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शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

लघुकथा एक ऐसा लाइट हाउस है जो पूरे साहित्य को दिशा प्रदान करता है। | लघुकथा समाचार

पत्रिका समाचार  21 फरवरी 2020

दिल्ली से आए लघुकथाकार बलराम अग्रवाल ने कहा, हम वृद्ध आश्रम की बात करके युवा पीढ़ी को क्या बताना चाहते हैंं? क्या हमारे घर से कोई वृद्ध आश्रम गया है? जब हम अपने अनुभवों को कल्पना के आधार पर ही लिखेंगे तो वह बात गहराई से लोगों तक नहीं पहुंचेगी।


रायपुर द्य फाफाडीह स्थित होटल में राष्ट्रीय लघुकथा का आयोजन किया गया। इसमें डॉ. बलराम अग्रवाल, सुभाष नीरव, गिरीश पंकज,डॉ राजेश श्रीवास्तव, डॉ सुधीर शर्मा, डॉ. मालती बसंत, जया केतकी, साकेत सुमन चतुर्वेदी शामिल हुए। 

संस्था की अध्यक्ष संतोष श्रीवास्तव ने लघुकथा में नारी अस्मिता को लेकर अपनी बात रखते हुए कहा, आज लघुकथा मांग करती है एक ऐसी शक्ति स्वरूपा नारी की जो अपनी अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा करती हुई शोषण की शक्तियों से मुठभेड़ करती नजर आए। दिल्ली से आए लघुकथाकार बलराम अग्रवाल ने कहा, हम वृद्ध आश्रम की बात करके युवा पीढ़ी को क्या बताना चाहते हैंं? क्या हमारे घर से कोई वृद्ध आश्रम गया है? जब हम अपने अनुभवों को कल्पना के आधार पर ही लिखेंगे तो वह बात गहराई से लोगों तक नहीं पहुंचेगी। उन्होंने कई लघुकथाओं के उदाहरण देते हुए नारी अस्मिता को लेकर लघुकथाएं लिखना मौजूदा समय की मांग बताया।विशिष्ट अतिथि गिरीश पंकज ने कहा कि लघुकथा एक ऐसा लाइट हाउस है जो पूरे साहित्य को दिशा प्रदान करता है मुख्य अतिथि सुभाष नीरव ने अपने वक्तव्य में लघुकथाओं में नारी अस्मिता को लेकर विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। संस्था की ओर से विभिन्न विधाओं पर पांच पुरस्कार प्रदान किए गए। 

राधा अवधेश स्मृति पुरस्कार-लक्ष्मी यादव, पुष्पा विश्वनाथ स्मृति पुरस्कार -अजय श्रीवास्तव अजेय,हेमंत स्मृति लघुकथा रत्न सम्मान-कांता राय, पांखुरी लांबा सक्सेना स्मृति पुरस्कार-साधना वैद, द्वारका प्रसाद स्मृति साहित्य गरिमा पुरस्कार-अलका अग्रवाल ममता अहार द्वारा शक्ति स्वरूपा नाटक का एकल मंचन के साथ ही 75 कवियों और लघुकथाकारों की कविता व लघुकथा की प्रस्तुति।तीन सत्रों में आयोजित कार्यक्रम का संचालन क्रमश: नीता श्रीवास्तव, रूपेंद्र राज तिवारी और वर्षा रावल ने किया।

Source:
https://www.patrika.com/raipur-news/el-cuento-es-un-faro-que-da-direccin-a-toda-la-literatura-5803798/

रविवार, 15 दिसंबर 2019

लघुकथा वीडियो : लाजवन्ती | लेखन: सुभाष नीरव | स्वर: अंजू खरबंदा

वरिष्ठ लघुकथाकार श्री सुभाष नीरव के विवाह की वर्षगाँठ के अवसर पर लघुकथाकारा अंजू खरबंदा जी द्वारा उनकी लघुकथा का वाचन 



बुधवार, 17 अप्रैल 2019

बारिश तथा अन्य लघुकथाएं (लघुकथा संग्रह) | सुभाष नीरव

● बारिश तथा अन्य लघुकथाएं 
(लघुकथा संग्रह) 
लेखक : सुभाष नीरव
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मूल्य : Rs. 195/- (पेपरबैक संस्करण)

ISBN : 978-93-88348-49-2

प्रकाशक : किताबगंज प्रकाशन
ICS (रेमंड शोरूम), नजदीक SBI बैंक
राधाकृष्ण मार्केट, गंगापुर सिटी-322201
जिला- सवाई माधोपुर (राजस्थान)
Phone : 8750660105
Email : kitabganj@gmail.com

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● इस नवीनतम मौलिक लघुकथा संग्रह "बारिश तथा अन्य लघुकथाएं" में सुप्रसिद्ध लघुकथाकार एवं पंजाबी साहित्य अनुवादक सुभाष नीरव जी ने मानव जीवन के रिश्ते और समाज को अपनी लघुकथाओं की मुख्य विषयवस्तु बनाया है । पंजाबी साहित्य के हिन्दी अनुवाद करने की अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद भी सिर्फ किताबगंज प्रकाशन के लिए उन्होंने विशेष रूप से यह मौलिक लघुकथा संग्रह तैयार किया है । लघुकथा के सुधी पाठकों के लिए यह एक जरूरी पुस्तक है। यह पुस्तक अब ऑनलाइन शापिंग प्लेटफॉर्म amazon.in पर बिक्री के लिए उपलब्ध है। जो भी पाठक इस किताब की डायरेक्ट बुकिंग कराना चाहते हैं वे हमें हमारे व्हाट्सअप नंबर # 8750660105 पर इनबॉक्स में संपर्क कर सकते हैं ●

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बुधवार, 16 जनवरी 2019

लघुकथा समाचार : मातृभारती.कॉम द्वारा आयोजित लघुकथा संकलन "स्वाभिमान" का लोकार्पण



मातृभारती.कॉम द्वारा आयोजित लघुकथा संकलन "स्वाभिमान" का  लोकार्पण

11 जनवरी 2019 को  मातृभारती.कॉम आयोजित राष्ट्रीय लघुकथा प्रतियोगिता में विजयी ५० श्रेष्ठ लघुकथाओं को पुस्तक स्वरूप देकर पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम रखा गया। लघुकथा संकलन का नाम स्वाभिमान दिया गया है और इसे प्रकाशित किया है वनिका पब्लिकेशन्स ने।

इस मौके पर देश के विभिन्न राज्यों से आए लघुकथाकारों ने अपनी अपनी लघुकथाओं का पाठ किया। कार्यक्रम में उपस्थित मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ कथाकार श्री सुभाष नीरव, वरिष्ठ लघुकथाकार व आलोचक श्री जितेंद्र जीतू और प्रकाशक श्रीमती नीरज सुधांशु। कार्यक्रम का सफल  संचालन किया कवयित्री व लेखिका श्रीमती नीलिमा शर्मा जी ने। कार्यक्रम की शुरूआत करते हुए मातृभारती.कॉम के फाउंडर श्री महेंद्र शर्मा जी ने उपस्थित महमानों का स्वागत किया और साथ ही लघुकथा लेखकों और लेखिकाओं का उत्साह बढ़ाया। साथ ही इस दिन यानी 11 जनवरी को प्रति वर्ष लघुकथा स्वाभिमान दिवस के तौर पर मनाने का प्रस्ताव भी रखा।

श्री सुभाष नीरव जी ने अपनी लघुकथा यात्रा के बारे में बताते हुए कहा कि इस विषय पर प्रतियोगिताओं का होना एक उत्तम कार्य है, प्रतियोगिताओं के माध्यम से ही श्रेष्ठ लेखकों को पाठकों के समक्ष लाया जा सकता है। साथ ही उन्होंने लघुकथा लेखकों व नवोदितों के लिए एक वर्कशॉप करने का प्रस्ताव भी रक्खा।

श्री जितेंद्र जीतू जी, जो इस प्रतियोगिता के निर्णायक भी रहे, उन्होंने अपने मन्तव्य प्रेक्षकों के समक्ष रक्खे। श्रेष्ठ लघुकथाओं का समीक्षात्मक मूल्याकन करके कथाएं क्यों सर्वश्रेष्ठ रही यह बताया ।

