यह ब्लॉग खोजें

मंगलवार, 12 मार्च 2019

लघुकथा | नेक काम | राजकुमार कांदु

गाँव में एक बार फिर हड़कंप मचा हुआ था । मुखिया के बेटे ने आज फिर एक शिकार किया था 'मुनिया' का । दबी जुबान से चर्चा शुरू थी मुनिया से हुए बलात्कार की लेकिन किसकी मजाल थी कि मुखिया या उसके लड़के के खिलाफ कोई शिकायत करता?

कुछ दिनों बाद कल्लू  के यहाँ आयी उसके दूर के एक रेिश्तेदार की लड़की ' रूबी ' शौच के लिए जाते हुए मुखिया के बेटे और उसके साथियों को दिखी। गाँव के बाहर शौच से वापस आते हुए रूबी का घात लगाकर बैठे मुखिया के बेटे और उसके तीन साथियों ने शिकार कर लिया। चारों ने जमकर अपनी मर्दानगी दिखाई उस अबला पर। लेकिन यह क्या ? इतने अत्याचार के बावजूद वह हँस रही थी। उन दरिंदों की उम्मीद के विपरीत उसका हँसना उन्हें अखर गया। एक लड़के ने पूछ ही लिया इसका कारण और जवाब सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई । जवाब था
"मैं कल्लू की कोई रिश्तेदार विश्तेदार नहीं, सोनागाछी से आई एक वेश्या हूँ। एड्स की वजह से मेरा अंत नजदीक है, सोचा जाते-जाते कोई नेक काम करती जाऊँ। तुमने मेरा नहीं, मैंने तुम लोगों का शिकार करके इन गाँववालों को तुम्हारे अत्याचारों से मुक्ति दिला दी है। अब तुम सब अपनी जिंदगी के दिन गिनना शुरू कर दो।"


- राजकुमार कांदु

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें