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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

सतीश राठी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना: एक अध्ययन | चंद्रेश कुमार छतलानी


सतीश राठी: एक संक्षिप्त स्मरण

सतीश राठी (23 फरवरी 1956 – 1 सितंबर 2026) हिंदी लघुकथा के उन रचनाकारों में रहे जिन्होंने इस विधा को केवल लिखा नहीं, बल्कि उसके विकास के लिए लगातार काम भी किया। इंदौर की साहित्यिक भूमि से जुड़े राठी ‘क्षितिज’ संस्था के संस्थापक अध्यक्ष रहे और कई दशकों तक लघुकथा के लेखन, संपादन और प्रसार से जुड़े रहे। उनकी साहित्यिक यात्रा में शब्द साक्षी हैं और जिस्मों का तिलिस्म जैसे लघुकथा-संग्रह, पिघलती आँखों का सच जैसा कविता-संग्रह तथा अनेक संपादित संकलन उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाएँ मराठी, कन्नड़, पंजाबी, गुजराती और बांग्ला सहित विभिन्न भाषाओं में अनूदित हुईं।

राठी का साहित्य आम आदमी के जीवन से गहरे जुड़ा रहा। भूख, गरीबी, श्रम, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, स्त्री-पुरुष संबंध और बदलती मानवीय संवेदनाएँ उनकी लघुकथाओं के प्रमुख सरोकार रहे। उनकी भाषा सहज थी, लेकिन उनके प्रश्न गहरे थे। वे छोटी-सी घटना के भीतर छिपे बड़े सामाजिक अर्थ को पहचानते थे। ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’, ‘खुली किताब’ और ‘जिस्मों का तिलिस्म’ जैसी रचनाएँ इसका प्रमाण हैं।

उनका निधन हिंदी लघुकथा के लिए केवल एक रचनाकार की विदाई नहीं है। यह उस पीढ़ी के एक सक्रिय प्रतिनिधि का जाना है जिसने लघुकथा को एक सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित होते देखा, उसमें लिखा और उसके लिए साहित्यिक वातावरण तैयार किया। ‘क्षितिज’ के माध्यम से उनका संपादकीय और संगठनात्मक योगदान आने वाले समय में भी लघुकथा के इतिहास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।

प्रस्तुत शोध-पत्र उनके इसी रचनात्मक अवदान को उनकी लघुकथाओं के पाठ के आधार पर समझने का एक विनम्र प्रयास है।


सारांश

हिंदी लघुकथा ने आधुनिक हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान उस समय बनाई, जब कम शब्दों में जीवन की बड़ी सच्चाइयों को व्यक्त करने की आवश्यकता महसूस हुई। इस विधा के विकास में अनेक रचनाकारों का योगदान रहा है। सतीश राठी उनमें ऐसे लेखक हैं जिनकी पहचान केवल लघुकथाकार के रूप में नहीं, बल्कि संपादक और लघुकथा के सक्रिय संवाहक के रूप में भी बनी है। इंदौर के साहित्यिक परिवेश से जुड़े राठी जी ने लंबे समय तक ‘क्षितिज’ के माध्यम से लघुकथा लेखन और उसके आलोचनात्मक विमर्श को आगे बढ़ाया। उनकी रचनाओं में भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, स्त्री की स्थिति, पारिवारिक संबंध, वृद्धावस्था और सामाजिक व्यवस्था की विडंबनाएँ बार-बार दिखाई देती हैं।

प्रस्तुत शोध-पत्र में सतीश राठी की प्रतिनिधि लघुकथाओं, ‘जिस्मों का तिलिस्म’, ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’, का विश्लेषण किया गया है। साथ ही उनके साहित्यिक और संपादकीय योगदान को ‘क्षितिज’ के संदर्भ में देखा गया है। अध्ययन का उद्देश्य राठीजी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के संबंध को समझना है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उनकी लघुकथा का सामाजिक सरोकार केवल समस्या-चित्रण तक सीमित नहीं है। वे व्यवस्था के भीतर मौजूद असमानता को सामने लाते हुए व्यक्ति की गरिमा, नैतिकता और संवेदना के प्रश्न को भी उठाते हैं। उनकी भाषा सामान्य जीवन के करीब है और कथ्य को प्रभावी बनाने के लिए संवाद, प्रतीक, विडंबना और अर्थपूर्ण अंत का उपयोग किया गया है।

बीज शब्द: सतीश राठी, हिंदी लघुकथा, सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना, क्षितिज, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, स्त्री-विमर्श

प्रस्तावना

साहित्य अपने समय से अलग नहीं रह सकता। विशेषकर लघुकथा जैसी विधा के लिए यह बात और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। लघुकथा का आकार तो छोटा होता है, लेकिन उसका अनुभव छोटा नहीं होता। कुछ पंक्तियों में लेखक ऐसी स्थिति सामने रख सकता है जो पाठक को लंबे समय तक सोचने के लिए मजबूर करे।
आधुनिक हिंदी लघुकथा के विकास में मध्यप्रदेश के योगदान पर विचार करें तो, इंदौर इस विकास का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा और इस परिवेश में सतीश राठी की भूमिका विशेष ध्यान खींचती है। राठी ने स्वयं लेखन के साथ-साथ संपादन और अपने साहित्यिक संगठन 'क्षितिज' के माध्यम से भी लघुकथा के विकास में काम किया। उपलब्ध लेखक-परिचयों के अनुसार उनका जन्म 23 फरवरी 1956 को इंदौर में हुआ और उन्होंने एम.कॉम. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में शब्द साक्षी हैं और पिघलती आँखों का सच शामिल हैं। उन्होंने तीसरा क्षितिज, मनोबल और अन्य संकलनों का संपादन भी किया। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com) राठी जी की साहित्यिक पहचान को केवल उनकी व्यक्तिगत रचनाओं के आधार पर समझना अधूरा होगा। ‘क्षितिज’ संस्था और उससे जुड़े प्रकाशन उनके साहित्यिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।  (Sahityakunj)

