आप काफी समय से लघुकथा से जुड़े हैं, उस वक्त लघुकथा यानी 'साहित्य को जबरन बोना करने या फिलर के रूप में कहीं स्थान पाना मात्र था। आज लघुकथा को आप कहां पाते हैं ? 

कमलेश भारतीय-  फिलर से पूर्ण विधा। पचास साल के सफर में कितने रूप और कितनी मंजिलें तय कीं। जैसे व्य॔ग्य की स्थिति को कभी शूद्र की स्थिति में रखा था हरिशंकर परसाई ने लेकिन आज स्थिति बदल चुकी। ऐसे ही लघुकथा ने बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया। अब कोई पत्र -पत्रिका इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती।


डॉ. लता अग्रवाल – बधाई,  खेमे बनाने से कोई विधा नहीं पनपती फिर भी आज लघुकथा में कई खेमें नित्य जन्म ले रहे हैं। ऐसे में लघुकथा का क्या भविष्य देखते हैं ?

कमलेश भारतीय-  मैंने लम्बे लघुकथा सफर में किसी भी खेमे से अपनेआपको जुडने नहीं दिया। भरसक दूरी बनाए रखी। कुछ नुकसान भी उठाया लेकिन अपने पथ से विचलित नहीं हुआ। खेमे शेमे में साहित्य नहीं पनपता यह मेरा विश्वास है। 


डॉ. लता अग्रवाल –लघुकथाओं के प्रति शौक कैसे उत्पन्न हुआ ? लघुकथा को लेकर आपके साहित्य संसार के बारे में जानना चाहेंगे।

कमलेश भारतीय-  मूलतः कहानियां लिखता था। लम्बी कहानियां। छह कथा संग्रह हैं मेरे।  धर्मयुग , कहानी , सारिका , नया प्रतीक सभी में कहानियां आईं। पहले लघुकथा संग्रह महक से ऊपर को पंजाब के भाषा विभाग की ओर से सर्वोत्तम कथाकृति का पुरस्कार मिला तो एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार। इसके बाबजूद लघुकथा की ओर आकर्षित हुआ और चार लघुकथा संग्रह भी दिए। पांचवें की तैयारी में हूं। कम शब्दों में बड़ी से बड़ी बात पहुंचाना ही आकर्षण का केंद्र बना। नाटक , गजल और दोहे जैसी विधाओं की तरह तुरंत बात पहुंचाना लघुकथा में संभव। एक लघुकथा संग्रह ‘इतनी सी बात’ का पंजाबी में ‘ऐनी कु गल्ल’ के रूप में अनुवाद भी हुआ। इसका नेपाली में भी अनुवाद होने छा रहा है। अनेक लघुकथाएं पंजाबी , गुजराती , मलयालम व अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ। 


डॉ. लता अग्रवाल -  एक लेखक ‘सार्त्र’ रहे, जिन्होंने नोबेल पुरस्कार को भी आलू की बोरी कहकर ठुकरा दिया। आज पुरस्कार लेने की होड़ लगी है, आप भी उसी लेखक समाज से आते हैं मगर जितना में जानती हूँ आप मंच से सदैव दूरी बनाए रखते हैं, इसकी कोई खास वजह...?

कमलेश भारतीय-  लघुकथा के समर्पित सिपाही के तौर पर काम करना पसंद। यही कर रहा हूं पचास वर्ष से। सिर्फ कार्यकर्त्ता की भूमिका। नेतागिरी या पुरस्कार पर आंख नहीं।  पुरस्कार के पीछे भागना पसंद नहीं। आप पुरस्कार के लिए नहीं लिखते। आत्मसंतुष्टि और समाज के लिए लिखते हैं। प्रधानमंत्री तक का पुरस्कार सहज ही मिला। लेखक को श्रेष्ठ लिखने की चिंता करनी चाहिए। पुरस्कारों की नहीं।


डॉ. लता अग्रवाल – काश...! आपने लघुकथा को परिभाषित किया है कि 'मेरी दृष्टि में लघुकथा उन क्षणों का वर्णन है जिन्हें जानबूझकर विस्तार नहीं दिया जा सकता यदि लघुकथा लेखक ऐसा करता है तो सजग पाठक उसे तुरंत पहचान लेता है। तो क्या लघुकथा लेखन के दौरान विषय चयन को लेकर कोई सावधानी रखनी चाहिए ?

