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बुधवार, 11 सितंबर 2019

पुस्तक समीक्षा | माटी कहे कुम्हार से: लघुकथा-संग्रह (डॉ. चंद्रा सायता) | दो समीक्षाएं


पुस्तक : माटी कहे कुम्हार से
लेखिका : डॉ. चंद्रा सायता 
प्रकाशक : अपना प्रकाशन
मूल्य : 200 रुपए
पेज : 104
समीक्षक : 
१. नंद किशोर बर्वे २. दीपक गिरकर



माटी कहे कुम्हार से : गहरी संवेदनाओं की लघुकथाएँ 

नंद किशोर बर्वे

जैसे जैसे समाज में विरोधभास बढ़ते जा रहे हैं, वैसे वैसे लघु कथा के लिये उर्वरा जमीन तैयार होती जा रही है । चूँकि एक लेखक – वो चाहे किसी भी विधा में लिख रहा हो, उसकी संवेदना औरों की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय होती है । इसी सक्रियता को वह अपनी रचनाओं में उतारता है । इस कारण समाज में होने वाली घटनाएँ  अनेक रूपों में हमारे सामने आती हैं ।

एक सच्चा लेखक वही है जो अपने समय को अपनी कलम से शब्द बद्ध करके आने वाली पीढियाँ के लिये एक प्रामाणिक दस्तावेज़ के रूप में छोड़ कर जाये । यह काम वर्तमान समय  में लघुकथाएँ बहुत प्रभावी तरीके से कर रही हैं ।कारण कि वे पद्य के दोहों और शेरों के जितनी प्रभावशाली होती हैं । कम से कम शब्दों में अपनी भूमिका को श्रेष्ठ तरीके से निभा पाने के कारण ही लघुकथाएँ आज इतनी मात्रा में लिखी और पढ़ी जा रही हैं।   

 प्रसिद्ध लेखिका और अनुवादक डॉ . श्रीमती चन्द्र सायता की लघु कथाओं के  दूसरे संग्रह ‘माटी कहे कुम्हार से’ में संकलित बहत्तर लघु कथाओं में गहरी संवेदना , दरकते मूल्यों के प्रति चिंता और निहित स्वार्थों के कारण टूटते रिश्तों का रेखांकन   हुआ  है ।  अपनी लघुकथाओं के पात्रों के चयन से चंद्रा जी कभी कभी तो चमत्कार  सा कर देती हैं । उनके ये पात्र हमें अपने आस पास सहज ही दिख जाते हैं । बस उनके प्रति उनकी दृष्टि सम्पन्नता ही  कथा बन जाती है , जिसे आम आदमी देखकर भूल जाता है।

‘अंकुरण’, ‘अर्थी और अर्थ’ तथा ‘अकेलापन’ बाल मनोविज्ञान की अच्छी कथाएं हैं । ‘अंकुरण’ माँ के आभाव में पला बच्चा अपने पापा से भावनात्क रूप से बहुत ‘अटेच’ है , वह बिना पापा के किसी बात की कल्पना नहीं कर सकता । ‘अकेलापन’ में परिवारों में आजकल जो एक ही बच्चा हो रहा है , ऐसे में उस बालसखा विहीन बच्चे की मनोदशा अच्छे से रेखांकित हुई है।

‘अर्थी और अर्थ’ में बच्चा शव यात्रा में शवों पर उड़ाये पैसों से अपनी बीमार माँ के लिये दवाई खरीदता है । यह घटना समाज में चिंताजनक स्थिति तक बढ़ रही अमीरी और ग़रीबी की खाई को ऐसे बताती है कि पाठक बिना द्रवित नहीं रह सकता । ‘नामगुनिया’ चिकनगुनिया की ही तरह व्यक्ति को अपनी चपेट में लाइलाज तरीके से लेने वाले सोशल मिडिया के प्रति एडिक्शन की सुंदर बयानी है । हम में कई लोग हैं जो अपने रोजमर्रा के जीवन की छोटी छोटी घटनाओं को इस माध्यम पर ‘शेयर’ करने की गम्भीर बीमारी से जाने अनजाने ग्रसित होते जा रहे हैं ।

इसमें विरोधाभास यह है कि बाकी नशों की तरह यहाँ भी बीमार यह मानने को राज़ी नहीं है कि वह इस बीमारी की गिरफ्त में आ चुका है । ‘प्रतिष्ठा कवच’ और ‘अधिकार’ दोनों लघुकथाएँ युवा वर्ग की दो समस्याओं को दर्शाती हैं । ‘प्रतिष्ठा कवच’ में अपने भाई की गलत हरकतों को बचाती बहन है तो दूसरी ओर उसके नामदार पिता की प्रतिष्ठा का कवच भी है जो ऐसे लोगों को ख़ुद को कानून से ऊपर मानने का खुला लायसेंस देता है । इसमें वह बहन भी उस अपराध की कम दोषी नहीं कही जा सकती जो अपने भाई की गलत करतूतों के लिये उसे फटकारने के बजाय उसका बचाव करती है । ‘अधिकार’ में इन दिनों चल रहे अनैतिक लिव इन रिलेशन की विद्रूपताओं को बताती है ।

