यह ब्लॉग खोजें

सोमवार, 24 नवंबर 2025

पुस्तक समीक्षा । लघुकथा संग्रह: पावन तट पर । समीक्षक: नृपेन्द्र अभिषेक नृप

पावन तट पर: आस्था, मानवता और विवेक का उजला संग

संपादक सुरेश सौरभ हिंदी साहित्य जगत में एक प्रतिष्ठित और बहुआयामी रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं। उनकी भाषा में गहन संवेदना है, तो विचारों में सामाजिक यथार्थ का तीक्ष्ण दृष्टिकोण। वे उन साहित्यकारों में से हैं जिनके लेखन में न केवल कलात्मकता बल्कि मानवता की सच्ची पुकार सुनाई देती है। एक शिक्षक के रूप में वे नई पीढ़ी को साहित्यिक चेतना से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं, तो एक कथाकार के रूप में वे समाज की विडंबनाओं को शब्दों के माध्यम से उजागर कर रहे हैं। "पावन तट पर" का संपादन उनके इसी संवेदनशील और सजग साहित्यकार रूप का प्रमाण है। इस साझा लघुकथा-संग्रह में उन्होंने विभिन्न दृष्टिकोणों से कुंभ जैसे विशाल सांस्कृतिक आयोजन को देखने की एक ईमानदार और बहुआयामी कोशिश की है।

यह संग्रह केवल कुंभ मेले का साहित्यिक दस्तावेज नहीं, बल्कि यह भारतीय जनमानस की आस्था, विश्वास, विरोधाभास और विवेक का प्रत्यक्ष चित्रण है। कुंभ, जो सदियों से हमारी आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक रहा है, जहाँ लाखों-करोड़ों लोग पुण्य स्नान के लिए एकत्र होते हैं, वहाँ मानवता की असंख्य कहानियाँ भी जन्म लेती हैं- कुछ श्रद्धा से भरी, कुछ पीड़ा से सराबोर, कुछ प्रश्नों से दग्ध। “पावन तट पर” इन सबको अपने भीतर समेटे हुए है।



संपादक सुरेश सौरभ ने इस संग्रह के माध्यम से केवल धार्मिक आस्था का उत्सव प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उन्होंने उन सामाजिक सच्चाइयों को भी स्वर दिया है जिन्हें अक्सर धार्मिक आवरण के नीचे दबा दिया जाता है। वे इस बात को भली-भांति समझते हैं कि आस्था और अंधविश्वास के बीच एक बेहद महीन रेखा है, और इसी रेखा पर यह संकलन चलता है, कभी श्रद्धा की उजली रोशनी में, तो कभी पाखंड की काली छाया में।

इस संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें सम्मिलित प्रत्येक लघुकथा अपने आप में एक अलग दृष्टि, एक अलग संवेदना और एक अलग समाज-सत्य को उद्घाटित करती है। डॉ. रशीद गौरी की ‘निपटारा’ में हम देखते हैं कि कैसे आधुनिक समाज में कुछ लोग आपदा में भी अवसर तलाश लेते हैं। कुंभ जैसे पवित्र अवसर को भी स्वार्थ और छल का माध्यम बना देना, यह रचना हमें भीतर तक झकझोर देती है। वहीं सूर्यदीप कुशवाहा की ‘पुण्य फल’ में मानवीय करुणा का उज्ज्वल उदाहरण मिलता है। रचना यह संदेश देती है कि सच्चा पुण्य किसी तीर्थ या स्नान में नहीं, बल्कि मनुष्य की सहायता में निहित है।

डॉ. पूरन सिंह की ‘ये माँ ही हो सकती है’ पाठक को भावनाओं के ऐसे संसार में ले जाती है, जहाँ मातृत्व की ममता धर्म, दूरी, और वृद्धावस्था के हर बंधन को तोड़ देती है। वृद्धाश्रम की दीवारों के भीतर भी आस्था का दीप जलता है, जो इस लघुकथा को अनमोल बनाता है। डॉ. अंजू दुआ जैमिनी की ‘मोक्ष बनाम मुक्ति’ आधुनिकता और परंपरा के टकराव पर एक साहसिक प्रश्न उठाती है कि क्या केवल स्नान से मुक्ति संभव है, जब जल ही रोग का कारण बन जाए? यह लघुकथा धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति प्रश्नाकुल दृष्टि प्रस्तुत करती है। वहीं मनोरमा पंत की ‘मुक्ति की खुशी’ में कुंभ की भीड़ में उमड़ती श्रद्धा की सहजता और नादान हृदय की मासूमता का चित्रण है, जो दिखाता है कि आस्था आज भी भारतीय मन में गहराई से रची-बसी है।

रमाकांत चौधरी की ‘पूर्व जन्म के पाप’ एक मार्मिक लघुकथा है उन ठगों पर जो श्रद्धा का शोषण कर धर्म की गरिमा को कलंकित करते हैं। यह रचना धर्म के बाजारीकरण पर करारा प्रहार करती है। इसी क्रम में गुलज़ार हुसैन, सेवा सदन प्रसाद, चित्रगुप्त, अरविंद असर आदि लघुकथाकारों ने भी समाज में फैली कुरीतियों और विसंगतियों को गहरी संवेदनशीलता और विचारशीलता से उजागर किया है। इन सभी रचनाओं के बीच “पावन तट पर” एक ध्रुव तारे की भांति चमकता है, जो आस्था और विवेक, परंपरा और आधुनिकता, भावना और तर्क, सभी के बीच संतुलन साधता है। इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी धर्म या विचारधारा का पक्ष नहीं लेता, बल्कि मानवता के पक्ष में खड़ा होता है। यही इसे कालजयी बनाता है।

सुरेश सौरभ की भूमिका में व्यक्त विचार संग्रह की आत्मा हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि साहित्यकार का कार्य किसी विशेष पंथ, जाति या विचारधारा का प्रचार करना नहीं, बल्कि सत्य और मानवता की खोज करना है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि दरबारी लेखकों और एजेंडा-चालित रचनाकारों के बीच सच्चे साहित्यकार का दायित्व और भी बढ़ जाता है। सौरभ जी इस बात पर बल देते हैं कि साहित्य वही शाश्वत होता है जो निष्पक्ष, मानवीय और जन-सरोकारों से जुड़ा हो। उनका यह कथन अत्यंत सार्थक है कि “आस्था और अंधविश्वास में एक महीन रेखा है, जिसे समझना और परखना आवश्यक है।” यही बात इस संग्रह को विचारशील बनाती है। “पावन तट पर” न केवल कुंभ के दृश्यात्मक संसार को उकेरता है, बल्कि वह यह भी पूछता है कि क्या हमारी आस्था मानवता को सशक्त बना रही है या उसे अंधकार की ओर धकेल रही है।