कमलेश भारतीय- सावधानी नहीं। अंदर से यह अनुशासन होना चाहिए। सप्रयास कुछ नहीं। सहजता ही मूलमंत्र।


डॉ. लता अग्रवाल – जी, लघुकथा को लेकर जितना समर्पण भाव पंजाबी, गुजराती, डोगरी में संजीदगी से हो रहा है,हिंदी में वह गंभीरता कम ही दिखाई देती है। क्या वजह हो सकती है।

कमलेश भारतीय- समर्पण जरूरी है। बहुत सचेत रहने की जरूरत। हिंदी में मठों की स्थापना ज्यादा और इसे संवारने की ओर ध्यान कम। 


डॉ. लता अग्रवाल – सहमत हूँ,  आपने एक बात बड़ी रोचक कही, 'लघुकथा आंदोलन में बिखराव का कारण सब ने अपनी - अपनी डेढ़ इंच की मस्जिद बनाकर मसीहाई मुद्रा अपना ली है। इससे कैसे बाहर आया जाये?

कमलेश भारतीय-  खुद को खेमों और मठों से दूर रखना ही इसका उपाय है। यही कर रहा हूं। सिर्फ लेखन पर ध्यान। कभी संग्रह संपादन नहीं किया। समाचारपत्र व पत्रिका के संपादन में भी नये रचनाकारों को मुक्तहृदय से मंच प्रदान किया। 

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बुधवार, 14 दिसंबर 2022

पुस्तक समीक्षा | अपकेन्द्रीय बल | लेखक: संतोष सुपेकर | समीक्षक: दिव्या राकेश शर्मा

संवेदना को हौले-हौले से जगाती कथाएँ


"सुपेकर उन लघुकथाकारों में से हैं जो लघुकथा-सृजन का रास्ता अपनी वैचारिक शक्ति के बूते एक अन्वेषी के रूप में खुद खोजते हैं।किसी का अनुगामी होकर चलना उनके रचानात्मक स्वभाव में नहीं हैं।"

आदरणीय संतोष सुपेकर जी के लिए यह उदगार आदरणीय डॉ. पुरुषोत्तम दूबे सर के हैं। उनकी इस बात से मैं भी पूरी तरह सहमत हूँ। हम सुपेकर सर की रचनाओं को विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अक्सर पढ़ते रहते हैं। उनकी रचनाशीलता व लघुकथा के प्रति समर्पण भी उनकी साहित्यिक कर्मठता को दिखाता है।वैचारिक शक्ति का एक उदाहरण सुपेकर जी के नये लघुकथा संग्रह 'अपकेन्द्रीय बल' में आपको मिलेगा।यह उनका छठा लघुकथा संग्रह है जो एचआई पब्लिकेशन से प्रकाशित हुआ है।

'अपकेन्द्रीय बल' में संकलित कथाओं के बारें में आदरणीय योगराज सर लिखते हैं कि,

"इस संग्रह से गुजरते हुए मैंने पाया कि संतोष सुपेकर की लघुकथाएँ हमारे जीवन की विसंगतियों का बहुत ही बारीकी से अन्वेषण करती हैं।यथार्थ से सजी इन लघुकथाओं में जीवन की श्वेत श्याम फोटोग्राफी है।"

कथाओं में निहित मूल भाव और उद्देश्य का सार योगराज सर ने अपने इस वक्तव्य में दिया है। जो भी पाठक संतोष सुपेकर जी की लघुकथाओं से परिचित है वह इस बात से सहमत होगा कि संतोष सुपेकर जी की लघुकथाएँ यथार्थ का आईना हैं।

इन कथाओं में कोई कृत्रिमता नहीं है बल्कि स्वभाविक भाव लिए उन बिन्दुओं पर चोट है जिन बिन्दुओं की डार्क स्याही से हम बचकर निकल जाने की कोशिश करते हैं। कथाओं के पात्र हमारे इर्दगिर्द ही हैं जिन्हें आप रोज देखते हो और आगे बढ़ जाते हो।