महीनों या बरसों साथ में रहने और बिना ज़िम्मेदारी के वैवाहिक सुखा भोगने के बाद कोई भी लड़की किसी भी दिन जाकर पुलिस में शिकायत दर्ज कर दे कि उसके साथ बलात्कार होता रहा है /था । और पुलिस लड़के को बिना प्राकृतिक न्याय की परवाह किये एक तरफा सजा सुना के उसे दोषी करार देती है । यहाँ किसी के भी प्रति ज्यादती की वकालात मैं नहीं कर रहा , लेकिन ‘लिव इन’ में दोनों पक्ष सामान रूप से और अपनी मर्जी से इन्वाल्व होते हैं , तो सजा एक पक्ष को ही क्यों हो ? 

‘सृजन सम्बन्ध’ एक विशिष्ट प्रकार की लघुकथा है , जो किसी भी प्रकार के रचना कर्म में लगे लोगों के बीच अपने सृजन से उत्पन्न रिश्तों को बहुत ढंग सुंदर से बुनती है । इसमें एक कवि के लिखे गीत को गायिका गाती है , जिसकी वजह से वह गीत बहुत लोकप्रिय हो जाता है , इससे अभिभूत हो कर वह कवि उस गायिका के घर जाकर उसका सम्मान करता है और दोनों धन्य हो जाते है। इस संग्रह में उनकी  कुछ मानवेत्तर लघुकथाएँ भी हैं । जो बेहतर बन पड़ी है । ‘ज़िन्दगी और समय’ में समय ज़िन्दगी के इस ‘उलाहने पर कि तुम निष्ठुर और कुटिल हो’ उसे समझाते हुए कहता है कि – 

“हे सखी मैं इतना पारदर्शी हूँ कि तुम अपने कर्म के अनुसार अपना ही प्रतिबिम्ब मुझमें देखने लगती हो । इसलिए जब तुम्हारा भाव कुटिल होता है , तब तुम्हार कर्म भी कुटिल हो जाता है । और कर्म कुटिल होते ही तुम्हारा दृष्टिकोण कुटिल बन जाता है । तुम्हें जब जब मैं जैसा जैसा दिखता हूँ , तुम होती हो । समझीं कुछ । ” इस प्रकार वे ज़िन्दगी और समय के माध्यम से एक बड़ा सन्देश में कामयाब होती हैं , कि समय तो अपनी गति से ही चलता है ये हम ही हैं जो समय को अच्छा या कि बुरा बताते रहते हैं । इसी प्रकार किताब की शीर्षक कथा ‘माटी कहे कुम्हार से…’ में माटी ख़ुद कुम्हार से यह कहती है कि वो बाकी बर्तनों के साथ ही उससे सकोरे भी बना कर बेचे ताकि प्यास से व्याकुल पंछियों को भी अपनी प्यास बुझाने को पानी मिल जाये ।  कुम्हार की इस समस्या पर  कि इससे बढ़ने वाली लागत का क्या होगा ? मिट्टी उसका तरीका बताते हुए कहती है कि इसकी लागत को मटके की कीमत में जोड़ कर सहज समाधान भी बताती है । ‘दुःख से उपजा सुख’ लघुकथा में बीमार बेटी के असामयिक निधन पर उसके प्रति चिंतिति उसकी माँ एक डीएम निश्चिन्त हो जाती है कि वह भी अब बेटी की चिंता के बिना आराम से मर सकेगी । इसमें दुःख में भी सुख देखने कि मानवीय मानसिकता का अच्छा चित्रण किया है ।  

यहाँ यह भी कहना समीचीन होगा कि कुछ लघुकथाएँ अपने कथ्य और गठन में और मेहनत की दरकार रखती हैं । जो चन्द्रा जी जैसी वरिष्ठ और दृष्टि सम्पन्न लेखिका के लिये कोई मुश्किल काम नहीं है । आशा ही नहीं विश्वास है कि भविष्य में समाज को उनसे और बेहतर लघुकथाएँ मिलती रहेंगी ।

Source:

https://www.thepurvai.com/book-review-by-nand-kishor-barwe/
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सकारात्मकता का बोध कराती लघुकथाओं का संग्रह है ’माटी कहे कुम्हार से...’

