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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

सतीश राठी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना: एक अध्ययन | चंद्रेश कुमार छतलानी


सतीश राठी: एक संक्षिप्त स्मरण

सतीश राठी (23 फरवरी 1956 – 1 सितंबर 2026) हिंदी लघुकथा के उन रचनाकारों में रहे जिन्होंने इस विधा को केवल लिखा नहीं, बल्कि उसके विकास के लिए लगातार काम भी किया। इंदौर की साहित्यिक भूमि से जुड़े राठी ‘क्षितिज’ संस्था के संस्थापक अध्यक्ष रहे और कई दशकों तक लघुकथा के लेखन, संपादन और प्रसार से जुड़े रहे। उनकी साहित्यिक यात्रा में शब्द साक्षी हैं और जिस्मों का तिलिस्म जैसे लघुकथा-संग्रह, पिघलती आँखों का सच जैसा कविता-संग्रह तथा अनेक संपादित संकलन उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाएँ मराठी, कन्नड़, पंजाबी, गुजराती और बांग्ला सहित विभिन्न भाषाओं में अनूदित हुईं।

राठी का साहित्य आम आदमी के जीवन से गहरे जुड़ा रहा। भूख, गरीबी, श्रम, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, स्त्री-पुरुष संबंध और बदलती मानवीय संवेदनाएँ उनकी लघुकथाओं के प्रमुख सरोकार रहे। उनकी भाषा सहज थी, लेकिन उनके प्रश्न गहरे थे। वे छोटी-सी घटना के भीतर छिपे बड़े सामाजिक अर्थ को पहचानते थे। ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’, ‘खुली किताब’ और ‘जिस्मों का तिलिस्म’ जैसी रचनाएँ इसका प्रमाण हैं।

उनका निधन हिंदी लघुकथा के लिए केवल एक रचनाकार की विदाई नहीं है। यह उस पीढ़ी के एक सक्रिय प्रतिनिधि का जाना है जिसने लघुकथा को एक सशक्त साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित होते देखा, उसमें लिखा और उसके लिए साहित्यिक वातावरण तैयार किया। ‘क्षितिज’ के माध्यम से उनका संपादकीय और संगठनात्मक योगदान आने वाले समय में भी लघुकथा के इतिहास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।

प्रस्तुत शोध-पत्र उनके इसी रचनात्मक अवदान को उनकी लघुकथाओं के पाठ के आधार पर समझने का एक विनम्र प्रयास है।


सारांश

हिंदी लघुकथा ने आधुनिक हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान उस समय बनाई, जब कम शब्दों में जीवन की बड़ी सच्चाइयों को व्यक्त करने की आवश्यकता महसूस हुई। इस विधा के विकास में अनेक रचनाकारों का योगदान रहा है। सतीश राठी उनमें ऐसे लेखक हैं जिनकी पहचान केवल लघुकथाकार के रूप में नहीं, बल्कि संपादक और लघुकथा के सक्रिय संवाहक के रूप में भी बनी है। इंदौर के साहित्यिक परिवेश से जुड़े राठी जी ने लंबे समय तक ‘क्षितिज’ के माध्यम से लघुकथा लेखन और उसके आलोचनात्मक विमर्श को आगे बढ़ाया। उनकी रचनाओं में भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, स्त्री की स्थिति, पारिवारिक संबंध, वृद्धावस्था और सामाजिक व्यवस्था की विडंबनाएँ बार-बार दिखाई देती हैं।

प्रस्तुत शोध-पत्र में सतीश राठी की प्रतिनिधि लघुकथाओं, ‘जिस्मों का तिलिस्म’, ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’, का विश्लेषण किया गया है। साथ ही उनके साहित्यिक और संपादकीय योगदान को ‘क्षितिज’ के संदर्भ में देखा गया है। अध्ययन का उद्देश्य राठीजी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के संबंध को समझना है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उनकी लघुकथा का सामाजिक सरोकार केवल समस्या-चित्रण तक सीमित नहीं है। वे व्यवस्था के भीतर मौजूद असमानता को सामने लाते हुए व्यक्ति की गरिमा, नैतिकता और संवेदना के प्रश्न को भी उठाते हैं। उनकी भाषा सामान्य जीवन के करीब है और कथ्य को प्रभावी बनाने के लिए संवाद, प्रतीक, विडंबना और अर्थपूर्ण अंत का उपयोग किया गया है।

बीज शब्द: सतीश राठी, हिंदी लघुकथा, सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना, क्षितिज, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, स्त्री-विमर्श

प्रस्तावना

साहित्य अपने समय से अलग नहीं रह सकता। विशेषकर लघुकथा जैसी विधा के लिए यह बात और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। लघुकथा का आकार तो छोटा होता है, लेकिन उसका अनुभव छोटा नहीं होता। कुछ पंक्तियों में लेखक ऐसी स्थिति सामने रख सकता है जो पाठक को लंबे समय तक सोचने के लिए मजबूर करे।
आधुनिक हिंदी लघुकथा के विकास में मध्यप्रदेश के योगदान पर विचार करें तो, इंदौर इस विकास का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा और इस परिवेश में सतीश राठी की भूमिका विशेष ध्यान खींचती है। राठी ने स्वयं लेखन के साथ-साथ संपादन और अपने साहित्यिक संगठन 'क्षितिज' के माध्यम से भी लघुकथा के विकास में काम किया। उपलब्ध लेखक-परिचयों के अनुसार उनका जन्म 23 फरवरी 1956 को इंदौर में हुआ और उन्होंने एम.कॉम. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में शब्द साक्षी हैं और पिघलती आँखों का सच शामिल हैं। उन्होंने तीसरा क्षितिज, मनोबल और अन्य संकलनों का संपादन भी किया। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com) राठी जी की साहित्यिक पहचान को केवल उनकी व्यक्तिगत रचनाओं के आधार पर समझना अधूरा होगा। ‘क्षितिज’ संस्था और उससे जुड़े प्रकाशन उनके साहित्यिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।  (Sahityakunj)

उनकी लघुकथाओं में सामान्य मनुष्य का जीवन केंद्र में आता है। भूख और गरीबी के प्रसंग हों या भ्रष्ट व्यवस्था की आलोचना, स्त्री-पुरुष संबंध हों या परिवार में बदलते मूल्य—राठी का लेखन अपने समय की सामाजिक बेचैनी से संवाद करता है।

इसी कारण इस अध्ययन का मूल प्रश्न है:
सतीश राठी की लघुकथाएँ सामाजिक यथार्थ को किस तरह मानवीय संवेदना में बदलती हैं और इस प्रक्रिया में उनका कथ्य तथा शिल्प किस प्रकार एक-दूसरे का साथ देते हैं?

2. अध्ययन के उद्देश्य
इस अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं:
  • सतीश राठी के लघुकथा-साहित्य की प्रमुख सामाजिक प्रवृत्तियों की पहचान करना।
  • उनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ के स्वरूप का अध्ययन करना।
  • आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और लैंगिक संबंधों के उनके चित्रण को समझना।
  • उनकी लघुकथाओं में मानवीय संवेदना की भूमिका का विश्लेषण करना।
  • उनकी भाषा और शिल्प की प्रमुख विशेषताओं की पहचान करना।
  • ‘क्षितिज’ के माध्यम से उनके संपादकीय और साहित्यिक योगदान का मूल्यांकन करना।
3. शोध-प्रश्न
अध्ययन निम्न प्रश्नों पर केंद्रित है:
1. सतीश राठी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ किन प्रमुख रूपों में सामने आता है?
2. क्या उनकी लघुकथाएँ केवल सामाजिक विसंगतियों की आलोचना करती हैं, या उनमें मानवीय संबंधों और संवेदना के लिए भी कोई जगह बनती है?
3. आर्थिक असमानता और भूख को प्रस्तुत करने के लिए राठी किन कथात्मक युक्तियों का प्रयोग करते हैं?
4. उनकी लघुकथाओं में स्त्री-पुरुष संबंधों की प्रस्तुति किस प्रकार सामाजिक नैतिकता पर प्रश्न उठाती है?
5. ‘क्षितिज’ के माध्यम से राठी का योगदान उनके व्यक्तिगत लेखन से किस तरह आगे जाता है?

4. शोध-पद्धति
यह अध्ययन गुणात्मक और पाठ-आधारित है। इसमें प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया है। प्राथमिक सामग्री के रूप में सतीश राठी की उपलब्ध लघुकथाओं को लिया गया है। विशेष रूप से ‘जिस्मों का तिलिस्म’, ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’। इन रचनाओं को उपलब्ध ऑनलाइन स्रोतों से भी सत्यापित किया गया है। (रचनाकार)

द्वितीयक सामग्री में लेखक-परिचय, साहित्यिक साक्षात्कार, समीक्षाएँ, ‘क्षितिज’ के इतिहास से संबंधित लेख तथा सतीश राठी के साहित्य पर हुए पूर्व शोध के संदर्भ शामिल हैं। उपलब्ध स्रोत बताते हैं कि विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. स्तर का शोधकार्य किया गया था। (laghukathaduniya.blogspot.com)

अध्ययन में निम्न विश्लेषणात्मक आधार अपनाए गए हैं:
  • विषय-वस्तु का विश्लेषण
  • पात्र और सामाजिक स्थिति का अध्ययन
  • प्रतीक और व्यंजना का अध्ययन
  • संवाद तथा भाषा का विश्लेषण
  • अंत की भूमिका
  • सामाजिक संदर्भ और मानवीय संवेदना का संबंध
यह अध्ययन मात्र लेखक-परिचय प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं है। इसका केंद्र उनकी रचनाओं के भीतर मौजूद सामाजिक अर्थ हैं।

5. पूर्ववर्ती अध्ययन और शोध-अंतराल
सतीश राठी पर उपलब्ध सामग्री को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में देखा जा सकता है।
पहला, लेखक-परिचय और साहित्यिक गतिविधियों से संबंधित सामग्री है। इसमें उनके प्रकाशन, संपादन, पुरस्कार और ‘क्षितिज’ से जुड़े कार्यों का विवरण मिलता है। (Sahityakunj)

दूसरा, उनकी लघुकथाओं और संग्रहों पर लिखी गई समीक्षाएँ हैं। जिस्मों का तिलिस्म पर प्रकाशित समीक्षा में उसकी 72 लघुकथाओं के माध्यम से सामाजिक शोषण, आर्थिक विषमता और मानवीय संवेदना की चर्चा की गई है। समीक्षा उनकी भाषा को सहज और संप्रेषणीय भी मानती है। (hastaksher.com)

तीसरा, विश्वविद्यालयीय शोध का संदर्भ है। 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. शोध का उल्लेख मिलता है। (laghukathaduniya.blogspot.com)

इन स्रोतों से राठी की साहित्यिक स्थिति का एक आधार बनता है, लेकिन उनकी प्रतिनिधि लघुकथाओं को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के परस्पर संबंध के आधार पर एक साथ पढ़ने की आवश्यकता बनी रहती है। प्रस्तुत अध्ययन इसी बिंदु पर अपना ध्यान केंद्रित करता है।

6. सतीश राठी : रचनाकार और संपादक
सतीश राठी का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है। वे लघुकथा के साथ कविता, व्यंग्य, कहानी और निबंध जैसी विधाओं में भी लिखते रहे हैं। (Sahityakunj)

उनका संपादकीय कार्य भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। तीसरा क्षितिज, मनोबल और समक्ष जैसे संकलनों से उनका नाम जुड़ा है। 1991 में समक्ष के माध्यम से मध्यप्रदेश के पाँच लघुकथाकारों की सौ लघुकथाओं को एक साथ प्रस्तुत किया गया था। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है। संपादन किसी विधा के विकास में केवल तकनीकी काम नहीं होता। इससे यह भी तय होता है कि किन रचनाओं को सामने लाया जाए, किन प्रश्नों पर चर्चा हो और नए लेखक किस साहित्यिक वातावरण में प्रवेश करें। राठी जी का ‘क्षितिज’ से जुड़ाव इसी कारण महत्त्वपूर्ण है।

7. ‘क्षितिज’ और लघुकथा का साहित्यिक परिवेश
इंदौर में ‘क्षितिज’ ने लघुकथा को केंद्र में रखकर लंबे समय तक साहित्यिक गतिविधियाँ संचालित कीं। राठी जी के संस्मरणात्मक लेख में इसके विकास, प्रकाशनों और विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। 1986 में 1981 से 1985 तक की श्रेष्ठ लघुकथाओं का संकलन तीसरा क्षितिज प्रकाशित हुआ था। बाद में समक्ष जैसे संकलनों के माध्यम से यह प्रयास आगे बढ़ा। (jangatha.blogspot.com)

‘क्षितिज’ की भूमिका केवल प्रकाशन तक सीमित नहीं रही। इसके माध्यम से लघुकथा की कथावस्तु, शिल्प और आलोचना पर चर्चा हुई। बाद के वर्षों में इससे जुड़े साहित्यिक आयोजनों में देश के विभिन्न क्षेत्रों के लघुकथाकारों की भागीदारी भी दिखाई देती है। (laghukathaduniya.blogspot.com)

मध्यप्रदेश में लघुकथा के विकास पर लिखे गए एक आलेख में भी इंदौर और ‘क्षितिज’ के योगदान को रेखांकित किया गया है। उसमें राठी जी के संपादकीय कार्य और 2018 में अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन के आयोजन में उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है। (Setu)

इसलिए राठी जी की रचनाओं का अध्ययन करते समय ‘लेखक’ और ‘संपादक’ की भूमिकाओं को अलग-अलग करके देखना उचित नहीं होगा। दोनों मिलकर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को पूरा करते हैं।

8. आर्थिक असमानता और भूख
राठी जी की लघुकथाओं का एक मजबूत पक्ष आर्थिक असमानता का चित्रण है। उनके यहाँ गरीबी कोई दूर की समस्या नहीं है। वह पात्र के घर, शरीर और संबंधों में उतरती हुई दिखाई देती है। ‘आटा और जिस्म’ इसका स्पष्ट उदाहरण है। सुजान मशीन दुर्घटना में अपने दोनों हाथ खो देता है और काम करने में असमर्थ हो जाता है। मिलने वाला मुआवजा जल्दी खत्म हो जाता है। उसकी पत्नी रमिया दूसरे लोगों के घरों में काम करके परिवार चलाती है। एक समय ऐसा आता है जब घर में दो दिन से आटा नहीं है। (रचनाकार)
कथा यहीं से अपना असली तनाव पैदा करती है। रमिया किसी तरह आटा लेकर लौटती है और उसे गूँधने लगती है। भूखा सुजान उस आटे और अपनी पत्नी के शरीर के बीच फर्क महसूस नहीं कर पाता। यही वह क्षण है जहाँ शीर्षक अपना पूरा अर्थ खोलता है। ‘आटा’ यहाँ केवल भोजन नहीं है। वह जीवन की मूल जरूरत है। ‘जिस्म’ केवल शरीर नहीं है। वह उस आर्थिक व्यवस्था की ओर संकेत करता है जिसमें भूख मनुष्य की गरिमा तक को संकट में डाल देती है। रचना की ताकत यह है कि लेखक इस स्थिति पर लंबा भाषण नहीं देता। दृश्य स्वयं बोलता है।

9. ‘जिस्मों का तिलिस्म’: शरीर से अस्मिता तक
‘जिस्मों का तिलिस्म’ राठीजी की सामाजिक दृष्टि को समझने वाली महत्त्वपूर्ण रचना है। लघुकथा में राशन की दुकान के सामने खड़े लोग झुके हुए हैं। कथावाचक को वे दूर से ‘सिरकटे जिस्म’ दिखाई देते हैं। जब वह कारण पूछता है तो पता चलता है कि वे पेट भरने के लिए राशन की कतार में खड़े हैं। कथा में उनके हाथों का न होना भी एक महत्त्वपूर्ण संकेत बनता है। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)

यहाँ शरीर का रूपक कई स्तरों पर काम करता है।
  • पहला स्तर है भूख।
  • दूसरा है निर्भरता।
  • तीसरा है असहायता।
  • और चौथा है सामाजिक agency का खो जाना।
हाथ मनुष्य की कार्य-क्षमता और प्रतिरोध की शक्ति का प्रतीक हो सकते हैं। जब हाथ ही नहीं हैं, तो राशन की बंद व्यवस्था के सामने खड़ा व्यक्ति केवल प्रतीक्षा कर सकता है। इस अर्थ में लघुकथा भूख से आगे जाकर नागरिक असहायता की ओर पहुँचती है।

10. भ्रष्टाचार का सामान्यीकरण : ‘पेट का सवाल’
‘पेट का सवाल’ भ्रष्टाचार को लेकर राठी जी की सबसे स्पष्ट और प्रभावशाली रचनाओं में रखी जा सकती है।लघुकथा में सड़क निर्माण के दौरान एक नया मजदूर पर्याप्त डामर मिलाने की कोशिश करता है। ठेकेदार उसे रोकता है और समझाता है कि डामर में कई लोगों का ‘हिस्सा’ है। इसलिए सड़क का अच्छा बन जाना ही समस्या बन जाएगा। (रचनाकार)

यहाँ व्यंग्य का तरीका दिलचस्प है। ठेकेदार भ्रष्टाचार को अपराध नहीं मानता। वह उसे व्यवस्था का सामान्य नियम मानता है और यही लघुकथा का सबसे तीखा बिंदु है।
भ्रष्टाचार तब अधिक खतरनाक हो जाता है जब वह गलत काम नहीं, बल्कि ‘काम करने का तरीका’ बन जाए।शीर्षक ‘पेट का सवाल’ भी इसी दोहरे अर्थ को सामने लाता है। एक तरफ गरीब व्यक्ति की वास्तविक भूख है।दूसरी तरफ उन लोगों की आर्थिक लालसा है जिनका ‘पेट’ कभी भरता नहीं।
राठीजी की व्यंग्यात्मक शक्ति इसी जगह दिखाई देती है। वे भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ अलग से भाषण नहीं देते। वे भ्रष्ट व्यक्ति को अपनी भाषा में बोलने देते हैं। पाठक स्वयं निष्कर्ष तक पहुँचता है।

11. स्त्री और पुरुष के दोहरे नैतिक मानदंड : ‘खुली किताब’
राठी जी की लघुकथाओं में सामाजिक यथार्थ केवल गरीबी या भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है। निजी संबंध भी उनके लिए सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं। ‘खुली किताब’ में पति अपने पुराने प्रेम-प्रसंगों को पत्नी के सामने सहजता से सुनाता है। उसे लगता है कि ऐसा करना उसकी ‘खुली’ और ईमानदार जिंदगी का प्रमाण है। फिर वही व्यक्ति पत्नी से उसके अतीत के बारे में बताने को कहता है। (रचनाकार)

पत्नी का उत्तर लघुकथा की दिशा बदल देता है। वह पूछती है कि अगर उसकी जिंदगी की किताब में भी ऐसे ही कुछ पन्ने हों तो क्या पति उसी तरह मुस्कुरा पाएगा?
पति का मौन उत्तर बन जाता है।
इस लघुकथा में राठी ने स्त्री-विमर्श को किसी नारे के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने घरेलू बातचीत के भीतर मौजूद दोहरे मानदंड को पकड़ा है। पुरुष के लिए जो ‘अनुभव’ है, वही स्त्री के लिए ‘चरित्र’ क्यों बन जाता है?
लघुकथा इसी प्रश्न को पाठक के सामने छोड़ देती है।

12. सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना
राठी जी के साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उनका सामाजिक यथार्थ केवल कठोर नहीं है। उसमें करुणा भी है। जिस्मों का तिलिस्म पर प्रकाशित समीक्षा में भी उनकी रचनाओं को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के मेल के रूप में देखा गया है। समीक्षा विशेष रूप से निम्नवर्गीय जीवन, आर्थिक विषमता और मानवीय स्थिति की ओर ध्यान दिलाती है। (hastaksher.com)

यह बात ‘आटा और जिस्म’ में साफ दिखाई देती है। वहाँ गरीबी केवल आर्थिक तथ्य नहीं है। वह पति-पत्नी के संबंध, शरीर और आत्मसम्मान को प्रभावित करती है।
‘पेट का सवाल’ में भ्रष्टाचार है, लेकिन उसके पीछे सड़क इस्तेमाल करने वाले आम लोगों का जीवन भी है।
‘खुली किताब’ में लैंगिक असमानता है, लेकिन उसके भीतर पति-पत्नी के संबंध की नैतिकता का प्रश्न भी है।
इसलिए राठीजी की लघुकथाओं को केवल ‘सामाजिक समस्या की लघुकथाएँ’ कहना पर्याप्त नहीं होगा।
उनकी चिंता अंततः मनुष्य की स्थिति को लेकर है।

13. सहज भाषा
सतीश राठी की भाषा को समझने के लिए उनकी रचनाओं के संवाद पढ़ लेना पर्याप्त है। ‘पेट का सवाल’ में ठेकेदार जिस तरह बोलता है, वह किसी साहित्यिक भाषण की तरह नहीं लगता। ‘खुली किताब’ में पति-पत्नी की बातचीत भी रोजमर्रा के जीवन के करीब है। (रचनाकार)
यह सहजता उनकी लघुकथाओं को पाठक के करीब लाती है। उनकी भाषा में सामान्यतः छोटे और सीधे वाक्य, बोलचाल के संवाद, पात्रानुकूल शब्द, सीमित लेकिन प्रभावी प्रतीक, और अंत में अर्थ का विस्तार मिलता है।
जिस्मों का तिलिस्म की समीक्षा भी उनकी भाषा को सहज, स्वाभाविक और संप्रेषणीय मानती है। (hastaksher.com)
लघुकथा के लिए यह गुण विशेष महत्त्व रखता है। छोटी रचना में भाषा यदि अनावश्यक रूप से भारी हो जाए तो कथ्य का प्रभाव कम हो सकता है। राठी सामान्यतः इस समस्या से बचते हैं।

14. शीर्षक और प्रतीक
राठीजी की कई लघुकथाओं में शीर्षक स्वयं कथा का अर्थ खोलने की कुंजी बन जाता है।



यहाँ शीर्षक केवल पहचान नहीं है। वह कथा के भीतर प्रवेश करने का रास्ता बन जाता है। ‘आटा और जिस्म’ में दो अलग चीजों को एक साथ रखकर लेखक आर्थिक विवशता की भयावहता को सामने लाता है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में ‘जिस्म’ शब्द व्यक्ति की पहचान को शरीर तक सीमित करने वाली व्यवस्था का संकेत बन जाता है। इस तरह शीर्षक और कथ्य के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है।

15. अंत की भूमिका
लघुकथा के प्रभाव में उसका अंत बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। राठी की प्रतिनिधि रचनाओं में अंतिम स्थिति कथा को नया अर्थ देती है। ‘खुली किताब’ में पति का सिर झुका लेना लघुकथा का निर्णायक क्षण है। लेखक यह नहीं कहता कि पुरुष गलत था। उसका मौन ही यह बात कह देता है। (रचनाकार) ‘पेट का सवाल’ में भ्रष्टाचार को ‘सबके पेट’ से जोड़ना व्यंग्य को अंतिम धार देता है। (रचनाकार) ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में शरीर के हाथों का गायब होना लघुकथा के सामाजिक अर्थ को अचानक गहरा कर देता है। (pradeepkant.blogspot.com) इस प्रकार अंत केवल घटना को समाप्त नहीं करता। वह पाठक की सोच को आगे बढ़ाता है।

16. राठी के साहित्य में निम्नवर्गीय जीवन
राठी की सामाजिक दृष्टि का सबसे मजबूत क्षेत्र निम्न और निम्न-मध्यवर्गीय जीवन दिखाई देता है। उनके पात्र बड़े शहरों की चमकदार दुनिया के केंद्र में नहीं हैं। वे अक्सर उस दुनिया के किनारे खड़े हैं।
  • राशन की कतार में खड़े लोग।
  • मशीन दुर्घटना के बाद काम खो चुका मजदूर।
  • दूसरों के घरों में काम करने वाली स्त्री।
  • भ्रष्ट ठेकेदारी व्यवस्था में काम करता मजदूर।
इन पात्रों के माध्यम से राठी उस समाज को सामने लाते हैं जो अक्सर साहित्य और सार्वजनिक विमर्श में दिखाई तो देता है, लेकिन उसकी आवाज कम सुनाई देती है। जिस्मों का तिलिस्म की समीक्षा में भी उच्चवर्गीय जीवन और निम्नवर्गीय विवशता के बीच मौजूद आर्थिक अंतर को राठी के लेखन की प्रमुख विशेषता माना गया है। (hastaksher.com)

17. व्यवस्था-बोध
राठीजी की रचनाओं में व्यक्ति और व्यवस्था के बीच तनाव बार-बार आता है। व्यक्ति अकेला है - व्यवस्था बड़ी है। लेकिन उनकी लघुकथा इस असमानता को केवल स्वीकार नहीं करती। वह उसे दिखाती है और पाठक को असहज करती है। ‘पेट का सवाल’ में व्यवस्था भ्रष्टाचार को सामान्य बनाती है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ में व्यवस्था के सामने व्यक्ति के हाथ ही नहीं बचे। ‘आटा और जिस्म’ में आर्थिक व्यवस्था व्यक्ति की देह तक पहुँच जाती है। इन रचनाओं को साथ पढ़ने पर एक साझा प्रश्न उभरता है:
क्या आर्थिक और संस्थागत व्यवस्था मनुष्य की गरिमा से बड़ी हो सकती है?
राठीजी का साहित्य इस प्रश्न का सीधा सैद्धांतिक उत्तर नहीं देता। वह ऐसी स्थितियाँ बनाता है जिनमें पाठक स्वयं उत्तर खोजे।

18. साहित्यिक योगदान और पुरस्कार
राठी की साहित्यिक सक्रियता को विभिन्न स्तरों पर मान्यता मिली है। उनके लेखक-परिचय में शब्द साक्षी हैं के लिए 2006 में साहित्य कलश, इंदौर द्वारा ईश्वर पार्वती स्मृति सम्मान का उल्लेख है। 2012 में लघुकथा के क्षेत्र में योगदान के लिए माँ शरबती देवी सम्मान मिलने की जानकारी भी उपलब्ध है। (Sahityakunj)
लेकिन उनके योगदान को केवल पुरस्कारों से नहीं आँका जाना चाहिए। उनकी वास्तविक उपलब्धि उनके लंबे साहित्यिक जुड़ाव में दिखाई देती है। उन्होंने लिखा भी, संपादित भी किया और लघुकथा को लेकर साहित्यिक गतिविधियाँ भी संचालित कीं। यही तीनों स्तर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाते हैं।

19. अकादमिक स्वीकृति
सतीश राठी के साहित्य पर विश्वविद्यालय स्तर पर शोध हुआ है। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ विषय पर एम.फिल. शोधकार्य किया गया था। (laghukathaduniya.blogspot.com)
यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि राठी जी का साहित्य केवल समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं तक सीमित नहीं रहा। उस पर अकादमिक स्तर पर भी विचार हुआ। हालाँकि वर्तमान अध्ययन उस पूर्व शोध की पुनरावृत्ति नहीं करता। इसका जोर विशेष रूप से सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के संबंध पर है।

20. चर्चा
अब तक के विश्लेषण से राठीजी की लघुकथा-दृष्टि के कुछ स्पष्ट बिंदु सामने आते हैं।
  • पहला, उनका यथार्थ जमीन से जुड़ा है। वे बड़े सिद्धांतों को पात्रों की रोजमर्रा की जिंदगी में पकड़ते हैं।
  • दूसरा, उनके यहाँ आर्थिक प्रश्न बहुत बार नैतिक प्रश्न बन जाता है। भूख केवल भोजन की कमी नहीं रहती। वह गरिमा और निर्णय की स्वतंत्रता को भी प्रभावित करती है।
  • तीसरा, उनका व्यंग्य व्यवस्था को बाहर से देखकर नहीं आता। कई बार व्यवस्था के भीतर का पात्र ही अपनी भाषा में उसकी पोल खोल देता है।
  • चौथा, स्त्री-पुरुष संबंधों में वे बराबरी और दोहरे मानदंड पर प्रश्न उठाते हैं।
  • पाँचवाँ, उनकी भाषा सहज है। यह सहजता उनकी रचनाओं को सरल बनाती है, लेकिन उनका अर्थ सरल नहीं करती।
  • और अंत में, राठी की लघुकथाओं में संवेदना और सामाजिक आलोचना साथ-साथ चलती हैं।
21. निष्कर्ष
सतीश राठी की लघुकथाएँ अपने समय और समाज को देखने का एक मानवीय तरीका प्रस्तुत करती हैं। उनके यहाँ गरीबी केवल आँकड़ा नहीं है। वह भूखे शरीर की पीड़ा है। भ्रष्टाचार केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है। वह उस सड़क की खराबी है जिस पर आम आदमी चलता है। लैंगिक असमानता केवल सामाजिक सिद्धांत नहीं है। वह पति-पत्नी के बीच बोले गए एक छोटे-से वाक्य में सामने आ सकती है। यही उनकी लघुकथा की खासियत है।
‘आटा और जिस्म’ में भूख और शरीर का संबंध सामाजिक व्यवस्था की कठोरता को सामने लाता है। ‘पेट का सवाल’ भ्रष्टाचार के सामान्यीकरण पर चोट करती है। ‘जिस्मों का तिलिस्म’ भूख, असहायता और नागरिक अस्मिता का तीखा रूपक बन जाती है। ‘खुली किताब’ निजी संबंधों के भीतर छिपे लैंगिक दोहरेपन को उजागर करती है। (रचनाकार)
राठीजी की साहित्यिक भूमिका इन रचनाओं से भी आगे जाती है। ‘क्षितिज’ के माध्यम से उन्होंने लघुकथा को केवल लिखने की विधा नहीं रहने दिया; उसके लिए एक साहित्यिक संवाद का वातावरण तैयार किया। तीसरा क्षितिज और समक्ष जैसे संपादित संकलन तथा लंबे समय तक किया गया संपादकीय कार्य इस बात का प्रमाण हैं। (jangatha.blogspot.com)
इसलिए सतीश राठी का मूल्यांकन केवल उनके लघुकथा-संग्रहों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। उनका साहित्यिक अवदान तीन स्तरों पर दिखाई देता है—रचना, संपादन और लघुकथा-संवर्धन।
उनकी श्रेष्ठ लघुकथाएँ पाठक को कोई तैयार निष्कर्ष नहीं देतीं। वे एक स्थिति सामने रखती हैं और फिर चुप हो जाती हैं। उस चुप्पी में प्रश्न बचा रहता है।
और यही उनकी लघुकथा की सबसे बड़ी शक्ति है।

संदर्भ सूची
  • राठी, सतीश. शब्द साक्षी हैं. लघुकथा-संग्रह, 2002. इस प्रकाशन वर्ष का उल्लेख उपलब्ध लघुकथा-सूची में मिलता है। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • राठी, सतीश. जिस्मों का तिलिस्म. ऋषिराज प्रकाशन, ग्राम ईटावदी, तहसील महेश्वर, जिला खरगोन, मध्य प्रदेश. ISBN 978-81-956080-2-7. उपलब्ध समीक्षा के अनुसार संग्रह में 72 लघुकथाएँ हैं। (hastaksher.com)
  • राठी, सतीश. ‘आटा और जिस्म’, ‘पेट का सवाल’ और ‘खुली किताब’. रचनाकार, 26 अक्टूबर 2018. (रचनाकार)
  • राठी, सतीश. ‘जिस्मों का तिलिस्म’. विभिन्न साहित्यिक प्रकाशनों में प्रकाशित पाठ। उपलब्ध पाठ के आधार पर अध्ययन। (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • राठी, सतीश. ‘लघुकथा, इंदौर और क्षितिज’. जनगाथा, 2022. (jangatha.blogspot.com)
  • द्वितीयक स्रोत
  • गिरकर, दीपक. ‘जिस्मों का तिलिस्म: मानवीय संवेदनाओं के विविध रंगों से रूबरू करवाती लघुकथाएँ’. हस्ताक्षर, अगस्त 2023. (hastaksher.com)
  • सुपेकर, संतोष. ‘लघुकथा और उज्जैन’. लघुकथा दुनिया. (laghukathaduniya.blogspot.com)
  • ‘मध्यप्रदेश में लघुकथा, अतीत और वर्तमान’. सेतु. 2018. (Setu)
  • ‘सतीश राठी’. साहित्य कुंज. लेखक-परिचय एवं कृतियों की सूची. (Sahityakunj)
  • ‘सतीश राठी’. लघुकथा-वार्ता, मार्च 2017. लेखक-परिचय एवं कृतियों की जानकारी. (wwwlaghukatha-varta.blogspot.com)
  • ‘साहित्य समाचार // प्राची—फरवरी 2018’. रचनाकार. ‘क्षितिज’ की साहित्यिक गतिविधियों संबंधी विवरण. (रचनाकार)
  • सुपेकर, संतोष. ‘लघुकथा और उज्जैन’. (विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 2003 में भारती ललवानी द्वारा डॉ. शैलेंद्र कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए एम.फिल. शोध ‘लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान’ का उल्लेख) (laghukathaduniya.blogspot.com)

रविवार, 21 अप्रैल 2024

लघुकथा और उज्जैन / सन्तोष सुपेकर

उज्जैन के पिछले 43 वर्षों का लघुकथा का इतिहास 



भगवान महाकाल, कवि कालिदास और गुरु गोरखनाथ का नगर है उज्जैन। यहाँ प्रतिवर्ष भव्य 'कालिदास समारोह' का आयोजन होता है और प्रति बारह वर्ष में सिंहस्थ (कुंभ ) मेला लगता है जिसमें करोड़ों श्रद्धालु आते हैं। मध्यप्रदेश के गठन के  बाद सबसे पहले विश्वविद्यालय की स्थापना उज्जैन में ही हुई थी।

साहित्य की हर विधा की तरह लघुकथा क्षेत्र में भी उज्जैन में काफी सृजन कार्य  हुए हैं। 1981 में डॉ राजेन्द्र सक्सेना (अब स्वर्गीय) का संग्रह 'महंगाई अदालत में हाजिर हो' प्रकाशित हुआ था। कुछ वर्षों  के बाद 1990 में श्रीराम दवे के सम्पादन में  लघुकथा फोल्डर  'भूख के डर से' प्रकाशित हुआ था। 1996 में डाक्टर शैलेन्द्र पाराशर के सम्पादन में साहित्य मंथन संस्था से लघुकथा संकलन 'सरोकार' का प्रकाशन हुआ था जिसमें 20 रचनाकार शामिल थे। सन् 2000 में स्व. श्री अरविंद नीमा 'जय' की लघुकथाओं का  संग्रह 'गागर में सागर' नाम से प्रकाशित हुआ था जिसे उनके परिवार ने उनके देहावसान के बाद प्रकाशित करवाया था। इसमें उनकी 32 हिंदी और 22 मालवी बोली की लघुकथाएँ शामिल थीं। वर्ष 2002 में डाक्टर प्रभाकर शर्मा और सरस निर्मोही के सम्पादन में 'सागर के मोती' लघुकथा संकलन प्रकाशित हुआ  जिसमें उस समय आयोजित एक लघुकथा प्रतियोगिता के विजेताओं की भी रचनाऐं शामिल थीं। 2003 में श्रीराम दवे के सम्पादन में "त्रिवेणी"लघुकथा संकलन प्रकाशित हुआ जिसमें योगेन्द्रनाथ शुक्ल,सुरेश शर्मा(अब स्वर्गीय) और प्रतापसिंह सोढ़ी की लघुकथाएं शामिल थीं। बैंककर्मियों की साहित्यिक संस्था 'प्राची' ने  सन् 2001-2002 के दरम्यान उज्जैन में लघुकथा गोष्ठियांँ आयोजित की थीं। इसी प्रकार श्री जगदीश तोमर  के निर्देशन में प्रेमचंद सृजन पीठ, उज्जैन ने भी लघुकथा गोष्ठियांँ आयोजित की थीं। बाद के वर्षों में  विभिन्न लघुकथाकारों के संग्रह/संकलन  प्रकाशित हुए जिनका वर्णन निम्नानुसार है--

1. श्रीमती  मीरा जैन का"मीरा जैन की सौ लघुकथाएं" वर्ष 2003 में, 

2. सतीश राठी के सम्पादन में सन्तोष सुपेकर और राजेंद्र नागर 'निरन्तर' का संयुक्त लघुकथा संकलन 'साथ चलते हुए' वर्ष  2004 में,  इसी वर्ष मृदुल कश्यप का  मात्र  11 लघुकथाओं का संग्रह " माँ के लिए " प्रकाशित हुआ। 

3. सन्तोष सुपेकर का 'हाशिये का आदमी' वर्ष 2007 में,

4. राधेश्याम पाठक 'उत्तम' ( अब स्वर्गीय) का  लघुकथा  संग्रह 'पहचान' वर्ष 2008 में, 

5. इसी वर्ष श्री पाठक का मालवी बोली में लघुकथा संग्रह 'नी तीन में, नी तेरा में', 

6. 2009 में  मोहम्मद आरिफ का 'अर्थ के आँसू' प्रकाशित हुआ। 

7. सन 2009 में  ही राधेश्याम पाठक 'उत्तम' का संग्रह 'बात करना बेकार है' 

8. सन्तोष सुपेकर का' बन्द आँखों का समाज' वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ। 

9. 2010 में ही मीरा जैन का  '101 लघुकथाएं',  

10. मोहम्मद आरिफ का ' 'गांधीगिरी' लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुआ। 

11. 2011 में शब्दप्रवाह'  साहित्यिक संस्था द्वारा 198 लघुकथाकारों की रचनाओं से युक्त लघुकथा विशेषांक  संदीप 'सृजन' और कमलेश व्यास 'कमल' के सम्पादन में निकला। 

12. वर्ष  2011 में  ही राजेंद्र नागर 'निरन्तर' का 'खूंटी पर लटका सच' प्रकाशित हुआ ।

13. वर्ष  2012 में प्रेमचंद सृजनपीठ, उज्जैन द्वारा प्रोफेसर बी. एल. आच्छा के सम्पादन में देशभर के 229 लघुकथाकारों का विशाल  242 पृष्ठों का लघुकथा संकलन 'संवाद सृजन' प्रकाशित हुआ। 14. सन् 2012  में ही डाक्टर संदीप नाड़कर्णी के संकलन 'नौ दो ग्यारह' में 11 लघुकथाएं संकलित थी।

15. इसी वर्ष राधेश्याम पाठक 'उत्तम' का संग्रह "पहचान"प्रकाशित हुआ। 

16. वर्ष 2013 में सन्तोष सुपेकर का लघुकथा संग्रह "भ्रम के बाज़ार में"   प्रकाशित हुआ जिसमे 153 लघुकथाएं थी।

17. वर्ष 2013 में ही सन्तोष सुपेकर के सम्पादन में राजेंद्र देवधरे 'दर्पण' और राधेश्याम पाठक 'उत्तम' की  लघुकथाओं का फोल्डर 'शब्द सफर के साथी' प्रकाशित हुआ।

18. इसी वर्ष (2013 में) कोमल वाधवानी 'प्रेरणा' का  संग्रह 'नयन नीर' प्रकाशित हुआ जिसमे उनकी 100 लघुकथाएं शामिल  हैं। उल्लेखनीय है कि 'प्रेरणा' जी दृष्टिबाधित रचनाकार हैं। 

19. 'बंद आँखों का समाज' (संतोष सुपेकर) का मराठी संस्करण 'डोलस पण अन्ध समाज' (अनुवादक श्रीमती आरती कुलकर्णी) भी 2013 में निकला। 

20. 2015 मे कोमल वाधवानी  'प्रेरणाजी' का 104 लघुकथाओं का दूसरा लघुकथा संग्रह 'कदम कदम पर' प्रकाशित हुआ।

21-23. वर्ष 2016 में वाणी दवे का 'अस्थायी चारदीवारी', कोमल वाधवानी 'प्रेरणा' का  'यादों का दस्तावेज', (124 लघुकथाएँ)मीरा जैन का 'सम्यक लघुकथाएं' लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुए।

24. वर्ष 2017 में सन्तोष सुपेकर का चौथा लघुकथा संग्रह 'हँसी की चीखें' प्रकाशित हुआ जिसमें 101 लघुकथाएँ संगृहीत हैं।

25. 2018 में डाक्टर वन्दना गुप्ता के संकलन 'बर्फ में दबी आग' में  कुछ लघुकथाएँ सकलित थीं। इसी वर्ष माया बदेका का लघुकथा संग्रह '  माया '  प्रकाशित हुआ। 

26. 2019 में मीरा जैन का 'मानव मीत लघुकथाएं" प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष हिन्दी -

मालवी की प्रख्यात लेखिका माया मालवेंद्र  बधेका  का लघुकथा संग्रह ' माया'  ई बुक  स्वरूप में प्रकाशित हुआ।   इसी वर्ष डॉ.क्षमा सिसोदिया का '  कथा सीपिका'  प्रकाशित हुआ जिसमें 76 लघुकथाएँ थीं l


27-   2020 में सन्तोष सुपेकर का पाँचवा लघुकथा संग्रह "सांतवें पन्ने की खबर"प्रकाशित हुआ जिसमे 112 लघुकथाएं संकलित हैं।

28- 2021 में उज्जैन के सन्तोष सुपेकर और इंदौर के राममूरत 'राही' के सम्पादन में, देश का पहला, अनाथ जीवन पर आधारित लघुकथा संकलन "अनाथ जीवन का दर्द"अपना प्रकाशन भोपाल के सहयोग से प्रकाशित हुआ। डॉ क्षमा सिसोदिया का  '  भीतर कोई बन्द है'  लघुकथा संग्रह भी इस वर्ष प्रकाशित हुआ जिसमें 67 लघुकथाएँ शामिल थींl इसी वर्ष माया बदेका का 'सांवली' भी प्रकाशित हुआ। 

29. 2021 में ही उज्जैन के सन्तोष सुपेकर के सम्पादन ,संयोजन में लघुकथा साक्षात्कार का संकलन "उत्कण्ठा के चलते" एच आई पब्लिकेशन ,उज्जैन से प्रकाशित हुआ जिसमें लघुकथा से जुड़े मध्यप्रदेश के सात लघुकथाकारों /समीक्षकों सर्वश्री सूर्यकान्त नागर,सतीश राठी,डॉ शैलेन्द्रकुमार शर्मा,डॉ पुरुषोत्तम दुबे ,कान्ता रॉय,वसुधा गाडगीळ और अंतरा करवड़े के साथ ही तीन अन्य विधाओं से जुड़ी हस्तियों डॉक्टर पिलकेन्द्र अरोरा (व्यंग्य) सन्दीप राशिनकर (चित्रकला)अमेरिका निवासी श्रीमती वर्षा हलबे (शास्त्रीय गायन ,कविता )और लघुकथा के एक सामान्य पाठक श्री संजय जौहरी से भी लघुकथा को लेकर प्रश्न पूछे गए थे।

2021 में डॉक्टर  सन्दीप नाडकर्णी का लघुकथा संग्रह "हम हिंदुस्तानी"प्रकाशित हुआ जिसमें 51 लघुकथाएं हैं। इसी वर्ष श्रीमती कोमल वाधवानी 'प्रेरणा'का चौथा लघुकथा संग्रह 'रास्ते और भी हैं'प्रकाशित हुआ।उज्जैन के शिक्षाविद श्री रामचन्द्र धर्मदासानी का पहला लघुकथा संग्रह '  रैतीली  प्रतिध्वनि' भी 2021 में  प्रकाशित हुआ जिसमे 122 लघुकथाएँ संकलित हैं।

32. 2022 में सन्तोष सुपेकर का छठवाँ लघुकथा संग्रह 'अपकेन्द्रीय बल' एच आई पब्लिकेशन ,उज्जैन से प्रकाशित हुआ जिसमे 154 लघुकथाएँ शामिल हैं।2022 में ही नवोदित लेखिका हर्षिता रीना राजेन्द्र का संकलन "सदा सखी रहो "का उज्जैन में विमोचन हुआ जिसमे कुछ लघुकथाएँ भी सम्मिलित हैं। 2022 में माया मालवेंद्र 

बदेका का 'साँवली'  लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमें 25  लघुकथाएँ 'साँवली' शीर्षक से प्रकाशित हैं। इसी वर्ष मीरा जैन का लघुकथा संग्रह'  भोर में भास्कर'  प्रकाशित हुआ जिसमें 101 लघुकथाएँ हैं l