उनकी लघुकथाओं में सामान्य मनुष्य का जीवन केंद्र में आता है। भूख और गरीबी के प्रसंग हों या भ्रष्ट व्यवस्था की आलोचना, स्त्री-पुरुष संबंध हों या परिवार में बदलते मूल्य—राठी का लेखन अपने समय की सामाजिक बेचैनी से संवाद करता है।

इसी कारण इस अध्ययन का मूल प्रश्न है:
सतीश राठी की लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ को किस तरह मानवीय संवेदना में बदलती हैं और इस प्रक्रिया में उनका कथ्य तथा शिल्प किस प्रकार एक-दूसरे का साथ देते हैं?

2. अध्ययन के उद्देश्य
इस अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं:
  • सतीश राठी के लघुकथा-साहित्य की प्रमुख सामाजिक प्रवृत्तियों की पहचान करना।
  • उनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ के स्वरूप का अध्ययन करना।
  • आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और लैंगिक संबंधों के उनके चित्रण को समझना।
  • उनकी लघुकथाओं में मानवीय संवेदना की भूमिका का विश्लेषण करना।
  • उनकी भाषा और शिल्प की प्रमुख विशेषताओं की पहचान करना।
  • ‘क्षितिज’ के माध्यम से उनके संपादकीय और साहित्यिक योगदान का मूल्यांकन करना।
3. शोध-प्रश्न
अध्ययन निम्न प्रश्नों पर केंद्रित है:
1. सतीश राठी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ किन प्रमुख रूपों में सामने आता है?
2. क्या उनकी लघुकथाएँ केवल सामाजिक विसंगतियों की आलोचना करती हैं, या उनमें मानवीय संबंधों और संवेदना के लिए भी कोई जगह बनती है?
3. आर्थिक असमानता और भूख को प्रस्तुत करने के लिए राठी किन कथात्मक युक्तियों का प्रयोग करते हैं?
4. उनकी लघुकथाओं में स्त्री-पुरुष संबंधों की प्रस्तुति किस प्रकार सामाजिक नैतिकता पर प्रश्न उठाती है?
5. ‘क्षितिज’ के माध्यम से राठी का योगदान उनके व्यक्तिगत लेखन से किस तरह आगे जाता है?

4. शोध-पद्धति
यह अध्ययन गुणात्मक और पाठ-आधारित है। इसमें प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया है। प्राथमिक सामग्री के रूप में सतीश राठी की उपलब्ध लघुकथाओं को लिया गया है। विशेष रूप से ‘जिस्मों का तिलिस्म’, ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’। इन रचनाओं को उपलब्ध ऑनलाइन स्रोतों से भी सत्यापित किया गया है। (रचनाकार)

द्वितीयक सामग्री में लेखक-परिचय, साहित्यिक साक्षात्कार, समीक्षाएँ, ‘क्षितिज’ के इतिहास से संबंधित लेख तथा सतीश राठी के साहित्य पर हुए पूर्व शोध के संदर्भ शामिल हैं। उपलब्ध स्रोत बताते हैं कि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. स्तर का शोधकार्य किया गया था। (laghukathaduniya.blogspot.com)

अध्ययन में निम्न विश्लेषणात्मक आधार अपनाए गए हैं:
  • विषय-वस्तु का विश्लेषण
  • पात्र और सामाजिक स्थिति का अध्ययन
  • प्रतीक और व्यंजना का अध्ययन
  • संवाद तथा भाषा का विश्लेषण
  • अंत की भूमिका
  • सामाजिक संदर्भ और मानवीय संवेदना का संबंध
यह अध्ययन मात्र लेखक-परिचय प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं है। इसका केंद्र उनकी रचनाओं के भीतर मौजूद सामाजिक अर्थ हैं।

5. पूर्ववर्ती अध्ययन और शोध-अंतराल
सतीश राठी पर उपलब्ध सामग्री को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में देखा जा सकता है।
पहला, लेखक-परिचय और साहित्यिक गतिविधियों से संबंधित सामग्री है। इसमें उनके प्रकाशन, संपादन, पुरस्कार और ‘क्षितिज’ से जुड़े कार्यों का विवरण मिलता है। (Sahityakunj)

दूसरा, उनकी लघुकथाओं और संग्रहों पर लिखी गई समीक्षाएँ हैं। जिस्मों का तिलिस्म पर प्रकाशित समीक्षा में उसकी 72 लघुकथाओं के माध्यम से सामाजिक शोषण, आर्थिक विषमता और मानवीय संवेदना की चर्चा की गई है। समीक्षा उनकी भाषा को सहज और संप्रेषणीय भी मानती है। (hastaksher.com)

तीसरा, विश्वविद्यालयीय शोध का संदर्भ है। 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. शोध का उल्लेख मिलता है। (laghukathaduniya.blogspot.com)

इन स्रोतों से राठी की साहित्यिक स्थिति का एक आधार बनता है, लेकिन उनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के परस्पर संबंध के आधार पर एक साथ पढ़ने की आवश्यकता बनी रहती है। प्रस्तुत अध्ययन इसी बिंदु पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।

6. सतीश राठी : रचनाकार और संपादक
सतीश राठी का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे लघुकथा के साथ कविता, व्यंग्य, कहानी और निबंध जैसी विधाओं में भी लिखते रहे हैं। (Sahityakunj)

