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गुरुवार, 11 जुलाई 2019

लघुकथा: आपका दिन


 "मैं केक नहीं काटूँगी।" उसने यह शब्द कहे तो थे सहज अंदाज में, लेकिन सुनते ही पूरे घर में झिलमिलाती रोशनी ज्यों गतिहीन सी हो गयी। उसका अठारहवाँ जन्मदि मना रहे परिवारजनों, दोस्तों, आस-पड़ौसियों और नाते-रिश्तेदारों की आँखें अंगदी पैर की तरह ताज्जुब से उसके चेहरे पर स्थित हो गयीं थी

वह सहज स्वर में ही आगे बोली, "अब मैं बड़ी हो गयी हूँ, इसलिए सॉलिड वर्ड्स में यह कह सकती हूँ कि अब से यह केक मैं नहीं मेरी मॉम काटेगी।" कहते हुए उसके होठों पर मुस्कुराहट तैर गयी।

वहाँ खड़े अन्य सभी के चेहरों पर अलग-अलग भाव आए, लेकिन जिज्ञासावश वे सभी चुप रहे। उसकी माँ उसके पास आई और बोली, "मैं क्यों...? बेटे ये आपका बर्थडे है। केक आप ही काटो।"

उसने अपनी माँ की आँखों में झाँकते हुए उत्तर दिया, "मॉम, आपको याद है कि मेरे पैदा होने से पहले आपको बहुत दर्द हुआ होगा... लेबर पैन। उसके बाद मैं पैदा हुई।"

माँ ने हाँ में सिर हिला दिया।

वह आगे बोली, "इसका मतलब मेरा बर्थडे तो बाद में हुआ, उससे पहले आपका लेबर-डे है। एटीन की होने से पहले यह बात सबके सामने नहीं कह सकती थी। लेकिन आज... हैप्पी लेबर-डे मॉम।" आखिरी तीन शब्दों को उसने पूरे जोश से कहा।

और यह कहकर उसने अपने हाथ में थामे हुए चाँदी के चाकू से केक के ठीक ऊपर तक लटके हुए बड़े गुब्बारे को धम्म से फोड़ दिया।

- डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

सोमवार, 8 जुलाई 2019

कैनेडा से प्रकाशित पत्रिका हिन्दी चेतना के नवीन अंक में मेरी दो लघुकथाएँ

कैनेडा हिंदी प्रचारिणी सभा की अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका हिन्दी चेतना के जुलाई-सितम्बर 2019 अंक (लघुकथा विशेषांक) में मेरी  लघुकथाओं (दायित्व-बोध और खजाना) को स्थान मिला है। दायित्व-बोध आपने पिछली पोस्ट (http://laghukathaduniya.blogspot.com/2019/07/blog-post_6.html) में पढ़ ली है। विश्वास है खजाना भी आपको निराश नहीं करेगी। खजाना मेरी उन लघुकथाओं में से एक है, जिन रचनाओं के लिए पाठकों ने मुझे फोन, ईमेल और पत्र व्यवहार कर अपने प्रेम और स्नेह से मुझे समृद्ध किया। कुछ पाठकों ने इसके कथ्य का अनुसरण करते हुए कुछ रुपये अपने स्वयं के अंतिम संस्कार हेतु अलग से रख भी दिये। आप भी पढ़िये और बताइये कि यह रचना कितनी सफल है। 


खजाना / डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

पिता के अंतिम संस्कार के बाद शाम को दोनों बेटे घर के बाहर आंगन में अपने रिश्तेदारों और पड़ौसियों के साथ बैठे हुए थे। इतने में बड़े बेटे की पत्नी आई और उसने अपने पति के कान में कुछ कहा। बड़े बेटे ने अपने छोटे भाई की तरफ अर्थपूर्ण नजरों से देखकर अंदर आने का इशारा किया और खड़े होकर वहां बैठे लोगों से हाथ जोड़कर कहा, “अभी पांच मिनट में आते हैं”।