यह संग्रह पाठक को बार-बार सोचने पर मजबूर करता है, कुंभ का मेला केवल आस्था का प्रतीक है या यह हमारे समाज की व्यवस्था का आईना भी है? भीड़ में उमड़ती संवेदनाएँ, भक्ति में लिपटा व्यवसाय, स्नान में छिपा स्वार्थ और त्याग- इन सबका सम्मिलित चित्र यह पुस्तक अत्यंत सजीवता से प्रस्तुत करती है। संपादक के रूप में सुरेश सौरभ ने रचनाकारों का चयन अत्यंत सजग दृष्टि से किया है। उन्होंने अनुभवी लेखकों के साथ-साथ नवोदित प्रतिभाओं को भी समान मंच दिया है। यह उनकी लोकतांत्रिक संपादकीय दृष्टि का परिचायक है। उन्होंने केवल कथाओं को संकलित नहीं किया, बल्कि उन्हें एक वैचारिक सूत्र में पिरोया है, जिससे पूरी पुस्तक एक संपूर्ण दार्शनिक विमर्श का रूप ले लेती है।

भाषा की दृष्टि से भी यह संग्रह उल्लेखनीय है। प्रत्येक लघुकथा में एक विशिष्ट शैली, एक अलग लय, और एक सजीव चित्रात्मकता दिखाई देती है। कहीं आस्था का पवित्र जल बहता है, तो कहीं समाज के मलिन जल की गंध आती है। किंतु हर रचना का अंत पाठक के मन में कोई न कोई सवाल, कोई चुभन या कोई आलोक छोड़ जाता है। यही एक सफल लघुकथा-संग्रह की पहचान है। “पावन तट पर” का महत्व केवल धार्मिक या सामाजिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और साहित्यिक दोनों है। यह पुस्तक बताती है कि भारतीय आस्था केवल अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों की पवित्रता में निहित है। यह संग्रह पाठक को एक ऐसी यात्रा पर ले जाता है जहाँ स्नान केवल जल में नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर होता है, मलिनताओं से मुक्ति का, और विवेक की ओर अग्रसर होने का।

इस तरह से यह कहा जा सकता है कि “पावन तट पर” एक ऐसा साहित्यिक संकलन है जो अपने समय का साक्षी भी है और समाज का दर्पण भी। यह न केवल पढ़ने योग्य, बल्कि संभालकर रखने योग्य पुस्तक है- एक दस्तावेज, जो आने वाले समय में भी यह बताएगा कि साहित्यकार केवल शब्दों का जादूगर नहीं होता, वह युग का मूक इतिहासकार होता है। सुरेश सौरभ और सभी रचनाकारों को इस उत्कृष्ट साहित्यिक प्रयास के लिए साधुवाद। यह संग्रह न केवल कुंभ मेले की कथा कहता है, बल्कि मानवता के कुंभ की भी व्याख्या करता है, जहाँ हर मन, हर विश्वास, हर संवेदना एक साथ स्नान करती है सत्य और करुणा के पावन जल में।

-0-


समीक्षक: नृपेन्द्र अभिषेक नृप

पुस्तक: पावन तट पर

संपादक : सुरेश सौरभ

प्रकाशन: समृद्ध पब्लिकेशन, दिल्ली

मूल्य: 250 रुपये

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

लघुकथा लेखन में अनुवाद का महत्व | मनोरमा पंत | आलेख

विभिन्न भाषाओं के बीच अनुवाद का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। अनुवाद ने ही हमें विश्व के विविध साहित्यिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक मूल्यों से परिचित कराया है। आज हम अलग-अलग सभ्यताओं को एक-दूसरे के करीब पाते हैं, तो उसके पीछे अनुवाद की अदृश्य लेकिन अनिवार्य भूमिका रही है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में, जहाँ 453 जीवित भाषाएँ, 270 मातृभाषाएँ और 1369 बोलियाँ प्रचलित हैं - वहाँ अनुवाद केवल भाषा नहीं, बल्कि संस्कृति, भाव और विचार का भी आदान-प्रदान है। वेद, उपनिषद, पुराण, पंचतंत्र, हितोपदेश जैसे भारतीय ग्रंथों की कथाएँ विभिन्न भाषाओं में अनुवादित होकर वैश्विक धरोहर बन गईं। वहीं ईसप की कथाओं जैसी पश्चिमी लघुकथाएँ भारतीय भाषाओं में लोकप्रिय हुईं।

लघुकथा अपनी संक्षिप्तता और सामाजिक तीव्रता के कारण आज के समय की माँग बन गई है। अनुवादक के माध्यम से यह विधा देश-विदेश में पहचानी जा रही है। तेजी से बदलते समय में कई भाषाएँ विलुप्त हो रही हैं। ऐसे में अनुवादित लघुकथाएँ भाषाई धरोहरों को संरक्षित कर रही हैं। भारत में अब तक 42 भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं और 147 संकट में हैं।

जब देश में भाषा-आधारित राजनीति और टकराव बढ़ रहे हों, तब अनुवादित लघुकथाएँ भाषाओं के बीच संवाद का पुल बनती हैं। जैसे महाराष्ट्र में हिन्दी विरोध के बीच हिन्दी भाषी क्षेत्रों में मराठी और अन्य भाषाओं की लघुकथाओं का अनुवाद हो रहा है। अशोक भाटिया ने “रूसी लघुकथाओं का पुनर्पाठ”—टॉलस्टॉय, चेखव, गोर्की आदि—को हिन्दी में प्रस्तुत किया है। कल्पना भट्ट और संतोष सुपेकर ने हिन्दी लघुकथाओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। बेबी कारफोमा और हीरालाल मिश्र ने बांग्ला लघुकथाओं का हिन्दी में अनुवाद किया है; वहीं हिन्दी लघुकथाओं का मराठी में अनुवाद मंजूषा मूले, डॉ. वसुधा गाडगिल, संतोष सुपेकर, उज्ज्वला केलकर और अंतरा करवड़े ने किया है। हिन्दी से नेपाली और नेपाली से हिन्दी में अनुवाद डॉ. पुष्कर राज भट्ट, रचना शर्मा और किशन पौडेल ने किया है। आशीष श्रीवास्तव ‘अश्क’ ने हिन्दी लघुकथाओं का उर्दू में, डॉक्टर रीना ने हिन्दी लघुकथाओं का मलयालम में, श्यामसुन्दर अग्रवाल और जगदीश राय कुलरियाँ ने हिन्दी लघुकथाओं का पंजाबी में, रजनीकांत एस. शाह ने हिन्दी लघुकथाओं का गुजराती में, मिन्नी मिश्रा ने हिन्दी लघुकथाओं का मैथिली में, रेखा शाह आर.बी. ने भोजपुरी में और हेमलता शर्मा ‘भोली बेन’ ने मालवी बोली में अनुवाद किया है।

योगराज प्रभाकर का अनुवाद के क्षेत्र में सराहनीय योगदान रहा है। वे हिन्दी लघुकथाओं का पंजाबी और उर्दू में अनुवाद करते ही हैं, साथ ही पंजाबी और उर्दू लघुकथाओं का हिन्दी में अनुवाद करने की दक्षता भी रखते हैं। हाल ही में योगराज जी का प्रकाशित “पंजाबी लघुकथा-संग्रह” चर्चा में है।

इन अनुवादकों की विशेषता यह है कि वे केवल शब्दों का अनुवाद नहीं करते, बल्कि मूल भाषा के भाव, उद्देश्य और शैली को आत्मसात कर दूसरे पाठकों तक पहुँचाते हैं। इससे अनूदित लघुकथाएँ न केवल पठनीय होती हैं, बल्कि प्रभावशाली भी बनती हैं। अनुवाद से भाषाई सौहार्द और एकता, विविधताओं में एकरूपता का अनुभव, अंतर-भाषायी समझ का विकास, संस्कृति और साहित्य का साझा बोध तथा नई भाषाओं और विचारों का साक्षात्कार होता है। जैसे-जैसे पाठक विभिन्न भाषाओं की अनूदित लघुकथाएँ पढ़ते हैं, वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दुख–सुख, संघर्ष और संवेदनाएँ सार्वभौमिक होती हैं। यही अनुवाद का सार है - भिन्न भाषाओं में एक जैसी मानवता को पाना।

अनुवाद किसी रचना के अर्थ, भावना और सांस्कृतिक बारीकियों को एक भाषा से दूसरी भाषा में सटीक रूप से संप्रेषित करने की प्रक्रिया है, जिसमें मूल पाठ की निष्ठा और लक्ष्य भाषा में सहज प्रवाह—दोनों का संतुलन आवश्यक है। इसके मूल में ‘समतुल्यता’, ‘सटीकता’, ‘प्रवाह’, ‘सांस्कृतिक अनुकूलन’ और लेखक के मूल आशय की समझ शामिल है। एक कुशल अनुवादक को मूल लेखक की शैली, बारीकियों और दोहरे अर्थों को समझकर उन्हें लक्ष्य भाषा में स्वाभाविक रूप से संप्रेषित करना होता है।

अनुवाद प्रक्रिया में अनुवादक मूल पाठ की भावनाओं को समझकर उसे लक्ष्य भाषा के अनुकूल, स्वाभाविक और सुंदर रूप में प्रस्तुत करता है। अनुवाद विभिन्न साहित्यिक कृतियों तक पहुँच को सुगम बनाता है और उनके इर्द-गिर्द के संवाद को समृद्ध करता है। अनुवाद सांस्कृतिक आदान-प्रदान, लेखक की पहुँच बढ़ाने, सहानुभूति उत्पन्न करने और मूल भाषा की बारीकियों को बनाए रखने में सहायक है। अनुवादक की भूमिका केवल भाषा का रूपांतरण नहीं, बल्कि लेखक की शैली और आशय को संरक्षित रखना भी है, जिससे रचना लक्ष्य भाषा में स्वाभाविक लगे। अनुवादक सांस्कृतिक और वैचारिक अंतर्दृष्टि प्रदान करके साहित्यिक विमर्श को समृद्ध करते हैं।

लघुकथा में अनुवाद न केवल भाषाओं का सेतु है, बल्कि साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सौहार्द का माध्यम भी है। आज के वैश्विक युग में, जहाँ संचार का दायरा व्यापक है, वहाँ लघुकथा जैसी संक्षिप्त और प्रभावशाली विधा का अनुवाद एक मूल्यवान साहित्यिक साधना है। यह न केवल भाषाओं को बचाता है, बल्कि उन्हें नई पीढ़ियों और नई सीमाओं तक भी पहुँचाता है।

-०-

मनोरमा पंत  / 92291131 95

लेखिका परिचय:

भोपाल निवासी मनोरमा पंत समकालीन हिंदी साहित्य की सक्रिय और संवेदनशील रचनाकार हैं। उनका लघुकथा संग्रह "ज़िंदगी की अदालत में" और कविता संकलन "भाव सरिता" पाठकों द्वारा अत्यंत सराहा गया है। वे लघुकथा-संग्रह "उत्कर्ष" की सह-संपादक रही हैं और अब तक 15 से अधिक सांझा संकलनों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं।

समीक्षा-लेखन में भी वे समान रूप से सक्रिय हैं। उन्होंने बेताल पच्चीसी, ऋषि रेणु, भज मन, गुलाबी गलियां, मन का फेर, कलम बोलती है, मैंने देखा है, सूर्य देव सहित कई महत्वपूर्ण कृतियों की समीक्षाएँ लिखी हैं।

आलेख, लघुकथाएँ, पर्यावरण विषयक लेख और व्यंग्य उनकी प्रमुख लेखन विधाएँ हैं जो विविध पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होते रहते हैं। साहित्यिक रुचि और विचार-गहराई के कारण उनका साक्षात्कार वर्ल्ड पंजाबी टाइम्स, जन सरोकार मंच, कथा दर्पण और वरिष्ठ फोटोग्राफर जगदीश कौशल द्वारा लिया जा चुका है।

मनोरमा पंत को उनके निरंतर और गुणवत्तापूर्ण लेखन हेतु अनेक साहित्यिक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

भूमिका । लघुकथा संग्रह । विजय ‘विभोर’

 हरियाणा साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कीर्तिशेष श्री विजय ‘विभोर’ भाई जी का लघुकथा संग्रह ‘फिर वही पहली रात’ का उनके घर के बाहर का प्रथम पाठक बनने का अवसर प्राप्त हुआ था। उस समय इस पुस्तक के लिए कुछ लिखा था, वह निम्नानुसार है:


"साहित्य का कर्तव्य केवल ज्ञान देना नहीं है, परंतु एक नया वातावरण प्रदान करना भी है।" अपने इन शब्दों द्वारा डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन क्या कहना चाह रहे हैं यह तो स्पष्ट है, साथ ही इस वाक्य पर थोड़े से मनन के पश्चात् समझ में आता है कि यह पंक्ति एक भाव यह भी रखती है कि साहित्य का कार्य छोटी से बड़ी किसी भी समस्या के ताले की चाबी बनना हो न हो वर्तमान युग के अनुसार एक ऐसा वातावरण तैयार करना है ही, जो हमारे मन-मस्तिष्क के द्वार खटखटाने में सक्षम हो। चूँकि लघुकथा सीमित शब्दों में अपने पाठकों को दीर्घ सन्देश देने में भी सक्षम है, अतः ऐसे वातावरण का निर्माण करने में लघुकथा का दायित्व अन्य गद्य विधाओं से अधिक स्वतः ही हो जाता है।