उनका संपादकीय कार्य भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। तीसरा क्षितिज, मनोबल और समक्ष जैसे संकलनों से उनका नाम जुड़ा है। 1991 में समक्ष के माध्यम से मध्यप्रदेश के पाँच लघुकथाकारों की सौ लघुकथाओं को एक साथ प्रस्तुत किया गया था। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है। संपादन किसी विधा के विकास में केवल तकनीकी काम नहीं होता। इससे यह भी तय होता है कि किन रचनाओं को सामने लाया जाए, किन प्रश्नों पर चर्चा हो और नए लेखक किस साहित्यिक वातावरण में प्रवेश करें। राठी जी का ‘क्षितिज’ से जुड़ाव इसी कारण महत्त्वपूर्ण है।

7. ‘क्षितिज’ और लघुकथा का साहित्यिक परिवेश
इंदौर में ‘क्षितिज’ ने लघुकथा को केंद्र में रखकर लंबे समय तक साहित्यिक गतिविधियाँ संचालित कीं। राठी जी के संस्मरणात्मक लेख में इसके विकास, प्रकाशनों और विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। 1986 में 1981 से 1985 तक की श्रेष्ठ लघुकथाओं का संकलन तीसरा क्षितिज प्रकाशित हुआ था। बाद में समक्ष जैसे संकलनों के माध्यम से यह प्रयास आगे बढ़ा। (jangatha.blogspot.com)

‘क्षितिज’ की भूमिका केवल प्रकाशन तक सीमित नहीं रही। इसके माध्यम से लघुकथा की कथावस्तु, शिल्प और आलोचना पर चर्चा हुई। बाद के वर्षों में इससे जुड़े साहित्यिक आयोजनों में देश के विभिन्न क्षेत्रों के लघुकथाकारों की भागीदारी भी दिखाई देती है। (laghukathaduniya.blogspot.com)

मध्यप्रदेश में लघुकथा के विकास पर लिखे गए एक आलेख में भी इंदौर और ‘क्षितिज’ के योगदान को रेखांकित किया गया है। उसमें राठी जी के संपादकीय कार्य और 2018 में अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन के आयोजन में उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है। (Setu)

इसलिए राठी जी की रचनाओं का अध्ययन करते समय ‘लेखक’ और ‘संपादक’ की भूमिकाओं को अलग-अलग करके देखना उचित नहीं होगा। दोनों मिलकर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को पूरा करते हैं।

8. आर्थिक असमानता और भूख
राठी जी की लघुकथाओं का एक मजबूत पक्ष आर्थिक असमानता का चित्रण है। उनके यहाँ गरीबी कोई दूर की समस्या नहीं है। वह पात्र के घर, शरीर और संबंधों में उतरती हुई दिखाई देती है। ‘आटा और जिस्म’ इसका स्पष्ट उदाहरण है। सुजान मशीन दुर्घटना में अपने दोनों हाथ खो देता है और काम करने में असमर्थ हो जाता है। मिलने वाला मुआवजा जल्दी खत्म हो जाता है। उसकी पत्नी रमिया दूसरे लोगों के घरों में काम करके परिवार चलाती है। एक समय ऐसा आता है जब घर में दो दिन से आटा नहीं है। (रचनाकार)
कथा यहीं से अपना असली तनाव पैदा करती है। रमिया किसी तरह आटा लेकर लौटती है और उसे गूँधने लगती है। भूखा सुजान उस आटे और अपनी पत्नी के शरीर के बीच फर्क महसूस नहीं कर पाता। यही वह क्षण है जहाँ शीर्षक अपना पूरा अर्थ खोलता है। ‘आटा’ यहाँ केवल भोजन नहीं है। वह जीवन की मूल जरूरत है। ‘जिस्म’ केवल शरीर नहीं है। वह उस आर्थिक व्यवस्था की ओर संकेत करता है जिसमें भूख मनुष्य की गरिमा तक को संकट में डाल देती है। रचना की ताकत यह है कि लेखक इस स्थिति पर लंबा भाषण नहीं देता। दृश्य स्वयं बोलता है।

9. ‘जिस्मों का तिलिस्म’: शरीर से अस्मिता तक
‘जिस्मों का तिलिस्म’ राठीजी की सामाजिक दृष्टि को समझने वाली महत्त्वपूर्ण रचना है। लघुकथा में राशन की दुकान के सामने खड़े लोग झुके हुए हैं। कथावाचक को वे दूर से ‘सिरकटे जिस्म’ दिखाई देते हैं। जब वह कारण पूछता है तो पता चलता है कि वे पेट भरने के लिए राशन की कतार में खड़े हैं। कथा में उनके हाथों का न होना भी एक महत्त्वपूर्ण संकेत बनता है। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)

यहाँ शरीर का रूपक कई स्तरों पर काम करता है।
  • पहला स्तर है भूख।
  • दूसरा है निर्भरता।
  • तीसरा है असहायता।
  • और चौथा है सामाजिक agency का खो जाना।
हाथ मनुष्य की कार्य-क्षमता और प्रतिरोध की शक्ति का प्रतीक हो सकते हैं। जब हाथ ही नहीं हैं, तो राशन की बंद व्यवस्था के सामने खड़ा व्यक्ति केवल प्रतीक्षा कर सकता है। इस अर्थ में लघुकथा भूख से आगे जाकर नागरिक असहायता की ओर पहुँचती है।

10. भ्रष्टाचार का सामान्यीकरण : ‘पेट का सवाल’
‘पेट का सवाल’ भ्रष्टाचार को लेकर राठी जी की सबसे स्पष्ट और प्रभावशाली रचनाओं में रखी जा सकती है।लघुकथा में सड़क निर्माण के दौरान एक नया मजदूर पर्याप्त डामर मिलाने की कोशिश करता है। ठेकेदार उसे रोकता है और समझाता है कि डामर में कई लोगों का ‘हिस्सा’ है। इसलिए सड़क का अच्छा बन जाना ही समस्या बन जाएगा। (रचनाकार)