फिर दोनों भाई अंदर चले गये। अंदर जाते ही बड़े भाई ने फुसफुसा कर छोटे से कहा, "बक्से में देख लेते हैं, नहीं तो कोई हक़ जताने आ जाएगा।" छोटे ने भी सहमती में गर्दन हिलाई ।

पिता के कमरे में जाकर बड़े भाई की पत्नी ने अपने पति से कहा, "बक्सा निकाल लीजिये, मैं दरवाज़ा बंद कर देती हूँ।" और वह दरवाज़े की तरफ बढ़ गयी।

दोनों भाई पलंग के नीचे झुके और वहां रखे हुए बक्से को खींच कर बाहर निकाला। बड़े भाई की पत्नी ने अपने पल्लू में खौंसी हुई चाबी निकाली और अपने पति को दी।

बक्सा खुलते ही तीनों ने बड़ी उत्सुकता से बक्से में झाँका, अंदर चालीस-पचास किताबें रखी थीं। तीनों को सहसा विश्वास नहीं हुआ। बड़े भाई की पत्नी निराशा भरे स्वर में  बोली, "मुझे तो पूरा विश्वास था कि बाबूजी ने कभी अपनी दवाई तक के रुपये नहीं लिये, तो उनकी बचत के रुपये और गहने इसी बक्से में रखे होंगे, लेकिन इसमें तो....."

इतने में छोटे भाई ने देखा कि बक्से के कोने में किताबों के पास में एक कपड़े की थैली रखी हुई है, उसने उस थैली को बाहर निकाला। उसमें कुछ रुपये थे और साथ में एक कागज़। रुपये देखते ही उन तीनों के चेहरे पर जिज्ञासा आ गयी। छोटे भाई ने रुपये गिने और उसके बाद कागज़ को पढ़ा, उसमें लिखा था,
"मेरे अंतिम संस्कार का खर्च"
-0-


रविवार, 7 जुलाई 2019

लघुकथा अन्नदाता पर रजनीश दीक्षित जी की समीक्षा

#लेखक - चंद्रेश छतलानी
#लघुकथा - अन्नदाता
#शब्द_संख्या - 400
#समीक्षा - रजनीश दीक्षित

मैंने बहुत पहले एक कविता लिखी थी, उसकी दो पंक्तियाँ :

बरसात में कुकुरमुत्ते जैसे उग आते हैं,
नेता भी चुनावों में वैसे ही बढ़ जाते हैं।

अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो इन्हें नेता कहना 'नेता' शब्द का अपमान हैं क्योंकि इनके क्रिया-कलाप इस शब्द के पासंग भी नहीं हैं।

कई साल पहले एक फ़िल्म आयी थी जिसमें कहा गया था कि "बीहड़ में तो बागी होते हैं, डकैत तो अब संसद में बैठते हैं।" राजनेताओं ने अपनी इस छवि को बनाने में बड़ी मेहनत की है। जनता के पसीने की कमाई की जो बंदर-बाँट करते हैं, उसकी जितनी मजम्मत की जाए कम है।

...कहते हैं जंगल में आदमी कितना भी सावधानी से कदम रखे, शिकार की तलाश में बैठे जानवरों को खबर हो ही जाती है। दरअसल, प्रकृति ने उनके उदर पूर्ति के लिए ये हुनर दिया है कि वे अपने शिकार को उसकी गंध और तापमान से दूर से ही पहचान लें और घात लगाकर उन पर आक्रमण कर दें। बिल्कुल यही प्रक्रिया आजकल के राजनेता अपनाते हैं। हमारे देश की राजनैतिक पार्टियों ने हमेशा जनता को अपने हित साधने के लिए प्रयोग किया है। चाहे वह 1947 में देश के विभाजन की दुःखद घटना हो या उसके बाद से समय-समय पर होने वाले धर्म/मजहब या जाति आधारित दंगे हों। सबके पीछे नेताओं की सत्ता लोलुपता और अपने फायदे ही छुपे रहते हैं। नेताओं ने बड़ी ही चतुरता से देश को जाति-मजहब में बाँटने का काम किया है। आज हालात यह हैं कि मतदाता अपने कीमती मत का प्रयोग इन चालबाजों की बातों में आकर कर रहे हैं और इनकी कुटिल राजनीति का हिस्सा बन रहे हैं। इन नेताओं ने इसे अपना ऐसा ब्रम्हास्त्र बनाया हुआ है कि जब इसका असर होता है तो न तो जनता को अच्छी शिक्षा चाहिए, न स्वास्थ्य सेवाएं चाहिए और न ही और कोई विकास।

सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार नीरज जी की एक रचना की कुछ पंक्तियाँ हैं :

"भूखा सोने को तैयार है मेरा देश,
बस उसे परियों के सपने दिखाते रहिए।"

नीरज जी ने यह बात कई दशकों पहले लिखी थी लेकिन आजकल की हकीकत तो यह है कि आप सपने छोड़िए, बस एक मोबाइल, लैपटॉप या साइकिल दे दीजिए।। बस, मतदाता आपका गुलाम। नेताओं के इसी सफलता के अचूक सूत्र ने बहुत से नेताओं को उनकी पीढ़ियों से सत्तासीन किया हुआ है। इन नेताओं के हालात कुछ ही दशक में कहाँ से कहाँ पहुँच गए? इन्होंने बाँटने की राजनीति को इस तरह बोया और काटा कि उनके परिवार का हर सदस्य सत्ता सुख भोगता रहा और देश की जनता के पसीने की कमाई से खुद की झोपड़ी, महलों में बदल ली और आम आदमी का जीवन स्तर नीचे, और नीचे गिरता चला गया।

....प्रस्तुत लघुकथा में लेखक ने आज की राजनीति को देश के अन्नदाताओं से जोड़कर लिखा है। आजकल खेती करना बहुत ही घाटे के सौदा हो गया है। तकनीक की उपलब्धता के बाबजूद आज भी किसान प्रकृति के रहमो-करम पर निर्भर है। प्रकृति को हमने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए बदलने पर इतना मजबूर कर दिया कि अब उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। जंगल के जंगल साफ हो रहे हैं, सड़कों को चौड़ा करने के फलस्वरूप पेड़ों की कटाई लगातार जारी है, नदियों का पानी, कारखानों की गंदगी और रसायन के लगातार मिलने से प्रदूषित हो रहा है। तो ऐसे में किसान करे भी तो क्या करे? सब किसानों की यह क्षमता नहीं है कि वे अपने कुएं खोद लें और पम्प से पानी प्राप्त कर लें और जिनकी यह स्थिति है उन्हें भी पानी के लगातार कम हो रहे जलस्तर से इस सुविधा का लाभ आखिरकार कब तक मिल पायेगा? चलो मान भी लिया जाए कि समय से बारिश हो भी गई तो रही बची कसर पूरी कर देते हैं आवारा जानवर। किसानों की जिंदगी इन समस्याओं के कारण बहुत ही मुश्किल और दयनीय हो जाती है। आजकल खेती से जो पैदावार होती है उसमें किसान की लागत भी नहीं निकलती है। ऐसे में कई किसान समस्या के निदान हेतु या तो किसी बैंक के कर्जदार ही जाते हैं या किसी साहूकार के। दोनों ही हालात में वह कर्ज के चक्रव्यूह से निकलने में अपने आपको असहाय महसूस करता है और फिर उसे इस जहाँ से रुखसत होने का दुर्भाग्यपूर्ण कदम उठाना पड़ता है।

किसी ने इस तरह के हालात पर कहा है -
चेहरा बता रहा था कि मरा है भूख से,
सब लोग कह रहे थे कुछ खा के मर गया।😢

चुनावों का मौसम आ चुका था और आज उस किसान की फसल कटी है। वह फसल से हुई उपज और जिंदगी को तौलने की असफल कोशिश में था कि 'गिद्धों' का आना शुरू हो गया। इन्हें आम आदमी की मुश्किलों से कोई मतलब नहीं। आम आदमी की मुश्किलें इनकी बला से। शिकार देखा और अपने धर्म के रंग का तीर चला दिया, "काका, आपका मत मेरा मत। क्योंकि आपका धर्म मेरा धर्म और धर्म की रक्षा हेतु आपका कर्तव्य है कि आप मुझे ही अपना मत प्रदान करें।" .... अब होली चाहे त्योहार के नियत समय पर अपने रूप में कम मनाई जाए लेकिन चुनावों में रंगों का महत्व कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें पास आती जा रही हैं, हर रंग वाला, धर्म की रक्षा हेतु खुद को सच्चा ठेकेदार बताते हुए आम आदमी से खुद को चुनने के लिए गुहार करता है। आम आदमी? उसके लिए तो इन रंगों के क्या मायने होंगे जब उसकी जिंदगी में सिर्फ रातें ही नहीं दिन भी स्याह हो चुके हैं।

...लेकिन हमारे देश का किसान या कोई भी मेहनतकश आदमी इन चमचमाती गाडियों में आने वालों की चाशनी से पगी बातों में अपनापन देखता है और उसे लगता है कि यह सब तो अपने ही हैं। सभी उसके साथ हैं, शायद जिन्दगी का सफर इतना मुश्किल नहीं होगा। लेकिन हकीकत इन सबसे अलग होती है। उसे यह पता भी नहीं चल पाता कि इन रंगों ने अपना काम कब कर दिया? चारों तरफ अपने ही तरह और उन्हीं रंगों में रंगे लोगों का हित शायद सिद्ध हो चुका है। अब बस आखिरी निर्णय और वह अपने गन्तव्य की ओर प्रस्थान कर चुका है। एक ऐसे गन्तव्य की ओर जहाँ से लौटकर कोई नहीं आता, अन्नदाता भी नहीं।😢

**

मैं चंद्रेश छतलानी जी को पुनः एक अच्छी लघुकथा के लिए बहुत शुभकामनाएँ और बधाई देता हूँ।

- रजनीश दीक्षित


अन्नदाता / डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

फसल कटाई के बाद उसके चेहरे और खेत की ज़मीन में कोई खास फर्क नहीं दिखाई दे रहा था। दोनों पर गड्ढे और रेशे। घर की चौखट पर बैठा धंसी हुई आंखों से वह कटी हुई फसल और काटने वाली ज़िन्दगी के अनुपात को मापने का प्रयास कर रहा था कि एक चमचमाती कार उसके घर के सामने आ खड़ी हुई। उसमें से एक सफेद कुर्ता-पजामा धारी हाथ जोड़ता हुआ बाहर निकला और उसके पास आकर बोला, "राम-राम काका।" और अपने कुर्ते की जेब से केसरिया सरीखा रंग निकाल कर उसके ललाट पर लगा दिया। उसने अचंभित होकर पूछा, "आज होली..."

उस व्यक्ति ने हँसते हुए उत्तर दिया, "नहीं काका। यह रंग हमारे धर्म का हैइसे सिर पर लगाये रखिये। दूसरे लोग हमारे धर्म को बेचना चाहते हैंइसलिए आप वोट हमें देना ताकि हमारा धर्म सुरक्षित रहें और हां! हम और सिर्फ हम ही आपके साथ हैं और कोई नहीं।"

सुनकर उसने हाँ की मुद्रा में गर्दन हिलाकर कहा, "जी अन्नदाता।"