उपरोक्त कथन को मूर्तिमंत करते लघुकथा के कर्म, चरित्र और मूल वस्तु से परिचय कराता, सुरुचिपूर्ण, सकारात्मक, सार्थक और प्रेरणास्पद लेखन का एक उदाहरण है श्री विजय ‘विभोर’ का लघुकथा संग्रह 'फिर वही पहली रात'। मानवीय चेतना के शुद्ध रूप के दर्शन करने को प्रोत्साहित करती श्री विभोर की लघुकथाएं स्पष्ट सन्देश प्रदान करने में समर्थ हैं। मौजूदा समय का मूलभूत अनिवार्य मंथन भी इन रचनाओं में सहज भावों के माध्यम से परिलक्षित होता है। उदाहरणस्वरूप पति-पत्नी के सम्बन्ध विच्छेद की बढ़ती घटनाओं कम करने का प्रयास करती लघुकथा ‘आदत’, मानवीय प्रेम का सन्देश देती 'कनागत, ‘मजबूरी’, आदि रचनाओं में चेतना जागरण, नैतिक मूल्य, मानवता, नारी-स्वातंत्र्य, सामाजिक दशा, कर्तव्य परायणता और मानवीय उदात्तता जैसे बहुआयामी और समसामयिक विषयों पर लेखक ने बड़ी प्रवीणता-कुशलता से सृजन किया है। 

लेखन ऐसा होना चाहिए जो न सिर्फ काल की वर्तमानता को दर्शाये बल्कि आने वाली शताब्दी तक की चुनौतियों पर खरा उतरने वाला हो। आदमीयत की गायब होती परिपूर्णता को शब्दों से उभार सके तथा सच व झूठ के टुकड़ों में बंटे हुए मनुष्य को आत्मिक चेतना तक का अनुभव करवा सके। अष्टछाप के प्रसिद्ध कवि कुम्भनदास को एक बार अकबर ने फतेहपुर सीकरी आमंत्रित किया था, कुम्भनदास ने उस आमंत्रण को अस्वीकार करते हुए कहा कि "सन्तन को कहा सीकरी सों काम।" सच्चे साहित्यकार संत की तरह होते हैं। ज़्यादातर इतिहासकारों ने शासकों की अयोग्यता को भी जय-जयकार में बदला है लेकिन अधिकतर साहित्यकारों ने नहीं। इस संग्रह की ‘जीवन जीर्णोद्धार’, ‘अन्नदाता’, ‘फैसले’, ‘बदलाव’ जैसी रचनाएँ  साहित्यकार के इस धर्म का पालन करती हैं। लेखन सम्बन्धी विसंगतियां उठाती इस संग्रह की 'कुल्हड़ में हुल्लड़' भी एक विचारणीय रचना है।

पुरातन साहित्य में दर्शाया गया है कि वाराणसी के निवासी शौच करने भी 'उस पार' जाते थे। गंगा में नहाते समय अपने कपडे घाट पर निचोड़ते थे, नदी में नहीं। पौराणिक युगीन साहित्य में यह भी कहा गया कि “नमामी गंगे तव पाद पंकजं सुरासुरैर्वदित दिव्यरूपम्। भुक्ति चमुक्ति च ददासि नित्यं भावनसारेण सदानराणाय् ।।“ ऐसे विचार पढ़ने पर यह सोच स्वतः ही जन्म लेती है कि साहित्यकारों के कहे पर यदि देश चलता तो शायद गंगा कभी प्रदूषित होती ही नहीं और विस्तृत सोचें तो केवल जल प्रदूषण ही नहीं, कितनी ही और विडंबनाओं से बचा जा सकता था। प्रस्तुत संग्रह में भी 'बस ख्याल रखना', 'मेला',  ‘निजात’, ‘प्रश्न’ जैसी रचनाएं साहित्यकारों की स्थिति दर्शा रही हैं, जो एक महत्वपूर्ण विषय है।

लघुकथा के बारे में एक मत है कि यह तुरत-फुरत पढ़ सकने वाली विधा है। लेकिन जिसका सृजन विपुल समय लेता है, उसे अल्प समय में पढ़ने के बाद पाठकगण हृदयंगम कर अपना महती समय चिंतन में खर्च न करें तो मेरे अनुसार हो सकता है कि वह रचना प्रभावी शिल्प की हो, लेकिन उद्देश्य पूर्णता की दृष्टि से अप्रभावी ही है। ‘फिर वही पहली रात’ की रचनाएं इस दृष्टि से निराश नहीं करतीं, वरन कुछ रचनाएँ ऐसी भी हैं जो नव-विचार उत्पन्न करती हैं। अधिकतर लघुकथाओं के कथानक समसामयिक हैं, सहज ग्राह्य एवं ओजस्वी भाषा शैली है।  शीर्षक से लेकर अंतिम पंक्ति तक में लेखक का अटूट परिश्रम झलकता है।

समग्रतः, प्रभावशाली मानवीय संवेदनाओं, उन्नत चिन्तन, आवश्यक सारभूत विषयों को आत्मसात करती जीवंत लघुकथाओं से परिपूर्ण विजय 'विभोर' जी की विवेकी, गूढ़ और प्रबुद्ध सोच का प्रतिफल यह संग्रह पठनीय-संग्रहणीय सिद्ध होगा। बहुत-बहुत बधाइयां व मंगल कामनाएं। 

-0-


- डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

उदयपुर 

9928544749

सोमवार, 29 सितंबर 2025

साक्षात्कार | September 03, 2021 | bijendergemini.blogspot.com


डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी से साक्षात्कार

 प्रश्न न.1 -  लघुकथा में सबसे महत्वपूर्ण तत्व कौन सा है ?

उत्तर - मेरे अनुसार यों तो लघुकथा में कोई ऐसा तत्व नहीं हैं जिसका महत्व कम हो क्योंकि जब कम-से-कम शब्दों में अपनी बात कहनी है तो शीर्षक से लेकर अंत तक सभी शब्दों, शिल्प आदि पर पूरा ध्यान देना होता ही है। मैं अपने लेखन में सबसे अधिक विषय (विशेष तौर पर जो समकालीन यथार्थ पर आधारित हो) के अध्ययन को समय देता हूँ फिर कथानक और उसके प्रस्तुतिकरण के निर्धारण में।


प्रश्न न.2 -  समकालीन लघुकथा साहित्य में कोई पांच नाम बताओं?  जिनकी भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है?

उत्तर - हालांकि पांच से अधिक नाम जेहन में आ रहे हैं, फिर भी प्रश्न की सीमा न लांघते हुए मैं सर्वश्री योगराज प्रभाकर, अशोक भाटिया, मधुदीप गुप्ता व उमेश महादोषी के नाम लेना चाहूंगा। वस्तुतः आप (बीजेंद्र जैमिनी) सहित कई अन्य वरिष्ठ व कई नवोदित भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं।


प्रश्न न.3 - लघुकथा की समीक्षा के कौन - कौन से मापदंड होने चाहिए ?

उत्तर - मेरे अनुसार निम्न तत्वों पर एक लघुकथा समीक्षक को ध्यान देना आवश्यक है:-

रचना का उद्देश्य, विषय, लाघवता व पल विशेष, कथानक, शिल्प, शैली, शीर्षक, पात्र, भाषा एवं संप्रेषण, संदेश / सामाजिक महत्व, न्यूनतम अतिशयोक्ति व सांकेतिकता। इनके अतिरिक्त मेरा यह भी मानना है कि कोई लघुकथा अपने पाठकों को कितना प्रभावित कर सकती है इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए।


प्रश्न न.4 - लघुकथा साहित्य में सोशल मीडिया के कौन-कौन से प्लेटफॉर्म बहुत महत्वपूर्ण हैं?

उत्तर - पिछले कुछ वर्षों से सोशल मीडिया ने लघुकथा को स्थापित करने में सहायता की है। फेसबुक, व्हाट्सएप्प, यूट्यूब, फोरम व ब्लोग्स द्वारा फिलवक्त लघुकथा पर काफी कार्य किया जा रहा है। आने वाले समय में अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यथा इन्स्टाग्राम,  पिनट्रेस्ट, लिंक्डइन, ट्वीटर आदि पर अच्छे कार्य होने की उम्मीद है।


प्रश्न न.5 - आज के साहित्यिक परिवेश में लघुकथा की क्या स्थिति है ?

उत्तर - फिलहाल लघुकथाएं मात्रात्मक दृष्टि से एक अच्छी संख्या में कही जा रही हैं, हालांकि गुणात्मकता पर विचार करें तो उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं है। संपादकों व प्रकाशकों को भी पुस्तकों, संग्रहों, संकलनों आदि में कहीं न कहीं समझौता करना ही पड़ता है। इसके अतिरिक्त रचनाओं में समसामयिक विषयों की भी कमी प्रतीत होती है। ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण, राजनीतिक पतन, साइबर क्राइम, दिव्यांग जैसे वर्ग की समस्याएं, पुरातन लोक संगीत / वास्तुकला आदि के सरंक्षण सहित कई विषय ऐसे हैं जिन पर कलम बहुत अधिक नहीं चली है। कहीं-कहीं लघुकथा की समीक्षा में निष्पक्षता की आवश्यकता भी महसूस होती है।


प्रश्न न.6 - लघुकथा की वर्तमान स्थिति से क्या आप सतुष्ट हैं ?

उत्तर - यह एक अच्छी बात है कि लघुकथा अब अधिकतर साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। इससे प्रबुद्ध पाठकों की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। गुणात्मकता के अतिरिक्त प्रकाशित रचनाओं में कभी-कभी प्रूफ रीडिंग, सम्पादन व कुछ निष्पक्षता की आवश्यकता ज़रूर प्रतीत होती है। मैं उन सभी लघुकथाकारों की हृदय से प्रशंसा करना चाहूँगा, जिन्होंने इस विधा को स्थापित करने में अपना समय और धन दोनों को बिना सोचे खर्च किया है। आप सभी के परिश्रम से जो स्थान इस विधा को प्राप्त हुआ है उससे मुझ सहित अन्य लघुकथाकारों को काफी संतुष्टि मिलना स्वाभाविक ही है। हालांकि, मुझे अपने लेखन से स्वयं को संतुष्टि मिल पाए, ऐसा समय अभी नहीं आया।


प्रश्न न.7 - आप किस प्रकार के पृष्ठभूमि से आए हैं?  बतायें किस प्रकार के मार्गदर्शक बन पाये हैं?

उत्तर - मैं यों तो विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ, लेकिन हिन्दी व अन्य भाषाओं और साहित्य में रूचि प्रारम्भ से ही रही। पढ़ने के नाम पर मैं जो कुछ भी मिले पढ़ लेता था। शिक्षा समाप्ति के बाद देश-विदेश के विभिन्न संस्थानों के लिए सॉफ्टवेयर व वेबसाइट निर्माण किए और कुछ समय पश्चात् शिक्षण व शोध के क्षेत्र में आ गया। फिलहाल मैं कम्प्यूटर विज्ञान के छात्रों का ही मार्गदर्शक बन पाया हूँ। नवीन विषयों तथा भिन्न शिल्प को लेकर लेखन करना मुझे पसंद है।


प्रश्न न.8 - आप के लेखन में आपके परिवार की भूमिका क्या है?

उत्तर - परिवार से मुझे सदैव प्रोत्साहन ही मिला है। वस्तुतः जो समय मुझे परिवार को देना चाहिए, उसी में से कुछ वक्त निकाल कर मैं साहित्य सृजन कर पाता हूँ, लेकिन कभी शिकायत नहीं मिली। परिवार के सदस्यों को मैं समय-समय पर लेखन कार्य में प्रवृत्त करने का प्रयास भी करता हूँ और उनसे प्रेरणा भी प्राप्त करता हूँ।


प्रश्न न.9 - आप की आजीविका में आपके लेखन की क्या स्थिति है ?

उत्तर - अभी इस बारे में सोचा नहीं। हालांकि साहित्यिक पुस्तक बिक्री, प्रतियोगिताओं, शोध-कार्य आदि से कुछ आय हुई भी है लेकिन अधिकतर बार उसे अन्य पुस्तकें खरीदने में ही खर्च किया है।


प्रश्न न.10 - आपकी दृष्टि में लघुकथा का भविष्य कैसा होगा ?

उत्तर - जिस तरह से लघुकथा विधा उन्नति कर रही है, यह प्रतीत होता है कि गद्य विधा में जल्दी ही लघुकथा का ही युग होगा। इस हेतु उचित सृजन महती कार्य है। मेरा मानना है कि किसी लेखक को लघुकथा को सिद्ध करना है तो सबसे पहले उसके विषय व कथानक को आत्मसात कर उसमें निहित पात्रों को स्वयं जीना होता है। वे बातें भी दिमाग में होनी चाहिए जो हम रचना में तो नहीं लिख रहे हैं लेकिन रचना को प्रभावित कर रही हैं। इसीसे लेखन में जीवन्तता आती है। इस प्रकार का लेखन पर्याप्त समय लेता है और इसके विपरीत जल्दबाजी में विधा और साहित्य दोनों को हानि होती है। हालांकि समय स्वयं अच्छी रचनाओं को अपने साथ भविष्य की ओर बढाता है तथा अन्य को पीछे छोड़ देता है। लेकिन यह भी सत्य है कि इन दिनों कई रचनाएं ऐसी भी कही जा रही हैं, जो विधा की उन्नति के समय को बढ़ा रही हैं। लघुकथा पर शोध व नवीन प्रयोग भी आवश्यकता से कम हो रहे हैं। लघुकथा में नए मुहावरे भी गढ़े जा सकते हैं। बहरहाल, इन सबके बावजूद भी मैं विधा के अच्छे भविष्य के प्रति आश्वस्त हूँ क्योंकि वर्तमान अधिक बिगड़ा हुआ नहीं है बल्कि अपेक्षाकृत बेहतर है।


प्रश्न न.11 - लघुकथा साहित्य से आपको क्या प्राप्त हुआ है ?

उत्तर - कहीं पढ़ा था कि, “Literature is a bridge from disappointment to hope.” यह बात लेखन पर भी लागू होती है। लघुकथा में लेखकीय प्रवेश वर्जित है, इस बात का अपनी तरफ से जितना रख सकता हूँ, ध्यान रखते हुए, कई बार अपनी बात जुबानी न कहने की स्थिति में उसे लघुकथा के रूप में ढाल देता हूँ, उससे मानसिक शांति तो प्राप्त होती ही है और साथ ही अपनी बात इस प्रकार कह देने का अवसर भी मिलता है। कई विषयों को पढ़ कर समझने की प्रवृत्ति को एक नई दिशा भी मिली तथा सोच का दायरा भी विस्तृत हुआ। साथ ही शोध हेतु यह एक और विषय भी मिला। इनके अतिरिक्त मुझे गुरुओं का जो मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, वरिष्ठ लघुकथाकारों का जो आशीर्वाद मिला और समकालीन व मेरे लेखन प्रारम्भ करने के बाद आए लघुकथाकारों का जो स्नेह प्राप्त हुआ, उसे शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए असंभव है।

Source: https://bijendergemini.blogspot.com/2021/09/blog-post_33.html


शनिवार, 12 जुलाई 2025

डॉ. रजनीश दीक्षित की 12 जुलाई 2019 की फेसबुक पोस्ट से

 #मेरी_समझ'/37

#लघुकथा_कलश_द्वितीय_महाविशेषांक


.....'मेरी समझ' की अगली कड़ी में एक बार फिर से लेखक हैं आदरणीय #चंद्रेश छतलानी जी। आज उनकी लघुकथा "दंगे की जड़" पर 'अपनी समझ' रख रहा हूँ, कुछ इस तरह:


#लघुकथा - दंगे की जड़

#लेखक_चंद्रेश_छतलानी_जी

#शब्द_संख्या - 236


मैंने बचपन में एक बड़ी ताई जी के बारे में सुना था कि उनको अक्सर लोगों से झगड़ने की आदत थी। लोगों से किस बात पर झगड़ा करना है, उनके लिए कारण ढूंढना कोई बड़ी बात नहीं थी। एक बार की बात है कि कुछ लड़के गली में गुल्ली-डंडा खेल रहे थे। अचानक एक लड़के ने गुल्ली को बहुत दूर तक पहुंचा दिया। बस ताई जी ने लड़कों को आड़े हांथों ले लिया। बोलीं, "खेलना बंद करो"। जब लड़कों ने कारण पूछा तो बोलीं, "अगर मेरी बेटी आज ससुराल से घर आ रही होती तो उसको चोट लग सकती थी।" बेचारे लड़के अपना सिर खुजलाते अपने घरों की ओर चले गए। लड़कों को पता था कि यदि बहस में पड़े तो दंगे जैसे हालात हो सकते हैं।


...आज हमारे देश में ऐसी ताइयों की कमी थोड़े ही है। इस स्वभाव के लोगों को राजनीति में स्वर्णिम अवसर भी प्राप्त हो रहे हैं। आखिर इसी की तो कमाई खा रहे हैं लोग। सुना है अंग्रेजों ने हमारा देश 1947 में छोड़ दिया था लेकिन अफसोस तो इस बात का है कि जाते-जाते वे हमें "फूट डालो और राज करो" का मंत्र सिखा कर गए। इसका अनुसरण करने में फ़ायदे ही फायदे जो हैं। इसके लिए नेताओं को कुछ खास करना भी नहीं है। पांच साल सत्ता का सुख भोगिये और चुनाव से पहले धर्म-जाति के नाम पर शिगूफे छोड़िए, बहुत संभावना है कि अगली सरकार आपकी ही बने। हाँ, यह उनकी दक्षता पर निर्भर करता है कि किसने कितनी बेशर्मी से इस मंत्र का प्रयोग किया। 'जीता वही सिकंदर' वाली बात तो सही है लेकिन जो हार गए वह भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। उन्होंने भी आजकल बगुला भगत वाला चोला पहना हुआ है। 


मैंने एक पंडित जी के बारे में सुना है कि वे बड़े ही धार्मिक और पाक साफ व्यक्ति हैं। वह केवल बुधवार को ही मांस-मछली खाते हैं, बाकी सब दिन प्याज भी नहीं। लेकिन बुधवार को भी इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि जब मांस-मछली का सेवन करते हैं तो जनेऊ को उतार देते हैं और बाद में अच्छी तरह से हाथ धोने के बाद ही जनेऊ पहनते हैं। इन्हें संभवतः अपने धर्म की अच्छाईयों के बारे में न भी पता हो लेकिन दूसरे धर्मों में क्या बुराइयां हैं, इन्हें सब पता है। यह हाल केवल या किसी एक धर्म के तथाकथित ठेकेदारों के नहीं हैं। कमोवेश यही हाल सब जगह है। इस तरह के पाखंडियों का क्या कहिये? आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसे पाखंडी लोगों के बड़े-बड़े आश्रम हैं, मठ हैं, इज्जत है, पैसा है और भक्तों की बड़ी भीड़ भी है। अब ऐसे ही चरित्र वालों को जगह मिल गयी है राजनीति में। वर्तमान समय में राजनीति में धर्म है या धर्म में राजनीति, यह पता लगाना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि इनका गठजोड़ रसगुल्ले और चाशनी जैसा हो गया है। खैर...


