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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

सतीश राठी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना: एक अध्ययन | चंद्रेश कुमार छतलानी


सतीश राठी: एक संक्षिप्त स्मरण

सतीश राठी (23 फरवरी 1956 – 1 सितंबर 2026) हिंदी लघुकथा के उन रचनाकारों में रहे जिन्होंने इस विधा को केवल लिखा नहीं, बल्कि उसके विकास के लिए लगातार काम भी किया। इंदौर की साहित्यिक भूमि से जुड़े राठी ‘क्षितिज’ संस्था के संस्थापक अध्यक्ष रहे और कई दशकों तक लघुकथा के लेखन, संपादन और प्रसार से जुड़े रहे। उनकी साहित्यिक यात्रा में शब्द साक्षी हैं और जिस्मों का तिलिस्म जैसे लघुकथा-संग्रह, पिघलती आँखों का सच जैसा कविता-संग्रह तथा अनेक संपादित संकलन उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाएँ मराठी, कन्नड़, पंजाबी, गुजराती और बांग्ला सहित विभिन्न भाषाओं में अनूदित हुईं।

राठी का साहित्य आम आदमी के जीवन से गहरे जुड़ा रहा। भूख, गरीबी, श्रम, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, स्त्री-पुरुष संबंध और बदलती मानवीय संवेदनाएँ उनकी लघुकथाओं के प्रमुख सरोकार रहे। उनकी भाषा सहज थी, लेकिन उनके प्रश्न गहरे थे। वे छोटी-सी घटना के भीतर छिपे बड़े सामाजिक अर्थ को पहचानते थे। ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’, ‘खुली किताब’ और ‘जिस्मों का तिलिस्म’ जैसी रचनाएँ इसका प्रमाण हैं।

उनका निधन हिंदी लघुकथा के लिए केवल एक रचनाकार की विदाई नहीं है। यह उस पीढ़ी के एक सक्रिय प्रतिनिधि का जाना है जिसने लघुकथा को एक सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित होते देखा, उसमें लिखा और उसके लिए साहित्यिक वातावरण तैयार किया। ‘क्षितिज’ के माध्यम से उनका संपादकीय और संगठनात्मक योगदान आने वाले समय में भी लघुकथा के इतिहास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।

प्रस्तुत शोध-पत्र उनके इसी रचनात्मक अवदान को उनकी लघुकथाओं के पाठ के आधार पर समझने का एक विनम्र प्रयास है।


सारांश

हिंदी लघुकथा ने आधुनिक हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान उस समय बनाई, जब कम शब्दों में जीवन की बड़ी सच्चाइयों को व्यक्त करने की आवश्यकता महसूस हुई। इस विधा के विकास में अनेक रचनाकारों का योगदान रहा है। सतीश राठी उनमें ऐसे लेखक हैं जिनकी पहचान केवल लघुकथाकार के रूप में नहीं, बल्कि संपादक और लघुकथा के सक्रिय संवाहक के रूप में भी बनी है। इंदौर के साहित्यिक परिवेश से जुड़े राठी जी ने लंबे समय तक ‘क्षितिज’ के माध्यम से लघुकथा लेखन और उसके आलोचनात्मक विमर्श को आगे बढ़ाया। उनकी रचनाओं में भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, स्त्री की स्थिति, पारिवारिक संबंध, वृद्धावस्था और सामाजिक व्यवस्था की विडंबनाएँ बार-बार दिखाई देती हैं।

प्रस्तुत शोध-पत्र में सतीश राठी की प्रतिनिधि लघुकथाओं, ‘जिस्मों का तिलिस्म’, ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’, का विश्लेषण किया गया है। साथ ही उनके साहित्यिक और संपादकीय योगदान को ‘क्षितिज’ के संदर्भ में देखा गया है। अध्ययन का उद्देश्य राठीजी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के संबंध को समझना है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उनकी लघुकथा का सामाजिक सरोकार केवल समस्या-चित्रण तक सीमित नहीं है। वे व्यवस्था के भीतर मौजूद असमानता को सामने लाते हुए व्यक्ति की गरिमा, नैतिकता और संवेदना के प्रश्न को भी उठाते हैं। उनकी भाषा सामान्य जीवन के करीब है और कथ्य को प्रभावी बनाने के लिए संवाद, प्रतीक, विडंबना और अर्थपूर्ण अंत का उपयोग किया गया है।

बीज शब्द: सतीश राठी, हिंदी लघुकथा, सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना, क्षितिज, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, स्त्री-विमर्श

प्रस्तावना

साहित्य अपने समय से अलग नहीं रह सकता। विशेषकर लघुकथा जैसी विधा के लिए यह बात और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। लघुकथा का आकार तो छोटा होता है, लेकिन उसका अनुभव छोटा नहीं होता। कुछ पंक्तियों में लेखक ऐसी स्थिति सामने रख सकता है जो पाठक को लंबे समय तक सोचने के लिए मजबूर करे।
आधुनिक हिंदी लघुकथा के विकास में मध्यप्रदेश के योगदान पर विचार करें तो, इंदौर इस विकास का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा और इस परिवेश में सतीश राठी की भूमिका विशेष ध्यान खींचती है। राठी ने स्वयं लेखन के साथ-साथ संपादन और अपने साहित्यिक संगठन 'क्षितिज' के माध्यम से भी लघुकथा के विकास में काम किया। उपलब्ध लेखक-परिचयों के अनुसार उनका जन्म 23 फरवरी 1956 को इंदौर में हुआ और उन्होंने एम.कॉम. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में शब्द साक्षी हैं और पिघलती आँखों का सच शामिल हैं। उन्होंने तीसरा क्षितिज, मनोबल और अन्य संकलनों का संपादन भी किया। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com) राठी जी की साहित्यिक पहचान को केवल उनकी व्यक्तिगत रचनाओं के आधार पर समझना अधूरा होगा। ‘क्षितिज’ संस्था और उससे जुड़े प्रकाशन उनके साहित्यिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।  (Sahityakunj)

उनकी लघुकथाओं में सामान्य मनुष्य का जीवन केंद्र में आता है। भूख और गरीबी के प्रसंग हों या भ्रष्ट व्यवस्था की आलोचना, स्त्री-पुरुष संबंध हों या परिवार में बदलते मूल्य—राठी का लेखन अपने समय की सामाजिक बेचैनी से संवाद करता है।

इसी कारण इस अध्ययन का मूल प्रश्न है:
सतीश राठी की लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ को किस तरह मानवीय संवेदना में बदलती हैं और इस प्रक्रिया में उनका कथ्य तथा शिल्प किस प्रकार एक-दूसरे का साथ देते हैं?

2. अध्ययन के उद्देश्य
इस अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं:
  • सतीश राठी के लघुकथा-साहित्य की प्रमुख सामाजिक प्रवृत्तियों की पहचान करना।
  • उनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ के स्वरूप का अध्ययन करना।
  • आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और लैंगिक संबंधों के उनके चित्रण को समझना।
  • उनकी लघुकथाओं में मानवीय संवेदना की भूमिका का विश्लेषण करना।
  • उनकी भाषा और शिल्प की प्रमुख विशेषताओं की पहचान करना।
  • ‘क्षितिज’ के माध्यम से उनके संपादकीय और साहित्यिक योगदान का मूल्यांकन करना।
3. शोध-प्रश्न
अध्ययन निम्न प्रश्नों पर केंद्रित है:
1. सतीश राठी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ किन प्रमुख रूपों में सामने आता है?
2. क्या उनकी लघुकथाएँ केवल सामाजिक विसंगतियों की आलोचना करती हैं, या उनमें मानवीय संबंधों और संवेदना के लिए भी कोई जगह बनती है?
3. आर्थिक असमानता और भूख को प्रस्तुत करने के लिए राठी किन कथात्मक युक्तियों का प्रयोग करते हैं?
4. उनकी लघुकथाओं में स्त्री-पुरुष संबंधों की प्रस्तुति किस प्रकार सामाजिक नैतिकता पर प्रश्न उठाती है?
5. ‘क्षितिज’ के माध्यम से राठी का योगदान उनके व्यक्तिगत लेखन से किस तरह आगे जाता है?

4. शोध-पद्धति
यह अध्ययन गुणात्मक और पाठ-आधारित है। इसमें प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया है। प्राथमिक सामग्री के रूप में सतीश राठी की उपलब्ध लघुकथाओं को लिया गया है। विशेष रूप से ‘जिस्मों का तिलिस्म’, ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’। इन रचनाओं को उपलब्ध ऑनलाइन स्रोतों से भी सत्यापित किया गया है। (रचनाकार)

द्वितीयक सामग्री में लेखक-परिचय, साहित्यिक साक्षात्कार, समीक्षाएँ, ‘क्षितिज’ के इतिहास से संबंधित लेख तथा सतीश राठी के साहित्य पर हुए पूर्व शोध के संदर्भ शामिल हैं। उपलब्ध स्रोत बताते हैं कि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. स्तर का शोधकार्य किया गया था। (laghukathaduniya.blogspot.com)

अध्ययन में निम्न विश्लेषणात्मक आधार अपनाए गए हैं:
  • विषय-वस्तु का विश्लेषण
  • पात्र और सामाजिक स्थिति का अध्ययन
  • प्रतीक और व्यंजना का अध्ययन
  • संवाद तथा भाषा का विश्लेषण
  • अंत की भूमिका
  • सामाजिक संदर्भ और मानवीय संवेदना का संबंध
यह अध्ययन मात्र लेखक-परिचय प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं है। इसका केंद्र उनकी रचनाओं के भीतर मौजूद सामाजिक अर्थ हैं।

5. पूर्ववर्ती अध्ययन और शोध-अंतराल
सतीश राठी पर उपलब्ध सामग्री को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में देखा जा सकता है।
पहला, लेखक-परिचय और साहित्यिक गतिविधियों से संबंधित सामग्री है। इसमें उनके प्रकाशन, संपादन, पुरस्कार और ‘क्षितिज’ से जुड़े कार्यों का विवरण मिलता है। (Sahityakunj)

दूसरा, उनकी लघुकथाओं और संग्रहों पर लिखी गई समीक्षाएँ हैं। जिस्मों का तिलिस्म पर प्रकाशित समीक्षा में उसकी 72 लघुकथाओं के माध्यम से सामाजिक शोषण, आर्थिक विषमता और मानवीय संवेदना की चर्चा की गई है। समीक्षा उनकी भाषा को सहज और संप्रेषणीय भी मानती है। (hastaksher.com)

तीसरा, विश्वविद्यालयीय शोध का संदर्भ है। 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. शोध का उल्लेख मिलता है। (laghukathaduniya.blogspot.com)

इन स्रोतों से राठी की साहित्यिक स्थिति का एक आधार बनता है, लेकिन उनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के परस्पर संबंध के आधार पर एक साथ पढ़ने की आवश्यकता बनी रहती है। प्रस्तुत अध्ययन इसी बिंदु पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।

6. सतीश राठी : रचनाकार और संपादक
सतीश राठी का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे लघुकथा के साथ कविता, व्यंग्य, कहानी और निबंध जैसी विधाओं में भी लिखते रहे हैं। (Sahityakunj)

उनका संपादकीय कार्य भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। तीसरा क्षितिज, मनोबल और समक्ष जैसे संकलनों से उनका नाम जुड़ा है। 1991 में समक्ष के माध्यम से मध्यप्रदेश के पाँच लघुकथाकारों की सौ लघुकथाओं को एक साथ प्रस्तुत किया गया था। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है। संपादन किसी विधा के विकास में केवल तकनीकी काम नहीं होता। इससे यह भी तय होता है कि किन रचनाओं को सामने लाया जाए, किन प्रश्नों पर चर्चा हो और नए लेखक किस साहित्यिक वातावरण में प्रवेश करें। राठी जी का ‘क्षितिज’ से जुड़ाव इसी कारण महत्त्वपूर्ण है।

7. ‘क्षितिज’ और लघुकथा का साहित्यिक परिवेश
इंदौर में ‘क्षितिज’ ने लघुकथा को केंद्र में रखकर लंबे समय तक साहित्यिक गतिविधियाँ संचालित कीं। राठी जी के संस्मरणात्मक लेख में इसके विकास, प्रकाशनों और विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। 1986 में 1981 से 1985 तक की श्रेष्ठ लघुकथाओं का संकलन तीसरा क्षितिज प्रकाशित हुआ था। बाद में समक्ष जैसे संकलनों के माध्यम से यह प्रयास आगे बढ़ा। (jangatha.blogspot.com)

‘क्षितिज’ की भूमिका केवल प्रकाशन तक सीमित नहीं रही। इसके माध्यम से लघुकथा की कथावस्तु, शिल्प और आलोचना पर चर्चा हुई। बाद के वर्षों में इससे जुड़े साहित्यिक आयोजनों में देश के विभिन्न क्षेत्रों के लघुकथाकारों की भागीदारी भी दिखाई देती है। (laghukathaduniya.blogspot.com)

मध्यप्रदेश में लघुकथा के विकास पर लिखे गए एक आलेख में भी इंदौर और ‘क्षितिज’ के योगदान को रेखांकित किया गया है। उसमें राठी जी के संपादकीय कार्य और 2018 में अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन के आयोजन में उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है। (Setu)

इसलिए राठी जी की रचनाओं का अध्ययन करते समय ‘लेखक’ और ‘संपादक’ की भूमिकाओं को अलग-अलग करके देखना उचित नहीं होगा। दोनों मिलकर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को पूरा करते हैं।

8. आर्थिक असमानता और भूख
राठी जी की लघुकथाओं का एक मजबूत पक्ष आर्थिक असमानता का चित्रण है। उनके यहाँ गरीबी कोई दूर की समस्या नहीं है। वह पात्र के घर, शरीर और संबंधों में उतरती हुई दिखाई देती है। ‘आटा और जिस्म’ इसका स्पष्ट उदाहरण है। सुजान मशीन दुर्घटना में अपने दोनों हाथ खो देता है और काम करने में असमर्थ हो जाता है। मिलने वाला मुआवजा जल्दी खत्म हो जाता है। उसकी पत्नी रमिया दूसरे लोगों के घरों में काम करके परिवार चलाती है। एक समय ऐसा आता है जब घर में दो दिन से आटा नहीं है। (रचनाकार)
कथा यहीं से अपना असली तनाव पैदा करती है। रमिया किसी तरह आटा लेकर लौटती है और उसे गूँधने लगती है। भूखा सुजान उस आटे और अपनी पत्नी के शरीर के बीच फर्क महसूस नहीं कर पाता। यही वह क्षण है जहाँ शीर्षक अपना पूरा अर्थ खोलता है। ‘आटा’ यहाँ केवल भोजन नहीं है। वह जीवन की मूल जरूरत है। ‘जिस्म’ केवल शरीर नहीं है। वह उस आर्थिक व्यवस्था की ओर संकेत करता है जिसमें भूख मनुष्य की गरिमा तक को संकट में डाल देती है। रचना की ताकत यह है कि लेखक इस स्थिति पर लंबा भाषण नहीं देता। दृश्य स्वयं बोलता है।

9. ‘जिस्मों का तिलिस्म’: शरीर से अस्मिता तक
‘जिस्मों का तिलिस्म’ राठीजी की सामाजिक दृष्टि को समझने वाली महत्त्वपूर्ण रचना है। लघुकथा में राशन की दुकान के सामने खड़े लोग झुके हुए हैं। कथावाचक को वे दूर से ‘सिरकटे जिस्म’ दिखाई देते हैं। जब वह कारण पूछता है तो पता चलता है कि वे पेट भरने के लिए राशन की कतार में खड़े हैं। कथा में उनके हाथों का न होना भी एक महत्त्वपूर्ण संकेत बनता है। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)

यहाँ शरीर का रूपक कई स्तरों पर काम करता है।
  • पहला स्तर है भूख।
  • दूसरा है निर्भरता।
  • तीसरा है असहायता।
  • और चौथा है सामाजिक agency का खो जाना।
हाथ मनुष्य की कार्य-क्षमता और प्रतिरोध की शक्ति का प्रतीक हो सकते हैं। जब हाथ ही नहीं हैं, तो राशन की बंद व्यवस्था के सामने खड़ा व्यक्ति केवल प्रतीक्षा कर सकता है। इस अर्थ में लघुकथा भूख से आगे जाकर नागरिक असहायता की ओर पहुँचती है।

10. भ्रष्टाचार का सामान्यीकरण : ‘पेट का सवाल’
‘पेट का सवाल’ भ्रष्टाचार को लेकर राठी जी की सबसे स्पष्ट और प्रभावशाली रचनाओं में रखी जा सकती है।लघुकथा में सड़क निर्माण के दौरान एक नया मजदूर पर्याप्त डामर मिलाने की कोशिश करता है। ठेकेदार उसे रोकता है और समझाता है कि डामर में कई लोगों का ‘हिस्सा’ है। इसलिए सड़क का अच्छा बन जाना ही समस्या बन जाएगा। (रचनाकार)

यहाँ व्यंग्य का तरीका दिलचस्प है। ठेकेदार भ्रष्टाचार को अपराध नहीं मानता। वह उसे व्यवस्था का सामान्य नियम मानता है और यही लघुकथा का सबसे तीखा बिंदु है।
भ्रष्टाचार तब अधिक खतरनाक हो जाता है जब वह गलत काम नहीं, बल्कि ‘काम करने का तरीका’ बन जाए।शीर्षक ‘पेट का सवाल’ भी इसी दोहरे अर्थ को सामने लाता है। एक तरफ गरीब व्यक्ति की वास्तविक भूख है।दूसरी तरफ उन लोगों की आर्थिक लालसा है जिनका ‘पेट’ कभी भरता नहीं।
राठीजी की व्यंग्यात्मक शक्ति इसी जगह दिखाई देती है। वे भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अलग से भाषण नहीं देते। वे भ्रष्ट व्यक्ति को अपनी भाषा में बोलने देते हैं। पाठक स्वयं निष्कर्ष तक पहुँचता है।

11. स्त्री और पुरुष के दोहरे नैतिक मानदंड : ‘खुली किताब’
राठी जी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ केवल गरीबी या भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है। निजी संबंध भी उनके लिए सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं। ‘खुली किताब’ में पति अपने पुराने प्रेम-प्रसंगों को पत्नी के सामने सहजता से सुनाता है। उसे लगता है कि ऐसा करना उसकी ‘खुली’ और ईमानदार जिंदगी का प्रमाण है। फिर वही व्यक्ति पत्नी से उसके अतीत के बारे में बताने को कहता है। (रचनाकार)

पत्नी का उत्तर लघुकथा की दिशा बदल देता है। वह पूछती है कि अगर उसकी जिंदगी की किताब में भी ऐसे ही कुछ पन्ने हों तो क्या पति उसी तरह मुस्कुरा पाएगा?
पति का मौन उत्तर बन जाता है।
इस लघुकथा में राठी ने स्त्री-विमर्श को किसी नारे के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने घरेलू बातचीत के भीतर मौजूद दोहरे मानदंड को पकड़ा है। पुरुष के लिए जो ‘अनुभव’ है, वही स्त्री के लिए ‘चरित्र’ क्यों बन जाता है?
लघुकथा इसी प्रश्न को पाठक के सामने छोड़ देती है।

12. सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना
राठी जी के साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उनका सामाजिक यथार्थ केवल कठोर नहीं है। उसमें करुणा भी है। जिस्मों का तिलिस्म पर प्रकाशित समीक्षा में भी उनकी रचनाओं को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के मेल के रूप में देखा गया है। समीक्षा विशेष रूप से निम्नवर्गीय जीवन, आर्थिक विषमता और मानवीय स्थिति की ओर ध्यान दिलाती है। (hastaksher.com)

यह बात ‘आटा और जिस्म’ में साफ दिखाई देती है। वहाँ गरीबी केवल आर्थिक तथ्य नहीं है। वह पति-पत्नी के संबंध, शरीर और आत्मसम्मान को प्रभावित करती है।
‘पेट का सवाल’ में भ्रष्टाचार है, लेकिन उसके पीछे सड़क इस्तेमाल करने वाले आम लोगों का जीवन भी है।
‘खुली किताब’ में लैंगिक असमानता है, लेकिन उसके भीतर पति-पत्नी के संबंध की नैतिकता का प्रश्न भी है।
इसलिए राठीजी की लघुकथाओं को केवल ‘सामाजिक समस्या की लघुकथाएँ’ कहना पर्याप्त नहीं होगा।
उनकी चिंता अंततः मनुष्य की स्थिति को लेकर है।

13. सहज भाषा
सतीश राठी की भाषा को समझने के लिए उनकी रचनाओं के संवाद पढ़ लेना पर्याप्त है। ‘पेट का सवाल’ में ठेकेदार जिस तरह बोलता है, वह किसी साहित्यिक भाषण की तरह नहीं लगता। ‘खुली किताब’ में पति-पत्नी की बातचीत भी रोजमर्रा के जीवन के करीब है। (रचनाकार)
यह सहजता उनकी लघुकथाओं को पाठक के करीब लाती है। उनकी भाषा में सामान्यतः छोटे और सीधे वाक्य, बोलचाल के संवाद, पात्रानुकूल शब्द, सीमित लेकिन प्रभावी प्रतीक, और अंत में अर्थ का विस्तार मिलता है।
जिस्मों का तिलिस्म की समीक्षा भी उनकी भाषा को सहज, स्वाभाविक और संप्रेषणीय मानती है। (hastaksher.com)
लघुकथा के लिए यह गुण विशेष महत्त्व रखता है। छोटी रचना में भाषा यदि अनावश्यक रूप से भारी हो जाए तो कथ्य का प्रभाव कम हो सकता है। राठी सामान्यतः इस समस्या से बचते हैं।

14. शीर्षक और प्रतीक
राठीजी की कई लघुकथाओं में शीर्षक स्वयं कथा का अर्थ खोलने की कुंजी बन जाता है।



यहाँ शीर्षक केवल पहचान नहीं है। वह कथा के भीतर प्रवेश करने का रास्ता बन जाता है। ‘आटा और जिस्म’ में दो अलग चीजों को एक साथ रखकर लेखक आर्थिक विवशता की भयावहता को सामने लाता है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में ‘जिस्म’ शब्द व्यक्ति की पहचान को शरीर तक सीमित करने वाली व्यवस्था का संकेत बन जाता है। इस तरह शीर्षक और कथ्य के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है।

15. अंत की भूमिका
लघुकथा के प्रभाव में उसका अंत बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। राठी की प्रतिनिधि रचनाओं में अंतिम स्थिति कथा को नया अर्थ देती है। ‘खुली किताब’ में पति का सिर झुका लेना लघुकथा का निर्णायक क्षण है। लेखक यह नहीं कहता कि पुरुष गलत था। उसका मौन ही यह बात कह देता है। (रचनाकार) ‘पेट का सवाल’ में भ्रष्टाचार को ‘सबके पेट’ से जोड़ना व्यंग्य को अंतिम धार देता है। (रचनाकार) ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में शरीर के हाथों का गायब होना लघुकथा के सामाजिक अर्थ को अचानक गहरा कर देता है। (pradeepkant.blogspot.com) इस प्रकार अंत केवल घटना को समाप्त नहीं करता। वह पाठक की सोच को आगे बढ़ाता है।

16. राठी के साहित्य में निम्नवर्गीय जीवन
राठी की सामाजिक दृष्टि का सबसे मजबूत क्षेत्र निम्न और निम्न-मध्यवर्गीय जीवन दिखाई देता है। उनके पात्र बड़े शहरों की चमकदार दुनिया के केंद्र में नहीं हैं। वे अक्सर उस दुनिया के किनारे खड़े हैं।
  • राशन की कतार में खड़े लोग।
  • मशीन दुर्घटना के बाद काम खो चुका मजदूर।
  • दूसरों के घरों में काम करने वाली स्त्री।
  • भ्रष्ट ठेकेदारी व्यवस्था में काम करता मजदूर।
इन पात्रों के माध्यम से राठी उस समाज को सामने लाते हैं जो अक्सर साहित्य और सार्वजनिक विमर्श में दिखाई तो देता है, लेकिन उसकी आवाज कम सुनाई देती है। जिस्मों का तिलिस्म की समीक्षा में भी उच्चवर्गीय जीवन और निम्नवर्गीय विवशता के बीच मौजूद आर्थिक अंतर को राठी के लेखन की प्रमुख विशेषता माना गया है। (hastaksher.com)

17. व्यवस्था-बोध
राठीजी की रचनाओं में व्यक्ति और व्यवस्था के बीच तनाव बार-बार आता है। व्यक्ति अकेला है - व्यवस्था बड़ी है। लेकिन उनकी लघुकथा इस असमानता को केवल स्वीकार नहीं करती। वह उसे दिखाती है और पाठक को असहज करती है। ‘पेट का सवाल’ में व्यवस्था भ्रष्टाचार को सामान्य बनाती है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में व्यवस्था के सामने व्यक्ति के हाथ ही नहीं बचे। ‘आटा और जिस्म’ में आर्थिक व्यवस्था व्यक्ति की देह तक पहुँच जाती है। इन रचनाओं को साथ पढ़ने पर एक साझा प्रश्न उभरता है:
क्या आर्थिक और संस्थागत व्यवस्था मनुष्य की गरिमा से बड़ी हो सकती है?
राठीजी का साहित्य इस प्रश्न का सीधा सैद्धांतिक उत्तर नहीं देता। वह ऐसी स्थितियाँ बनाता है जिनमें पाठक स्वयं उत्तर खोजे।

18. साहित्यिक योगदान और पुरस्कार
राठी की साहित्यिक सक्रियता को विभिन्न स्तरों पर मान्यता मिली है। उनके लेखक-परिचय में शब्द साक्षी हैं के लिए 2006 में साहित्य कलश, इंदौर द्वारा ईश्वर पार्वती स्मृति सम्मान का उल्लेख है। 2012 में लघुकथा के क्षेत्र में योगदान के लिए माँ शरबती देवी सम्मान मिलने की जानकारी भी उपलब्ध है। (Sahityakunj)
लेकिन उनके योगदान को केवल पुरस्कारों से नहीं आँका जाना चाहिए। उनकी वास्तविक उपलब्धि उनके लंबे साहित्यिक जुड़ाव में दिखाई देती है। उन्होंने लिखा भी, संपादित भी किया और लघुकथा को लेकर साहित्यिक गतिविधियाँ भी संचालित कीं। यही तीनों स्तर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाते हैं।

19. अकादमिक स्वीकृति
सतीश राठी के साहित्य पर विश्वविद्यालय स्तर पर शोध हुआ है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. शोधकार्य किया गया था। (laghukathaduniya.blogspot.com)
यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि राठी जी का साहित्य केवल समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं तक सीमित नहीं रहा। उस पर अकादमिक स्तर पर भी विचार हुआ। हालाँकि वर्तमान अध्ययन उस पूर्व शोध की पुनरावृत्ति नहीं करता। इसका जोर विशेष रूप से सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के संबंध पर है।

20. चर्चा
अब तक के विश्लेषण से राठीजी की लघुकथा-दृष्टि के कुछ स्पष्ट बिंदु सामने आते हैं।
  • पहला, उनका यथार्थ जमीन से जुड़ा है। वे बड़े सिद्धांतों को पात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी में पकड़ते हैं।
  • दूसरा, उनके यहाँ आर्थिक प्रश्न बहुत बार नैतिक प्रश्न बन जाता है। भूख केवल भोजन की कमी नहीं रहती। वह गरिमा और निर्णय की स्वतंत्रता को भी प्रभावित करती है।
  • तीसरा, उनका व्यंग्य व्यवस्था को बाहर से देखकर नहीं आता। कई बार व्यवस्था के भीतर का पात्र ही अपनी भाषा में उसकी पोल खोल देता है।
  • चौथा, स्त्री-पुरुष संबंधों में वे बराबरी और दोहरे मानदंड पर प्रश्न उठाते हैं।
  • पाँचवाँ, उनकी भाषा सहज है। यह सहजता उनकी रचनाओं को सरल बनाती है, लेकिन उनका अर्थ सरल नहीं करती।
  • और अंत में, राठी की लघुकथाओं में संवेदना और सामाजिक आलोचना साथ-साथ चलती हैं।
21. निष्कर्ष
सतीश राठी की लघुकथाएँ अपने समय और समाज को देखने का एक मानवीय तरीका प्रस्तुत करती हैं। उनके यहाँ गरीबी केवल आँकड़ा नहीं है। वह भूखे शरीर की पीड़ा है। भ्रष्टाचार केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है। वह उस सड़क की खराबी है जिस पर आम आदमी चलता है। लैंगिक असमानता केवल सामाजिक सिद्धांत नहीं है। वह पति-पत्नी के बीच बोले गए एक छोटे-से वाक्य में सामने आ सकती है। यही उनकी लघुकथा की खासियत है।
‘आटा और जिस्म’ में भूख और शरीर का संबंध सामाजिक व्यवस्था की कठोरता को सामने लाता है। ‘पेट का सवाल’ भ्रष्टाचार के सामान्यीकरण पर चोट करती है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ भूख, असहायता और नागरिक अस्मिता का तीखा रूपक बन जाती है। ‘खुली किताब’ निजी संबंधों के भीतर छिपे लैंगिक दोहरेपन को उजागर करती है। (रचनाकार)
राठीजी की साहित्यिक भूमिका इन रचनाओं से भी आगे जाती है। ‘क्षितिज’ के माध्यम से उन्होंने लघुकथा को केवल लिखने की विधा नहीं रहने दिया; उसके लिए एक साहित्यिक संवाद का वातावरण तैयार किया। तीसरा क्षितिज और समक्ष जैसे संपादित संकलन तथा लंबे समय तक किया गया संपादकीय कार्य इस बात का प्रमाण हैं। (jangatha.blogspot.com)
इसलिए सतीश राठी का मूल्यांकन केवल उनके लघुकथा-संग्रहों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। उनका साहित्यिक अवदान तीन स्तरों पर दिखाई देता है—रचना, संपादन और लघुकथा-संवर्धन।
उनकी श्रेष्ठ लघुकथाएँ पाठक को कोई तैयार निष्कर्ष नहीं देतीं। वे एक स्थिति सामने रखती हैं और फिर चुप हो जाती हैं। उस चुप्पी में प्रश्न बचा रहता है।
और यही उनकी लघुकथा की सबसे बड़ी शक्ति है।

संदर्भ सूची
  • राठी, सतीश. शब्द साक्षी हैं. लघुकथा-संग्रह, 2002. इस प्रकाशन वर्ष का उल्लेख उपलब्ध लघुकथा-सूची में मिलता है। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • राठी, सतीश. जिस्मों का तिलिस्म. ऋषिराज प्रकाशन, ग्राम ईटावदी, तहसील महेश्वर, जिला खरगोन, मध्य प्रदेश. ISBN 978-81-956080-2-7. उपलब्ध समीक्षा के अनुसार संग्रह में 72 लघुकथाएँ हैं। (hastaksher.com)
  • राठी, सतीश. ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’. रचनाकार, 26 अक्टूबर 2018. (रचनाकार)
  • राठी, सतीश. ‘जिस्मों का तिलिस्म’. विभिन्न साहित्यिक प्रकाशनों में प्रकाशित पाठ। उपलब्ध पाठ के आधार पर अध्ययन। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • राठी, सतीश. ‘लघुकथा, इंदौर और क्षितिज’. जनगाथा, 2022. (jangatha.blogspot.com)
  • द्वितीयक स्रोत
  • गिरकर, दीपक. ‘जिस्मों का तिलिस्म: मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती लघुकथाएँ’. हस्ताक्षर, अगस्त 2023. (hastaksher.com)
  • सुपेकर, संतोष. ‘लघुकथा और उज्जैन’. लघुकथा दुनिया. (laghukathaduniya.blogspot.com)
  • ‘मध्यप्रदेश में लघुकथा, अतीत और वर्तमान’. सेतु. 2018. (Setu)
  • ‘सतीश राठी’. साहित्य कुंज. लेखक-परिचय एवं कृतियों की सूची. (Sahityakunj)
  • ‘सतीश राठी’. लघुकथा-वार्ता, मार्च 2017. लेखक-परिचय एवं कृतियों की जानकारी. (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • ‘साहित्य समाचार // प्राची—फरवरी 2018’. रचनाकार. ‘क्षितिज’ की साहित्यिक गतिविधियों संबंधी विवरण. (रचनाकार)
  • सुपेकर, संतोष. ‘लघुकथा और उज्जैन’. (विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में भारती ललवानी द्वारा डॉ. शैलेंद्र कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए एम.फिल. शोध ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ का उल्लेख) (laghukathaduniya.blogspot.com)

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

पुस्तक समीक्षा । आस्था के पार विवेक की तलाश - पावन तट पर। रमाकांत चौधरी

कुंभ जैसे विराट धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन पर लिखना जितना आकर्षक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। यहाँ आस्था, परंपरा, सामाजिक यथार्थ और मानवीय भावनाएँ एक साथ उपस्थित रहती हैं। ऐसे विषय को साहित्यिक दृष्टि से समेटना सहज नहीं होता। 'पावन तट पर' नामक यह साझा लघुकथा-संग्रह इस चुनौती को स्वीकार करता है और कुंभ के बहाने आस्था, विवेक और सामाजिक यथार्थ के अनेक आयामों को सामने लाता है। संग्रह के संपादक सुरेश सौरभ स्पष्ट सामाजिक दृष्टि रखने वाले रचनाकार के रूप में दिखाई देते हैं। वह अपनी भूमिका में स्वामी विवेकानंद के ‘नर सेवा नारायण सेवा’ के विचार का उल्लेख करते हुए, साहित्यकार के नैतिक दायित्व, निष्पक्ष दृष्टि और मानवीय सरोकारों की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनके अनुसार साहित्य का काम किसी पंथ, जाति या विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ पक्ष को ईमानदारी से सामने लाना भी है। यही कारण है कि यह संग्रह आस्था का अंधानुकरण नहीं करता, बल्कि उसे विवेकपूर्ण प्रश्नों के साथ प्रस्तुत करता है।

संग्रह में अनेक लघुकथाकारों की रचनाएँ शामिल हैं, जो कुंभ के विविध अनुभवों और भावनात्मक स्थितियों को अभिव्यक्त करती हैं। रश्मि ‘लहर’ की ‘सेवा’, सूर्यदीप कुशवाहा की ‘पुण्य फल’ और ‘सच्चा पुण्य’, डॉ. रशीद गौरी की ‘निपटारा’, डॉ. पूरन सिंह की ‘ये माँ ही हो सकती हैं’, डॉ. अंजु दुआ जैमिनी की ‘मोक्ष बनाम मुक्ति’, सरोज बाला सोनी की ‘कल्पवास’ और मिन्नी मिश्रा की ‘पिता का कुंभ स्नान’ जैसी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक भावनाओं को स्पर्श करती हैं। वहीं प्रो. रणजोध सिंह की ‘लिविंग गॉड’ और राजेन्द्र वर्मा की ‘पुण्य’ आस्था और सामाजिक मानसिकता के गहरे पहलुओं को उजागर करती हैं। इसी क्रम में अभय कुमार भारती की ‘व्रत’, शोभा गोयल की ‘रिफंड’, देवेंद्रराज सुथार की ‘सोच का स्नान’, नृपेंद्र अभिषेक नृप की ‘मोक्ष की एक डुबकी’, नीना मंदिलवार की ‘विलुप्त’ और हरीश कुमार ‘अमित’ की ‘कुंभ स्नान’ तथा ‘पुण्य’ कुंभ के सामाजिक यथार्थ और मानवीय मनोविज्ञान को उभारती हैं।

चित्रगुप्त की ‘पावन तट पर’ और ‘बंद दरवाजे की चीख’, डॉ. रामकुमार घोटड़ की ‘मुक्ति-पथ’ तथा ‘पितृहीन साया’, मार्टिन जॉन की ‘पापमुक्ति’, रंजना जायसवाल की ‘डुबकी’, डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की ‘कुंभी पाप’ और अरविन्द असर की ‘मुफ्त का पुण्य’ आस्था के भीतर छिपी विडंबनाओं और सामाजिक विसंगतियों को उजागर करती हैं।

इसी प्रकार ट्विंकल तोमर सिंह की ‘भंडारे की आग’, गुलजार हुसैन की ‘भगदड़ में माँ’, सेवा सदन प्रसाद की ‘अनुतृप्त’, चित्तरंजन गोप ‘लुकाठी’ की ‘महाकुंभ की अमृत बूंदें’ (एक) और (दो), डॉ. उपमा शर्मा की ‘पूजा’, डॉ. यशोधरा भटनागर की ‘विरासत की डोरी’ तथा नमिता सिंह ‘आराधना’ की ‘गंगा मैया से पैरवी’ कुंभ के सामाजिक और भावनात्मक पक्षों को पछोर-पछोर कर सामने लाती हैं।

संपादक सुरेश सौरभ की ‘ज़ख्म’ और ‘साये में पुण्य’ लघुकथाएं इस संग्रह में शामिल हैं, जो संग्रह की वैचारिक दिशा को और विराटता से स्पष्ट करती हैं। पूनम ‘कतरियार’ की ‘मुक्ति गाथा’, सुनीता मिश्रा की ‘शेष उम्र की धूप’, डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ की ‘वह देशद्रोही है’ और ‘सुकून’, डॉ. नीरू मित्तल ‘नीर’ की ‘कुम्भ में मौन डुबकी’, मनोरमा पंत की ‘मुक्ति की खुशी’, आलोक चोपड़ा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुरेश वशिष्ठ की ‘औलाद वाले’, निर्मल कुमार डे की ‘पुण्य-लाभ’, मानवीन कौर पाहवा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुषमा गुप्ता की ‘आस्था का सैलाब’ तथा मीरा जैन की ‘माँ की खुशी’ भी संग्रह को विविध अनुभवों से समृद्ध करती हैं।

इसी संग्रह में मेरी लघुकथा ‘पूर्व जन्म के पाप’ भी शामिल है, जो कर्मफल और आस्था से जुड़े पारंपरिक विश्वासों के बीच छिपे सामाजिक प्रश्नों को उजागर करने का प्रयास करती है। लघुकथा पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि मनुष्य अपने वर्तमान जीवन की विसंगतियों को अक्सर ‘पूर्व जन्म के पाप’ जैसी धारणाओं से ढंकने का प्रयास करते हुए कब ठगी का शिकार हो जाता है उसे तनिक पता ही नहीं चलता। 

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कुंभ को केवल धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के अनुभवों के रूप में देखा गया है। कहीं करुणा है, कहीं विडंबना, कहीं विश्वास है तो कहीं तीखा व्यंग्य भी। लघुकथा की संक्षिप्तता यहाँ उसकी शक्ति बनकर उभरती है और पाठक को सोचने के लिए बाध्य करती है।

भाषा सरल और सहज है, जिससे विविध रचनाकारों की रचनाएँ पाठक के मन तक आसानी से पहुँचती हैं। संपादन की सजगता के कारण संग्रह में वैचारिक एकसूत्रता भी बनी रहती है।

समग्रतः पावन तट पर आस्था और विवेक के बीच संतुलन साधने वाला एक महत्वपूर्ण लघुकथा-संग्रह है। यह पुस्तक केवल कुंभ के धार्मिक पक्ष का वर्णन नहीं करती, बल्कि उसके बहाने समाज की मानसिकता, मानवीय संवेदना और सामाजिक यथार्थ को भी सामने लाती है। इस दृष्टि से सुरेश सौरभ के संपादन में प्रकाशित यह संग्रह हिंदी लघुकथा-साहित्य के क्षेत्र में एक विचारोत्तेजक और सार्थक संग्रणीय योगदान कहा जा सकता है।

–रमाकान्त चौधरी 

गोला गोकर्णनाथ, लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश। 

मो. 9415881883


रविवार, 18 जनवरी 2026

लघुकथा समीक्षा | पुस्तक: नई सदी की धमक | समीक्षक: डॉ. संध्या तिवारी

जनवरी 2018 में डॉ. संध्या तिवारी द्वारा की गई एक समीक्षा:

 वैचारिकी-12

1-किताब           -     नई सदी की धमक 

2-लघुकथा विचार -   कड़ी - 12

3-लघुकथा संख्या -    22

4-लघुकथा            -   सोयी हुई सृष्टि

5-लघुकथाकार       -  चन्द्रेश कुमार छतलानी 

               "सोयी हुई सृष्टि" लघुकथा पढ़ कर जो सबसे पहला विचार मेरे मन में आया वह था , "ताओ" पंथ के संत 'च्वांगत्सू'  की 'तितली' की कहानी ।

 कथा कुछ यूं है --   कि एक सुबह 'च्वांगत्सू' जागे। वे बड़े परेशान लग रहे थे। उन्हें चाय देने आए शिष्यों ने गुरुवर को परेशान देखा तो कारण पूछा। 'च्वांगत्सू' ने कहा, मैं इसलिए चिंतित हूं, क्योंकि कल रात मैंने एक सपना देखा। सपने में मैंने देखा कि मैं एक तितली हूं। शिष्यों ने कहा, इसमें चिंतित होने वाली क्या बात है। सपना ही तो था। 'च्वांगत्सू' ने कहा, नहीं, लेकिन बात ये है कि जब मैं स्वप्न में तितली था, तब मुझे इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। अभी जागने पर मुझे याद आया है कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं वास्तव में एक तितली हूं, जो कि अभी यह स्वप्न देख रही है कि वह "च्वांगत्सू" है और जागने पर वह पाए कि वह तो वास्तव में एक तितली है।

जाग्रति और स्वप्न  मनुष्य का सबसे बड़ा कौतूहल रहा है। 

'सोयी हुयी सृष्टि' का नायक भी खुद को सोया हुआ देख रहा है 'च्वांगत्सू' की तितली के नाईं ।'च्वांगत्सू' जागने पर चिंतित होता है और अपने शिष्यों को अपनी चिंता से अवगत कराता है कि वह वास्तव में तितली तो नहीं। 

 कथानायक कथा में पहले सोया हुआ अर्थात अचेतन मन का प्रतीक है फिर नेता का प्रतीक है तदोपरान्त आम आदमी का प्रतीक है ।

परन्तु जागने पर जिस प्रकार कथा नायक परिचयपत्र में अपने पिता का नाम देख निश्चिन्त हो जाता है वैसा संत च्वांगत्सू नहीं कर पाते क्योंकि उनकी उलझन आध्यात्मिक स्तर की है और कथा नायक की भौतिक।

फिर भी कथा का स्वप्न से साम्य तो है ही। 

प्रस्तुत कथा में भी ऐसा ही साहचर्य देखने को मिलता है ।

हालांकि इस कथा में सोना मात्र 'प्रतीक' है तमोगुण का ।जो कि हम भारत वासियों की मानसिकता की निशानी है।

 फिर चाहे 'स्वामी विवेकानन्द' जी जगायें या 'भारतेन्दु हरिश्चन्द '।

प्रतीकों और बिम्बों के आधार पर बुना कथा का फलक बहुत विस्तृत है।

करोड़ो लोगो से ज्यादा सोये होना मने हम मनुष्यों में जागरूकता का अभाव होना ।

खादी के कपड़े पहने लोगों के मुंह से कुछ आवाजें और धुआं निकलता मने मुट्ठी भर लोगों का आम जनता का शोषण ।

स्वयं कथा नायक का स्वपन में ही जाग जाना और शोषकवर्ग में शामिल हो जाना ।

तभी उसका स्वप्न टूट जाना और परिचय पत्र पर पिता का नाम देखना यहां परिचय पत्र पर पिता का नाम देखने से एक अर्थ 

(जो कि समष्टिगत है) यह भी निकलता है कि वह खुद को भारत देश के रूप में देख रहा और पिता के रूप में बापू को ।

दूसरा अर्थ (जो कि व्यष्टिगत है) यह है कि वह एक आम नागरिक है और उसके पिता के नाम से वह जाना जा रहा है ।

प्रथमदृष्टया यह कथा 'ख़लील ज़िब्रान' की कथाओं की सी झलक लिये हुये प्रतीत होती है 

'चन्द्रेशकुमार छतलानी जी ' ने लघुकथाओं में अपनी एक शैली विकसित की है।

कलात्मक रूप से उच्चकोटि की रचना है ।

कथानक ,शिल्प, शैली, शीर्षक आदि सभी मानकानुसार ।

कथाकार को बधाई ।

- डाॅ संध्या तिवारी 

पीलीभीत

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

2025 की श्रेष्ठ लघुकथा

आदरणीय लघुकथाकार महोदय/महोदया,

सादर नमस्कार।

हिंदी लघुकथा के समकालीन परिदृश्य को रेखांकित करने के उद्देश्य से वर्ष 2025 में आप द्वारा लिखित और स्व-चयनित श्रेष्ठ लघुकथाओं को लघुकथा-दुनिया ब्लॉग पर संकलित किये जाने का विचार है।

इस संकलन की विशिष्टता यह होगी कि इसमें सम्मिलित लघुकथाएँ आप द्वारा स्वयं चयनित होंगी, अर्थात् आप अपनी दृष्टि में वर्ष 2025 की अपनी सर्वश्रेष्ठ लघुकथा इस हेतु भेज सकेंगे।

इससे यह संग्रह रचनात्मक आत्ममूल्यांकन और समकालीन संवेदना का प्रमाणिक दस्तावेज बनेगा।

आपसे विनम्र अनुरोध है कि:
  • वर्ष 2025 में लिखित (प्रकाशित/अप्रकाशित) आपके अनुसार अपनी श्रेष्ठ लघुकथा
  • संक्षिप्त रचनात्मक परिचय
  • संपर्क विवरण
4 जनवरी 2026 तक निम्न गूगल फॉर्म द्वारा भेजने का कष्ट करें:
https://forms.gle/XniKGVefwzVX63xa8

गूगल फॉर्म के अतिरिक्त अन्य माध्यम से ना भेजें।

आपका सहयोग इस संकलन को सार्थक, प्रतिनिधि और स्मरणीय बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। आशा है आप इस साहित्यिक प्रयास का हिस्सा बनकर हिंदी लघुकथा को और समृद्ध करेंगे।

(इस हेतु अन्य कोई शुल्क नहीं है। आपका रचनात्मक साहित्यिक योगदान स्वयं में अमूल्य है।)


उपरोक्त को आपके अन्य लघुकथाकार मित्रों से भी साझा करने का निवेदन है।

सादर
टीम लघुकथा दुनिया
iBlogger द्वारा Best Indian Hindi Blog से सम्मानित 
ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 का सम्मान प्राप्त

रविवार, 14 दिसंबर 2025

पुस्तक समीक्षा । पावन तट पर: आस्था और विसंगति का द्वंद्व । देवेन्द्रराज सुथार

सुरेश सौरभ द्वारा संपादित 'पावन तट पर' साझा लघुकथा संग्रह आस्था और अंधविश्वास के मध्य विद्यमान सूक्ष्म विभाजक रेखा का अन्वेषण करता है। महाकुंभ 2025 को केंद्रबिंदु बनाकर देशभर के 41 लघुकथाकारों की रचनाएँ इस संकलन में समाहित हैं, जो धार्मिक आयोजनों की विसंगतियों और विद्रूपताओं को बेबाक शिल्प में प्रस्तुत करती हैं।

    संपादक का दृष्टिकोण निर्भीक और निष्पक्ष है। वे मानवीय मूल्यों को धार्मिक आडंबर से सर्वोपरि स्थान देते हैं। रश्मि 'लहर' की 'सेवा' में सास द्वारा भगदड़ में बहू के जीवन-रक्षण का प्रयास, प्रो. रणजोध सिंह की 'लिविंग गॉड' में माता-पिता की सेवा-शुश्रूषा को प्रकृति प्रदत्त तीर्थ मानना, और सुरेश सौरभ की लघुकथा 'साये में पुण्य' आदि लघुकथाओं में गंगा-जमुनी तहज़ीब की सुगंध परिलक्षित होती हैं। संग्रह समस्त रचनाएँ मानवता को परम धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करती हैं।

    संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता इसकी साहसिकता और सामाजिक यथार्थ के प्रति प्रतिबद्धता है। डॉ. रशीद गौरी की 'निपटारा' में बहू द्वारा वृद्ध ससुर को कुंभ में परित्यक्त करने की कुत्सित योजना, चित्रगुप्त की 'बंद दरवाजे की चीख' में वृद्ध माता को कक्ष में बंद कर कुंभ-गमन का निर्मम निर्णय, और अरविंद असर की 'मुफ्त का पुण्य' में सरकारी आँकड़ों पर तीक्ष्ण व्यंग्य-यह सब रचनाएँ समकालीन समाज के कटु और वीभत्स सत्य को निर्ममता से उद्घाटित करती हैं।

      अनेक कथाएँ भगदड़ की त्रासदी और उसकी मार्मिक परिणतियों को केंद्र में स्थापित करती हैं। गुलज़ार हुसैन की 'भगदड़ में माँ', मार्टिन जॉन की 'पापमुक्ति' और चित्तरंजन गोप की दोनों लघुकथाएँ कुंभ की भयावहता तथा अराजकता का मर्मस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करती हैं। राजेंद्र वर्मा की 'पुण्य' में पति द्वारा रुग्ण पत्नी को परित्यक्त न करने का निर्णय वास्तविक धर्म-पालन का श्रेष्ठ उदाहरण है।

     कतिपय रचनाएँ आधुनिक तकनीकों के दुरुपयोग पर भी कठोर प्रहार करती हैं। चित्रगुप्त की 'पावन तट पर' में स्नानरत महिलाओं के अश्लील वीडियो निर्माण की घृणित घटना समकालीन युग की नैतिक विकृति और पतन को रेखांकित करती है।

       संपादन अत्यंत कुशल और संतुलित है। प्रत्येक रचना स्वतंत्र इकाई के रूप में पूर्ण और प्रभावोत्पादक है। भाषा सहज, प्रवाहमय और संप्रेषणीय है, जो पाठक को सतत आबद्ध रखती है। विविध भौगोलिक क्षेत्रों से आगत रचनाकारों की उपस्थिति संग्रह को राष्ट्रीय व्यापकता और बहुआयामी दृष्टि प्रदान करती है।

      सूर्यदीप कुशवाहा की 'पुण्य फल' और 'सच्चा पुण्य' दोनों कथाएँ मानवीय करुणा को धार्मिक कर्मकांड से श्रेष्ठ सिद्ध करती हैं। डॉ. पूरन सिंह की 'ये माँ ही हो सकती हैं' में मातृत्व की महत्ता, और सेवा सदन प्रसाद की 'अनुतप्त' में पश्चाताप का भाव-ये रचनाएँ गहन मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदर्शित करती हैं।

      डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की 'कुंभी पाप' में गरिमा-भंग की घटना, और नीना मंदिलवार की 'विलुप्त' में भगदड़ के पश्चात् आस्था का विलोपन - ये रचनाएँ धार्मिक आयोजनों की कुरूपता को उजागर करती हैं। हरीश कुमार 'अमित' की दोनों लघुकथाएँ सच्चे पुण्य की पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करती हैं।

       'पावन तट पर' केवल धार्मिक पाखंड और कर्मकांडों पर प्रहार नहीं करता, अपितु मानवीय संवेदनाओं को जागृत करने का सार्थक प्रयास है। यह संग्रह उन समस्त पाठकों और चिंतकों के लिए अनिवार्य है जो अंधविश्वास और आस्था, धर्म और धार्मिकता के मध्य विद्यमान सूक्ष्म भेद को समझना चाहते हैं।

     संग्रह की सर्वाधिक सशक्त पक्ष यह है कि यह धर्म का विरोध नहीं करता, वरन् धर्म के नाम पर होने वाले शोषण, आडंबर और अमानवीयता का तीव्र प्रतिरोध करता है। सुरेश सौरभ ने संपादक के रूप में विलक्षण सूझबूझ और साहित्यिक विवेक का परिचय दिया है।

        यह एक प्रगतिशील, विचारोत्तेजक और सामाजिक चेतना से ओतप्रोत संकलन है जो समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान के रूप में स्थापित होने की पूर्ण क्षमता रखता है। इस संग्रह का प्रत्येक पृष्ठ मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का आह्वान करता है।


पुस्तक- पावन तट पर ( कुंभ स्नान पर केंद्रित लघुकथाएं) 

संपादक- सुरेश सौरभ

मूल्य-250

प्रकाशन वर्ष-2025

प्रकाशन- समृद्धि पब्लिकेशन नई दिल्ली

 

 समीक्षक-देवेन्द्रराज सुथार

स्थानीय पता-गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025

मोबाइल नंबर-8107177196


संपादक परिचय:

नाम : सुरेश सौरभ

मूल नाम : सुरेश कुमार

माता : स्व. कमला देवी 

पिता : स्व. केवल राम

शिक्षा : बीए (संस्कृत)  बी. कॉम., एम. ए. (हिन्दी) यूजीसी-नेट (हिन्दी)

जन्म तिथि : 03 जून, 1979

प्रकाशन : 

दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हरिभूमि, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, प्रभात ख़बर, सोच विचार, विभोम स्वर, कथाबिंब, पाखी, पंजाब केसरी, ट्रिब्यून सहित देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब पत्रिकाओं में सैकड़ों लघुकथाएँ, बाल कथाएँ, व्यंग्य-लेख, कविताएँ तथा समीक्षाएँ आदि प्रकाशित।

प्रकाशित पुस्तकें : 

एक कवयित्री की प्रेमकथा (उपन्यास), नोटबंदी, तीस-पैंतीस, वर्चुअल रैली, बेरंग (लघुकथा-संग्रह), अमिताभ हमारे बाप (हास्य-व्यंग्य), नंदू सुधर गया, पक्की दोस्ती (बाल कहानी संग्रह), भीगते सावन (कहानी संग्रह) 

संपादन : 

100 कवि, 51 कवि, काव्य मंजरी, खीरी जनपद के कवि, तालाबंदी, इस दुनिया में तीसरी दुनिया, गुलाबी गलियां, पावन तट पर आदि

विशेष :

भारतीय साहित्य विश्वकोश में इकतालीस  लघुकथाएँ शामिल। यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया में लघुकथाओं एवं हास्य-व्यंग्य लेखों की व्यापक चर्चा।

कुछ लघुकथाओं पर लघु फिल्मों का निर्माण। चौदह साल की उम्र से लेखन में सक्रिय। मंचों से रचनापाठ एवं आकाशवाणी लखनऊ से रचनापाठ।

कुछ लघुकथाओं का उड़िया, अंग्रेज़ी तथा पंजाबी आदि भाषाओं में अनुवाद।

सम्मान : 

अन्तरराष्ट्रीय संस्था भाखा, भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर प्रताप नारायण मिश्र युवा सम्मान, हिन्दी साहित्य परिषद, सीतापुर द्वारा लक्ष्य लेखिनी सम्मान, लखीमपुर की सौजन्या, महादलित परिसंघ, कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता में दो बार सम्मानित, परिवर्तन फाउंडेशन सहित कई प्रसिद्ध संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

सम्प्रति : 

प्राइवेट महाविद्यालय में अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन।

सम्पर्क :

निर्मल नगर, लखीमपुर-खीरी (उत्तर प्रदेश)

पिन कोड- 262701

मोबाइल- 7860600355

ईमेल- sureshsaurabhlmp@gmail.com


रविवार, 30 नवंबर 2025

समकालीन हिंदी लघुकथा: जीवन की 'क्षणिका' और आधुनिक समाज का यथार्थ । चंद्रेश कुमार छ्तलानी

परिचय

डिजिटल युग की इस भाग-दौड़ भरी दुनिया में, जहाँ पाठकों का attention span लगातार सिमट रहा है, समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य की एक बेहद सशक्त और प्रासंगिक विधा के रूप में उभर कर सामने आई है।
यह किसी एक कहानी को छोटा कर कहा गया नहीं है; यह तो आधुनिक जीवन की आपाधापी में उपजे किसी तीखे अनुभव, किसी गहरी मानवीय संवेदना, या किसी ज्वलंत सामाजिक मुद्दे की एक 'क्षणिका' सरीखी है - एक पल की कथा। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसकी संक्षिप्तता है, जो कम-से-कम शब्दों में अधिकतम प्रभाव छोड़ने का सामर्थ्य रखती है।
आज की हिंदी लघुकथा केवल उपदेश या आदर्श की बात नहीं करती, बल्कि यह अपने समय के जटिल यथार्थ को पूरी ईमानदारी से आईना दिखाती है। आइए कुछ चर्चा करते हैं।

1. लघुकथा: समय के साथ बदलता स्वरूप

हिंदी साहित्य में कथा कहने की परम्परा सदियों पुरानी है, लेकिन लघुकथा का आधुनिक स्वरूप 20वीं सदी के उत्तरार्ध में, विशेषकर 1970 के दशक के बाद, एक स्वतंत्र साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हुआ।
पंचतंत्र और जातक कथाओं जैसी आरंभिक रचनाओं में उपदेशात्मकता (नैतिक शिक्षा) हावी थी, जिसे समकालीन लेखकों ने त्याग दिया। अब लघुकथा ने यथार्थवादी और गहन मनोवैज्ञानिक विषयों को अपनाया है।
आधुनिक लघुकथा कथा-सम्राट प्रेमचंद की 'कहानी' की तरह विस्तृत नहीं होती, बल्कि यह जीवन के किसी एक दृश्य, किसी एक भाव का 'स्नैपशॉट' होती है। यह कहानी के सभी तत्वों (चरित्र, कथानक, संवाद) को अत्यंत संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें निहित मूल विचार का उदघाटन अक्सर इसके अंत में होता है, जो कि एक प्रभावी मोड़ या पाठक के मन में बैठ जाने वाली एक गहरी संवेदना सरीखा होता है। डिजिटल माध्यमों और पत्रिकाओं ने इसके प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे यह विधा आम और व्यस्त पाठकों तक आसानी से पहुँच सकी है।

2. समकालीन लघुकथा के प्रमुख विषय और रुझान

समकालीन हिंदी लघुकथा वास्तव में आज के समाज की धड़कन को बड़ी सजीवता और संक्षिप्तता के साथ अभिव्यक्त करती है। इसकी मौलिकता इसी बात में है कि यह केवल पुराने विषयों को नहीं दोहराती, बल्कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं और नई सामाजिक विसंगतियों को अपना केंद्रीय कथ्य बनाती है। सामान्य विषयों के अतिरिक्त, समकालीन लघुकथा के फलक पर कई अन्य महत्त्वपूर्ण आयाम उभरे हैं, जिनमें से कुछ को निम्नानुसार बताया गया है:

2.1 आधुनिक समाज की विडंबनाएँ और विषय-वस्तु
समकालीन लघुकथा ने अपने सामाजिक परिप्रेक्ष्य को व्यापक बनाया है, जिसमें वर्गभेद, पारिवारिक विघटन, और व्यक्तिगत टूटन जैसे मुद्दे शामिल हैं। इनमें शामिल हैं - 

विषय-वस्तुविस्तार और प्रासंगिकता
किसान जीवन और कृषि संकटवैश्वीकरण और पूँजीवादी प्रभाव के कारण किसानों की आत्महत्याएँ, कर्ज का जाल, और खेती का गैर-लाभकारी हो जाना—ये विषय लघुकथा में संवेदनात्मक धरातल पर उतरे हैं। कई लघुकथाएँ अन्नदाता के संघर्ष और उसकी बदहाल माली हालत को दर्शाती हैं।
पर्यावरण और जलवायु परिवर्तनआज लघुकथा बदलते मौसम, सूखे, बाढ़, और शहरों में प्रकृति के क्षरण को प्रमुखता से उठाती है। यह मानव और प्रकृति के बिगड़ते संबंध, अंधाधुंध विकास की कीमत और जल, जंगल, ज़मीन के विनाश पर तीखे सवाल करती है।
उपभोक्तावाद और लालचबाज़ारवाद ने किस प्रकार मानवीय मूल्यों को बदलकर रख दिया है, इसका चित्रण लघुकथा में मिलता है। अत्यधिक लालच, भौतिक सुखों के लिए compromises, और "अधिक की चाहत" में सब कुछ खो देने की विडंबना को उजागर किया जाता है।
सांप्रदायिकता और हिंसासमाज में पनप रही हिंसक प्रवृत्ति, कट्टरता, और साम्प्रदायिक दंगों की भयावहता भी समकालीन लघुकथा का गंभीर विषय बनी है। 
पहचान का संकट और अस्तित्वनिम्न वर्ग द्वारा अन्याय का प्रतिकार, हाशिए पर धकेले गए लोगों की पीड़ा, और समाज में अपनी Identity बनाए रखने का संघर्ष भी लघुकथाओं में सामने आया है।
2.2 कथ्य की अभिव्यक्ति और शिल्पगत विशेषताएँ
समकालीन हिंदी लघुकथा की शक्ति उसे कहने के कलात्मक उत्कर्ष में भी निहित है।

शिल्पगत विशेषताप्रभाव और महत्ता
सांकेतिकता और सूक्ष्मतालघुकथा अपने विशाल कथ्य को संकेतों और सूक्ष्म चित्रण के माध्यम से व्यक्त करती है। यहाँ सब कुछ स्पष्ट नहीं कहा जाता, बल्कि पाठक को सोचने और निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए छोड़ दिया जाता है।
तीखा व्यंग्य (Satire)हरिशंकर परसाई की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, आधुनिक लघुकथाएँ दफ़्तरी जीवन की विसंगतियों से लेकर राजनीतिक अवसरवादिता पर तीखे कटाक्ष करती हैं।
विषय पर सीधा प्रहारकहानी की तरह विस्तृत पृष्ठभूमि बाँधने के बजाय, लघुकथा सीधे विषय पर आती है, जिससे पाठक का attention span सिमटने के कारण प्रभाव गहरा और तत्काल होता है।
सरल, सहज भाषाजन-मानस से संवाद स्थापित करने के लिए अक्सर सहज-सजग-रोचक भाषा का प्रयोग किया जाता है, जिससे यह विधा आम पाठकों तक आसानी से पहुँच पाती है और उन्हें व्यापक अनुभव-जगत् से साक्षात्कार कराती है।
कुल मिलाकर, समकालीन हिंदी लघुकथा ने सिद्ध किया है कि साहित्य का आकार-प्रकार नहीं, बल्कि उसका विजन, संघर्ष और विडंबनाओं के उभार की उसकी क्षमता ही उसकी कसौटी होती है। यह विधा 21वीं सदी की तीव्र गति और जटिल यथार्थ को पकड़ने का एक क्रांतिकारी साहित्यिक आयाम है।

3. लघुकथा की सफल संरचना
एक श्रेष्ठ लघुकथा का निर्माण किसी कुशल कारीगर की कारीगरी जैसा होता है, जहाँ एक भी शब्द अनावश्यक नहीं होता। इसकी सफलता कई तत्वों पर निर्भर करती है, इनमें से कुछ पर चर्चा करते हैं:

तत्वविवरण 
कथ्य की नवीनताविषय-वस्तु ताज़ा होनी चाहिए। यह जीवन के घिसे-पिटे पहलुओं से हटकर, किसी अनछुए अनुभव को छूए।
संक्षिप्ततालघुकथा की अधिकतम शब्द-सीमा पर बहुत चर्चाएँ हुई हैं, और इस लेख के लिखे जाने तक विद्वान एकमत नहीं हैं, पर 300-500 शब्दों में कही गई लघुकथा का अच्छा प्रभाव माना जाता है।
क्षण की अभिव्यक्तियह पूरे जीवन-चरित्र का नहीं, बल्कि जीवन के किसी एक महत्वपूर्ण क्षण या मनोदशा का चित्रण करती है। पात्र कम और उनका चित्रण सांकेतिक हो तो बेहतर।
प्रभावी शुरुआतपाठक को तुरंत रचना से जोड़ने के लिए पहली एक-दो पंक्तियाँ आकर्षक होनी चाहिए। हालाँकि लघुकथा सीधे विषय पर आनी चाहिए।
अंतिम प्रभाव (पंच)अंत अपेक्षित नहीं, बल्कि अप्रत्याशित हो तो यह पाठक के मन में एक गहरा विचार या एक टीस छोड़कर जाता है।
लघुकथा में अनावश्यक विशेषणों, लंबे संवादों और विस्तृत पृष्ठभूमि के चित्रण से बचें। यहाँ हर शब्द का अपना विशिष्ट महत्व होता है।

4. लघुकथा लेखन में अवसर और चुनौतियाँ
आज, आधुनिक लघुकथा लेखन केवल शौक का माध्यम नहीं रहा, बल्कि यह एक साहित्यिक पहचान और करियर का रास्ता बन गया है।
अवसर: साहित्यिक वेबसाइटें, डिजिटल पत्रिकाएँ, सोशल मीडिया और ब्लॉग्स ने लेखकों के लिए द्वार खोले हैं। कई प्रकाशन गृह भी लघुकथा संग्रह प्रकाशित कर रहे हैं।
चुनौतियाँ: संक्षिप्तता के कारण, लेखक के लिए अपनी बात को कम शब्दों में पूरी तरह से व्यक्त करना और पाठक को बांधे रखना सबसे बड़ी चुनौती है।

एक सफल लघुकथा लेखक को अपने आसपास की घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील और अवलोकनशील होना आवश्यक है।

निष्कर्ष: 

समकालीन हिंदी लघुकथा ने यह सिद्ध कर दिया है कि साहित्य की प्रासंगिकता कभी कम नहीं होती, केवल उसका रूप और अभिव्यक्ति का माध्यम बदलता है। यह 21वीं सदी के तेज-रफ़्तार जीवन की साहित्य विधा है, जो केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि हमें गहरे तक सोचने पर मजबूर भी करती है। यह विधा आज के समय में हिंदी साहित्य को एक नई दिशा और युवा पाठकों का एक बड़ा वर्ग प्रदान कर रही है और उम्मीद है कि कम शब्दों में जीवन का सार समाहित करने वाली 'भविष्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधा' बनेगी।
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डॉ. चंद्रेश कुमार छ्तलानी
writerchandresh@gmail.com
9928544749

लेखक परिचय:

25 वर्षों से अधिक के प्रशिक्षण, अनुसंधान, अकादमिक कार्य, लेखन, सॉफ्टवेयर और वेबसाइट विकास के गहन अनुभव के साथ, डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी ने अब तक 150 से अधिक सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन और वेबसाइटें स्वयं निर्मित की हैं। वे तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं - वर्ल्ड बुक रिकॉर्ड (श्रीलंका), ट्रिब्यून इंटरनेशनल वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, और वर्ल्ड्स ग्रेटेस्ट रिकॉर्ड्स - द्वारा सर्वाधिक शैक्षणिक प्रमाणपत्र अर्जित करने का विश्व रिकॉर्ड रखते हैं। इसके अतिरिक्त, उनकी अंग्रेज़ी लघुकथाओं की पुस्तक को भी तीन संगठनों ने रिकॉर्ड के लिए चयनित किया है। उन्हें एक वर्ष में स्कूल-विद्यार्थियों के लिए 50 से अधिक गेम्स सॉफ्टवेयार बनाने का रिकॉर्ड भी प्राप्त है। उन्होंने Microsoft, Amity, Cisco, Google, IEEE, DIKSHA, WHO तथा अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से 1,000 से अधिक प्रमाणपत्र प्राप्त किए हैं। डॉ. चन्द्रेश अब तक 17 पुस्तकों के लेखक, 10 मोनोग्राफ के रचनाकार, 10 पुस्तकों के संपादक, और 43 से अधिक शोध-पत्रों के लेखक हैं। उन्हें 50 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. छतलानी एक बहुमुखी साहित्यकार भी हैं और लघुकथाएँ, कहानियाँ, लेख तथा कविताएँ लिखते हैं।