उस चमचमाती कार के जाते ही एक दूसरी चमचमाती कार उसके घर के सामने आई। उसमें से भी पहले व्यक्ति जैसे कपड़े पहने एक आदमी निकला। हाथ दिखाते हुए उस आदमी ने उसके पास आकर उसकी आँखों और नाक पर सफेद रंग लगाया और बोला, "देश को धर्म के आधार पर तोड़ने की साजिश की जा रही है। आप अपनी आंखें खुली रखें और देश की इज्जत बचाये रखने के लिये हमें वोट दें और हाँ! हम और सिर्फ हम ही आपके साथ हैं और कोई नहीं।"

उसे भी अपने साथ पा वह मुस्कुरा कर बोला, "जी अन्नदाता।"

उस व्यक्ति के जाते ही एक तीसरा आदमी अंदर आ गया। उसके चेहरे के रंगों को देखकर वह आदमी घृणायुक्त स्वर में बोला, "तुम खुद अन्नदाता होकर गलत रंगों में रंगे हो! अपने लिए खुद आवाज़ उठाओऔर हाँ! सिर्फ हम ही हैं जो तुम्हारे साथ हैं।" कहकर उस आदमी ने उसके मुंह पर लाल रंग मल दिया।

वह प्रफुल्लित हो उठा। सभी तो उसके साथ थे।

उसने अपने बायीं तरफ देखावहां वह खुद ही खड़ा था और दाएं तरफ भी वही। अपने सभी ओर उसने खुदको ही खड़ा पाया। अलग-अलग रंगों से पुता हुआ उसका हर रूप अलग-अलग कुर्ता-पजामा धारियों के नाम के ढोल बजाता हुआ चल दिया, इस बात से अनभिज्ञ कि घर की चौखट पर एक रंगीन फंदे में लुढ़की हुई गर्दन लिए उसका जिस्म सड़ने लगा है।

शनिवार, 6 जुलाई 2019

आज नई दुनिया - नायिका में मेरी लघुकथा: दायित्व-बोध


दायित्व-बोध / डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

पिता की मृत्यु के बारह दिन गुज़र गये थे, नाते-रिश्तेदार सभी लौट गये। आखिरी रिश्तेदार को रेलवे स्टेशन तक छोड़कर आने के बाद, उसने घर का मुख्य द्वार खोला ही था कि उसके कानों में उसके पिता की कड़क आवाज़ गूंजी, "सड़क पार करते समय ध्यान क्यों नहीं देता है, गाड़ियाँ देखी हैं बाहर।"

उसकी साँस गहरी हो गयी, लेकिन गहरी सांस दो-तीन बार उखड़ भी गयी। पिता तो रहे नहीं, उसके कान ही बज रहे थे और केवल कान ही नहीं उसकी आँखों ने भी देखा कि मुख्य द्वार के बाहर वह स्वयं खड़ा था, जब वह बच्चा था जो डर के मारे कांप रहा था।

वह थोड़ा और आगे बढ़ा, उसे फिर अपने पिता का तीक्ष्ण स्वर सुनाई दिया, "दरवाज़ा बंद क्या तेरे फ़रिश्ते करेंगे?"

उसने मुड़ कर देखा, वहां भी वह स्वयं ही खड़ा था, वह थोड़ा बड़ा हो चुका था, और मुंह बिगाड़ कर दरवाज़ा बंद कर रहा था।

दो क्षणों बाद वह मुड़ा और चल पड़ा, कुछ कदम चलने के बाद फिर उसके कान पिता की तीखी आवाज़ से फिर गूंजे, "दिखाई नहीं देता नीचे पत्थर रखा है, गिर जाओगे।"

अब उसने स्वयं को युवावस्था में देखा, जो तेज़ चलते-चलते आवाज़ सुनकर एकदम रुक गया था।

अब वह घर के अंदर घुसा, वहां उसका पोता अकेला खेल रहा था, देखते ही जीवन में पहली बार उसकी आँखें क्रोध से भर गयीं और पहली ही बार वह तीक्ष्ण स्वर में बोला, "कहाँ गये सब लोग? कोई बच्चे का ध्यान नहीं रखता, छह महीने का बच्चा अकेला बैठा है।"

और उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसके पैरों में उसके पिता के जूते हैं।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

लघुकथा कलश - 3 में प्रकाशित मेरी एक लघुकथा : एक बिखरता टुकड़ा


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एक बिखरता टुकड़ा / 
डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी


एक टीवी चैनल के कार्यालय से चार-पांच गाड़ियां एक साथ बाहर निकलीं। उनमें अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रवक्ता वाद-विवाद के एक कार्यक्रम में भाग लेकर जा रहे थे। एक कार में से आवाज़ आई, "भगतसिंह के साथ जो नाइंसाफी हुई, उसमें किसका हाथ था, यह अब देश की जनता समझ..."
बात खत्म होने से पहले ही दूसरी गाड़ी से आवाज़ आई, "गोडसे को पूजने वाले गाँधीजी को तो मार सकते हैं लेकिन उनके विचारों..." यह बात भी पूरी होती उससे पहले ही वह गाड़ी झटके से रुक गयी। अन्य गाड़ियां भी रुक गयीं थीं। सभी व्यक्ति घबराये से बाहर निकले।

वहां एक विशालकाय बादल ज़मीन पर उतरा हुआ था। उस बादल में बहुत सारे चेहरे उभरे हुए थे, गौर से देखने पर भी उन्हें वे चेहरे स्पष्ट नहीं हो पाए। उन चेहरों में से गोल चश्मा लगे एक दुबले चेहरे, जिसके सिर पर बाल नहीं थे, के होंठ हिलने लगे और पतला सा स्वर आया, "तुम लोग जानते हो आपस में लड़ कर क्या सन्देश दे रहे हो? समझो! शराबी की तरह लड़खड़ाते शब्दों को गटर में ही जगह मिलती है।"

बादल से आती आवाज़ सुनकर वे सभी अवाक रह गए।

कुछ क्षणों बाद बादल में मूंछ मरोड़ते हुए एक दूसरे चेहरे के होंठ हिलने लगे, भारी स्वर गूंजा,"हमने देश को जिन लोगों से आज़ाद कराने के लिए प्राण त्यागे, आज भी वे घुसपैठ कर रहे हैं।  हम फूट डालो और राज करो की नीति के विरोधी थे और तुम ! हमारे नाम पर ही देश के भाइयों में फूट डाल रहे हो!"

अब एक जवान व्यक्ति का चेहरा जिसने अंग्रेजी हेट पहना हुआ था, होंठ हिलाने लगा, जोशीली आवाज़ आई, "फांसी पर झूलते हुए हम हँस रहे थे क्योंकि हमारी फांसी क्रांति का पर्याय बनने वाली थी, लेकिन वही फांसी अब खोखली राजनीति का पर्याय है।"

उन आश्चर्यचकित खड़े लोगों में से एक ने साहस करके पूछा, "कौकौन है वहां?"

यह सुनते ही उन सभी चेहरों की आँखों के नीचे बादल पिघलने लगा, पानी बहते हुए सड़क पर बिखर गया और बहुत सारे आक्रोशित स्वरों की मिश्रित आवाज़ एक साथ आई "बंद करो हमारे नामों की राजनीति!"

लेकिन वह आवाज़ बहुत हल्की थी, बादल लगातार पिघलता जा रहा था।

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

लघुकथा "अन्नदाता" को मिला स्टोरी मिरर द्वारा Winner of Writing Prompt का सम्मान

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अन्नदाता / डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

फसल कटाई के बाद उसके चेहरे और खेत की ज़मीन में कोई खास फर्क नहीं दिखाई दे रहा था। दोनों पर गड्ढे और रेशे। घर की चौखट पर बैठा धंसी हुई आंखों से वह कटी हुई फसल और काटने वाली ज़िन्दगी के अनुपात को मापने का प्रयास कर रहा था कि एक चमचमाती कार उसके घर के सामने आ खड़ी हुई। उसमें से एक सफेद कुर्ता-पजामा धारी हाथ जोड़ता हुआ बाहर निकला और उसके पास आकर बोला, "राम-राम काका।" और अपने कुर्ते की जेब से केसरिया सरीखा रंग निकाल कर उसके ललाट पर लगा दिया। उसने अचंभित होकर पूछा, "आज होली..."