यहाँ व्यंग्य का तरीका दिलचस्प है। ठेकेदार भ्रष्टाचार को अपराध नहीं मानता। वह उसे व्यवस्था का सामान्य नियम मानता है और यही लघुकथा का सबसे तीखा बिंदु है।
भ्रष्टाचार तब अधिक खतरनाक हो जाता है जब वह गलत काम नहीं, बल्कि ‘काम करने का तरीका’ बन जाए।शीर्षक ‘पेट का सवाल’ भी इसी दोहरे अर्थ को सामने लाता है। एक तरफ गरीब व्यक्ति की वास्तविक भूख है।दूसरी तरफ उन लोगों की आर्थिक लालसा है जिनका ‘पेट’ कभी भरता नहीं।
राठीजी की व्यंग्यात्मक शक्ति इसी जगह दिखाई देती है। वे भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अलग से भाषण नहीं देते। वे भ्रष्ट व्यक्ति को अपनी भाषा में बोलने देते हैं। पाठक स्वयं निष्कर्ष तक पहुँचता है।

11. स्त्री और पुरुष के दोहरे नैतिक मानदंड : ‘खुली किताब’
राठी जी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ केवल गरीबी या भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है। निजी संबंध भी उनके लिए सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं। ‘खुली किताब’ में पति अपने पुराने प्रेम-प्रसंगों को पत्नी के सामने सहजता से सुनाता है। उसे लगता है कि ऐसा करना उसकी ‘खुली’ और ईमानदार जिंदगी का प्रमाण है। फिर वही व्यक्ति पत्नी से उसके अतीत के बारे में बताने को कहता है। (रचनाकार)

पत्नी का उत्तर लघुकथा की दिशा बदल देता है। वह पूछती है कि अगर उसकी जिंदगी की किताब में भी ऐसे ही कुछ पन्ने हों तो क्या पति उसी तरह मुस्कुरा पाएगा?
पति का मौन उत्तर बन जाता है।
इस लघुकथा में राठी ने स्त्री-विमर्श को किसी नारे के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने घरेलू बातचीत के भीतर मौजूद दोहरे मानदंड को पकड़ा है। पुरुष के लिए जो ‘अनुभव’ है, वही स्त्री के लिए ‘चरित्र’ क्यों बन जाता है?
लघुकथा इसी प्रश्न को पाठक के सामने छोड़ देती है।

12. सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना
राठी जी के साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उनका सामाजिक यथार्थ केवल कठोर नहीं है। उसमें करुणा भी है। जिस्मों का तिलिस्म पर प्रकाशित समीक्षा में भी उनकी रचनाओं को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के मेल के रूप में देखा गया है। समीक्षा विशेष रूप से निम्नवर्गीय जीवन, आर्थिक विषमता और मानवीय स्थिति की ओर ध्यान दिलाती है। (hastaksher.com)

यह बात ‘आटा और जिस्म’ में साफ दिखाई देती है। वहाँ गरीबी केवल आर्थिक तथ्य नहीं है। वह पति-पत्नी के संबंध, शरीर और आत्मसम्मान को प्रभावित करती है।
‘पेट का सवाल’ में भ्रष्टाचार है, लेकिन उसके पीछे सड़क इस्तेमाल करने वाले आम लोगों का जीवन भी है।
‘खुली किताब’ में लैंगिक असमानता है, लेकिन उसके भीतर पति-पत्नी के संबंध की नैतिकता का प्रश्न भी है।
इसलिए राठीजी की लघुकथाओं को केवल ‘सामाजिक समस्या की लघुकथाएँ’ कहना पर्याप्त नहीं होगा।
उनकी चिंता अंततः मनुष्य की स्थिति को लेकर है।

13. सहज भाषा
सतीश राठी की भाषा को समझने के लिए उनकी रचनाओं के संवाद पढ़ लेना पर्याप्त है। ‘पेट का सवाल’ में ठेकेदार जिस तरह बोलता है, वह किसी साहित्यिक भाषण की तरह नहीं लगता। ‘खुली किताब’ में पति-पत्नी की बातचीत भी रोजमर्रा के जीवन के करीब है। (रचनाकार)
यह सहजता उनकी लघुकथाओं को पाठक के करीब लाती है। उनकी भाषा में सामान्यतः छोटे और सीधे वाक्य, बोलचाल के संवाद, पात्रानुकूल शब्द, सीमित लेकिन प्रभावी प्रतीक, और अंत में अर्थ का विस्तार मिलता है।
जिस्मों का तिलिस्म की समीक्षा भी उनकी भाषा को सहज, स्वाभाविक और संप्रेषणीय मानती है। (hastaksher.com)
लघुकथा के लिए यह गुण विशेष महत्त्व रखता है। छोटी रचना में भाषा यदि अनावश्यक रूप से भारी हो जाए तो कथ्य का प्रभाव कम हो सकता है। राठी सामान्यतः इस समस्या से बचते हैं।

14. शीर्षक और प्रतीक
राठीजी की कई लघुकथाओं में शीर्षक स्वयं कथा का अर्थ खोलने की कुंजी बन जाता है।



यहाँ शीर्षक केवल पहचान नहीं है। वह कथा के भीतर प्रवेश करने का रास्ता बन जाता है। ‘आटा और जिस्म’ में दो अलग चीजों को एक साथ रखकर लेखक आर्थिक विवशता की भयावहता को सामने लाता है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में ‘जिस्म’ शब्द व्यक्ति की पहचान को शरीर तक सीमित करने वाली व्यवस्था का संकेत बन जाता है। इस तरह शीर्षक और कथ्य के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है।

