यह ब्लॉग खोजें

शनिवार, 28 जनवरी 2023

लघुकथा वीडियो: जानवरीयत | लेखन: डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी । वाचन: geetaconnectingwithin


 


लघुकथा: जानवरीयत |  डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

वृद्धाश्रम के दरवाज़े से बाहर निकलते ही उसे किसी कमी का अहसास हुआ, उसने दोनों हाथों से अपने चेहरे को टटोला और फिर पीछे पलट कर खोजी आँखों से वृद्धाश्रम के अंदर पड़ताल करने लगा। उसकी यह दशा देख उसकी पत्नी ने माथे पर लकीरें डालते हुए पूछा, "क्या हुआ?"

उसने बुदबुदाते हुए उत्तर दिया, "अंदर कुछ भूल गया..."

 पत्नी ने उसे समझाते हुए कहा, "अब उन्हें भूल ही जाओ, उनकी देखभाल भी यहीं बेहतर होगी। हमने फीस देकर अपना फ़र्ज़ तो अदा कर ही दिया है, चलो..." कहते हुए उसकी पत्नी ने उसका हाथ पकड़ कर उसे कार की तरफ खींचा।

 उसने जबरन हाथ छुड़ाया और ठन्डे लेकिन द्रुत स्वर में बोला, "अरे! मोबाइल फोन अंदर भूल गया हूँ।"

 "ओह!" पत्नी के चेहरे के भाव बदल गए और उसने चिंतातुर होते हुए कहा, "जल्दी से लेकर आ जाओ, कहीं इधर-उधर हो गया तो? मैं घंटी करती हूँ, उससे जल्दी मिल जायेगा।"

वह दौड़ता हुआ अंदर चला गया। अंदर जाते ही वह चौंका, उसके पिता, जिन्हें आज ही वृद्धाश्रम में दाखिल करवाया था, बाहर बगीचे में उनके ही घर के पालतू कुत्ते के साथ खेल रहे थे। पिता ने उसे पल भर देखा और फिर कुत्ते की गर्दन को अपने हाथों से सहलाते हुए बोले, "बहुत प्यार करता है मुझे, कार के पीछे भागता हुआ आ गया... जानवर है ना!"

 डबडबाई आँखों से अपने पिता को भरपूर देखने का प्रयास करते हुए उसने थरथराते हुए स्वर में उत्तर दिया, “जी पापा, जिसे जिनसे प्यार होता है... वे उनके पास भागते हुए पहुँच ही जाते हैं...”

 और उसी समय उसकी पत्नी द्वारा की हुई घंटी के स्वर से मोबाइल फोन बज उठा। वो बात और थी कि आवाज़ उसकी पेंट की जेब से ही आ रही थी।

-0-

शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

लघुकथा अनुवाद | हिंदी से मैथिली | अनुवादकर्ता: डॉ. मिन्नी मिश्रा | लघुकथा: लहराता खिलौना

डॉ. मिन्नी मिश्रा एक सशक्त लघुकथाकारा हैं. न केवल लघुकथा लेखन बल्कि समीक्षा व अनुवाद पर भी उनकी अच्छी पकड है. वे एक ब्लॉग मिन्नी की कलम से का भी संचालन करती हैं. पटना निवासी श्रीमती मिश्रा को कई श्रेष्ठ पुरस्कार व सम्मान भी प्राप्त हैं. उन्होंने मेरी एक हिंदी लघुकथा 'लहराता खिलौना' का मैथिली भाषा में अनुवाद किया है, यह निम्न है:


 लहराइत खेलौना (अनुवाद: मिन्नी मिश्रा / मैथिली)

देश के संविधान दिवसक उत्सव समाप्त केलाक बाद एकटा नेता अपन घरक अंदर पैर रखने हे छलाह कि हुनकर सात- आठ वर्षक बच्चा हुनका पर खेलौना वाला बंदुक तानि देलक, आ कहलक , "डैडी, हमरा किछु पूछबाक अछि।"

नेता अपन चिर परिचित अंदाज में मुस्की मारैत कहलथि ,"पूछ बेटा।"

"इ रिपब्लिक- डे कि होइत छैक?" बेटा प्रश्न दगलक।

सुनैत देरी संविधान दिवसक उत्सव में किछु अभद्र लोग दुआरे लगेल गेल नारा के दर्द नेता के ठोरक मुस्की के भेद देलक ,नेता गंहीर सांस भरैत कहलथि,
"हमरा पब्लिक के लऽग में बेर- बेर जेबाक चाही , इ हमरा याद दियेबाक दिन होइत अछि रि- पब्लिक-डे..."

"ओके डैडी ,ओहिमें झंडा केऽ कोन काज पड़ैत छैक?" बेटा बंदूक तनने रहल।

नेता जवाब देलथि ,"जेना अहाँ इ बंदूक उठा कऽ रखने छी,ओहिना हमरा सभके इ झंडा उठा कऽ राखय पड़ैत अछि ।"

"डैडी, हमरो झंडा खरिदि कऽ दियऽ... नहि तऽ हम अहाँके गोली सं मारि देब।" बेटा के स्वर पहिने के अपेक्षा अधिक तिखगर छलैन्ह।

नेता चौंकलथि आ बेटा के बिगरैत कहलन्हि,"इ के सिखबैत अछि अहांके?" हमर बेटा के हाथ में बंदूक नीक नहि लगैत अछि।आ' ओतय ठाढ़ ड्राइवर के किछु आनय के इशारा करैत,ओ बेटा के हाथ सं बंदूक छिनैत आगु बजलाह,
"आब अहाँ गन सं नहि खेलाएब।झंडा मंगवेलौहें ओकरे सं खेलाउ।"एतबा बजैत बिना पाछां तकैत नेता सधल चालि सं अंदर चलि गेलाह।

अनुवादक- डॉ. मिन्नी मिश्रा, पटना
-०- 

मूल लघुकथा

लहराता खिलौना / डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

देश के संविधान दिवस का उत्सव समाप्त कर एक नेता ने अपने घर के अंदर कदम रखा ही था कि उसके सात-आठ वर्षीय बेटे ने खिलौने वाली बन्दूक उस पर तान दी और कहा "डैडी, मुझे कुछ पूछना है।"

नेता अपने चिर-परिचित अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला, "पूछो बेटे।"

"ये रिपब्लिक-डे क्या होता है?" बेटे ने प्रश्न दागा।

सुनते ही संविधान दिवस के उत्सव में कुछ अवांछित लोगों द्वारा लगाये गए नारों के दर्द ने नेता के होंठों की मुस्कराहट को भेद दिया और नेता ने गहरी सांस भरते हुए कहा,
"हमें पब्लिक के पास बार-बार जाना चाहिये, यह हमें याद दिलाने का दिन होता है रि-पब्लिक डे..."

"ओके डैडी और उसमें झंडे का क्या काम होता है?" बेटे ने बन्दूक तानी हुई ही थी।

नेता ने उत्तर दिया, "जैसे आपने यह गन उठा रखी है, वैसे ही हमें झंडा उठाना पड़ता है।"

"डैडी, मुझे भी झंडा खरीद कर दो... नहीं तो मैं आपको गोली से मार दूंगा" बेटे का स्वर पहले की अपेक्षा अधिक तीक्ष्ण था।

नेता चौंका और बेटे को डाँटते हुए कहा, "ये कौन सिखाता है आपको? बन्दूक अच्छी नहीं लगती मेरे बेटे के हाथ में।" 
और उसने वहीँ खड़े ड्राईवर को कुछ लाने का इशारा कर अपने बेटे के हाथ से बन्दूक छीनते हुए आगे कहा,
“अब आप गन से नहीं खेलोगे, झंडा मंगवाया है, उससे खेलो।”