उस व्यक्ति ने हँसते हुए उत्तर दिया, "नहीं काका। यह रंग हमारे धर्म का हैइसे सिर पर लगाये रखिये। दूसरे लोग हमारे धर्म को बेचना चाहते हैंइसलिए आप वोट हमें देना ताकि हमारा धर्म सुरक्षित रहें और हां! हम और सिर्फ हम ही आपके साथ हैं और कोई नहीं।"

सुनकर उसने हाँ की मुद्रा में गर्दन हिलाकर कहा, "जी अन्नदाता।"

उस चमचमाती कार के जाते ही एक दूसरी चमचमाती कार उसके घर के सामने आई। उसमें से भी पहले व्यक्ति जैसे कपड़े पहने एक आदमी निकला। हाथ दिखाते हुए उस आदमी ने उसके पास आकर उसकी आँखों और नाक पर सफेद रंग लगाया और बोला, "देश को धर्म के आधार पर तोड़ने की साजिश की जा रही है। आप अपनी आंखें खुली रखें और देश की इज्जत बचाये रखने के लिये हमें वोट दें और हाँ! हम और सिर्फ हम ही आपके साथ हैं और कोई नहीं।"

उसे भी अपने साथ पा वह मुस्कुरा कर बोला, "जी अन्नदाता।"

उस व्यक्ति के जाते ही एक तीसरा आदमी अंदर आ गया। उसके चेहरे के रंगों को देखकर वह आदमी घृणायुक्त स्वर में बोला, "तुम खुद अन्नदाता होकर गलत रंगों में रंगे हो! अपने लिए खुद आवाज़ उठाओऔर हाँ! सिर्फ हम ही हैं जो तुम्हारे साथ हैं।" कहकर उस आदमी ने उसके मुंह पर लाल रंग मल दिया।

वह प्रफुल्लित हो उठा। सभी तो उसके साथ थे।

उसने अपने बायीं तरफ देखावहां वह खुद ही खड़ा था और दाएं तरफ भी वही। अपने सभी ओर उसने खुदको ही खड़ा पाया। अलग-अलग रंगों से पुता हुआ उसका हर रूप अलग-अलग कुर्ता-पजामा धारियों के नाम के ढोल बजाता हुआ चल दिया, इस बात से अनभिज्ञ कि घर की चौखट पर एक रंगीन फंदे में लुढ़की हुई गर्दन लिए उसका जिस्म सड़ने लगा है।

- डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

सोमवार, 1 जुलाई 2019

लघुकथा वीडियो | ख़बर | दीपक मशाल | स्वर: मधु चौरसिया

एक सैनिक की पत्नी जंग छिड़ने पर क्या सोच सकती है, उसका एक उदाहरण है यह लघुकथा। दीपक मशाल ने इस रचना के जरिये न केवल सैनिक की पत्नी बल्कि सेना के एक ड्राईवर तक की सोच बताई है कि ड्राईवर को जंग की फिक्र नहीं, क्योंकि जंग तो सैनिक के जीवन का हिस्सा है, उसे फिक्र है अपने जीवन के उस हिस्से की जहां जीवन खुदकों जीता है। एक सैनिक अपने नागरिकों के लिए लड़ता है तो ऐसी फिक्र होना स्वाभाविक है। हालांकि इस रचना में एक सत्य है लेकिन फिर भी मेरा मानना यह है कि इस रचना सैनिक की पत्नी को यदि थोड़ा बहादुर दर्शाया जाता तो यह अच्छी रचना बेहतर हो सकती थी। मधु चौरसिया जी के स्वर में सुनते हैं दीपक मशाल जी की लघुकथा - खबर।