कुंभ जैसे विराट धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन पर लिखना जितना आकर्षक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। यहाँ आस्था, परंपरा, सामाजिक यथार्थ और मानवीय भावनाएँ एक साथ उपस्थित रहती हैं। ऐसे विषय को साहित्यिक दृष्टि से समेटना सहज नहीं होता। 'पावन तट पर' नामक यह साझा लघुकथा-संग्रह इस चुनौती को स्वीकार करता है और कुंभ के बहाने आस्था, विवेक और सामाजिक यथार्थ के अनेक आयामों को सामने लाता है। संग्रह के संपादक सुरेश सौरभ स्पष्ट सामाजिक दृष्टि रखने वाले रचनाकार के रूप में दिखाई देते हैं। वह अपनी भूमिका में स्वामी विवेकानंद के ‘नर सेवा नारायण सेवा’ के विचार का उल्लेख करते हुए, साहित्यकार के नैतिक दायित्व, निष्पक्ष दृष्टि और मानवीय सरोकारों की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनके अनुसार साहित्य का काम किसी पंथ, जाति या विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ पक्ष को ईमानदारी से सामने लाना भी है। यही कारण है कि यह संग्रह आस्था का अंधानुकरण नहीं करता, बल्कि उसे विवेकपूर्ण प्रश्नों के साथ प्रस्तुत करता है।
संग्रह में अनेक लघुकथाकारों की रचनाएँ शामिल हैं, जो कुंभ के विविध अनुभवों और भावनात्मक स्थितियों को अभिव्यक्त करती हैं। रश्मि ‘लहर’ की ‘सेवा’, सूर्यदीप कुशवाहा की ‘पुण्य फल’ और ‘सच्चा पुण्य’, डॉ. रशीद गौरी की ‘निपटारा’, डॉ. पूरन सिंह की ‘ये माँ ही हो सकती हैं’, डॉ. अंजु दुआ जैमिनी की ‘मोक्ष बनाम मुक्ति’, सरोज बाला सोनी की ‘कल्पवास’ और मिन्नी मिश्रा की ‘पिता का कुंभ स्नान’ जैसी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक भावनाओं को स्पर्श करती हैं। वहीं प्रो. रणजोध सिंह की ‘लिविंग गॉड’ और राजेन्द्र वर्मा की ‘पुण्य’ आस्था और सामाजिक मानसिकता के गहरे पहलुओं को उजागर करती हैं। इसी क्रम में अभय कुमार भारती की ‘व्रत’, शोभा गोयल की ‘रिफंड’, देवेंद्रराज सुथार की ‘सोच का स्नान’, नृपेंद्र अभिषेक नृप की ‘मोक्ष की एक डुबकी’, नीना मंदिलवार की ‘विलुप्त’ और हरीश कुमार ‘अमित’ की ‘कुंभ स्नान’ तथा ‘पुण्य’ कुंभ के सामाजिक यथार्थ और मानवीय मनोविज्ञान को उभारती हैं।
चित्रगुप्त की ‘पावन तट पर’ और ‘बंद दरवाजे की चीख’, डॉ. रामकुमार घोटड़ की ‘मुक्ति-पथ’ तथा ‘पितृहीन साया’, मार्टिन जॉन की ‘पापमुक्ति’, रंजना जायसवाल की ‘डुबकी’, डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की ‘कुंभी पाप’ और अरविन्द असर की ‘मुफ्त का पुण्य’ आस्था के भीतर छिपी विडंबनाओं और सामाजिक विसंगतियों को उजागर करती हैं।
इसी प्रकार ट्विंकल तोमर सिंह की ‘भंडारे की आग’, गुलजार हुसैन की ‘भगदड़ में माँ’, सेवा सदन प्रसाद की ‘अनुतृप्त’, चित्तरंजन गोप ‘लुकाठी’ की ‘महाकुंभ की अमृत बूंदें’ (एक) और (दो), डॉ. उपमा शर्मा की ‘पूजा’, डॉ. यशोधरा भटनागर की ‘विरासत की डोरी’ तथा नमिता सिंह ‘आराधना’ की ‘गंगा मैया से पैरवी’ कुंभ के सामाजिक और भावनात्मक पक्षों को पछोर-पछोर कर सामने लाती हैं।
संपादक सुरेश सौरभ की ‘ज़ख्म’ और ‘साये में पुण्य’ लघुकथाएं इस संग्रह में शामिल हैं, जो संग्रह की वैचारिक दिशा को और विराटता से स्पष्ट करती हैं। पूनम ‘कतरियार’ की ‘मुक्ति गाथा’, सुनीता मिश्रा की ‘शेष उम्र की धूप’, डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ की ‘वह देशद्रोही है’ और ‘सुकून’, डॉ. नीरू मित्तल ‘नीर’ की ‘कुम्भ में मौन डुबकी’, मनोरमा पंत की ‘मुक्ति की खुशी’, आलोक चोपड़ा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुरेश वशिष्ठ की ‘औलाद वाले’, निर्मल कुमार डे की ‘पुण्य-लाभ’, मानवीन कौर पाहवा की ‘मोक्ष’, डॉ. सुषमा गुप्ता की ‘आस्था का सैलाब’ तथा मीरा जैन की ‘माँ की खुशी’ भी संग्रह को विविध अनुभवों से समृद्ध करती हैं।
इसी संग्रह में मेरी लघुकथा ‘पूर्व जन्म के पाप’ भी शामिल है, जो कर्मफल और आस्था से जुड़े पारंपरिक विश्वासों के बीच छिपे सामाजिक प्रश्नों को उजागर करने का प्रयास करती है। लघुकथा पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि मनुष्य अपने वर्तमान जीवन की विसंगतियों को अक्सर ‘पूर्व जन्म के पाप’ जैसी धारणाओं से ढंकने का प्रयास करते हुए कब ठगी का शिकार हो जाता है उसे तनिक पता ही नहीं चलता।
इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कुंभ को केवल धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के अनुभवों के रूप में देखा गया है। कहीं करुणा है, कहीं विडंबना, कहीं विश्वास है तो कहीं तीखा व्यंग्य भी। लघुकथा की संक्षिप्तता यहाँ उसकी शक्ति बनकर उभरती है और पाठक को सोचने के लिए बाध्य करती है।
भाषा सरल और सहज है, जिससे विविध रचनाकारों की रचनाएँ पाठक के मन तक आसानी से पहुँचती हैं। संपादन की सजगता के कारण संग्रह में वैचारिक एकसूत्रता भी बनी रहती है।
समग्रतः पावन तट पर आस्था और विवेक के बीच संतुलन साधने वाला एक महत्वपूर्ण लघुकथा-संग्रह है। यह पुस्तक केवल कुंभ के धार्मिक पक्ष का वर्णन नहीं करती, बल्कि उसके बहाने समाज की मानसिकता, मानवीय संवेदना और सामाजिक यथार्थ को भी सामने लाती है। इस दृष्टि से सुरेश सौरभ के संपादन में प्रकाशित यह संग्रह हिंदी लघुकथा-साहित्य के क्षेत्र में एक विचारोत्तेजक और सार्थक संग्रणीय योगदान कहा जा सकता है।
–रमाकान्त चौधरी
गोला गोकर्णनाथ, लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश।
मो. 9415881883

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें