जनवरी 2018 में डॉ. संध्या तिवारी द्वारा की गई एक समीक्षा:
वैचारिकी-12
1-किताब - नई सदी की धमक
2-लघुकथा विचार - कड़ी - 12
3-लघुकथा संख्या - 22
4-लघुकथा - सोयी हुई सृष्टि
5-लघुकथाकार - चन्द्रेश कुमार छतलानी
"सोयी हुई सृष्टि" लघुकथा पढ़ कर जो सबसे पहला विचार मेरे मन में आया वह था , "ताओ" पंथ के संत 'च्वांगत्सू' की 'तितली' की कहानी ।
कथा कुछ यूं है -- कि एक सुबह 'च्वांगत्सू' जागे। वे बड़े परेशान लग रहे थे। उन्हें चाय देने आए शिष्यों ने गुरुवर को परेशान देखा तो कारण पूछा। 'च्वांगत्सू' ने कहा, मैं इसलिए चिंतित हूं, क्योंकि कल रात मैंने एक सपना देखा। सपने में मैंने देखा कि मैं एक तितली हूं। शिष्यों ने कहा, इसमें चिंतित होने वाली क्या बात है। सपना ही तो था। 'च्वांगत्सू' ने कहा, नहीं, लेकिन बात ये है कि जब मैं स्वप्न में तितली था, तब मुझे इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। अभी जागने पर मुझे याद आया है कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं वास्तव में एक तितली हूं, जो कि अभी यह स्वप्न देख रही है कि वह "च्वांगत्सू" है और जागने पर वह पाए कि वह तो वास्तव में एक तितली है।
जाग्रति और स्वप्न मनुष्य का सबसे बड़ा कौतूहल रहा है।
'सोयी हुयी सृष्टि' का नायक भी खुद को सोया हुआ देख रहा है 'च्वांगत्सू' की तितली के नाईं ।'च्वांगत्सू' जागने पर चिंतित होता है और अपने शिष्यों को अपनी चिंता से अवगत कराता है कि वह वास्तव में तितली तो नहीं।
कथानायक कथा में पहले सोया हुआ अर्थात अचेतन मन का प्रतीक है फिर नेता का प्रतीक है तदोपरान्त आम आदमी का प्रतीक है ।
परन्तु जागने पर जिस प्रकार कथा नायक परिचयपत्र में अपने पिता का नाम देख निश्चिन्त हो जाता है वैसा संत च्वांगत्सू नहीं कर पाते क्योंकि उनकी उलझन आध्यात्मिक स्तर की है और कथा नायक की भौतिक।
फिर भी कथा का स्वप्न से साम्य तो है ही।
प्रस्तुत कथा में भी ऐसा ही साहचर्य देखने को मिलता है ।
हालांकि इस कथा में सोना मात्र 'प्रतीक' है तमोगुण का ।जो कि हम भारत वासियों की मानसिकता की निशानी है।
फिर चाहे 'स्वामी विवेकानन्द' जी जगायें या 'भारतेन्दु हरिश्चन्द '।
प्रतीकों और बिम्बों के आधार पर बुना कथा का फलक बहुत विस्तृत है।
करोड़ो लोगो से ज्यादा सोये होना मने हम मनुष्यों में जागरूकता का अभाव होना ।
खादी के कपड़े पहने लोगों के मुंह से कुछ आवाजें और धुआं निकलता मने मुट्ठी भर लोगों का आम जनता का शोषण ।
स्वयं कथा नायक का स्वपन में ही जाग जाना और शोषकवर्ग में शामिल हो जाना ।
तभी उसका स्वप्न टूट जाना और परिचय पत्र पर पिता का नाम देखना यहां परिचय पत्र पर पिता का नाम देखने से एक अर्थ
(जो कि समष्टिगत है) यह भी निकलता है कि वह खुद को भारत देश के रूप में देख रहा और पिता के रूप में बापू को ।
दूसरा अर्थ (जो कि व्यष्टिगत है) यह है कि वह एक आम नागरिक है और उसके पिता के नाम से वह जाना जा रहा है ।
प्रथमदृष्टया यह कथा 'ख़लील ज़िब्रान' की कथाओं की सी झलक लिये हुये प्रतीत होती है
'चन्द्रेशकुमार छतलानी जी ' ने लघुकथाओं में अपनी एक शैली विकसित की है।
कलात्मक रूप से उच्चकोटि की रचना है ।
कथानक ,शिल्प, शैली, शीर्षक आदि सभी मानकानुसार ।
कथाकार को बधाई ।
- डाॅ संध्या तिवारी
पीलीभीत