15. अंत की भूमिका
लघुकथा के प्रभाव में उसका अंत बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। राठी की प्रतिनिधि रचनाओं में अंतिम स्थिति कथा को नया अर्थ देती है। ‘खुली किताब’ में पति का सिर झुका लेना लघुकथा का निर्णायक क्षण है। लेखक यह नहीं कहता कि पुरुष गलत था। उसका मौन ही यह बात कह देता है। (रचनाकार) ‘पेट का सवाल’ में भ्रष्टाचार को ‘सबके पेट’ से जोड़ना व्यंग्य को अंतिम धार देता है। (रचनाकार) ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में शरीर के हाथों का गायब होना लघुकथा के सामाजिक अर्थ को अचानक गहरा कर देता है। (pradeepkant.blogspot.com) इस प्रकार अंत केवल घटना को समाप्त नहीं करता। वह पाठक की सोच को आगे बढ़ाता है।

16. राठी के साहित्य में निम्नवर्गीय जीवन
राठी की सामाजिक दृष्टि का सबसे मजबूत क्षेत्र निम्न और निम्न-मध्यवर्गीय जीवन दिखाई देता है। उनके पात्र बड़े शहरों की चमकदार दुनिया के केंद्र में नहीं हैं। वे अक्सर उस दुनिया के किनारे खड़े हैं।
  • राशन की कतार में खड़े लोग।
  • मशीन दुर्घटना के बाद काम खो चुका मजदूर।
  • दूसरों के घरों में काम करने वाली स्त्री।
  • भ्रष्ट ठेकेदारी व्यवस्था में काम करता मजदूर।
इन पात्रों के माध्यम से राठी उस समाज को सामने लाते हैं जो अक्सर साहित्य और सार्वजनिक विमर्श में दिखाई तो देता है, लेकिन उसकी आवाज कम सुनाई देती है। जिस्मों का तिलिस्म की समीक्षा में भी उच्चवर्गीय जीवन और निम्नवर्गीय विवशता के बीच मौजूद आर्थिक अंतर को राठी के लेखन की प्रमुख विशेषता माना गया है। (hastaksher.com)

17. व्यवस्था-बोध
राठीजी की रचनाओं में व्यक्ति और व्यवस्था के बीच तनाव बार-बार आता है। व्यक्ति अकेला है - व्यवस्था बड़ी है। लेकिन उनकी लघुकथा इस असमानता को केवल स्वीकार नहीं करती। वह उसे दिखाती है और पाठक को असहज करती है। ‘पेट का सवाल’ में व्यवस्था भ्रष्टाचार को सामान्य बनाती है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में व्यवस्था के सामने व्यक्ति के हाथ ही नहीं बचे। ‘आटा और जिस्म’ में आर्थिक व्यवस्था व्यक्ति की देह तक पहुँच जाती है। इन रचनाओं को साथ पढ़ने पर एक साझा प्रश्न उभरता है:
क्या आर्थिक और संस्थागत व्यवस्था मनुष्य की गरिमा से बड़ी हो सकती है?
राठीजी का साहित्य इस प्रश्न का सीधा सैद्धांतिक उत्तर नहीं देता। वह ऐसी स्थितियाँ बनाता है जिनमें पाठक स्वयं उत्तर खोजे।

18. साहित्यिक योगदान और पुरस्कार
राठी की साहित्यिक सक्रियता को विभिन्न स्तरों पर मान्यता मिली है। उनके लेखक-परिचय में शब्द साक्षी हैं के लिए 2006 में साहित्य कलश, इंदौर द्वारा ईश्वर पार्वती स्मृति सम्मान का उल्लेख है। 2012 में लघुकथा के क्षेत्र में योगदान के लिए माँ शरबती देवी सम्मान मिलने की जानकारी भी उपलब्ध है। (Sahityakunj)
लेकिन उनके योगदान को केवल पुरस्कारों से नहीं आँका जाना चाहिए। उनकी वास्तविक उपलब्धि उनके लंबे साहित्यिक जुड़ाव में दिखाई देती है। उन्होंने लिखा भी, संपादित भी किया और लघुकथा को लेकर साहित्यिक गतिविधियाँ भी संचालित कीं। यही तीनों स्तर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाते हैं।

19. अकादमिक स्वीकृति
सतीश राठी के साहित्य पर विश्वविद्यालय स्तर पर शोध हुआ है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. शोधकार्य किया गया था। (laghukathaduniya.blogspot.com)
यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि राठी जी का साहित्य केवल समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं तक सीमित नहीं रहा। उस पर अकादमिक स्तर पर भी विचार हुआ। हालाँकि वर्तमान अध्ययन उस पूर्व शोध की पुनरावृत्ति नहीं करता। इसका जोर विशेष रूप से सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के संबंध पर है।

