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शुक्रवार, 20 मार्च 2026

पुस्तक समीक्षा । आस्था के पार विवेक की तलाश - पावन तट पर। रमाकांत चौधरी

कुंभ जैसे विराट धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन पर लिखना जितना आकर्षक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। यहाँ आस्था, परंपरा, सामाजिक यथार्थ और मानवीय भावनाएँ एक साथ उपस्थित रहती हैं। ऐसे विषय को साहित्यिक दृष्टि से समेटना सहज नहीं होता। 'पावन तट पर' नामक यह साझा लघुकथा-संग्रह इस चुनौती को स्वीकार करता है और कुंभ के बहाने आस्था, विवेक और सामाजिक यथार्थ के अनेक आयामों को सामने लाता है। संग्रह के संपादक सुरेश सौरभ स्पष्ट सामाजिक दृष्टि रखने वाले रचनाकार के रूप में दिखाई देते हैं। वह अपनी भूमिका में स्वामी विवेकानंद के ‘नर सेवा नारायण सेवा’ के विचार का उल्लेख करते हुए, साहित्यकार के नैतिक दायित्व, निष्पक्ष दृष्टि और मानवीय सरोकारों की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनके अनुसार साहित्य का काम किसी पंथ, जाति या विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ पक्ष को ईमानदारी से सामने लाना भी है। यही कारण है कि यह संग्रह आस्था का अंधानुकरण नहीं करता, बल्कि उसे विवेकपूर्ण प्रश्नों के साथ प्रस्तुत करता है।

संग्रह में अनेक लघुकथाकारों की रचनाएँ शामिल हैं, जो कुंभ के विविध अनुभवों और भावनात्मक स्थितियों को अभिव्यक्त करती हैं। रश्मि ‘लहर’ की ‘सेवा’, सूर्यदीप कुशवाहा की ‘पुण्य फल’ और ‘सच्चा पुण्य’, डॉ. रशीद गौरी की ‘निपटारा’, डॉ. पूरन सिंह की ‘ये माँ ही हो सकती हैं’, डॉ. अंजु दुआ जैमिनी की ‘मोक्ष बनाम मुक्ति’, सरोज बाला सोनी की ‘कल्पवास’ और मिन्नी मिश्रा की ‘पिता का कुंभ स्नान’ जैसी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक भावनाओं को स्पर्श करती हैं। वहीं प्रो. रणजोध सिंह की ‘लिविंग गॉड’ और राजेन्द्र वर्मा की ‘पुण्य’ आस्था और सामाजिक मानसिकता के गहरे पहलुओं को उजागर करती हैं। इसी क्रम में अभय कुमार भारती की ‘व्रत’, शोभा गोयल की ‘रिफंड’, देवेंद्रराज सुथार की ‘सोच का स्नान’, नृपेंद्र अभिषेक नृप की ‘मोक्ष की एक डुबकी’, नीना मंदिलवार की ‘विलुप्त’ और हरीश कुमार ‘अमित’ की ‘कुंभ स्नान’ तथा ‘पुण्य’ कुंभ के सामाजिक यथार्थ और मानवीय मनोविज्ञान को उभारती हैं।

चित्रगुप्त की ‘पावन तट पर’ और ‘बंद दरवाजे की चीख’, डॉ. रामकुमार घोटड़ की ‘मुक्ति-पथ’ तथा ‘पितृहीन साया’, मार्टिन जॉन की ‘पापमुक्ति’, रंजना जायसवाल की ‘डुबकी’, डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की ‘कुंभी पाप’ और अरविन्द असर की ‘मुफ्त का पुण्य’ आस्था के भीतर छिपी विडंबनाओं और सामाजिक विसंगतियों को उजागर करती हैं।

इसी प्रकार ट्विंकल तोमर सिंह की ‘भंडारे की आग’, गुलजार हुसैन की ‘भगदड़ में माँ’, सेवा सदन प्रसाद की ‘अनुतृप्त’, चित्तरंजन गोप ‘लुकाठी’ की ‘महाकुंभ की अमृत बूंदें’ (एक) और (दो), डॉ. उपमा शर्मा की ‘पूजा’, डॉ. यशोधरा भटनागर की ‘विरासत की डोरी’ तथा नमिता सिंह ‘आराधना’ की ‘गंगा मैया से पैरवी’ कुंभ के सामाजिक और भावनात्मक पक्षों को पछोर-पछोर कर सामने लाती हैं।

संपादक सुरेश सौरभ की ‘ज़ख्म’ और ‘साये में पुण्य’ लघुकथाएं इस संग्रह में शामिल हैं, जो संग्रह की वैचारिक दिशा को और विराटता से स्पष्ट करती हैं। पूनम ‘कतरियार’ की ‘मुक्ति गाथा’, सुनीता मिश्रा की ‘शेष उम्र की धूप’, डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ की ‘वह देशद्रोही है’ और ‘सुकून’, डॉ. नीरू मित्तल ‘नीर’ की ‘कुम्भ में मौन डुबकी’, मनोरमा पंत की ‘मुक्ति की खुशी’, आलोक चोपड़ा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुरेश वशिष्ठ की ‘औलाद वाले’, निर्मल कुमार डे की ‘पुण्य-लाभ’, मानवीन कौर पाहवा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुषमा गुप्ता की ‘आस्था का सैलाब’ तथा मीरा जैन की ‘माँ की खुशी’ भी संग्रह को विविध अनुभवों से समृद्ध करती हैं।

इसी संग्रह में मेरी लघुकथा ‘पूर्व जन्म के पाप’ भी शामिल है, जो कर्मफल और आस्था से जुड़े पारंपरिक विश्वासों के बीच छिपे सामाजिक प्रश्नों को उजागर करने का प्रयास करती है। लघुकथा पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि मनुष्य अपने वर्तमान जीवन की विसंगतियों को अक्सर ‘पूर्व जन्म के पाप’ जैसी धारणाओं से ढंकने का प्रयास करते हुए कब ठगी का शिकार हो जाता है उसे तनिक पता ही नहीं चलता। 

इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कुंभ को केवल धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के अनुभवों के रूप में देखा गया है। कहीं करुणा है, कहीं विडंबना, कहीं विश्वास है तो कहीं तीखा व्यंग्य भी। लघुकथा की संक्षिप्तता यहाँ उसकी शक्ति बनकर उभरती है और पाठक को सोचने के लिए बाध्य करती है।

भाषा सरल और सहज है, जिससे विविध रचनाकारों की रचनाएँ पाठक के मन तक आसानी से पहुँचती हैं। संपादन की सजगता के कारण संग्रह में वैचारिक एकसूत्रता भी बनी रहती है।

समग्रतः पावन तट पर आस्था और विवेक के बीच संतुलन साधने वाला एक महत्वपूर्ण लघुकथा-संग्रह है। यह पुस्तक केवल कुंभ के धार्मिक पक्ष का वर्णन नहीं करती, बल्कि उसके बहाने समाज की मानसिकता, मानवीय संवेदना और सामाजिक यथार्थ को भी सामने लाती है। इस दृष्टि से सुरेश सौरभ के संपादन में प्रकाशित यह संग्रह हिंदी लघुकथा-साहित्य के क्षेत्र में एक विचारोत्तेजक और सार्थक संग्रणीय योगदान कहा जा सकता है।

–रमाकान्त चौधरी 

गोला गोकर्णनाथ, लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश। 

मो. 9415881883


रविवार, 18 जनवरी 2026

लघुकथा समीक्षा | पुस्तक: नई सदी की धमक | समीक्षक: डॉ. संध्या तिवारी

जनवरी 2018 में डॉ. संध्या तिवारी द्वारा की गई एक समीक्षा:

 वैचारिकी-12

1-किताब           -     नई सदी की धमक 

2-लघुकथा विचार -   कड़ी - 12

3-लघुकथा संख्या -    22

4-लघुकथा            -   सोयी हुई सृष्टि

5-लघुकथाकार       -  चन्द्रेश कुमार छतलानी 

               "सोयी हुई सृष्टि" लघुकथा पढ़ कर जो सबसे पहला विचार मेरे मन में आया वह था , "ताओ" पंथ के संत 'च्वांगत्सू'  की 'तितली' की कहानी ।

