परिचय
डिजिटल युग की इस भाग-दौड़ भरी दुनिया में, जहाँ पाठकों का attention span लगातार सिमट रहा है, समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य की एक बेहद सशक्त और प्रासंगिक विधा के रूप में उभर कर सामने आई है।
यह किसी एक कहानी को छोटा कर कहा गया नहीं है; यह तो आधुनिक जीवन की आपाधापी में उपजे किसी तीखे अनुभव, किसी गहरी मानवीय संवेदना, या किसी ज्वलंत सामाजिक मुद्दे की एक 'क्षणिका' सरीखी है - एक पल की कथा। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसकी संक्षिप्तता है, जो कम-से-कम शब्दों में अधिकतम प्रभाव छोड़ने का सामर्थ्य रखती है।
आज की हिंदी लघुकथा केवल उपदेश या आदर्श की बात नहीं करती, बल्कि यह अपने समय के जटिल यथार्थ को पूरी ईमानदारी से आईना दिखाती है। आइए कुछ चर्चा करते हैं।
1. लघुकथा: समय के साथ बदलता स्वरूप
हिंदी साहित्य में कथा कहने की परम्परा सदियों पुरानी है, लेकिन लघुकथा का आधुनिक स्वरूप 20वीं सदी के उत्तरार्ध में, विशेषकर 1970 के दशक के बाद, एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हुआ।
पंचतंत्र और जातक कथाओं जैसी आरंभिक रचनाओं में उपदेशात्मकता (नैतिक शिक्षा) हावी थी, जिसे समकालीन लेखकों ने त्याग दिया। अब लघुकथा ने यथार्थवादी और गहन मनोवैज्ञानिक विषयों को अपनाया है।
आधुनिक लघुकथा कथा-सम्राट प्रेमचंद की 'कहानी' की तरह विस्तृत नहीं होती, बल्कि यह जीवन के किसी एक दृश्य, किसी एक भाव का 'स्नैपशॉट' होती है। यह कहानी के सभी तत्वों (चरित्र, कथानक, संवाद) को अत्यंत संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें निहित मूल विचार का उदघाटन अक्सर इसके अंत में होता है, जो कि एक प्रभावी मोड़ या पाठक के मन में बैठ जाने वाली एक गहरी संवेदना सरीखा होता है। डिजिटल माध्यमों और पत्रिकाओं ने इसके प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे यह विधा आम और व्यस्त पाठकों तक आसानी से पहुँच सकी है।
2. समकालीन लघुकथा के प्रमुख विषय और रुझान
समकालीन हिंदी लघुकथा वास्तव में आज के समाज की धड़कन को बड़ी सजीवता और संक्षिप्तता के साथ अभिव्यक्त करती है। इसकी मौलिकता इसी बात में है कि यह केवल पुराने विषयों को नहीं दोहराती, बल्कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं और नई सामाजिक विसंगतियों को अपना केंद्रीय कथ्य बनाती है। सामान्य विषयों के अतिरिक्त, समकालीन लघुकथा के फलक पर कई अन्य महत्त्वपूर्ण आयाम उभरे हैं, जिनमें से कुछ को निम्नानुसार बताया गया है:
2.1 आधुनिक समाज की विडंबनाएँ और विषय-वस्तु
समकालीन लघुकथा ने अपने सामाजिक परिप्रेक्ष्य को व्यापक बनाया है, जिसमें वर्गभेद, पारिवारिक विघटन, और व्यक्तिगत टूटन जैसे मुद्दे शामिल हैं। इनमें शामिल हैं -
| विषय-वस्तु | विस्तार और प्रासंगिकता |
| किसान जीवन और कृषि संकट | वैश्वीकरण और पूँजीवादी प्रभाव के कारण किसानों की आत्महत्याएँ, कर्ज का जाल, और खेती का गैर-लाभकारी हो जाना—ये विषय लघुकथा में संवेदनात्मक धरातल पर उतरे हैं। कई लघुकथाएँ अन्नदाता के संघर्ष और उसकी बदहाल माली हालत को दर्शाती हैं। |
| पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन | आज लघुकथा बदलते मौसम, सूखे, बाढ़, और शहरों में प्रकृति के क्षरण को प्रमुखता से उठाती है। यह मानव और प्रकृति के बिगड़ते संबंध, अंधाधुंध विकास की कीमत और जल, जंगल, ज़मीन के विनाश पर तीखे सवाल करती है। |