प्रतियोगिता में 5 सर्वश्रेष्ठ कथाओं को सम्मान दिया गया जिसमें
भगवान वैद्य
डॉ.आर बी भंडारकर
रत्न कुमार सांभरिया
प्रदीप मिश्र
शोभा रस्तोगी शामिल हैं।

श्रीमती नीरज सुधांशु ने अपनी प्रकाशक व निर्णायक की भूमिका के बारे में प्रेक्षकों को अवगत कराया व साथ ही प्रतियोगिता के विषय के अनुरूप लेखन को योग्य बताया। विषय व समय मर्यादा के साथ लिखकर ही लेखक एक उत्कृष्ट रचना का सर्जन कर सकता है।

कार्यक्रम के अंत मे श्री नीलिमा शर्मा जी ने सभी उपस्थित मेहमानों के प्रति आभार व्यक्त किया और महेंदर शर्मा जी ने भविष्य में इस प्रकार के कार्यक्रमों को करने का आश्वासन दिया |


Courtesy: thepurvai.com
URL: https://www.thepurvai.com/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%83%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%89%E0%A4%AE-%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A5%8B/

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

सुभाष नीरव जी की लघुकथा "तृप्ति" और मेरी जिज्ञासाएं

साहित्य की कोई भी विधा हो, रचनाकारों को लगातार अच्छी रचनाओं गहन अध्ययन करते रहना चाहिये, पढने ही से लेखन प्रगाढ़ होगा। वरिष्ठ रचनाकार, जो वर्षों से विधा की साधना कर रहे हैं, की रचनाओं में आपको उनके अनुभवों के शब्द, शिल्प और विभिन्न प्रयोग मिलेंगे। परन्तु कई बार हम उनकी रचनाओं की तह तक नहीं पहुँच पाते और तब यदि कोई वरिष्ठ रचनाकार अपने लेखन के अनुभव हमसे साझा कर लें तो निःसंदेह हमारा अध्ययन अधिक सबल हो जाता है।
कुछ दिनों पूर्व ही वरिष्ठ लघुकथाकार श्री सुभाष नीरव की एक नई लघुकथा "तृप्ति" को पढ़ने का अवसर मिला, आपकी रचनाएँ मुझे बहुत प्रभावित करती हैं, इसलिए ध्यान से पढने का प्रयास किया। तब दो प्रश्न विचलित करने लगे और दोनों प्रश्न मैनें सुभाष नीरव जी के समक्ष रख दिए, ताकि रचना का मर्म समझ सकूं। उन्होंने भी दोनों प्रश्नों के उत्तर देकर मुझे संतुष्ट किया। फिर एक विचार यह भी आया कि इन उत्तर रुपी सुभाष नीरव जी के अनुभवों को क्यों न आप सभी से भी साझा किया जाये, ताकि हम सभी लाभ उठा सकें। उनसे पूछा तो उन्होंने भी बड़ी उदारता के साथ इसकी अनुमति दे दी। सबसे पहले उनकी रचना पढिये और उसके बाद प्रश्न और उत्तर।

तृप्ति (सुभाष नीरव)

सुबह की सैर कर हरीलाल धीरे धीरे छड़ी के सहारे घर लौटे थे तो बेहद प्रसन्न थे, पर घर में बहू-बेटा और बच्चों के चेहरे तमतमाये मिले। वह बिना कुछ बोले अपने स्टोरनुमा छोटे-से कमरे में घुस गए और हाथ में पकड़ी छड़ी को दीवार के सहारे टिका अपने बैड पर बैठ गए। फिर उन्होंने पेट पर हाथ फेर एक लम्बी डकार ली। अमूमन वह आधे पौने घंटे में सैर करके लौट आते थे, आज उनकी सैर डेढ़-दो घंटे की हो गई थी।
पहले बेटा भन्नाया हुआ उनके कमरे में घुसा, “ये मैं क्या सुन रहा हूँ पिताजी?”
पीछे-पीछे बहू भी लाल-पीली हुई-सी कमरे के दरवाज़े पर आ खड़ी हुई, “पूरे मुहल्ले में चर्चा हो रही है… हम क्या आपको खाने को कुछ नहीं देते ?”
“क्या हो गया ? तुम दोनों इतना क्यों गरम हो रहे हो?” हरीलाल ने बैड पर बैठे-बैठे दोनों की तरफ़ नज़रें उठाकर पूछा।
“पड़ोसी रामकिशन आया था। बता रहा था कि रोहित के दादा मंदिर की सीढ़ियों पर…” बेटा कहते कहते रुक गया।
“शरम नहीं आई आपको, भिखारियों की पंगत में बैठकर श्राद्ध खाते रहे… अपनी नहीं तो हमारी इज्जत का ही ख्याल रखा होता ?” बहू की आवाज़ कुछ तीखी हो गई।
“मैं तो थोड़ा सुस्ताने को मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गया था… लोग खीर, पूरी, आलू की सब्जी… केले देते चले गए। मैं तो परसाद समझ स्वाद स्वाद में खाता रहा… मुझे तो पता ही नहीं चला कि मेरे इर्दगिर्द भिखारी बैठे थे या कोई और्… ।” हरीलाल ने मुस्कराकर जवाब दिया।
फिर, बहू-बेटा की ओर देख पेट पर हाथ फेरते हुए हुए बोले, “सच बेटा ! बड़ा स्वाद आया… बहुत दिन बाद ये चीजें खाने को मिली थीं, मन तृप्त हो गया…।”
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प्रश्न 1 (चंद्रेश): क्या रचना में अंग्रेजी शब्द बैड की जगह पलंग या किसी अन्य शब्द का प्रयोग कर सकते हैं? चूँकि बैड प्रचलित शब्द है और इसका अर्थ पलंग, चारपाई आदि हो सकते हैं? और यदि पलंग है तो क्या यह माना जा सकता है कि पिता का इतना तो ध्यान रखा जा रहा था कि कम से कम पलंग उपलब्ध था?
उत्तर (श्री सुभाष नीरव): मैं हिंदी में अपनी रचनाओं में बोलचाल की भाषा के शब्द प्रयोग करता रहता हूँ चाहे वे अंग्रेजी के हों या पंजाबी के। रही बात 'बैड' की, तो मित्र जब हम हिंदी वाले 'बैंक', 'रेल', 'स्कूल' 'बस', 'मोटर', 'कार', 'स्कूटर' शब्द खूब और प्रतिदिन इस्तेमाल करते हैं तो इसका कारण है कि अब ये हमारी हिंदी, हमारी बोली में रच बस गए शब्द हैं, और अगर ये रच बस गए हैं तो ये जब साहित्य में आते हैं तो आपत्ति क्यों? बैड की जगह पलँग, चारपाई, बिस्तर कुछ भी हो सकता था, पर यह एक प्रवाह में इस्तेमाल हो गया और मुझे कुछ भी अटपटा नहीं लगा।
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प्रश्न 2 (चंद्रेश): अंत में पिता तृप्त हुए - यह तृप्ति आज के भारतीय समाज और लघुकथाओं को पढ़ कर यह मानी जा सकती है कि पिता को खाने के लिए नहीं मिल रहा था लेकिन क्या रचना के अनकहे में परिवार की आर्थिक कमजोरी भी बताई जा रही है?
उत्तर (श्री सुभाष नीरव): बूढ़े की तृप्ति के पीछे घर की आर्थिक स्थिति का कमजोर होना नहीं, मध्यम और खाते पीते घरों में भी बूढ़ों की उपेक्षा, उनकी इच्छा को इग्नोर करने की बात अधिक है। उदाहरण देता हूँ अपना ही, मेरे पिता जो छोटे भाई के साथ रहते थे, जब मेरे घर रहने आये तो मेरी पत्नी से बेहद झिझकते हुए बोले - बेटा, करारी सी आलू - बड़ी की सब्जी बनाना, बहुत मन कर करता है। महीनों हो गए।
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- डॉ. चंद्रेश कुमार छ्तलानी