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बुधवार, 25 दिसंबर 2019

सुकेश साहनी की लघुकथाएँ नहीं पढ़नी चाहिए... | रवि प्रभाकर

सुकेश साहनी जी का लघुकथा संग्रह ‘साइबरमैन‘ और भगीरथ परिहार जी रचित ‘कथाशिल्पी सुकेश साहनी की सृजन-संचेतना‘ का परिचय रवि प्रभाकर जी ने अलग ही अंदाज में दिया है। रवि जी अपनी विस्तृत समीक्षा के लिए जाने जाते हैं, अपने अनूठे अंदाज से उन्होंने इन पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया है। आइये पढ़ते हैं:

सुकेश साहनी की लघुकथाएँ नहीं पढ़नी चाहिए... | रवि प्रभाकर 

दिनांक 6 दिसंबर को आदरणीय सुकेश साहनी जी द्वारा भेजी पुस्तकें ‘साइबरमैन‘ और भगीरथ परिहार रचित ‘कथाशिल्पी सुकेश साहनी की सृजन-संचेतना‘ प्राप्त हुईं। अपरिहार्य कारणों के चलते घर से बाहर जाना पड़ा और 4-5 दिन पुस्तक पढ़ने का सौभाग्य नहीं मिला। मुझे याद है जब सातवीं या आठवीं कक्षा में था तब पिताजी ने नया लाल रंग का ‘जैंकी‘ साइकिल दिलवाया था। रात आठ बजे साइकल मिला था, सुबह तक इंतज़ार करना भारी हो गया था कि कब सुबह हो और कब साईकल   चलाऊं। लगभग साढ़े तीन दशक बाद वही बेचैनी और रोमांच महसूस हुआ जब ‘साइबरमैन‘ घर थी और मैं उसे पढ़ नहीं पा रहा था। ख़ुदा ख़ुदा करके दिन निकले और मैं घर वापिस आया। ‘अथ उलूक कथा‘ (प्रकाशन मार्च 1987) से लेकर ‘चिड़िया‘ (साहनी जी की नवीनतम कृति) तक सभी लघुकथाएँ और प्रो. बी.एल. आच्छा द्वारा लिखित ‘लघुकथा के धरातल और शिल्प की नवोन्मेषी ललक‘ पढ़ते-पढ़ते एक सप्ताह कैसे निकला पता ही नहीं चला। इन लघुकथाओं का ख़ुमार अभी तक है। ‘साइबरमैन‘ पढ़ने के बाद जो विचार सबसे पहले मन में आया वो है ‘सुकेश साहनी की लघुकथाएँ नहीं पढ़नी चाहिए।‘ क्योंकि साहनी जी को पढ़ने के बाद कोई सतही लघुकथाएँ पचा नहीं सकता। इन लघुकथाओं को पढ़ते-पढ़ते आप मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। भाषायी आडम्बर से कोसों दूर, शिल्प के प्रति कोई विशेष आग्रह नहीं और सबसे बड़ी बात- इन लघुकथाओं के शीर्षक, कमाल! कमाल! कमाल! पृष्ठ 90 पर प्रकाशित ‘मरुस्थल‘ पढ़ने के बाद दिल से एक आह निकलने के साथ-साथ निकला ‘सुकेश साहनी जिन्दाबाद‘। 21 वर्ष पूर्व प्रकाशित लघुकथा ‘राजपथ‘ (प्रकाशन ‘हंस‘ अक्तूबर 98) पढ़कर कोई नहीं कह सकता कि ये आज के हालात पर लिखी नवीनतम लघुकथा है। यानी आज भी प्रासंगिक है। पृष्ठ 20 पर अंकित ‘ओएसिस‘ को पढ़कर समझ में आ जाता है कि लघुकथा सरीखी विधा में शीर्षक का क्या महत्त्व है। इस संकलन में 50 लघुकथाएँ शामिल है, जिन्हें पढ़ना अपने आपमें एक सीख है। सुकेश साहनी लघुकथा का ‘स्कूल‘ नहीं अपितु विश्वविद्यालय हैं। भगवान आपको दीर्घायु और आपकी कलम को बल बख़्शे।

हिन्दी साहित्य निकेतन, 16, साहित्य विहार, बिजनौर (उ.प्र.) द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य मात्र 250 रुपये है। हर लघुकथा अनुरागी के पास यह पुस्तक होनी ही चाहिए।

प्रस्तुत हैं इस संकलन में प्रकाशित दो लघुकथाएँ:

राजपथ
प्रजा बेहाल थी। दैवीय आपदाओं के साथ साथ अत्याचार, कुव्यवस्था एवं भूख से सैकड़ों लोग रोज़ मर रहे थे, पर राजा के कान पर तक नहीं रेंग रही थी। अंततः जनता राजा के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतर आई। राजा और उसके मंत्रियों के पुतले फूंकती, 'मुर्दाबाद! मुर्दाबाद!!' के नारे लगाती उग्र भीड़ राजमहल की ओर बढ़ रही थी। राजमार्ग को रौंदते क़दमों की धमक से राजमहल की दीवारें सूखे पत्ते-सी काँप रही थीं। ऐसा लग रहा था कि भीड़ आज राजमहल की ईंट से ईंट बजा देगी।
तभी अप्रत्याशित बात हुई। गगनभेदी विस्फोट से एकबारगी भीड़ के कान बहरे हो गए, आँखें चौंधिया गईं। कई विमान आकाश को चीरते चले गए, ख़तरे का सायरन बजने लगा। राजा के सिपहसालार पड़ोसी देश द्वारा एकाएक आक्रमण कर दिए जाने की घोषणा के साथ लोगों को सुरक्षित स्थानों में छिप जाने के निर्देश देने लगे।
भीड़ में भगदड़ मच गई। राजमार्ग के आसपास खुदी खाइयों में शरण लेते हुए लोग हैरान थे कि अचानक इतनी खाइयाँ कहाँ से प्रकट हो गईं।
सामान्य स्थिति की घोषणा होते ही लोग खाइयों से बाहर आ गए। उनके चेहरे देशभक्ति की भावना से दमक रहे थे, बाँहें फड़क रही थीं। अब वे सब देश के लिए मर-मिटने को तैयार थे। राष्ट्रहित में उन्होंने राजा के ख़िलाफ़ अभियान स्थगित कर दिया था। देशप्रेम के नारे लगाते वे सब घरों को लौटने लगे थे।
राजमहल की दीवारें पहले की तरह स्थिर हो गई थीं। रातोंरात राजमार्ग के इर्द-गिर्द खाइयाँ खोदनेवालों को राजा द्वारा पुरस्कृत किया जा रहा था।
(हंस, अक्टूबर 98)

मरुस्थल
'जमना, तू क्या कहना चाह रही है?' 'मौसी, जे जो गिराहक आया है, इसे किसी और के संग मत भेजियो।'
'जमना, जे तू के रई हय? इत्ती पुरानी होके। हमारे लिए किसी एक गिराक से आशनाई ठीक नई।'
'अरे मौसी, तू मुझे गलत समझ रई है। मैं कोई बच्ची तो नहीं, तू किसी बात की चिंता कर। पर इसे मैं ही बिठाऊँगी।'
'वजह भी तो जानूँ?'
'वो बात जे है कि...कि...' एकाएक जमना का पीला चेहरा और फीका हो गया, आँखें झुक गईं, 'इसकी शक्ल मेरे सुरगवाली मरद से बहुत मिलती है। जब इसे बिठाती हूँ, तो थोड़ी देर के वास्ते ऐसा लगे है, जैसे मैं धंधे में नहीं अपने मरद के साथ घर में हूँ।'
'पर...पर...आज तो वह तेरे साथ बैठनाई नहीं चाह रिया, उसे तो बारह-चौदह साल की चइए।' 
(कथादेश, जनवरी 2019)




3 टिप्‍पणियां:

  1. दोनों घिसी पिटी कहानियां हैं ..राजपथ ---ऐसे मौके पर तो विरोधी अपनी रोटी और चमकाने लगते हैं आज के समय की भाँति.....प्रश्न पूछने लगते हैं ----मरुस्थल भी पुराना विषय है ---

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  2. बहुत सुंदर।
    दोनों लघुकथा सराहनीय।

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