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शुक्रवार, 29 मार्च 2024

पुस्तक समीक्षा । मन का फेर । समीक्षक: मनोरमा पंत

 


पुस्तक: मन का फेर (अंधविश्वासों रूढ़ियों एवं कुरीतियों पर केंद्रित साझा लघुकथा संग्रह) 

प्रकाशन-श्वेत वर्णा प्रकाशन नोयडा

संपादक-सुरेश सौरभ 

मूल्य- 260 /


अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों के संपादक-लेखक सुरेश सौरभ, नवीन लघुकथा का साझा संग्रह ‘मन का फेर‘ लेकर पाठकों के बीच उपस्थित हुए हैं, अंधविश्वासों, रूढ़ियों एवं कुरीतियों पर केंद्रित यह साझा लघुकथा संग्रह अपने आप में बेहद अनूठा है। जिसमें उनकी संपादन कला निखर कर आई है। बलराम अग्रवाल, योगराज प्रभाकर जैसे प्रमुख लघुकथाकारों ने  एक स्वर में कहा है कि लघुकथा का मुख्य उद्देश्य समाज की विसंगतियों को सामने लाना है। इस उद्देश्य में सुरेश सौरभ  का नवीनतम  लघुकथा-संग्रह  ‘मन का फेर’ खरा उतरा है। यह एक विडम्बना ही है कि विकसित देशों के समूह  में शामिल होने में अग्रसर भारत का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी धर्म और परम्परा के नाम पर ढोंगी महात्माओं और कथित मौलवियों के जाल में फँसा हुआ है। अभी भी स्त्री को डायन करार देकर प्रताड़ित किया जाता है, पिछड़े इलाकों में बीमार व्यक्ति को, चाहे वह दो महीने का बच्चा ही क्यों न हो, नीम हकीम के द्वारा लोहे के छल्लों से दागा जाता है। ऐसे समाज  को जागरुक करने का बीड़ा उठाने में यह लघुकथा-संग्रह सक्षम है।

सुकेश साहनी, मीरा जैन, डॉ.पूरन सिंह, कल्पना भट्ट, डॉ. अंजू दुआ जैमिनी, गुलजार हुसैन, चित्तरंजन गोप 'लुकाठी', डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी, रमाकान्त चौधरी, अखिलेश कुमार ‘अरूण’, डॉ. राजेंद्र साहिल, डॉ. मिथिलेश दीक्षित, रश्मि लहर, विनोद शर्मा, सहित 60 लघुकथाकारों की लघुकथाओं से सुसज्जित, 144 पृष्ठीय संग्रह में, आडम्बरों को, रूढ़ियों को बेधती मार्मिक लघुकथाएँ सहज, सरल, भाषा शैली में, पाठकों को आकर्षित करने में सफल हैं। हाल ही में इस संग्रह का विमोचन स्वच्छकार समाज और समाज सेवियों ने किया। सौरभ जी का प्रयास है कि समाज में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक साहित्य पहुँचे। संग्रह की भूमिका प्रसिद्ध पत्रकार लेखक अजय बोकिल ने लिखी है। संग्रह की लघुकथाएँ शोधपरक एवं पठनीय हैं। सुरेश  सौरभ  को  इस लघुकथा-संग्रह के लिए  बधाई।

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मनोरमा पंत

शनिवार, 16 मार्च 2024

पुस्तक: उत्कृष्ट लघुकथा विमर्श । विचार: मिन्नी मिश्रा

 


"उत्कृष्ट लघुकथा विमर्श"

 (संपादक - दीपक गिरकर)

शिवना प्रकाशन, सीहोर (म. प्र.) 

मूल्य - 400 रूपए 


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आ. दीपक गिरकर  के द्वारा  संपादित पुस्तक "उत्कृष्ट लघुकथा विमर्श" कुछ दिन पहले मुझे मिली  |  लघुकथा विधा के लिए यह पुस्तक बहुत ही महत्वपूर्ण है | पुस्तक को दो खंडों में बांटा गया है | पहला खंड लघुकथा विमर्श का है तो दूसरा खंड लघुकथाओं का है | पहले खंड में विमर्श के अंतर्गत कुल 26 आलेख हैं । दूसरे खंड में 28 उत्कृष्ट लघुकथाओं को प्रकाशित किया गया है |सभी गुणीजनों के आलेखों  को मैंने पढ़ा ।उन आलेखों की जो पंक्तियां मुझे बेहद अच्छी लगीं, उन्हें मैंने कोट किया है।



"इस तरह की कृतियां नव लेखकों के लिए थ्योरी और प्रैक्टिकल का एक साथ अभ्यास करवाने में सक्षम होगी।"- डाॅ.विकास दवे


"एक सफल लघुकथा वह होती है जिसमें क्लिष्ट संकेत -मात्र न होकर सहजग्राह्य कथानक समाहित हो।"- बलराम अग्रवाल


" लेखन स्वांत सुखाय नहीं होता बल्कि समाज की बेहतरी के लिए होता है। "- भगीरथ परिहार


"केवल बहुत सारी लघुकथाएंँ पढ़ने या लिखते छपते रहने से काम नहीं चलने वाला, सभी विधाओं की रचनाओं से उसे गुजरना होगा। खूब पढ़ना होगा।"- ब्रजेश कानूनगो


"कथानक/कथ्य का समसामयिक होना अधिक प्रभाव छोड़ता है। घटना प्रस्तुति का प्रयोजन जनहित में होना चाहिए।"-डाॅ. चंद्रा सायता