 कथा कुछ यूं है --   कि एक सुबह 'च्वांगत्सू' जागे। वे बड़े परेशान लग रहे थे। उन्हें चाय देने आए शिष्यों ने गुरुवर को परेशान देखा तो कारण पूछा। 'च्वांगत्सू' ने कहा, मैं इसलिए चिंतित हूं, क्योंकि कल रात मैंने एक सपना देखा। सपने में मैंने देखा कि मैं एक तितली हूं। शिष्यों ने कहा, इसमें चिंतित होने वाली क्या बात है। सपना ही तो था। 'च्वांगत्सू' ने कहा, नहीं, लेकिन बात ये है कि जब मैं स्वप्न में तितली था, तब मुझे इस बात का तनिक भी भान नहीं था कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। अभी जागने पर मुझे याद आया है कि मैं 'च्वांगत्सू' हूं। तो कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं वास्तव में एक तितली हूं, जो कि अभी यह स्वप्न देख रही है कि वह "च्वांगत्सू" है और जागने पर वह पाए कि वह तो वास्तव में एक तितली है।

जाग्रति और स्वप्न  मनुष्य का सबसे बड़ा कौतूहल रहा है। 

'सोयी हुयी सृष्टि' का नायक भी खुद को सोया हुआ देख रहा है 'च्वांगत्सू' की तितली के नाईं ।'च्वांगत्सू' जागने पर चिंतित होता है और अपने शिष्यों को अपनी चिंता से अवगत कराता है कि वह वास्तव में तितली तो नहीं। 

 कथानायक कथा में पहले सोया हुआ अर्थात अचेतन मन का प्रतीक है फिर नेता का प्रतीक है तदोपरान्त आम आदमी का प्रतीक है ।

परन्तु जागने पर जिस प्रकार कथा नायक परिचयपत्र में अपने पिता का नाम देख निश्चिन्त हो जाता है वैसा संत च्वांगत्सू नहीं कर पाते क्योंकि उनकी उलझन आध्यात्मिक स्तर की है और कथा नायक की भौतिक।

फिर भी कथा का स्वप्न से साम्य तो है ही। 

प्रस्तुत कथा में भी ऐसा ही साहचर्य देखने को मिलता है ।

हालांकि इस कथा में सोना मात्र 'प्रतीक' है तमोगुण का ।जो कि हम भारत वासियों की मानसिकता की निशानी है।

 फिर चाहे 'स्वामी विवेकानन्द' जी जगायें या 'भारतेन्दु हरिश्चन्द '।

प्रतीकों और बिम्बों के आधार पर बुना कथा का फलक बहुत विस्तृत है।

करोड़ो लोगो से ज्यादा सोये होना मने हम मनुष्यों में जागरूकता का अभाव होना ।

खादी के कपड़े पहने लोगों के मुंह से कुछ आवाजें और धुआं निकलता मने मुट्ठी भर लोगों का आम जनता का शोषण ।

स्वयं कथा नायक का स्वपन में ही जाग जाना और शोषकवर्ग में शामिल हो जाना ।

तभी उसका स्वप्न टूट जाना और परिचय पत्र पर पिता का नाम देखना यहां परिचय पत्र पर पिता का नाम देखने से एक अर्थ 

(जो कि समष्टिगत है) यह भी निकलता है कि वह खुद को भारत देश के रूप में देख रहा और पिता के रूप में बापू को ।

दूसरा अर्थ (जो कि व्यष्टिगत है) यह है कि वह एक आम नागरिक है और उसके पिता के नाम से वह जाना जा रहा है ।

प्रथमदृष्टया यह कथा 'ख़लील ज़िब्रान' की कथाओं की सी झलक लिये हुये प्रतीत होती है 

'चन्द्रेशकुमार छतलानी जी ' ने लघुकथाओं में अपनी एक शैली विकसित की है।

कलात्मक रूप से उच्चकोटि की रचना है ।

कथानक ,शिल्प, शैली, शीर्षक आदि सभी मानकानुसार ।

कथाकार को बधाई ।

- डाॅ संध्या तिवारी 

पीलीभीत