कहते हुए नेता बिना पीछे देखे सधे हुए क़दमों से अंदर चला गया।
-०-

शनिवार, 21 जनवरी 2023

श्रीमती मिथिलेश दीक्षित द्वारा मधुदीप जी को भेजे गए प्रश्न व मधुदीप जी के उत्तर

 

प्रश्न : हिन्दी की प्रथम लघुकथा, उद्भव कब से, प्रथम लघुकथाकार

उत्तर : हिन्दी की प्रथम लघुकथा किसे माना जाये ---इस  विषय में मतभेद हैं | श्री कमल किशोर गोयनकाजी तथा अन्य कुछ विद्वान 1901 में छत्तीशगढ़ मित्र मासिक में प्रकाशित श्री माधव राय सप्रे की रचना ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ को हिन्दी की प्रथम लघुकथा मानते हैं | दूसरी तरफ इसी रचना को हिन्दी की पहली कहानी के रूप में भी स्वीकार किया जाता है | यहीं पर मतभेद और भ्रम उभरता है कि एक ही रचना को दो विधाओं की रचना कैसे स्वीकार किया जा सकता है ? वैसे भी मेरे विचार में यह रचना लघुकथा की सीमा का अतिक्रमण तो करती ही है | इस मुद्दे पर स्पष्ट निष्कर्ष तो लघुकथा के स्वतन्त्र अध्येता एवं विचारक ही दे सकते हैं | इस विषय में दूसरा पक्ष उन विचारकों का है जो श्री भारतेन्दुजी की 1876 में प्रकाशित पुस्तक ‘परिहासिनी’ में प्रकाशित रचना ‘अंगहीन धनी’ को हिन्दी की प्रथम लघुकथा स्वीकार करते हैं | कुछ विचारक इस पुस्तक को हास-परिहास की पुस्तक मानते हुए इसमें संकलित रचना को लघुकथा मानने से परहेज करते हैं | कुछ तो इसमें संकलित रचनाओं को भारतेन्दुजी की मौलिक रचना होने पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हैं | परन्तु मेरे विचार में ‘अंगहीन धनी’ उस समय के धनीवर्ग पर चोट करते हुए एक श्रेष्ठ लघुकथा है जिसे हास-परिहास की रचना कहकर खारिज नहीं किया जा सकता | इस लघुकथा  में परिलक्षित परिहास का पुट वास्तव में तीखा व्यंग्य है जो इस रचना को उच्च कोटि की लघुकथा के  रूप में स्थापित करता है | इस तरह मैं हिन्दी लघुकथा का उद्भव 1876 से मानता हूँ और ‘अंगहीन धनी’ को हिन्दी की पहली लघुकथा स्वीकार करता हूँ | मैंने अपनी सम्पादित पुस्तक ‘हिन्दी की कालजयी लघुकथाएँ (पडाव और पड़ताल, खण्ड-27) में इस तथ्य को रेखांकित भी किया है | एक बात और साफ़ कर दूँ कि ये सभी मान्यताएँ नवीन शोधों के बाद खण्डित भी हो सकती हैं और हमें नित नए हो रहे गम्भीर शोधकार्यों के साथ अपनी धारणा बदलने में कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए |

 

प्रश्न : लघुकथा की विकासयात्रा के परिप्रेक्ष्य में इसके वर्तमान स्वरूप पर प्रकाश डालें |

उत्तर : लघुकथा का जो वर्तमान स्वरूप है वह पिछली सदी के आठवें दशक से शुरू होता है | हालाँकि 1876 से 1970 के मध्य भी बहुत से लेखकों ने लघुकथाएँ या लाघुकथानुमा  रचनाएँ लिखी हैं लेकिन 1970 के बाद से लघुकथा में एक आन्दोलन का सूत्रपात होता है | मैं लघुकथा को तीन कालखण्डों में विभक्त करके देखता हूँ | 1876 से 1970 तक ‘नींव’, 1971 से 2000 तक ‘निर्माण’ तथा 2001 से अद्यतन ‘ नई सदी की धमक’ | स्वीकार करने को तो ‘हितोपदेश’ और ‘पंचतन्त्र’ की रचनाओं को भी लघुकथा का उद्गम माना जा सकता है लेकिन वह वास्तविक न होकर सिर्फ मानने के लिए ही होगा | हाँ, इतना अवश्य है कि उन्हें या उस तरह की दूसरी कई रचनाओं को लघुकथा के बीज रूप में स्वीकार किये जाने से परहेज नहीं होना चाहिए | 1876 से 1970 तक की लघुकथाओं पर बहुत कुछ कहानी का प्रभाव था क्योंकि इनमें से अधिकतर कहानीकारों द्वारा ही लिखी गई थीं लेकिन 1970 के बाद लघुकथा का जो आन्दोलन शुरू हुआ उसमें लघुकथा को कहानी से अलग करने की छटपटाहट साफ़ दिखाई देती है | इस काल में कहानीकारों से कतई इतर लघुकथाकार उभरकर सामने आते हैं जो इस विधा को हिन्दी गद्य साहित्य की स्वतन्त्र विधा स्वीकार करवाने के लिए कृत-संकल्प थे | उस दशक में ‘सारिका’ के जो लघुकथा विशेषांक निकले उनमें अधिकतर व्यंग्य प्रधान लघुकथाएँ/रचनाएँ थीं जिनसे यह भ्रम विकसित हुआ कि व्यंग्य लघुकथा का अनिवार्य अंग है और जिस रचना मं  व्यंग्य न हो उसे लघु कहानी कहा जाए | लेकिन बहुत जल्दी ही लघुकथा ने स्वयं को इस भ्रम से मुक्त करा लिया | अब जो लघुकथाएँ सामने आ रही हैं उनमें जीवन की विडम्बनाओं के साथ ही मानवीय सम्वेदनाओं को पूरी शिद्दत और तीव्रता से पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा  है | 1970 के दशक में लघुकथा के ‘लघु’ पक्ष पर अधिक जोर दिया जाता था लेकिन अब नई सदी के आते-आते इसके ‘कथा’ पक्ष पर भी बराबर जोर दिया जाने लगा है ताकि लघुकथा रचना के रूप में पठनीय भी हो सके | 2001 के बाद 2012 तक लघुकथा के विकास की गति बहुत धीमी रही | पुराने लघुकथाकारों का विधा से मोहभंग हो रहा था | उनमें से काफी मित्र उपन्यास और कहानी की तरफ जा रहे थे और नई पीढ़ी सामने नहीं आ पा रही थी | पुराने लघुकथाकारों को लगने लगा था कि सिर्फ लघुकथा के सहारे साहित्याकार नहीं बना जा सकता | एक भेंट में आदरणीय कमल किशोर गोयनकाजी ने भी हमें सलाह दी थी कि हम लघुकथाकारों को साहित्य की दूसरी विधाओं में भी लेखन करना चाहिए | लेकिन मेरी धारणा इससे कुछ अलग है | मेरा मानना है कि एक लेखक को पूरी गम्भीरता से और बिना विचलित हुए लघुकथा को अपना सर्वोत्तम देना चाहिए ताकि इस विधा का पूर्ण विकास हो | विधा के विकास में ही लेखक का विकास निहित है | इस समय पूरे देश में लघुकथा की लहर है और आनेवाला समय लघुकथा का समय होगा, ऐसा मेरा मानना है |

प्रश्न : आपकी दृष्टि में हिन्दी के कथात्मक साहित्य में लघुकथा का क्या स्थान है ?

उत्तर : उपन्यास, कहानी, नाटक तथा लघुकथा कथात्मक साहित्य के प्रमुख रूप हैं | जहाँ उपन्यास और कहानी मूल रूप में पश्चिम से भारत में आए हैं वहीं लघुकथा भारत से पश्चिम की तरफ गई है | लघुकथा शोधकर्ता इरा सरमा वलेरिया ने केम्ब्रिज से स्वीकृत अपने शोध में इस सत्य को प्रतिपादित किया है | यह सत्य है कि विश्वविद्यालयों तथा अकादमियों में लघुकथा को उपन्यास या कहानी के समकक्ष स्थान नहीं मिला है | विश्वविद्यालयों में लघुकथा पर शोधकार्य हो तो रहे हैं लेकिन उपन्यास, कविता या कहानी के मुकाबले उनकी संख्या बहुत ही कम है | उन्हें शिकायत रहती थी कि लघुकथा विधा में इतनी सामग्री ही उपलब्ध नहीं है जिस पर शोधकार्य करवाए जा सकें | लेकिन अब ‘पड़ाव और पड़ताल’ लघुकथा-शृंखला के 27 खण्ड आ जाने के बाद उनका यह कहना अनुचित लगने लगा है | इससे पहले भारतीय लघुकथा कोश, हिन्दी लघुकथा कोश, अनेक निजी एवं सम्पादित लघुकथा-संग्रह/संकलन आ चुके हैं | हर साल लघुकथा की 50 पुस्तकें तो आ ही रही हैं | इसी वर्ष विश्व हिन्दी लघुकथाकार कोश का प्रकाशन भी हो चुका है | केन्द्रीय हिन्दी अकादमी और राज्य की हिन्दी अकादमियों से यह अनुरोध किया जाना चाहिए कि वे पुरस्कार के लिए पुस्तकों का चयन करते समय लघुकथा की पुस्तकों पर भी ध्यान दें | कुछ राज्यों की हिन्दी अकादमियों ने इस विषय में पहल भी की है | मैं आशा करता हूँ कि आनेवाले पाँच वर्षों में हिन्दी लघुकथा की कोई पुस्तक साहित्य अकादमी पुरस्कार से अवश्य ही सम्मानित होगी | इस समय तो हमें स्वीकार करना ही होगा कि कहानी या उपन्यास के समक्ष लघुकथा पूरी मजबूती से नहीं टिक पा रही है लेकिन जिस तरह से पाठकों का रुझान लघुकथा की तरफ बढ़ा है और जिस तरह एक सशक्त आन्दोलन इस विधा में चल रहा है उसे देखते हुए लघुकथा हिन्दी की अन्य कथात्मक विधाओं के समक्ष एक दमदार चुनौती प्रस्तुत करने जा रही है | पिछले तीन नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेलों में इसकी अनुगूंज सभी ने सुनी है | इसके लिए सभी लघुकथाकारों को पूरी तल्लीनता से लेखन करना होगा |

 

प्रश्न : लघुकथा के स्वरूप, स्तर और विकास में सोशल मीडिया की क्या भूमिका है ?

उत्तर : मैंने पहले कहा था कि 2001 से 2012 तक लघुकथा में विकास की गति बहुत धीमी रही | इसके कुछ कारण भी मैंने बताये थे | 2012 के बाद फेसबुक तथा सोशल मीडिया का उदय होता है और लघुकथा के विकास और स्वरूप पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है | लघुकथा में इसके साथ ही फिर से एक आन्दोलन शुरू हो गया है और सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से लघुकथाएँ लिखी जा रही हैं | आजकल फेस बुक साहित्य का दौर है | छोटे आकार की रचना को फेस बुक पर सरलता से पोस्ट किया जा सकता है | इसलिए कविता, क्षणिका व हाइकू के साथ-साथ लघुकथाएँ भी बहुतायत से फेस बुक पर पोस्ट की जा रही हैं | अब तो फेस बुक पर पोस्ट की गई लघुकथाओं के संकलन प्रकाशित करने/करवाने का प्रचलन भी जोर पकड़ता जा रहा है |

     फेस बुक पर लघुकथाओं को पोस्ट किया जाना इस विधा के प्रचार-प्रसार के लिए एक शुभ लक्षण भी हो सकता है | आज सोशल मीडिया का युग है और इसके माध्यम से आप अपने विचार तथा रचनाएँ द्रुत गति से अन्य लोगों/पाठकों तक पहुँचा सकते हैं | नि:सन्देह किसी भी विधा के प्रसार के लिए सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम हो सकता है मगर इसके अपने खतरे भी कम नहीं हैं |