सबसे पहले मैं इस संग्रह की लघुकथा विवश प्रस्ताव का जिक्र करूंगी। यह कथा भले ही लेखक के दिमाग की कल्पना हो, लेकिन पात्र सच्चे हैं और मैं व्यक्तिगत ऐसे पात्रों को देख चुकी हूं जिन्होंने लेखन को अपनी आत्मा बना लिया है। एक बेबस वरिष्ठ लेखक जिसने जीवन में लेखन से सम्मान तो पाया किन्तु धन नहीं कमा सके। धन तो जीवन में सम्मान से बढ़कर होता है! इसलिए लेखक के घरवालों को अब लेखक का लिखना पसंद नहीं। लेखन को बचाने के लिए वरिष्ठ लेखक अपनी जमापूंजी को ऐसे व्यक्ति के हाथों सौंप देता है जो संस्था द्वारा लेखकों को सम्मान देने का.काम करता है।

"इसमें से तीन हजार आपकी संस्था के सहायतार्थ रख लीजिए और…दो हजार मेरा सम्मान कार्यक्रम कर मुझे दे देना ताकि मेरे घरवाले मुझे लेखन करने दें।"

इस संवाद को पढ़कर इस कथा के मूल से आप परिचित हो गए होंगे।

लेखक ने लेखन में समाज की उस विसंगति को जो कि लेखको की आत्मपीड़ा बनकर आर्तनाद कर रही है। इस कथा के माध्यम से बड़ी मार्मिकता से उभारा है। डिसेंडिंग ऑर्डर शीर्षक से क्रमशः एक और दो कथाएँ हैं, दोनों ही उम्दा हैं। मुहर,अपार्टमेंट, संकुचन,स्थाई कसक,जुड़ाव, फायर,जैसी कथाएँ मनोवैज्ञानिक अवलोकन पर आधारित हैं।

सुपेकर जी ने सरकारी कार्यालयों और सरकारी कर्मचारियों को लेकर अनेक कथाएँ लिखी हैं।इन कथाओं में व्यवस्था और उसमें शामिल भ्रष्टाचार अपने नग्न रुप में सामने आ रहा है।

संग्रह की कथाओं में प्रवाह है और ठहराव भी।भाषा सहज सुगम है और पात्रानुकूल है।

इन कथाओं के पात्र कभी अपने रोग से लड़ते हुए विजेता होने का सपना देखते हैं तो कभी सच रिश्तों की चुगली कर बतियाते हैं।

हताशा का लावा अच्छा शीर्षक है कथा भी जानदार। कथाओं की डोर सख्त कील से बंधी लेकिन अपने ऊपर ढेरों आशाएं टाँगे यह डोर संवेदना को हौले-हौले से झिंझोड़ कर जगा रही है।

सात रहती दूरियाँ ऐसे ही आपको खंरोच कर निकल जाती है, तो रास्ते का पत्थर टक से आपके दिल पर जाकर लगता है। इस कथा को पढ़कर एक बार अपने मन को ज़रूर टटोलना होगा कि कहीं कभी हमने भी ऐसा तो न कहा या किया था!

सुपेकर जी रचनाधर्मिता के साथ एक और धर्म बहुत स्पष्टता से निभा रहे हैं और वह है साहित्यकारों के हृदय की पीड़ा उनके जीवन में आने वाली दिक्कतों को संजीदगी के साथ समाज और व्यवस्था के सामने रखना। उन्होंने अनेक कथाओं में लेखन जगत की विसंगतियों को उभारा है जैसा कि मैं पहले लिख ही चुकी हूँ।

चाल ,साजिशें और गिरगिट की तरह रंग बदलते पात्रों में एक पात्र लखन दादा भी है, जो राकेश की बारात का स्वागत इसलिए करता है क्योंकि अब उसे पार्षद के इलेक्शन के लिए गरीब राकेश की बस्ती के वोट चाहिएं।

उस रक्त स्नान के खिलाफ इंसानियत के बचने की कथा है।

'अपकेन्द्रीय बल' संग्रह की शीर्षक कथा समाजिक असमानता के तानेबाने और सोच व ज़रूरत पर लिखी गई कथा है। सेठ छगनलाल और सेवक मंगल की आवश्कताओं का अपकेन्द्रीय बल जो कि बेहतरीन कथा बन पड़ी है।

जाति धर्म एक ऐसा विषय जो बेहद संवेदनशील विषय है और अक्सर झगड़े की वजह भी बनता है। संग्रह की प्रथम लघुकथा 'इस बार' में चार दोस्तों के बीच अपने धर्म और जाति के विवाद के बीच उपजी बहस में अचानक सभी सच को देख खामोश हो जाते हैं और अपने ऊपर शर्मिंदा होने लगते हैं।