दीपक गिरकर



हिन्दी एवं सिन्धी भाषा की सुप्रसिद्ध रचनाकार डॉ. चंद्रा सायता के लेखन का सफ़र बहुत लंबा है। माटी कहे कुम्हार से...  लेखिका का दूसरा लघुकथा संग्रह है। लेखिका का पहला लघुकथा संग्रह गिरहे भी काफ़ी चर्चित रहा था। लेखिका के तीन काव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। चंद्रा सायता की लघुकथाओं की पृष्ठभूमि और कथानक जीवन की मुख्यधारा से उपजते हैं और उनके पात्र समाज के हर वर्ग से उठ कर सामने आते हैं। इस पुस्तक में कुल 72 लघुकथाएँ संकलित है। इस संग्रह की अधिकांश लघुकथाएँ सशक्त है। लघुकथाओं की घटनाएँ और पात्र काल्पनिक नहीं, जीवंत लगते हैं। इस लघुकथा संग्रह की भूमिका बहुत ही सारगर्भित रूप से वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मिथिलेश दीक्षित ने लिखी है।  

माटी कहे कुम्हार से सकारात्मकता का बीज रोपित करती इस संग्रह की प्रमुख लघुकथा है। लघुकथा भिखारी सेठ में लेखिका कहती है,  "दद्दा! थोड़ा सा तो रहम करो मुझ पर। आपके बेटे जैसा हूँ। जरूरत आ पड़ी है, वरना…  वो तो ठीक है। मैं बिजनेस में कोई समझौता नहीं करता। यही एक कमी है मुझमें। बूढ़ा भिखारी टस से मस नहीं हुआ।” बासमती रिश्ते लघुकथा भी सकारात्मकता का बोध कराती रचना है। इस लघुकथा में एक जगह यह वर्णन दृष्टव्य है - "आप समझ सकती हैं कि अपने जवान बच्चों के सामने हम अगर निकाह कर लें तो उनके दिलों पर तो नश्तर चल जाएँगे। कहते हुए अशफाक ने जमीला की ओर से मसले का हल जानना चाहा। जी, आप दुरूस्त फरमा रहे हैं। इस मसले पर तो मैं पहले से सोचे बैठी हूँ। वह क्या? अशफाक अचानक ख़ुशी छुपाते हुए बोला। जमीला ने मुस्कुराते हुए कहा - हम पहले बच्चों से मशविरा कर लें, क्या वे एक दूसरे को पसंद करते हैं। वे साथ-साथ रहना चाहते हैं। ” लेखिका ने स्वार्थी दुनिया के मुखौटे का चित्रण ग़रीब लघुकथा में सटीक ढंग से किया है। वीराने में बहार और काशी जैसी सशक्त लघुकथाएँ मानवीय संवेदनाओं को झंकृत कर के रख देती है। भाभियाँ लघुकथा भाभियों के दोहरे चेहरों को बेनक़ाब करती है। उद्यान सौंदर्यीकरण, सच्चाई छुपाती तस्वीर, अधिकार, ऊँची दूकान, नास्तिक जैसी लघुकथाएँ समाज में व्याप्त विसंगतियों को उजागर करती हैं। लेखिका ने अकेलापन, अर्थी और अर्थ, अंकुरण इत्यादि लघुकथाओं में बच्चों के मनोविज्ञान को बहुत ही स्वाभाविक रूप से उकेरा है। लेखिका ने कुछ लघुकथाएँ जैसे ज़िन्दगी और समय, अकेलापन, तलाक। तलाक। तलाक।, माटी कहे कुम्हार से, वक़्त बादशाह, असली दोषी, वर्चस्व की लड़ाई इत्यादि सांकेतिक, मानवेतर पात्रों के माध्यम से व्यक्त की हैं। सामाजिक विसंगतियाँ, पुरुष के अहं, सोशल मीडिया, बाल मनोविज्ञान, मातृत्व भाव, बाज़ारवादी दृष्टिकोण, दोहरे चरित्र, नारी सुरक्षा, नैतिक और चारित्रिक कमज़ोरी इन सब विषयों पर लेखिका ने अपनी क़लम चलाई है।

इस संग्रह की रचनाएँ समाज को सीख देती हैं और साथ में समाज में व्याप्त विसंगतियों को देखने की एक नयी दृष्टि देती हैं। चन्द्रा सायता के लेखन में गंभीरता, सूक्ष्मता और यथार्थपरकता दृष्टिगोचर होती है। लेखिका की रचनाएँ जीवन की सच्चाइयों से साक्षात्कार कराती है। चन्द्रा सायता की लघुकथाएँ पाठकों को सोचने को मजबूर करती हैं, ज़िम्मेदारी का अहसास करवाती हैं। रचनाओं की भाषा सहज, स्वाभाविक और सम्प्रेषणीय है। संवेदना और भावना के स्तर पर चंद्रा सायता जी की लघुकथाएँ हमको उद्वेलित करती हैं। 103 पृष्ठ का यह लघुकथा संग्रह आपको कई विषयों पर सोचने के लिए मजबूर कर देता है। डॉ. चंद्रा सायता का यह लघुकथा संग्रह सराहनीय और पठनीय है। आशा है प्रबुद्ध पाठकों में इस लघुकथा संग्रह का स्वागत होगा।

Source:

http://sahityakunj.net/entries/view/sakaratmakata-ka-bodh-karati-laghukathon-ka-sangrh-mati-kahe-kumhar-se