" कालखंड कितने समय का होगा यह निश्चित नहीं है।यह एक क्षण से लेकर सदियों और उससे भी अधिक का हो सकता है।"- डाॅ. चन्द्रेश कुमार छतलानी 


" लघुकथा की शब्द संख्या निश्चित नहीं की जा सकती है। रचना का कथ्य ही उसके आकार को तय करता है।"- दीपक गिरकर

 

"जीवन के यथार्थ को कम से कम शब्दों में विषय की सटीक अभिव्यक्ति हेतु जो कथात्मक विधा बिना किसी लाग लपेट के सरस,सहज, सरल स्वाभाविक बोलचाल की भाषा में रंजनात्मकता लिए सीधा अपने गंतव्य तक पहुंचती है, लघुकथा कहलाती है।"- डाॅ. धर्मेन्द्र कुमार एच. राठवा 


" लघुकथा के स्वरूप को समझकर स्वसमीक्षक बनें। एक बार लिखने पर रचना मुकम्मल नहीं हो पाती है। लिखने के बाद उसे कई बार पढ़ा जाना चाहिए। एवं अनावश्यक विवरण को छांटते जाना चाहिए।"- पवन जैन


"आपके पास लघुकथा लिखने के लिए लघुकथा का बीज ही हो, जिस पर सिर्फ लघुकथा ही लिखी जा सके।"-  प्रबोध कुमार गोबिल 


"एक अच्छी लघुकथा की पंच लाइन तीक्ष्ण हो तो लघुकथा सौ टके की सफल कृति बनती है।"- संध्या तिवारी 


"अपने अंदर के आलोचक को बाहर निकाला जाए, उससे रचना जंचवाई जाए, फिर कहीं भेजी जाए।"- सन्तोष सुपेकर


"प्रोफेसर बी.एल.आच्छा ने लिखा है कि, लघुकथा ऐसी लगती है, जैसे खौलते तेल में पानी की बूंद, जैसे आलपिन की चुभन, जैसे आवेग का चरम क्षण ....या फिर गीत का पहला छंद।"- सतीश राठी


"लघुकथा एक कलात्मक अभिव्यक्ति है जो रचनाकार से अतिरिक्त कौशल की अपेक्षा रखती है।"- डाॅ.शील कौशिक


"लेखक की रचना- शैली ऐसी हो कि पाठक उसे सहज आत्मसात कर सके। शब्दों के प्रयोग में स्पष्टता रहनी भी अति आवश्यक है।"- डाॅ. सुरेश वशिष्ठ


"यहाँ शब्द सीमित पर चिंतन असीमित हो।"- सूर्यकांत नागर


"लेखक के भीतर किसी रचना के लिए आवश्यक कच्चे माल के पकने की प्रक्रिया ही लेखक की रचना-प्रक्रिया है।"- सुकेश साहनी।

 

 इस पुस्तक में मेरा भी एक आलेख प्रकाशित हुआ है | इस हेतु दीपक सर का तहे दिल से शुक्रिया और सादर आभार | यह पुस्तक हम सभी लघुकथाकारों के लिए बहुत ही उपयोगी, संग्रहणीय एवं महत्त्वपूर्ण 

है।

🙏💐💐

मिन्नी मिश्र, पटना

मंगलवार, 12 मार्च 2024

लघुकथा:रीलें । सुरेश सौरभ


        अपना बैग पटक, वह शान्त बैठ गयी।

      "क्या बात है बेटी! इतना फूली क्यों बैठी है? कालेज में कुछ हुआ क्या? जल्दी हाथ-मुँह धो ले, नाश्ता लगा रही हूँ।"

      "नहीं करना नाश्ता-वास्ता"-गुस्से से उसके नथुने फूलने-पिचकने लगे।

       माँ ने जैसे कुरेद दिया हो। 

       "अरे! क्या हुआ बेटी।"

       "जरा एक मिनट के लिए अपना मोबाइल देना मम्मी, अभी बताती हूँ क्या हुआ।" 

      मम्मी ने उसे मोबाइल दे दिया।

     "ये  देखो! ये देखो! आप की हैं ये रीलें।"

    "हाँ हाँ आँ ऽऽऽऽ.."-झेंपते हुए माँ बोली।

     "आज महिला दिवस पर भाषण प्रतियोगिता में मुझे फर्स्ट प्राइज़ मिला। सबने तालियाँ बजा कर मेरा हौसला बढ़ाया। बड़ी प्रशंसा मिली। लोगाें ने मंच के नीचे आते ही पूछा-इतना अच्छा कैसे बोला बेटी। मैंने गर्व से जवाब दिया-यह सब मेरी माँ के दिये संस्कारों का प्रतिफल है। पर.."

    "पर पर क्या बेटी..."

    "रास्ते में मेरी सहेलियाँ फूहड़ गानों पर बनी आप की रीलें, दिखा-दिखा कर फिकरें कस रहीं थीं-भाई बड़ी संस्कारवान हैं माँ-बेटी।"

      "फिर..."

       "फिर क्या.....आप ही बताएँ मेरी जगह आप होतीं तो क्या करतीं ?"

     माँ बुत सी मौन थी। सिर पर जैसे घड़ों पानी पड़ चुका हो। पास में पड़ा मोबाइल मानो कहना चाह रहा था-मैं बिलकुल निर्दोष हूँ। मैंने किसी का दिल नहीं दुखाया।

-०-

-सुरेश सौरभ 

 पता-निर्मल नगर लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश पिन-262701

मो-7860600355