लघुकथाओं को समझने के लिए पाठकों को उपन्यास को समझने से ज्यादा धैर्य व श्रम की आवश्यकता होती है।अमूमन यह धारणा है कि लघुकथाएं उपन्यास के सामने महत्व नहीं रखती जबकि ऐसा नहीं है क्योंकि एक लघुकथा जो चंद वाक्यों में लिखी जाती है वह हज़ारों शब्दों में लिखे गए उपन्यास से ज्यादा लम्बी कहानी को समेटे होती है, जिसका उद्देश्य समाज की चेतना को जाग्रत करना होता है।

इस संग्रह में भी आपको ऐसी ही कथाएं पढ़ने को मिलेंगी।

संग्रह के लिए आदरणीय सुपेकर सर को बधाई व शुभकामनाएं।

- दिव्या शर्मा

गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

लघुकथा की शैली में एक प्रयोग

कालखंड पर काम करते समय लघुकथा की एक शैली पर भी काम किया था, इस लघुकथा पर मैं समझ सकता हूँ कि काफी काम बचा हुआ है, यह सिर्फ शैली का अभ्यास सा है.

यह शैली घड़ी के घंटों पर आधारित है. हर एक घंटे में जो परिवर्तन आए वे लिखे और घड़ी के घंटों के बदलने को एक घटना जैसा दर्शाने की कोशिश की है.

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बारह घंटे में भगवान् / चंद्रेश कुमार छतलानी


12:00 बजे : वक्त का पाबन्द वह, ठीक वक्त पर नहा-धो कर नशा करने के लिए, क्लॉक टावर के नीचे बैठ कर कपडे में भिगोया हुआ केरोसिन सूंघना शुरू हो गया.


13:00 बजे : उसका एक दोस्त आया. अब तक वह नशे में धुत हो चुका है. दोस्त भी उसके साथ केरोसीन सूंघने लगा.


14:00 बजे : दोस्त ने उससे कहा, कोई भी केरोसीन को केवल सूंघ सकता है, पी नहीं सकता. उसे किक सी लगी और उसने कहा कि वह केरोसीन पी भी सकता है. इस बात पर दोनों की पचास हजार रुपये की शर्त लग गई.


15:00 बजे : नशे की हालत में वह काफी सारा केरोसीन पी गया था, केरोसीन उसके कपड़ों पर भी गिरा हुआ दिखाई दे रहा है.


16:00 बजे : शर्त हारते ही उसका दोस्त बेचैन हो गया था और रुपयों का इंतज़ाम करने को सोचते हुए तब से लेकर अब तक वह सिगरेट पर सिगरेट फूंक रहा है. 


17:00 बजे : उधर ज्यादा केरोसीन पीने के कारण उसके शरीर ने जवाब दे दिया और वह मर गया. आसपास कुछ लोग इकट्ठे हो गए. यह देख कर सिगरेट फूंक रहा दोस्त घबरा कर जलती हुई सिगरेट वहीं फैंक कर भागा. सिगरेट उसके मृत शरीर पर पीछे की तरफ जा गिरी है.

जलती सिगरेट से कुछ ही देर में उसके शरीर में आग लग गई. बाहर व अंदर केरोसीन होने के कारण वह अपने-आप जलने लगा, 


18:00 बजे : धीरे-धीरे आग उसके पूरे शरीर में फ़ैल चुकी है. वहाँ इकट्ठे लोग यह समझ रहे हैं कि वह अपने-आप जल रहा है. वे उसका विडियो भी बना रहे हैं.


19:00 बजे : वह जल कर राख हो गया है.


20:00 बजे : सोशल मीडिया के जरिए यह बात पूरे देश में वायरल हो गई है.


21:00 बजे : वहाँ शहर के अलग-अलग धर्मों के कुछ धर्मगुरु भी आ गए हैं और आपस में चर्चा कर रहे हैं.


22:00 बजे : धर्मगुरुओं की आपसी बातचीत खत्म हो गई. 


23:00 बजे : वहां कुछ पत्रकार बुलाए गए, जो आ चुके हैं और धर्मगुरुओं के मठों व आश्रमों के लोग भी आ गए. कई लोगों की भीड़ भी जमा हो गई है. 


00:00 बजे :  उसकी राख पर रखा बड़ा दान पात्र उसकी समाधी जैसा दिखाई दे रहा है. दान पात्र पर सभी धर्मों के चिन्ह बने हुए हैं. 

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धन्यवाद।

डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी