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लघुकथा दुनिया (Laghukatha Duniya)
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मंगलवार, 9 जून 2026
शुक्रवार, 20 मार्च 2026
पुस्तक समीक्षा । आस्था के पार विवेक की तलाश - पावन तट पर। रमाकांत चौधरी
कुंभ जैसे विराट धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन पर लिखना जितना आकर्षक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। यहाँ आस्था, परंपरा, सामाजिक यथार्थ और मानवीय भावनाएँ एक साथ उपस्थित रहती हैं। ऐसे विषय को साहित्यिक दृष्टि से समेटना सहज नहीं होता। 'पावन तट पर' नामक यह साझा लघुकथा-संग्रह इस चुनौती को स्वीकार करता है और कुंभ के बहाने आस्था, विवेक और सामाजिक यथार्थ के अनेक आयामों को सामने लाता है। संग्रह के संपादक सुरेश सौरभ स्पष्ट सामाजिक दृष्टि रखने वाले रचनाकार के रूप में दिखाई देते हैं। वह अपनी भूमिका में स्वामी विवेकानंद के ‘नर सेवा नारायण सेवा’ के विचार का उल्लेख करते हुए, साहित्यकार के नैतिक दायित्व, निष्पक्ष दृष्टि और मानवीय सरोकारों की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनके अनुसार साहित्य का काम किसी पंथ, जाति या विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ पक्ष को ईमानदारी से सामने लाना भी है। यही कारण है कि यह संग्रह आस्था का अंधानुकरण नहीं करता, बल्कि उसे विवेकपूर्ण प्रश्नों के साथ प्रस्तुत करता है।
संग्रह में अनेक लघुकथाकारों की रचनाएँ शामिल हैं, जो कुंभ के विविध अनुभवों और भावनात्मक स्थितियों को अभिव्यक्त करती हैं। रश्मि ‘लहर’ की ‘सेवा’, सूर्यदीप कुशवाहा की ‘पुण्य फल’ और ‘सच्चा पुण्य’, डॉ. रशीद गौरी की ‘निपटारा’, डॉ. पूरन सिंह की ‘ये माँ ही हो सकती हैं’, डॉ. अंजु दुआ जैमिनी की ‘मोक्ष बनाम मुक्ति’, सरोज बाला सोनी की ‘कल्पवास’ और मिन्नी मिश्रा की ‘पिता का कुंभ स्नान’ जैसी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक भावनाओं को स्पर्श करती हैं। वहीं प्रो. रणजोध सिंह की ‘लिविंग गॉड’ और राजेन्द्र वर्मा की ‘पुण्य’ आस्था और सामाजिक मानसिकता के गहरे पहलुओं को उजागर करती हैं। इसी क्रम में अभय कुमार भारती की ‘व्रत’, शोभा गोयल की ‘रिफंड’, देवेंद्रराज सुथार की ‘सोच का स्नान’, नृपेंद्र अभिषेक नृप की ‘मोक्ष की एक डुबकी’, नीना मंदिलवार की ‘विलुप्त’ और हरीश कुमार ‘अमित’ की ‘कुंभ स्नान’ तथा ‘पुण्य’ कुंभ के सामाजिक यथार्थ और मानवीय मनोविज्ञान को उभारती हैं।
चित्रगुप्त की ‘पावन तट पर’ और ‘बंद दरवाजे की चीख’, डॉ. रामकुमार घोटड़ की ‘मुक्ति-पथ’ तथा ‘पितृहीन साया’, मार्टिन जॉन की ‘पापमुक्ति’, रंजना जायसवाल की ‘डुबकी’, डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की ‘कुंभी पाप’ और अरविन्द असर की ‘मुफ्त का पुण्य’ आस्था के भीतर छिपी विडंबनाओं और सामाजिक विसंगतियों को उजागर करती हैं।
इसी प्रकार ट्विंकल तोमर सिंह की ‘भंडारे की आग’, गुलजार हुसैन की ‘भगदड़ में माँ’, सेवा सदन प्रसाद की ‘अनुतृप्त’, चित्तरंजन गोप ‘लुकाठी’ की ‘महाकुंभ की अमृत बूंदें’ (एक) और (दो), डॉ. उपमा शर्मा की ‘पूजा’, डॉ. यशोधरा भटनागर की ‘विरासत की डोरी’ तथा नमिता सिंह ‘आराधना’ की ‘गंगा मैया से पैरवी’ कुंभ के सामाजिक और भावनात्मक पक्षों को पछोर-पछोर कर सामने लाती हैं।
संपादक सुरेश सौरभ की ‘ज़ख्म’ और ‘साये में पुण्य’ लघुकथाएं इस संग्रह में शामिल हैं, जो संग्रह की वैचारिक दिशा को और विराटता से स्पष्ट करती हैं। पूनम ‘कतरियार’ की ‘मुक्ति गाथा’, सुनीता मिश्रा की ‘शेष उम्र की धूप’, डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ की ‘वह देशद्रोही है’ और ‘सुकून’, डॉ. नीरू मित्तल ‘नीर’ की ‘कुम्भ में मौन डुबकी’, मनोरमा पंत की ‘मुक्ति की खुशी’, आलोक चोपड़ा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुरेश वशिष्ठ की ‘औलाद वाले’, निर्मल कुमार डे की ‘पुण्य-लाभ’, मानवीन कौर पाहवा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुषमा गुप्ता की ‘आस्था का सैलाब’ तथा मीरा जैन की ‘माँ की खुशी’ भी संग्रह को विविध अनुभवों से समृद्ध करती हैं।
इसी संग्रह में मेरी लघुकथा ‘पूर्व जन्म के पाप’ भी शामिल है, जो कर्मफल और आस्था से जुड़े पारंपरिक विश्वासों के बीच छिपे सामाजिक प्रश्नों को उजागर करने का प्रयास करती है। लघुकथा पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि मनुष्य अपने वर्तमान जीवन की विसंगतियों को अक्सर ‘पूर्व जन्म के पाप’ जैसी धारणाओं से ढंकने का प्रयास करते हुए कब ठगी का शिकार हो जाता है उसे तनिक पता ही नहीं चलता।
इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कुंभ को केवल धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के अनुभवों के रूप में देखा गया है। कहीं करुणा है, कहीं विडंबना, कहीं विश्वास है तो कहीं तीखा व्यंग्य भी। लघुकथा की संक्षिप्तता यहाँ उसकी शक्ति बनकर उभरती है और पाठक को सोचने के लिए बाध्य करती है।
भाषा सरल और सहज है, जिससे विविध रचनाकारों की रचनाएँ पाठक के मन तक आसानी से पहुँचती हैं। संपादन की सजगता के कारण संग्रह में वैचारिक एकसूत्रता भी बनी रहती है।
समग्रतः पावन तट पर आस्था और विवेक के बीच संतुलन साधने वाला एक महत्वपूर्ण लघुकथा-संग्रह है। यह पुस्तक केवल कुंभ के धार्मिक पक्ष का वर्णन नहीं करती, बल्कि उसके बहाने समाज की मानसिकता, मानवीय संवेदना और सामाजिक यथार्थ को भी सामने लाती है। इस दृष्टि से सुरेश सौरभ के संपादन में प्रकाशित यह संग्रह हिंदी लघुकथा-साहित्य के क्षेत्र में एक विचारोत्तेजक और सार्थक संग्रणीय योगदान कहा जा सकता है।
–रमाकान्त चौधरी
गोला गोकर्णनाथ, लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश।
मो. 9415881883
रविवार, 18 जनवरी 2026
लघुकथा समीक्षा | पुस्तक: नई सदी की धमक | समीक्षक: डॉ. संध्या तिवारी
जनवरी 2018 में डॉ. संध्या तिवारी द्वारा की गई एक समीक्षा:
वैचारिकी-12
1-किताब - नई सदी की धमक
2-लघुकथा विचार - कड़ी - 12
3-लघुकथा संख्या - 22
4-लघुकथा - सोयी हुई सृष्टि
5-लघुकथाकार - चन्द्रेश कुमार छतलानी
"सोयी हुई सृष्टि" लघुकथा पढ़ कर जो सबसे पहला विचार मेरे मन में आया वह था , "ताओ" पंथ के संत 'च्वांगत्सू' की 'तितली' की कहानी ।
कथा कुछ यूं है -- कि एक सुबह 'च्वांगत्सू' जागे। वे बड़े परेशान लग रहे थे। उन्हें चाय देने आए शिष्यों ने गुरुवर को परेशान देखा तो कारण पूछा। 'च्वांगत्सू' ने कहा, मैं इसलिए चिंतित हूं, क्योंकि कल रात मैंने एक सपना देखा। सपने में मैंने देखा कि मैं एक तितली हूं। शिष्यों ने कहा, इसमें चिंतित होने वाली क्या बात है। सपना ही तो था। 'च्वांगत्सू' ने कहा, नहीं, लेकिन बात ये है कि जब मैं स्वप्न में तितली था, तब मुझे इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। अभी जागने पर मुझे याद आया है कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं वास्तव में एक तितली हूं, जो कि अभी यह स्वप्न देख रही है कि वह "च्वांगत्सू" है और जागने पर वह पाए कि वह तो वास्तव में एक तितली है।
जाग्रति और स्वप्न मनुष्य का सबसे बड़ा कौतूहल रहा है।
'सोयी हुयी सृष्टि' का नायक भी खुद को सोया हुआ देख रहा है 'च्वांगत्सू' की तितली के नाईं ।'च्वांगत्सू' जागने पर चिंतित होता है और अपने शिष्यों को अपनी चिंता से अवगत कराता है कि वह वास्तव में तितली तो नहीं।
कथानायक कथा में पहले सोया हुआ अर्थात अचेतन मन का प्रतीक है फिर नेता का प्रतीक है तदोपरान्त आम आदमी का प्रतीक है ।
परन्तु जागने पर जिस प्रकार कथा नायक परिचयपत्र में अपने पिता का नाम देख निश्चिन्त हो जाता है वैसा संत च्वांगत्सू नहीं कर पाते क्योंकि उनकी उलझन आध्यात्मिक स्तर की है और कथा नायक की भौतिक।
फिर भी कथा का स्वप्न से साम्य तो है ही।
प्रस्तुत कथा में भी ऐसा ही साहचर्य देखने को मिलता है ।
हालांकि इस कथा में सोना मात्र 'प्रतीक' है तमोगुण का ।जो कि हम भारत वासियों की मानसिकता की निशानी है।
फिर चाहे 'स्वामी विवेकानन्द' जी जगायें या 'भारतेन्दु हरिश्चन्द '।
प्रतीकों और बिम्बों के आधार पर बुना कथा का फलक बहुत विस्तृत है।
करोड़ो लोगो से ज्यादा सोये होना मने हम मनुष्यों में जागरूकता का अभाव होना ।
खादी के कपड़े पहने लोगों के मुंह से कुछ आवाजें और धुआं निकलता मने मुट्ठी भर लोगों का आम जनता का शोषण ।
स्वयं कथा नायक का स्वपन में ही जाग जाना और शोषकवर्ग में शामिल हो जाना ।
तभी उसका स्वप्न टूट जाना और परिचय पत्र पर पिता का नाम देखना यहां परिचय पत्र पर पिता का नाम देखने से एक अर्थ
(जो कि समष्टिगत है) यह भी निकलता है कि वह खुद को भारत देश के रूप में देख रहा और पिता के रूप में बापू को ।
दूसरा अर्थ (जो कि व्यष्टिगत है) यह है कि वह एक आम नागरिक है और उसके पिता के नाम से वह जाना जा रहा है ।
प्रथमदृष्टया यह कथा 'ख़लील ज़िब्रान' की कथाओं की सी झलक लिये हुये प्रतीत होती है
'चन्द्रेशकुमार छतलानी जी ' ने लघुकथाओं में अपनी एक शैली विकसित की है।
कलात्मक रूप से उच्चकोटि की रचना है ।
कथानक ,शिल्प, शैली, शीर्षक आदि सभी मानकानुसार ।
कथाकार को बधाई ।
- डाॅ संध्या तिवारी
पीलीभीत
सोमवार, 29 दिसंबर 2025
2025 की श्रेष्ठ लघुकथा
आदरणीय लघुकथाकार महोदय/महोदया,
हिंदी लघुकथा के समकालीन परिदृश्य को रेखांकित करने के उद्देश्य से वर्ष 2025 में आप द्वारा लिखित और स्व-चयनित श्रेष्ठ लघुकथाओं को लघुकथा-दुनिया ब्लॉग पर संकलित किये जाने का विचार है।
इस संकलन की विशिष्टता यह होगी कि इसमें सम्मिलित लघुकथाएँ आप द्वारा स्वयं चयनित होंगी, अर्थात् आप अपनी दृष्टि में वर्ष 2025 की अपनी सर्वश्रेष्ठ लघुकथा इस हेतु भेज सकेंगे।
इससे यह संग्रह रचनात्मक आत्ममूल्यांकन और समकालीन संवेदना का प्रमाणिक दस्तावेज बनेगा।
आपसे विनम्र अनुरोध है कि:
- वर्ष 2025 में लिखित (प्रकाशित/अप्रकाशित) आपके अनुसार अपनी श्रेष्ठ लघुकथा
- संक्षिप्त रचनात्मक परिचय
- संपर्क विवरण
https://forms.gle/
गूगल फॉर्म के अतिरिक्त अन्य माध्यम से ना भेजें।
आपका सहयोग इस संकलन को सार्थक, प्रतिनिधि और स्मरणीय बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। आशा है आप इस साहित्यिक प्रयास का हिस्सा बनकर हिंदी लघुकथा को और समृद्ध करेंगे।
(इस हेतु अन्य कोई शुल्क नहीं है। आपका रचनात्मक साहित्यिक योगदान स्वयं में अमूल्य है।)
सादर
टीम लघुकथा दुनिया
रविवार, 14 दिसंबर 2025
पुस्तक समीक्षा । पावन तट पर: आस्था और विसंगति का द्वंद्व । देवेन्द्रराज सुथार
सुरेश सौरभ द्वारा संपादित 'पावन तट पर' साझा लघुकथा संग्रह आस्था और अंधविश्वास के मध्य विद्यमान सूक्ष्म विभाजक रेखा का अन्वेषण करता है। महाकुंभ 2025 को केंद्रबिंदु बनाकर देशभर के 41 लघुकथाकारों की रचनाएँ इस संकलन में समाहित हैं, जो धार्मिक आयोजनों की विसंगतियों और विद्रूपताओं को बेबाक शिल्प में प्रस्तुत करती हैं।
संपादक का दृष्टिकोण निर्भीक और निष्पक्ष है। वे मानवीय मूल्यों को धार्मिक आडंबर से सर्वोपरि स्थान देते हैं। रश्मि 'लहर' की 'सेवा' में सास द्वारा भगदड़ में बहू के जीवन-रक्षण का प्रयास, प्रो. रणजोध सिंह की 'लिविंग गॉड' में माता-पिता की सेवा-शुश्रूषा को प्रकृति प्रदत्त तीर्थ मानना, और सुरेश सौरभ की लघुकथा 'साये में पुण्य' आदि लघुकथाओं में गंगा-जमुनी तहज़ीब की सुगंध परिलक्षित होती हैं। संग्रह समस्त रचनाएँ मानवता को परम धर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करती हैं।
संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता इसकी साहसिकता और सामाजिक यथार्थ के प्रति प्रतिबद्धता है। डॉ. रशीद गौरी की 'निपटारा' में बहू द्वारा वृद्ध ससुर को कुंभ में परित्यक्त करने की कुत्सित योजना, चित्रगुप्त की 'बंद दरवाजे की चीख' में वृद्ध माता को कक्ष में बंद कर कुंभ-गमन का निर्मम निर्णय, और अरविंद असर की 'मुफ्त का पुण्य' में सरकारी आँकड़ों पर तीक्ष्ण व्यंग्य-यह सब रचनाएँ समकालीन समाज के कटु और वीभत्स सत्य को निर्ममता से उद्घाटित करती हैं।
अनेक कथाएँ भगदड़ की त्रासदी और उसकी मार्मिक परिणतियों को केंद्र में स्थापित करती हैं। गुलज़ार हुसैन की 'भगदड़ में माँ', मार्टिन जॉन की 'पापमुक्ति' और चित्तरंजन गोप की दोनों लघुकथाएँ कुंभ की भयावहता तथा अराजकता का मर्मस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करती हैं। राजेंद्र वर्मा की 'पुण्य' में पति द्वारा रुग्ण पत्नी को परित्यक्त न करने का निर्णय वास्तविक धर्म-पालन का श्रेष्ठ उदाहरण है।
कतिपय रचनाएँ आधुनिक तकनीकों के दुरुपयोग पर भी कठोर प्रहार करती हैं। चित्रगुप्त की 'पावन तट पर' में स्नानरत महिलाओं के अश्लील वीडियो निर्माण की घृणित घटना समकालीन युग की नैतिक विकृति और पतन को रेखांकित करती है।
संपादन अत्यंत कुशल और संतुलित है। प्रत्येक रचना स्वतंत्र इकाई के रूप में पूर्ण और प्रभावोत्पादक है। भाषा सहज, प्रवाहमय और संप्रेषणीय है, जो पाठक को सतत आबद्ध रखती है। विविध भौगोलिक क्षेत्रों से आगत रचनाकारों की उपस्थिति संग्रह को राष्ट्रीय व्यापकता और बहुआयामी दृष्टि प्रदान करती है।
सूर्यदीप कुशवाहा की 'पुण्य फल' और 'सच्चा पुण्य' दोनों कथाएँ मानवीय करुणा को धार्मिक कर्मकांड से श्रेष्ठ सिद्ध करती हैं। डॉ. पूरन सिंह की 'ये माँ ही हो सकती हैं' में मातृत्व की महत्ता, और सेवा सदन प्रसाद की 'अनुतप्त' में पश्चाताप का भाव-ये रचनाएँ गहन मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदर्शित करती हैं।
डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की 'कुंभी पाप' में गरिमा-भंग की घटना, और नीना मंदिलवार की 'विलुप्त' में भगदड़ के पश्चात् आस्था का विलोपन - ये रचनाएँ धार्मिक आयोजनों की कुरूपता को उजागर करती हैं। हरीश कुमार 'अमित' की दोनों लघुकथाएँ सच्चे पुण्य की पुनर्व्याख्या प्रस्तुत करती हैं।
'पावन तट पर' केवल धार्मिक पाखंड और कर्मकांडों पर प्रहार नहीं करता, अपितु मानवीय संवेदनाओं को जागृत करने का सार्थक प्रयास है। यह संग्रह उन समस्त पाठकों और चिंतकों के लिए अनिवार्य है जो अंधविश्वास और आस्था, धर्म और धार्मिकता के मध्य विद्यमान सूक्ष्म भेद को समझना चाहते हैं।
संग्रह की सर्वाधिक सशक्त पक्ष यह है कि यह धर्म का विरोध नहीं करता, वरन् धर्म के नाम पर होने वाले शोषण, आडंबर और अमानवीयता का तीव्र प्रतिरोध करता है। सुरेश सौरभ ने संपादक के रूप में विलक्षण सूझबूझ और साहित्यिक विवेक का परिचय दिया है।
यह एक प्रगतिशील, विचारोत्तेजक और सामाजिक चेतना से ओतप्रोत संकलन है जो समकालीन हिंदी लघुकथा साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान के रूप में स्थापित होने की पूर्ण क्षमता रखता है। इस संग्रह का प्रत्येक पृष्ठ मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का आह्वान करता है।
पुस्तक- पावन तट पर ( कुंभ स्नान पर केंद्रित लघुकथाएं)
संपादक- सुरेश सौरभ
मूल्य-250
प्रकाशन वर्ष-2025
प्रकाशन- समृद्धि पब्लिकेशन नई दिल्ली
समीक्षक-देवेन्द्रराज सुथार
स्थानीय पता-गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025
मोबाइल नंबर-8107177196
संपादक परिचय:
नाम : सुरेश सौरभ
मूल नाम : सुरेश कुमार
माता : स्व. कमला देवी
पिता : स्व. केवल राम
शिक्षा : बीए (संस्कृत) बी. कॉम., एम. ए. (हिन्दी) यूजीसी-नेट (हिन्दी)
जन्म तिथि : 03 जून, 1979
प्रकाशन :
दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हरिभूमि, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, प्रभात ख़बर, सोच विचार, विभोम स्वर, कथाबिंब, पाखी, पंजाब केसरी, ट्रिब्यून सहित देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब पत्रिकाओं में सैकड़ों लघुकथाएँ, बाल कथाएँ, व्यंग्य-लेख, कविताएँ तथा समीक्षाएँ आदि प्रकाशित।
प्रकाशित पुस्तकें :
एक कवयित्री की प्रेमकथा (उपन्यास), नोटबंदी, तीस-पैंतीस, वर्चुअल रैली, बेरंग (लघुकथा-संग्रह), अमिताभ हमारे बाप (हास्य-व्यंग्य), नंदू सुधर गया, पक्की दोस्ती (बाल कहानी संग्रह), भीगते सावन (कहानी संग्रह)
संपादन :
100 कवि, 51 कवि, काव्य मंजरी, खीरी जनपद के कवि, तालाबंदी, इस दुनिया में तीसरी दुनिया, गुलाबी गलियां, पावन तट पर आदि
विशेष :
भारतीय साहित्य विश्वकोश में इकतालीस लघुकथाएँ शामिल। यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया में लघुकथाओं एवं हास्य-व्यंग्य लेखों की व्यापक चर्चा।
कुछ लघुकथाओं पर लघु फिल्मों का निर्माण। चौदह साल की उम्र से लेखन में सक्रिय। मंचों से रचनापाठ एवं आकाशवाणी लखनऊ से रचनापाठ।
कुछ लघुकथाओं का उड़िया, अंग्रेज़ी तथा पंजाबी आदि भाषाओं में अनुवाद।
सम्मान :
अन्तरराष्ट्रीय संस्था भाखा, भाऊराव देवरस सेवा न्यास द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर प्रताप नारायण मिश्र युवा सम्मान, हिन्दी साहित्य परिषद, सीतापुर द्वारा लक्ष्य लेखिनी सम्मान, लखीमपुर की सौजन्या, महादलित परिसंघ, कथादेश लघुकथा प्रतियोगिता में दो बार सम्मानित, परिवर्तन फाउंडेशन सहित कई प्रसिद्ध संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
सम्प्रति :
प्राइवेट महाविद्यालय में अध्यापन एवं स्वतंत्र लेखन।
सम्पर्क :
निर्मल नगर, लखीमपुर-खीरी (उत्तर प्रदेश)
पिन कोड- 262701
मोबाइल- 7860600355
ईमेल- sureshsaurabhlmp@gmail.com
रविवार, 30 नवंबर 2025
समकालीन हिंदी लघुकथा: जीवन की 'क्षणिका' और आधुनिक समाज का यथार्थ । चंद्रेश कुमार छ्तलानी
| विषय-वस्तु | विस्तार और प्रासंगिकता |
| किसान जीवन और कृषि संकट | वैश्वीकरण और पूँजीवादी प्रभाव के कारण किसानों की आत्महत्याएँ, कर्ज का जाल, और खेती का गैर-लाभकारी हो जाना—ये विषय लघुकथा में संवेदनात्मक धरातल पर उतरे हैं। कई लघुकथाएँ अन्नदाता के संघर्ष और उसकी बदहाल माली हालत को दर्शाती हैं। |
| पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन | आज लघुकथा बदलते मौसम, सूखे, बाढ़, और शहरों में प्रकृति के क्षरण को प्रमुखता से उठाती है। यह मानव और प्रकृति के बिगड़ते संबंध, अंधाधुंध विकास की कीमत और जल, जंगल, ज़मीन के विनाश पर तीखे सवाल करती है। |
| उपभोक्तावाद और लालच | बाज़ारवाद ने किस प्रकार मानवीय मूल्यों को बदलकर रख दिया है, इसका चित्रण लघुकथा में मिलता है। अत्यधिक लालच, भौतिक सुखों के लिए compromises, और "अधिक की चाहत" में सब कुछ खो देने की विडंबना को उजागर किया जाता है। |
| सांप्रदायिकता और हिंसा | समाज में पनप रही हिंसक प्रवृत्ति, कट्टरता, और साम्प्रदायिक दंगों की भयावहता भी समकालीन लघुकथा का गंभीर विषय बनी है। |
| पहचान का संकट और अस्तित्व | निम्न वर्ग द्वारा अन्याय का प्रतिकार, हाशिए पर धकेले गए लोगों की पीड़ा, और समाज में अपनी Identity बनाए रखने का संघर्ष भी लघुकथाओं में सामने आया है। |
| शिल्पगत विशेषता | प्रभाव और महत्ता |
| सांकेतिकता और सूक्ष्मता | लघुकथा अपने विशाल कथ्य को संकेतों और सूक्ष्म चित्रण के माध्यम से व्यक्त करती है। यहाँ सब कुछ स्पष्ट नहीं कहा जाता, बल्कि पाठक को सोचने और निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए छोड़ दिया जाता है। |
| तीखा व्यंग्य (Satire) | हरिशंकर परसाई की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, आधुनिक लघुकथाएँ दफ़्तरी जीवन की विसंगतियों से लेकर राजनीतिक अवसरवादिता पर तीखे कटाक्ष करती हैं। |
| विषय पर सीधा प्रहार | कहानी की तरह विस्तृत पृष्ठभूमि बाँधने के बजाय, लघुकथा सीधे विषय पर आती है, जिससे पाठक का attention span सिमटने के कारण प्रभाव गहरा और तत्काल होता है। |
| सरल, सहज भाषा | जन-मानस से संवाद स्थापित करने के लिए अक्सर सहज-सजग-रोचक भाषा का प्रयोग किया जाता है, जिससे यह विधा आम पाठकों तक आसानी से पहुँच पाती है और उन्हें व्यापक अनुभव-जगत् से साक्षात्कार कराती है। |
| तत्व | विवरण |
| कथ्य की नवीनता | विषय-वस्तु ताज़ा होनी चाहिए। यह जीवन के घिसे-पिटे पहलुओं से हटकर, किसी अनछुए अनुभव को छूए। |
| संक्षिप्तता | लघुकथा की अधिकतम शब्द-सीमा पर बहुत चर्चाएँ हुई हैं, और इस लेख के लिखे जाने तक विद्वान एकमत नहीं हैं, पर 300-500 शब्दों में कही गई लघुकथा का अच्छा प्रभाव माना जाता है। |
| क्षण की अभिव्यक्ति | यह पूरे जीवन-चरित्र का नहीं, बल्कि जीवन के किसी एक महत्वपूर्ण क्षण या मनोदशा का चित्रण करती है। पात्र कम और उनका चित्रण सांकेतिक हो तो बेहतर। |
| प्रभावी शुरुआत | पाठक को तुरंत रचना से जोड़ने के लिए पहली एक-दो पंक्तियाँ आकर्षक होनी चाहिए। हालाँकि लघुकथा सीधे विषय पर आनी चाहिए। |
| अंतिम प्रभाव (पंच) | अंत अपेक्षित नहीं, बल्कि अप्रत्याशित हो तो यह पाठक के मन में एक गहरा विचार या एक टीस छोड़कर जाता है। |
25 वर्षों से अधिक के प्रशिक्षण, अनुसंधान, अकादमिक कार्य, लेखन, सॉफ्टवेयर और वेबसाइट विकास के गहन अनुभव के साथ, डॉ. चन्द्रेश कुमार छतलानी ने अब तक 150 से अधिक सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन और वेबसाइटें स्वयं निर्मित की हैं। वे तीन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं - वर्ल्ड बुक रिकॉर्ड (श्रीलंका), ट्रिब्यून इंटरनेशनल वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, और वर्ल्ड्स ग्रेटेस्ट रिकॉर्ड्स - द्वारा सर्वाधिक शैक्षणिक प्रमाणपत्र अर्जित करने का विश्व रिकॉर्ड रखते हैं। इसके अतिरिक्त, उनकी अंग्रेज़ी लघुकथाओं की पुस्तक को भी तीन संगठनों ने रिकॉर्ड के लिए चयनित किया है। उन्हें एक वर्ष में स्कूल-विद्यार्थियों के लिए 50 से अधिक गेम्स सॉफ्टवेयार बनाने का रिकॉर्ड भी प्राप्त है। उन्होंने Microsoft, Amity, Cisco, Google, IEEE, DIKSHA, WHO तथा अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से 1,000 से अधिक प्रमाणपत्र प्राप्त किए हैं। डॉ. चन्द्रेश अब तक 17 पुस्तकों के लेखक, 10 मोनोग्राफ के रचनाकार, 10 पुस्तकों के संपादक, और 43 से अधिक शोध-पत्रों के लेखक हैं। उन्हें 50 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. छतलानी एक बहुमुखी साहित्यकार भी हैं और लघुकथाएँ, कहानियाँ, लेख तथा कविताएँ लिखते हैं।