20. चर्चा
अब तक के विश्लेषण से राठीजी की लघुकथा-दृष्टि के कुछ स्पष्ट बिंदु सामने आते हैं।
  • पहला, उनका यथार्थ जमीन से जुड़ा है। वे बड़े सिद्धांतों को पात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी में पकड़ते हैं।
  • दूसरा, उनके यहाँ आर्थिक प्रश्न बहुत बार नैतिक प्रश्न बन जाता है। भूख केवल भोजन की कमी नहीं रहती। वह गरिमा और निर्णय की स्वतंत्रता को भी प्रभावित करती है।
  • तीसरा, उनका व्यंग्य व्यवस्था को बाहर से देखकर नहीं आता। कई बार व्यवस्था के भीतर का पात्र ही अपनी भाषा में उसकी पोल खोल देता है।
  • चौथा, स्त्री-पुरुष संबंधों में वे बराबरी और दोहरे मानदंड पर प्रश्न उठाते हैं।
  • पाँचवाँ, उनकी भाषा सहज है। यह सहजता उनकी रचनाओं को सरल बनाती है, लेकिन उनका अर्थ सरल नहीं करती।
  • और अंत में, राठी की लघुकथाओं में संवेदना और सामाजिक आलोचना साथ-साथ चलती हैं।
21. निष्कर्ष
सतीश राठी की लघुकथाएँ अपने समय और समाज को देखने का एक मानवीय तरीका प्रस्तुत करती हैं। उनके यहाँ गरीबी केवल आँकड़ा नहीं है। वह भूखे शरीर की पीड़ा है। भ्रष्टाचार केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है। वह उस सड़क की खराबी है जिस पर आम आदमी चलता है। लैंगिक असमानता केवल सामाजिक सिद्धांत नहीं है। वह पति-पत्नी के बीच बोले गए एक छोटे-से वाक्य में सामने आ सकती है। यही उनकी लघुकथा की खासियत है।
‘आटा और जिस्म’ में भूख और शरीर का संबंध सामाजिक व्यवस्था की कठोरता को सामने लाता है। ‘पेट का सवाल’ भ्रष्टाचार के सामान्यीकरण पर चोट करती है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ भूख, असहायता और नागरिक अस्मिता का तीखा रूपक बन जाती है। ‘खुली किताब’ निजी संबंधों के भीतर छिपे लैंगिक दोहरेपन को उजागर करती है। (रचनाकार)
राठीजी की साहित्यिक भूमिका इन रचनाओं से भी आगे जाती है। ‘क्षितिज’ के माध्यम से उन्होंने लघुकथा को केवल लिखने की विधा नहीं रहने दिया; उसके लिए एक साहित्यिक संवाद का वातावरण तैयार किया। तीसरा क्षितिज और समक्ष जैसे संपादित संकलन तथा लंबे समय तक किया गया संपादकीय कार्य इस बात का प्रमाण हैं। (jangatha.blogspot.com)
इसलिए सतीश राठी का मूल्यांकन केवल उनके लघुकथा-संग्रहों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। उनका साहित्यिक अवदान तीन स्तरों पर दिखाई देता है—रचना, संपादन और लघुकथा-संवर्धन।
उनकी श्रेष्ठ लघुकथाएँ पाठक को कोई तैयार निष्कर्ष नहीं देतीं। वे एक स्थिति सामने रखती हैं और फिर चुप हो जाती हैं। उस चुप्पी में प्रश्न बचा रहता है।
और यही उनकी लघुकथा की सबसे बड़ी शक्ति है।

संदर्भ सूची
  • राठी, सतीश. शब्द साक्षी हैं. लघुकथा-संग्रह, 2002. इस प्रकाशन वर्ष का उल्लेख उपलब्ध लघुकथा-सूची में मिलता है। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • राठी, सतीश. जिस्मों का तिलिस्म. ऋषिराज प्रकाशन, ग्राम ईटावदी, तहसील महेश्वर, जिला खरगोन, मध्य प्रदेश. ISBN 978-81-956080-2-7. उपलब्ध समीक्षा के अनुसार संग्रह में 72 लघुकथाएँ हैं। (hastaksher.com)
  • राठी, सतीश. ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’. रचनाकार, 26 अक्टूबर 2018. (रचनाकार)
  • राठी, सतीश. ‘जिस्मों का तिलिस्म’. विभिन्न साहित्यिक प्रकाशनों में प्रकाशित पाठ। उपलब्ध पाठ के आधार पर अध्ययन। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • राठी, सतीश. ‘लघुकथा, इंदौर और क्षितिज’. जनगाथा, 2022. (jangatha.blogspot.com)
  • द्वितीयक स्रोत
  • गिरकर, दीपक. ‘जिस्मों का तिलिस्म: मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती लघुकथाएँ’. हस्ताक्षर, अगस्त 2023. (hastaksher.com)
  • सुपेकर, संतोष. ‘लघुकथा और उज्जैन’. लघुकथा दुनिया. (laghukathaduniya.blogspot.com)
  • ‘मध्यप्रदेश में लघुकथा, अतीत और वर्तमान’. सेतु. 2018. (Setu)
  • ‘सतीश राठी’. साहित्य कुंज. लेखक-परिचय एवं कृतियों की सूची. (Sahityakunj)
  • ‘सतीश राठी’. लघुकथा-वार्ता, मार्च 2017. लेखक-परिचय एवं कृतियों की जानकारी. (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • ‘साहित्य समाचार // प्राची—फरवरी 2018’. रचनाकार. ‘क्षितिज’ की साहित्यिक गतिविधियों संबंधी विवरण. (रचनाकार)
  • सुपेकर, संतोष. ‘लघुकथा और उज्जैन’. (विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में भारती ललवानी द्वारा डॉ. शैलेंद्र कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए एम.फिल. शोध ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ का उल्लेख) (laghukathaduniya.blogspot.com)

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

पुस्तक समीक्षा । आस्था के पार विवेक की तलाश - पावन तट पर। रमाकांत चौधरी

कुंभ जैसे विराट धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन पर लिखना जितना आकर्षक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। यहाँ आस्था, परंपरा, सामाजिक यथार्थ और मानवीय भावनाएँ एक साथ उपस्थित रहती हैं। ऐसे विषय को साहित्यिक दृष्टि से समेटना सहज नहीं होता। 'पावन तट पर' नामक यह साझा लघुकथा-संग्रह इस चुनौती को स्वीकार करता है और कुंभ के बहाने आस्था, विवेक और सामाजिक यथार्थ के अनेक आयामों को सामने लाता है। संग्रह के संपादक सुरेश सौरभ स्पष्ट सामाजिक दृष्टि रखने वाले रचनाकार के रूप में दिखाई देते हैं। वह अपनी भूमिका में स्वामी विवेकानंद के ‘नर सेवा नारायण सेवा’ के विचार का उल्लेख करते हुए, साहित्यकार के नैतिक दायित्व, निष्पक्ष दृष्टि और मानवीय सरोकारों की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनके अनुसार साहित्य का काम किसी पंथ, जाति या विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ पक्ष को ईमानदारी से सामने लाना भी है। यही कारण है कि यह संग्रह आस्था का अंधानुकरण नहीं करता, बल्कि उसे विवेकपूर्ण प्रश्नों के साथ प्रस्तुत करता है।