| उपभोक्तावाद और लालच | बाज़ारवाद ने किस प्रकार मानवीय मूल्यों को बदलकर रख दिया है, इसका चित्रण लघुकथा में मिलता है। अत्यधिक लालच, भौतिक सुखों के लिए compromises, और "अधिक की चाहत" में सब कुछ खो देने की विडंबना को उजागर किया जाता है। |
| सांप्रदायिकता और हिंसा | समाज में पनप रही हिंसक प्रवृत्ति, कट्टरता, और साम्प्रदायिक दंगों की भयावहता भी समकालीन लघुकथा का गंभीर विषय बनी है। |
| पहचान का संकट और अस्तित्व | निम्न वर्ग द्वारा अन्याय का प्रतिकार, हाशिए पर धकेले गए लोगों की पीड़ा, और समाज में अपनी Identity बनाए रखने का संघर्ष भी लघुकथाओं में सामने आया है।
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2.2 कथ्य की अभिव्यक्ति और शिल्पगत विशेषताएँ
समकालीन हिंदी लघुकथा की शक्ति उसे कहने के कलात्मक उत्कर्ष में भी निहित है।
| शिल्पगत विशेषता | प्रभाव और महत्ता |
| सांकेतिकता और सूक्ष्मता | लघुकथा अपने विशाल कथ्य को संकेतों और सूक्ष्म चित्रण के माध्यम से व्यक्त करती है। यहाँ सब कुछ स्पष्ट नहीं कहा जाता, बल्कि पाठक को सोचने और निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए छोड़ दिया जाता है। |
| तीखा व्यंग्य (Satire) | हरिशंकर परसाई की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, आधुनिक लघुकथाएँ दफ़्तरी जीवन की विसंगतियों से लेकर राजनीतिक अवसरवादिता पर तीखे कटाक्ष करती हैं। |
| विषय पर सीधा प्रहार | कहानी की तरह विस्तृत पृष्ठभूमि बाँधने के बजाय, लघुकथा सीधे विषय पर आती है, जिससे पाठक का attention span सिमटने के कारण प्रभाव गहरा और तत्काल होता है। |
| सरल, सहज भाषा | जन-मानस से संवाद स्थापित करने के लिए अक्सर सहज-सजग-रोचक भाषा का प्रयोग किया जाता है, जिससे यह विधा आम पाठकों तक आसानी से पहुँच पाती है और उन्हें व्यापक अनुभव-जगत् से साक्षात्कार कराती है। |
कुल मिलाकर, समकालीन हिंदी लघुकथा ने सिद्ध किया है कि साहित्य का आकार-प्रकार नहीं, बल्कि उसका विजन, संघर्ष और विडंबनाओं के उभार की उसकी क्षमता ही उसकी कसौटी होती है। यह विधा 21वीं सदी की तीव्र गति और जटिल यथार्थ को पकड़ने का एक क्रांतिकारी साहित्यिक आयाम है।
3. लघुकथा की सफल संरचना
एक श्रेष्ठ लघुकथा का निर्माण किसी कुशल कारीगर की कारीगरी जैसा होता है, जहाँ एक भी शब्द अनावश्यक नहीं होता। इसकी सफलता कई तत्वों पर निर्भर करती है, इनमें से कुछ पर चर्चा करते हैं:
| तत्व | विवरण |
| कथ्य की नवीनता | विषय-वस्तु ताज़ा होनी चाहिए। यह जीवन के घिसे-पिटे पहलुओं से हटकर, किसी अनछुए अनुभव को छूए। |
| संक्षिप्तता | लघुकथा की अधिकतम शब्द-सीमा पर बहुत चर्चाएँ हुई हैं, और इस लेख के लिखे जाने तक विद्वान एकमत नहीं हैं, पर 300-500 शब्दों में कही गई लघुकथा का अच्छा प्रभाव माना जाता है। |
| क्षण की अभिव्यक्ति | यह पूरे जीवन-चरित्र का नहीं, बल्कि जीवन के किसी एक महत्वपूर्ण क्षण या मनोदशा का चित्रण करती है। पात्र कम और उनका चित्रण सांकेतिक हो तो बेहतर। |
| प्रभावी शुरुआत | पाठक को तुरंत रचना से जोड़ने के लिए पहली एक-दो पंक्तियाँ आकर्षक होनी चाहिए। हालाँकि लघुकथा सीधे विषय पर आनी चाहिए। |