     पिछले कुछ दिनों/महीनों से फेस बुक पर लघुकथा-समूहों की बाढ़-सी आ गई है | कम-से-कम आठ-दस समूह तो मेरी नजर से भी गुजरे हैं | मजे की बात यह है की जो नवोदित लेखक इस विधा के प्रारम्भिक दौर से गुजरते हुए इस विधा को समझने का प्रयास कर रहे हैं वे इन समूहों के ‘एडमिन’ बने बैठे हैं | ऐसे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है की उन समूहों में किस तरह की या किस स्तर की लघुकथाएँ पोस्ट हो रही हैं | उस पर तुर्रा यह की उनमें से अधिकतर समूह लघुकथाओं की प्रतियोगिताएँ आयोजित कर रहे हैं तथा श्रेष्ठ लघुकथाओं के प्रमाण-पत्र भी बाँट रहे हैं |

    फेस बुक पर व्यक्तिगत या लघुकथा-समूहों पर पोस्ट की जा रही लघुकथाओं तथा उससे इस विधा के हो रहे अहित के मुद्दे पर बात करना चाहता हूँ | यदि आप फेस बुक से जुड़े हैं तो अवश्य ही आप वहाँ पर लघुकथा-समूहों की गतिविधियों से तथा वहाँ पर पोस्ट की जा रही लघुकथाओं तथा उनकी गुणवत्ता से भी रूबरू होते होंगे |  बुरा मत मानना, कितनी ही कमजोर तथा अधकचरी रचनाएँ वहाँ पर प्रस्तुत की जा रही हैं, यह किसीसे छिपा हुआ नहीं है | उन रचनाओं को एक-दूसरे की प्रशंसा और भ्रमित करनेवाली टिप्पणियाँ भी मिलती हैं | इस झूठी प्रशंसा से नवोदित लेखक दिग्भ्रमित होता है और मेरा यह मानना है कि इससे उसका विकास रुक जाता है | एक रचनाकार जो भी रचता है उसकी दृष्टि में वह श्रेष्ठ ही होता है | अगर उसकी दृष्टि में वह पूर्ण और श्रेष्ठ न हो तो वह  उसे कागज पर उतारेगा ही नहीं | लेखक अपनी रचना की सही-सही परख कभी नहीं कर सकता क्योंकि वह उसकी अपनी रचना होती है | यह बात नवोदितों पर ही नहीं पुराने रचनाकारों पर भी लागू होती है | रचना के गुण-दोषों की परख तो कोई दूसरा निष्पक्ष व्यक्ति ही कर सकता है और यह दूसरा होता है पाठक, अन्य वरिष्ठ लेखक, समीक्षक या सम्पादक | पहले जब लेखन होता था  तो उसके सृजन तथा प्रकाशन के मध्य सम्पादक होता था जोकि रचना के गुण-दोष के आधार पर उसका प्रकाशन स्वीकार या अस्वीकार करता था | इस तरह रचना की पड़ताल हो जाती थी तथा कमजोर रचना बाहर हो जाती थी | मगर फेस बुक पर ऐसा नहीं हो पाता | यहाँ पर यह सुविधा उपलब्ध है की जो कुछ भी आप लिखें उसे वहाँ पर पोस्ट कर दें | ऐसे रचनाकारों का एक समूह बन जाता है जो एक-दूसरे की रचनाओं की जी-खोलकर प्रशंसा भी कर देते हैं | अब तो स्थिति इतनी विकट और विकृत हो गई है कि यदि कोई वरिष्ठ रचनाकार उन्हें सही बात समझाना चाहता है तो नवोदित  एकदम आक्रामक मुद्रा में आ जाते हैं | हर महीने शीर्षक देकर लघुकथाएँ लिखने/लिखवाने का प्रचलन भी जोर पकड़ता जा रहा है जिससे फेक्ट्री मैड लघुकथाओं की बाढ़ आ गई है और उस बाढ़ में रचनात्मकता कहीं खोती जा रही है |