संग्रह में अनेक लघुकथाकारों की रचनाएँ शामिल हैं, जो कुंभ के विविध अनुभवों और भावनात्मक स्थितियों को अभिव्यक्त करती हैं। रश्मि ‘लहर’ की ‘सेवा’, सूर्यदीप कुशवाहा की ‘पुण्य फल’ और ‘सच्चा पुण्य’, डॉ. रशीद गौरी की ‘निपटारा’, डॉ. पूरन सिंह की ‘ये माँ ही हो सकती हैं’, डॉ. अंजु दुआ जैमिनी की ‘मोक्ष बनाम मुक्ति’, सरोज बाला सोनी की ‘कल्पवास’ और मिन्नी मिश्रा की ‘पिता का कुंभ स्नान’ जैसी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक भावनाओं को स्पर्श करती हैं। वहीं प्रो. रणजोध सिंह की ‘लिविंग गॉड’ और राजेन्द्र वर्मा की ‘पुण्य’ आस्था और सामाजिक मानसिकता के गहरे पहलुओं को उजागर करती हैं। इसी क्रम में अभय कुमार भारती की ‘व्रत’, शोभा गोयल की ‘रिफंड’, देवेंद्रराज सुथार की ‘सोच का स्नान’, नृपेंद्र अभिषेक नृप की ‘मोक्ष की एक डुबकी’, नीना मंदिलवार की ‘विलुप्त’ और हरीश कुमार ‘अमित’ की ‘कुंभ स्नान’ तथा ‘पुण्य’ कुंभ के सामाजिक यथार्थ और मानवीय मनोविज्ञान को उभारती हैं।

चित्रगुप्त की ‘पावन तट पर’ और ‘बंद दरवाजे की चीख’, डॉ. रामकुमार घोटड़ की ‘मुक्ति-पथ’ तथा ‘पितृहीन साया’, मार्टिन जॉन की ‘पापमुक्ति’, रंजना जायसवाल की ‘डुबकी’, डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की ‘कुंभी पाप’ और अरविन्द असर की ‘मुफ्त का पुण्य’ आस्था के भीतर छिपी विडंबनाओं और सामाजिक विसंगतियों को उजागर करती हैं।

इसी प्रकार ट्विंकल तोमर सिंह की ‘भंडारे की आग’, गुलजार हुसैन की ‘भगदड़ में माँ’, सेवा सदन प्रसाद की ‘अनुतृप्त’, चित्तरंजन गोप ‘लुकाठी’ की ‘महाकुंभ की अमृत बूंदें’ (एक) और (दो), डॉ. उपमा शर्मा की ‘पूजा’, डॉ. यशोधरा भटनागर की ‘विरासत की डोरी’ तथा नमिता सिंह ‘आराधना’ की ‘गंगा मैया से पैरवी’ कुंभ के सामाजिक और भावनात्मक पक्षों को पछोर-पछोर कर सामने लाती हैं।

संपादक सुरेश सौरभ की ‘ज़ख्म’ और ‘साये में पुण्य’ लघुकथाएं इस संग्रह में शामिल हैं, जो संग्रह की वैचारिक दिशा को और विराटता से स्पष्ट करती हैं। पूनम ‘कतरियार’ की ‘मुक्ति गाथा’, सुनीता मिश्रा की ‘शेष उम्र की धूप’, डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ की ‘वह देशद्रोही है’ और ‘सुकून’, डॉ. नीरू मित्तल ‘नीर’ की ‘कुम्भ में मौन डुबकी’, मनोरमा पंत की ‘मुक्ति की खुशी’, आलोक चोपड़ा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुरेश वशिष्ठ की ‘औलाद वाले’, निर्मल कुमार डे की ‘पुण्य-लाभ’, मानवीन कौर पाहवा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुषमा गुप्ता की ‘आस्था का सैलाब’ तथा मीरा जैन की ‘माँ की खुशी’ भी संग्रह को विविध अनुभवों से समृद्ध करती हैं।

इसी संग्रह में मेरी लघुकथा ‘पूर्व जन्म के पाप’ भी शामिल है, जो कर्मफल और आस्था से जुड़े पारंपरिक विश्वासों के बीच छिपे सामाजिक प्रश्नों को उजागर करने का प्रयास करती है। लघुकथा पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि मनुष्य अपने वर्तमान जीवन की विसंगतियों को अक्सर ‘पूर्व जन्म के पाप’ जैसी धारणाओं से ढंकने का प्रयास करते हुए कब ठगी का शिकार हो जाता है उसे तनिक पता ही नहीं चलता। 

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कुंभ को केवल धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के अनुभवों के रूप में देखा गया है। कहीं करुणा है, कहीं विडंबना, कहीं विश्वास है तो कहीं तीखा व्यंग्य भी। लघुकथा की संक्षिप्तता यहाँ उसकी शक्ति बनकर उभरती है और पाठक को सोचने के लिए बाध्य करती है।