| अंतिम प्रभाव (पंच) | अंत अपेक्षित नहीं, बल्कि अप्रत्याशित हो तो यह पाठक के मन में एक गहरा विचार या एक टीस छोड़कर जाता है।
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लघुकथा में अनावश्यक विशेषणों, लंबे संवादों और विस्तृत पृष्ठभूमि के चित्रण से बचें। यहाँ हर शब्द का अपना विशिष्ट महत्व होता है।
4. लघुकथा लेखन में अवसर और चुनौतियाँ
आज, आधुनिक लघुकथा लेखन केवल शौक का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह एक साहित्यिक पहचान और करियर का रास्ता बन गया है।
अवसर: साहित्यिक वेबसाइटें, डिजिटल पत्रिकाएँ, सोशल मीडिया और ब्लॉग्स ने लेखकों के लिए द्वार खोले हैं। कई प्रकाशन गृह भी लघुकथा संग्रह प्रकाशित कर रहे हैं।
चुनौतियाँ: संक्षिप्तता के कारण, लेखक के लिए अपनी बात को कम शब्दों में पूरी तरह से व्यक्त करना और पाठक को बांधे रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
एक सफल लघुकथा लेखक को अपने आसपास की घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील और अवलोकनशील होना आवश्यक है।
निष्कर्ष:
समकालीन हिंदी लघुकथा ने यह सिद्ध कर दिया है कि साहित्य की प्रासंगिकता कभी कम नहीं होती, केवल उसका रूप और अभिव्यक्ति का माध्यम बदलता है। यह 21वीं सदी के तेज-रफ़्तार जीवन की साहित्य विधा है, जो केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि हमें गहरे तक सोचने पर मजबूर भी करती है। यह विधा आज के समय में हिंदी साहित्य को एक नई दिशा और युवा पाठकों का एक बड़ा वर्ग प्रदान कर रही है और उम्मीद है कि कम शब्दों में जीवन का सार समाहित करने वाली 'भविष्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधा' बनेगी।
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डॉ. चंद्रेश कुमार छ्तलानी
writerchandresh@gmail.com
9928544749
लेखक परिचय:

25 वर्षों से अधिक के प्रशिक्षण, अनुसंधान, अकादमिक कार्य, लेखन, सॉफ्टवेयर और वेबसाइट विकास के गहन अनुभव के साथ, डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी ने अब तक 150 से अधिक सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन और वेबसाइटें स्वयं निर्मित की हैं। वे तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं - वर्ल्ड बुक रिकॉर्ड (श्रीलंका), ट्रिब्यून इंटरनेशनल वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, और वर्ल्ड्स ग्रेटेस्ट रिकॉर्ड्स - द्वारा सर्वाधिक शैक्षणिक प्रमाणपत्र अर्जित करने का विश्व रिकॉर्ड रखते हैं। इसके अतिरिक्त, उनकी अंग्रेज़ी लघुकथाओं की पुस्तक को भी तीन संगठनों ने रिकॉर्ड के लिए चयनित किया है। उन्हें एक वर्ष में स्कूल-विद्यार्थियों के लिए 50 से अधिक गेम्स सॉफ्टवेयार बनाने का रिकॉर्ड भी प्राप्त है। उन्होंने Microsoft, Amity, Cisco, Google, IEEE, DIKSHA, WHO तथा अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से 1,000 से अधिक प्रमाणपत्र प्राप्त किए हैं। डॉ. चन्द्रेश अब तक 17 पुस्तकों के लेखक, 10 मोनोग्राफ के रचनाकार, 10 पुस्तकों के संपादक, और 43 से अधिक शोध-पत्रों के लेखक हैं। उन्हें 50 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. छतलानी एक बहुमुखी साहित्यकार भी हैं और लघुकथाएँ, कहानियाँ, लेख तथा कविताएँ लिखते हैं।
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