यह बात किसी के भी गले नहीं उतरेगी कि आखिर रावण के पुतले को आग लगाने वाला सिर्फ आतंकवादी इसलिए करार दिया गया क्योंकि वह किसी और धर्म का है। सुना है कि आतंकी का कोई धर्म नहीं होता तो फिर बुराई खत्म करने वाले का धर्म कैसे निश्चित हो गया। और वैसे भी जब रावण बुराई का प्रतीक है तो फिर उसका धर्म कैसे निश्चित हो गया? और इस तर्ज पर यह जरूरी क्यों है कि आप उसे किसी धर्म का माने? और जो बुरा व्यक्ति जब आपके धर्म का है ही नहीं तो फिर उसे किस धर्म के व्यक्ति ने मारा? इस प्रश्न का औचित्य ही क्या रह जाता है? लेकिन नहीं, साहब। ये तो ठहरे राजनेता। इन्हें तो मसले बनाने ही बनाने हैं। कैसे भी हो, इनके मतलब सिद्ध होने चाहिए।


वैसे भी आजकल रावण दहन के प्रतीकात्मक प्रदर्शनों का कोई महत्व नहीं रह गया है उल्टे अनजाने ही सही वायु प्रदूषण का कारण बनता है सो अलग। क्योंकि जिनके करकमलों द्वारा इस कार्य को अंजाम दिया जाता है, उनके अंदर कई गुना बड़ा रावण (अपवादों को छोड़कर) दबा पड़ा है। रावण का चरित्र तो कम से कम ऐसा था कि उसने सीता को हरण करने के बाद भी कभी भी जबरन कोई गलत आचरण नहीं किया और वह इस आस में था कि एकदिन वह उसे स्वीकार करेंगी लेकिन क्या आजकल के धर्म या राजनीति के ठेकेदारों से ऐसी कोई उम्मीद की जा सकती है? शायद नहीं।


....तो फिर क्या आपत्ति है? और यह जानने की भी आवश्यकता क्या है कि रावण को किसने जलाया? क्या यह काफी नहीं है कि रावण जला दिया गया? यह जरूर काफी होगा उस सामान्य जनमानस के लिए जिसे बुराईयों से असल में नफरत है। लेकिन ये ठहरे नेता। इन्हें तो मजा ही तबतक नहीं आता जबतक समाज में जाति-धर्म के नाम पर तड़का न लगे। आदमी की खुशबू आयी नहीं कि सियार रोने लगे जंगल में, टपकने लगी लार। माना कि पुलिस ने उस तथाकथित आतंकवादी को पकड़ भी लिया है तो यह तो पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी तरफ से तफ्तीश करें और जो कानूनन ठीक हो, उसके हिसाब से सजा मिले। लेकिन....फिर वही। यही तो राजनीति का चारा है। इतिहास गवाह है कि कितने ही अनावश्यक दंगे इन राजनैतिक दलों ने अपने लाभ के लिए कराए हैं। लेकिन...इनका अपना जमीर इनका खुद ही साथ नहीं देता है। ये तो अपने खुद के कर्मो से अंदर ही अंदर इतने भयभीत हैं कि इनकी इतनी भी हिम्मत नहीं है कि ये किसी पाक-साफ आदमी से नजर मिलाकर बात भी कर सकें। आखिर साधारण और सरल आदमी को मंदबुद्धि भी इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उसके अंदर छल और प्रपंच नहीं होता। लेकिन बुराई को पहचानना किसी स्कूल में नहीं सिखाया जाता। उसके लिए हमारा समाज ही बहुत है। तभी तो उस मंदबुद्धि के बालक ने बुराई के प्रतीक रावण के पुतले को जला डाला था। जब वह मंदबुद्धि ही था तो संभव है कि उसे अपने धर्म का भी न पता हो लेकिन अच्छाई और बुराई का ज्ञान किसी भी धर्म के व्यक्ति को हो ही जाता है। इसके लिए किसी खास बुद्धिमत्ता की आवश्यकता नहीं है। उसने रावण को जला डाला और छोड़ दिया अनुत्तरित प्रश्न, इस स्वीकरोक्ति के साथ कि "हाँ, मैंने ही जलाया है रावण को। क्या मैं, राम नहीं बन सकता?"


यह ऐसा यक्ष प्रश्न है कि अगर इसका उत्तर खोज लिया है तो "दंगे की जड़ों" का अपने आप ही सर्वनाश हो जाये।


मैं चंद्रेश छतलानी जी को पुनः एक अच्छी लघुकथा के लिए बहुत शुभकामनाएँ और बधाई देता हूँ।


(क्रमशः....)


#रजनीश_दीक्षित


(नोट:👉👉जैसा कि पिछले दिनों मैंने एक पोस्ट डाली थी, "लघुकथा_कलश_द्वितीय_महाविशेषांक" में प्रकाशित रचनाओं पर "मेरी समझ" पुनः शुरू कर दिया है और आज की कड़ी में इस रचना को लिया है। यह जानने के लिए कि आपकी कथा/कथायें मुझे कितनी समझ आईं, मेरी दीवार पर गाहे-बगाहे झांकते रहिये☺😊☺। 'मेरी समझ' में जो भी लिख रहा हूँ, यह वास्तव में मेरी समझ ही है, इसके इतर कुछ भी नहीं।)


"मेरी समझ" की अगली कड़ी में किसी अन्य लेखक/ लेखिका की रचना होगी। इंतजार कीजिए।☺☺

रविवार, 6 जुलाई 2025

डॉ. रजनीश दीक्षित की 6 जुलाई 2019 की फेसबुक पोस्ट

.....'मेरी समझ' की अगली कड़ी में आज के लेखक हैं आदरणीय चंद्रेश छतलानी जी। आज उनकी लघुकथा "अन्नदाता" पर अपनी समझ रख रहा हूँ, कुछ इस प्रकार:


#लेखक - चंद्रेश छतलानी जी

#लघुकथा - अन्नदाता 

#शब्द_संख्या - 400

मैंने बहुत पहले एक कविता लिखी थी, उसकी दो पंक्तियाँ :


बरसात में कुकुरमुत्ते जैसे उग आते हैं,

नेता भी चुनावों में वैसे ही बढ़ जाते हैं।

अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो इन्हें नेता कहना 'नेता' शब्द का अपमान हैं क्योंकि इनके क्रिया-कलाप इस शब्द के पासंग भी नहीं हैं।

कई साल पहले एक फ़िल्म आयी थी जिसमें कहा गया था कि "बीहड़ में तो बागी होते हैं, डकैत तो अब संसद में बैठते हैं।" राजनेताओं ने अपनी इस छवि को बनाने में बड़ी मेहनत की है। जनता के पसीने की कमाई की जो बंदर-बाँट करते हैं, उसकी जितनी मजम्मत की जाए कम है।