भाषा सरल और सहज है, जिससे विविध रचनाकारों की रचनाएँ पाठक के मन तक आसानी से पहुँचती हैं। संपादन की सजगता के कारण संग्रह में वैचारिक एकसूत्रता भी बनी रहती है।

समग्रतः पावन तट पर आस्था और विवेक के बीच संतुलन साधने वाला एक महत्वपूर्ण लघुकथा-संग्रह है। यह पुस्तक केवल कुंभ के धार्मिक पक्ष का वर्णन नहीं करती, बल्कि उसके बहाने समाज की मानसिकता, मानवीय संवेदना और सामाजिक यथार्थ को भी सामने लाती है। इस दृष्टि से सुरेश सौरभ के संपादन में प्रकाशित यह संग्रह हिंदी लघुकथा-साहित्य के क्षेत्र में एक विचारोत्तेजक और सार्थक संग्रणीय योगदान कहा जा सकता है।

–रमाकान्त चौधरी 

गोला गोकर्णनाथ, लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश। 

मो. 9415881883


रविवार, 18 जनवरी 2026

लघुकथा समीक्षा | पुस्तक: नई सदी की धमक | समीक्षक: डॉ. संध्या तिवारी

जनवरी 2018 में डॉ. संध्या तिवारी द्वारा की गई एक समीक्षा:

 वैचारिकी-12

1-किताब           -     नई सदी की धमक 

2-लघुकथा विचार -   कड़ी - 12

3-लघुकथा संख्या -    22

4-लघुकथा            -   सोयी हुई सृष्टि

5-लघुकथाकार       -  चन्द्रेश कुमार छतलानी 

               "सोयी हुई सृष्टि" लघुकथा पढ़ कर जो सबसे पहला विचार मेरे मन में आया वह था , "ताओ" पंथ के संत 'च्वांगत्सू'  की 'तितली' की कहानी ।

 कथा कुछ यूं है --   कि एक सुबह 'च्वांगत्सू' जागे। वे बड़े परेशान लग रहे थे। उन्हें चाय देने आए शिष्यों ने गुरुवर को परेशान देखा तो कारण पूछा। 'च्वांगत्सू' ने कहा, मैं इसलिए चिंतित हूं, क्योंकि कल रात मैंने एक सपना देखा। सपने में मैंने देखा कि मैं एक तितली हूं। शिष्यों ने कहा, इसमें चिंतित होने वाली क्या बात है। सपना ही तो था। 'च्वांगत्सू' ने कहा, नहीं, लेकिन बात ये है कि जब मैं स्वप्न में तितली था, तब मुझे इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। अभी जागने पर मुझे याद आया है कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं वास्तव में एक तितली हूं, जो कि अभी यह स्वप्न देख रही है कि वह "च्वांगत्सू" है और जागने पर वह पाए कि वह तो वास्तव में एक तितली है।

जाग्रति और स्वप्न  मनुष्य का सबसे बड़ा कौतूहल रहा है। 

'सोयी हुयी सृष्टि' का नायक भी खुद को सोया हुआ देख रहा है 'च्वांगत्सू' की तितली के नाईं ।'च्वांगत्सू' जागने पर चिंतित होता है और अपने शिष्यों को अपनी चिंता से अवगत कराता है कि वह वास्तव में तितली तो नहीं। 

 कथानायक कथा में पहले सोया हुआ अर्थात अचेतन मन का प्रतीक है फिर नेता का प्रतीक है तदोपरान्त आम आदमी का प्रतीक है ।

परन्तु जागने पर जिस प्रकार कथा नायक परिचयपत्र में अपने पिता का नाम देख निश्चिन्त हो जाता है वैसा संत च्वांगत्सू नहीं कर पाते क्योंकि उनकी उलझन आध्यात्मिक स्तर की है और कथा नायक की भौतिक।

फिर भी कथा का स्वप्न से साम्य तो है ही। 

प्रस्तुत कथा में भी ऐसा ही साहचर्य देखने को मिलता है ।

हालांकि इस कथा में सोना मात्र 'प्रतीक' है तमोगुण का ।जो कि हम भारत वासियों की मानसिकता की निशानी है।

 फिर चाहे 'स्वामी विवेकानन्द' जी जगायें या 'भारतेन्दु हरिश्चन्द '।

प्रतीकों और बिम्बों के आधार पर बुना कथा का फलक बहुत विस्तृत है।

करोड़ो लोगो से ज्यादा सोये होना मने हम मनुष्यों में जागरूकता का अभाव होना ।

खादी के कपड़े पहने लोगों के मुंह से कुछ आवाजें और धुआं निकलता मने मुट्ठी भर लोगों का आम जनता का शोषण ।

स्वयं कथा नायक का स्वपन में ही जाग जाना और शोषकवर्ग में शामिल हो जाना ।

तभी उसका स्वप्न टूट जाना और परिचय पत्र पर पिता का नाम देखना यहां परिचय पत्र पर पिता का नाम देखने से एक अर्थ 

(जो कि समष्टिगत है) यह भी निकलता है कि वह खुद को भारत देश के रूप में देख रहा और पिता के रूप में बापू को ।

दूसरा अर्थ (जो कि व्यष्टिगत है) यह है कि वह एक आम नागरिक है और उसके पिता के नाम से वह जाना जा रहा है ।

प्रथमदृष्टया यह कथा 'ख़लील ज़िब्रान' की कथाओं की सी झलक लिये हुये प्रतीत होती है 

'चन्द्रेशकुमार छतलानी जी ' ने लघुकथाओं में अपनी एक शैली विकसित की है।

कलात्मक रूप से उच्चकोटि की रचना है ।

कथानक ,शिल्प, शैली, शीर्षक आदि सभी मानकानुसार ।

कथाकार को बधाई ।

- डाॅ संध्या तिवारी 

पीलीभीत