     सोशल मीडिया एक दुधारी तलवार है जिसके सही प्रयोग से तो लघुकथा का विकास संभव है लेकिन इसके गलत प्रयोग से विधा का बहुत अधिक अहित भी हो सकता है | हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि हम सोशल मीडिया की शक्ति का पूरा उपयोग विधा के विकास में करें | यदि सोशल मीडिया के माध्यम से हम खुद को या अपनी लघुकथाओं को चमकाने या उन्हें ही सही ठहराने का प्रयास करेंगे तो इसके बहुत ही गलत दूरगामी परिणाम होंगे |

 

प्रश्न : लघुकथा की वर्तमान स्थिति से आप कहाँ तक संतुष्ट हैं ?

उत्तर : सन्तुष्ट हो जाना यानी विराम लग जाना और असन्तुष्ट रहना यानी गतिवान रहना | इसलिए लघुकथा की वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट होकर बैठ जाने का तो प्रश्न ही नहीं है | निरन्तर प्रयास हो रहे हैं, और भी तेजी से प्रयास किये जाने की आवश्यकता है | मेरा सभी साथियों से यही कहना है कि वे अपनी पूरी क्षमता से विधा के विकास के लिए काम करें | विधा के विकास में ही हम सभी लघुकथाकारों का विकास समाहित है | कुछ तथाकथित लेखकों के माध्यम से यह प्रश्न उछाला जाता है की लघुकथा का भविष्य क्या है ! कुछ अजीब-सा प्रश्न नहीं है यह ? साहित्य की किसी भी विधा का भविष्य उस विधा के लेखकों के सामर्थ्य पर निर्भर करता है | लेखन दमदार होगा तो पाठक उसे कैसे नकारेगा ? जिन्हें अपने लेखन पर भरोसा नहीं होता या जो फिर साहित्य में अपना स्थान बनाने की बहुत जल्दी में होते हैं वे ही ऐसी बेतुकी बातें करते हैं | साहित्य जब काव्य से उपन्यास की तरफ और उपन्यास से कहानी की तरफ मुड़ा तब भी शायद  ऐसे ही प्रश्न उठे होंगे मगर उपन्यास या कहानी अपने समय में साहित्य के केन्द्र में रहे हैं, इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता | साहित्य की वही विधा केन्द्र में रहेगी जिसमें जन-मानस की भावनाओं की अभिव्यक्ति होते हुए दमदार लेखन होगा | सिर्फ गाल बजाने से कुछ नहीं होगा |

     आनेवाला समय, खासतौर पर 2020 के बाद के दस वर्ष लघुकथा के होंगे | आवश्यकता हम लघुकथाकारों द्वारा अपने पर विश्वास रखते हुए निरन्तर और दमदार लेखन करने की है | हमें जन-भावनाओं और जन-आकंक्षाओं पर अपनी पकड़ मजबूत रखते हुए सामायिक समस्याओं को अपने लेखन का आधार बनाना है | कोई भी लेखन अपने समय से कटकर जिन्दा नहीं रह सकता | इस बात पर अब विवाद करना बेमानी है कि लघुकथा में क्या और कितना-कुछ कहा जा सकता है | लेखक में दम होना चाहिए, हर स्थिति और समस्या को इस विधा में उकेरा जा सकता है और बहुत ही प्रभावी ढंग से उकेरा जा सकता है | पिछले दिनों लघुकथा में जो लेखन हुआ है उससे यह बात साबित भी हो चुकी है |

     साफ शब्दों में कहूँ तो मैं लघुकथा की वर्तमान स्थिति से पूर्णतया संतुष्ट तो नहीं हूँ लेकिन मुझे इतना विशवास है कि निकट भविष्य में ही लघुकथा अपना प्राप्य  प्राप्त कर लेगी |

००००