..कहते हैं जंगल में आदमी कितना भी सावधानी से कदम रखे, शिकार की तलाश में बैठे जानवरों को खबर हो ही जाती है। दरअसल, प्रकृति ने उनके उदर पूर्ति के लिए ये हुनर दिया है कि वे अपने शिकार को उसकी गंध और तापमान से दूर से ही पहचान लें और घात लगाकर उन पर आक्रमण कर दें। बिल्कुल यही प्रक्रिया आजकल के राजनेता अपनाते हैं। हमारे देश की राजनैतिक पार्टियों ने हमेशा जनता को अपने हित साधने के लिए प्रयोग किया है। चाहे वह 1947 में देश के विभाजन की दुःखद घटना हो या उसके बाद से समय-समय पर होने वाले धर्म/मजहब या जाति आधारित दंगे हों। सबके पीछे नेताओं की सत्ता लोलुपता और अपने फायदे ही छुपे रहते हैं। नेताओं ने बड़ी ही चतुरता से देश को जाति-मजहब में बाँटने का काम किया है। आज हालात यह हैं कि मतदाता अपने कीमती मत का प्रयोग इन चालबाजों की बातों में आकर कर रहे हैं और इनकी कुटिल राजनीति का हिस्सा बन रहे हैं। इन नेताओं ने इसे अपना ऐसा ब्रम्हास्त्र बनाया हुआ है कि जब इसका असर होता है तो न तो जनता को अच्छी शिक्षा चाहिए, न स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए और न ही और कोई विकास। 

सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार नीरज जी की एक रचना की कुछ पंक्तियाँ हैं :ये

"भूखा सोने को तैयार है मेरा देश,

बस उसे परियों के सपने दिखाते रहिए।"

नीरज जी ने यह बात कई दशकों पहले लिखी थी लेकिन आजकल की हकीकत तो यह है कि आप सपने छोड़िए, बस एक मोबाइल, लैपटॉप या साइकिल दे दीजिए।। बस, मतदाता आपका गुलाम। नेताओं के इसी सफलता के अचूक सूत्र ने बहुत से नेताओं को उनकी पीढ़ियों से सत्तासीन किया हुआ है। इन नेताओं के हालात कुछ ही दशक में कहाँ से कहाँ पहुँच गए? इन्होंने बाँटने की राजनीति को इस तरह बोया और काटा कि उनके परिवार का हर सदस्य सत्ता सुख भोगता रहा और देश की जनता के पसीने की कमाई से खुद की झोपड़ी, महलों में बदल ली और आम आदमी का जीवन स्तर नीचे, और नीचे गिरता चला गया। 

...प्रस्तुत लघुकथा में लेखक ने आज की राजनीति को देश के अन्नदाताओं से जोड़कर लिखा है। आजकल खेती करना बहुत ही घाटे के सौदा हो गया है। तकनीक की उपलब्धता के बाबजूद आज भी किसान प्रकृति के रहमो-करम पर निर्भर है। प्रकृति को हमने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए बदलने पर इतना मजबूर कर दिया कि अब उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। जंगल के जंगल साफ हो रहे हैं, सड़कों को चौड़ा करने के फलस्वरूप पेड़ों की कटाई लगातार जारी है, नदियों का पानी, कारखानों की गंदगी और रसायन के लगातार मिलने से प्रदूषित हो रहा है। तो ऐसे में किसान करे भी तो क्या करे? सब किसानों की यह क्षमता नहीं है कि वे अपने कुएं खोद लें और पम्प से पानी प्राप्त कर लें और जिनकी यह स्थिति है उन्हें भी पानी के लगातार कम हो रहे जलस्तर से इस सुविधा का लाभ आखिरकार कब तक मिल पायेगा? चलो मान भी लिया जाए कि समय से बारिश हो भी गई तो रही बची कसर पूरी कर देते हैं आवारा जानवर। किसानों की जिंदगी इन समस्याओं के कारण बहुत ही मुश्किल और दयनीय हो जाती है। आजकल खेती से जो पैदावार होती है उसमें किसान की लागत भी नहीं निकलती है। ऐसे में कई किसान समस्या के निदान हेतु या तो किसी बैंक के कर्जदार ही जाते हैं या किसी साहूकार के। दोनों ही हालात में वह कर्ज के चक्रव्यूह से निकलने में अपने आपको असहाय महसूस करता है और फिर उसे इस जहाँ से रुखसत होने का दुर्भाग्यपूर्ण कदम उठाना पड़ता है। 

किसी ने इस तरह के हालात पर कहा है -

के चेहरा बता रहा था कि मरा है भूख से,

सब लोग कह रहे थे कुछ खा के मर गया।😢

चुनावों का मौसम आ चुका था और आज उस किसान की फसल कटी है। वह फसल से हुई उपज और जिंदगी को तौलने की असफल कोशिश में था कि 'गिद्धों' का आना शुरू हो गया। इन्हें आम आदमी की मुश्किलों से कोई मतलब नहीं। आम आदमी की मुश्किलें इनकी बला से। शिकार देखा और अपने धर्म के रंग का तीर चला दिया, "काका, आपका मत मेरा मत। क्योंकि आपका धर्म मेरा धर्म और धर्म की रक्षा हेतु आपका कर्तव्य है कि आप मुझे ही अपना मत प्रदान करें।" .... अब होली चाहे त्योहार के नियत समय पर अपने रूप में कम मनाई जाए लेकिन चुनावों में रंगों का महत्व कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें पास आती जा रही हैं, हर रंग वाला, धर्म की रक्षा हेतु खुद को सच्चा ठेकेदार बताते हुए आम आदमी से खुद को चुनने के लिए गुहार करता है। आम आदमी? उसके लिए तो इन रंगों के क्या मायने होंगे जब उसकी जिंदगी में सिर्फ रातें ही नहीं दिन भी स्याह हो चुके हैं। 

...लेकिन हमारे देश का किसान या कोई भी मेहनतकश आदमी इन चमचमाती गाडियों में आने वालों की चाशनी से पगी बातों में अपनापन देखता है और उसे लगता है कि यह सब तो अपने ही हैं। सभी उसके साथ हैं, शायद जिन्दगी का सफर इतना मुश्किल नहीं होगा। लेकिन हकीकत इन सबसे अलग होती है। उसे यह पता भी नहीं चल पाता कि इन रंगों ने अपना काम कब कर दिया? चारों तरफ अपने ही तरह और उन्हीं रंगों में रंगे लोगों का हित शायद सिद्ध हो चुका है। अब बस आखिरी निर्णय और वह अपने गन्तव्य की ओर प्रस्थान कर चुका है। एक ऐसे गन्तव्य की ओर जहाँ से लौटकर कोई नहीं आता, अन्नदाता भी नहीं।😢

**

मैं चंद्रेश छतलानी जी को पुनः एक अच्छी लघुकथा के लिए बहुत शुभकामनाएँ और बधाई देता हूँ।

#रजनीश_दीक्षित

शनिवार, 28 जून 2025

English Laghukatha eBook - Free for limited time

https://amzn.in/d/6rUhbIr

The eBook is available for free on Amazon for a limited time. I would be grateful if you could take a moment to read it.

कुछ दिनों के लिए amazon पर यह ईबुक निःशुल्क उपलब्ध है। पढ़ने के आग्रह के साथ।

My Selected Laghukathas