  2022 में ही सन्तोष सुपेकर की दो लघुकथाओं 'तकनीकी ड्रॉ बेक'और 'अंतिम इच्छा'पर बिहार के अभिनेता श्री अनिल पतंग ने शार्ट फिल्म्स बनाईं।इसी वर्ष  श्रीमती कल्पना भट्ट(भोपाल) ने उज्जैन के सन्तोष सुपेकर के चार लघुकथा संग्रहों (बन्द आँखों का समाज,भ्रम के बाज़ार में ,हँसी की चीखें और सातवें पन्ने की खबर )में से 14-14 ,कुल 56 लघुकथाएं चयन कर उन्हें  अंग्रेजी में अनूदित किया जिसे ख्यात लघुकथाकार उदयपुर के डॉक्टर चंद्रेश छतलानी ने संकलित कर 'Selected Laghukathas  of Santosh Supekar' शीर्षक से प्रकाशित करवाया। 2022 के जुलाई माह से उज्जैन के दैनिक जन टाइम्स में सन्तोष सुपेकर के संपादन में साहित्यिक स्तम्भ ' जन साहित्य ' का प्रकाशन आरम्भ हुआ जिसमें प्रति सोमवार, गुरुवार और शनिवार को   देश - विदेश  के   लेखकों की सिर्फ लघुकथा   , सम्पादक की विशेष टिप्पणी के साथ प्रकाशित की जा रही है। जन टाइम्स प्रबंधन द्वारा  इस स्तम्भ में प्रकाशित  राजेंद्र वामन काटधरे( ठाणे, महाराष्ट्र) की लघुकथा '  अंधेरे के खिलाफ'  को  वर्ष की सर्वश्रेष्ठ  लघुकथा का प्रमाण पत्र और नकद राशि भी प्रदान की गई l


  2023 में श्री निराला साहित्य मण्डल, उज्जैन द्वारा डॉ प्रभाकर शर्मा और पंडित 

आनंद चतुर्वेदी के संपादन में लघुकथा संकलन 'अपने लोग'  प्रकाशित हुआ जिसमें 56 से अधिक लघुकथाकारों की रचनाएँ सम्मिलित थीं, इसी वर्ष डॉक्टर क्षमा सिसोदिया का '  बटुआ '  लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमें 130 लघुकथाएँ हैं l2023 में ही कोमल वाधवानी '  प्रेरणा'  का बाल लघुकथा संग्रह '  हिप- हिप - हुर्रे'  प्रकाशित हुआ जिसमें 102 लघुकथाएँ हैं । 2023 में ही केरल के तिरुअनंतपुरम से ' हिन्दी की चुनिंदा लघुकथाएँ' मलयालम भाषा में प्रकाशित हुई जिसमें उज्जैन के सन्तोष सुपेकर सलाहकार सम्पादक थे। 

2024 में सन्तोष सुपेकर का आठवां लघुकथा संग्रह ' प्रस्वेद का स्वर '  प्रकाशित हुआ।  श्रमिक के  चित्र वाले मुखपृष्ठ से सज्जित इस संग्रह में कुल 101 लघुकथाएँ हैं  जिनमें बारह  लघुकथाओं के केन्द्र में श्रमिक हैं। 


इनके अलावा संस्था 'सरल काव्यांजलि, उज्जैन' द्वारा वर्ष  2018  एवम्  2019 में  समय-समय पर लघुकथा कार्यशालाएँ आयोजित की गईं जिसमें  डाक्टर उमेश महादोषी, श्यामसुंदर अग्रवाल, डाक्टर बलराम अग्रवाल, जगदीश राय कुलारियाँ, माधव नागदा, सतीश राठी, बी. एल. आच्छा, रामयतन यादव ,कान्ता रॉय जैसी लघुकथा जगत की ख्यात हस्तियों ने शिरकत की।  सरल काव्यांजलि संस्था ने  2020 के हिन्दी दिवस ,14 सितंबर से देश की लघुकथा से जुड़ी हस्तियों को सम्मानित करने का निश्चय किया। 2020 में सूर्यकान्त नागर,सतीश राठी, कान्ता रॉय , 2021 में योगराज प्रभाकर,डॉक्टर उमेश महादोषी ,राममूरत 'राही'और मृणाल आशुतोष  ( रवि प्रभाकर स्मृति)को 2022 में  श्री बिनोय कुमार दास, डॉ चन्द्रेश छतलानी, अनिल पतंग, कल्पना भट्ट(रवि प्रभाकर स्मृति)  और 2023 में  श्री मधुकांत, जगदीश राय कुलारियाँ, अंतरा करवडे और वीरेंदर वीर मेहता ( रवि प्रभाकर स्मृति)डिजिटल सम्मान प्रदान किये गए।शहर के साहित्यकार  सन्तोष सुपेकर ने अनेक रचनाकारों की लघुकथाओं का अंग्रेजी अनुवाद भी किया है जो प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपता रहा है।उन्होंने लघुकथा  और सम्बन्धित आलेखों  को पाठ्यक्रमों में शामिल करने हेतु केंद्र और राज्य सरकारों को लगातार  पत्र भी लिखे हैं।वर्ष 2022 से इस विषय पर  प्रति माह एक पत्र केंद्रीय शिक्षा मंत्री को लिख रहे हैं। सर्वश्री सतीश राठी, राजेन्द्र नागर 'निरन्तर' और सन्तोष सुपेकर की 20-20 लघुकथाओं का अनुवाद बांग्ला भाषा में   श्री हीरालाल मिश्र ने किया है ।सन्तोष सुपेकर के लघुकथा अवदान पर लघुकथा कलश ,पटियाला ,पंजाब में आलेख भी प्रकाशित हुआ है।श्री सुपेकर की लघुकथाओं पर कनाडा के कुसुम ज्ञवाली और नेपाल की रचना शर्मा ने नेपाली भाषा मे अभिनयात्मक वाचन किया है।दिसम्बर 2021 में सरल काव्यांजलि संस्था उज्जैन  ने नए लघुकथाकारों के लिए कार्यशाला आयोजित की जिसमें डॉक्टर शेलेन्द्रकुमार शर्मा और सन्तोष सुपेकर ने नए लेखकों की समस्याओं ,उत्सुकताओं के उत्तर दिए।

   

     विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में डाक्टर शैलेन्द्र कुमार शर्मा के निदेशन में कुमारी भारती ललवानी द्वारा 2003 में  'लघुकथा परम्परा में सतीश राठी का योगदान' विषय पर एम. फिल. स्तर का शोधकार्य हुआ। इसी प्रकार  'मीरा जैन की लघुकथाओं का अनुशीलन' विषय पर प्रशांत कुशवाहा ने डाक्टर गीता नायक के निदेशन में  विक्रम विश्वविद्यालय में शोध प्रस्तुत किया। यहीं पर डॉक्टर धर्मेंद्र वर्मा ने लघुकथाकार स्व. चन्द्रशेखर दुबे के साहित्य पर शोध किया ।डॉ . सतीश दुबे (अब स्मृति शेष)पर आगर के डॉक्टर पी.एन. फागना ने 2009 में 'मध्यप्रदेश की लघुकथा परम्परा में डॉक्टर सतीश दुबे  का योगदान 'विषय पर  विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में शोध कार्य किया है।  वर्ष 2022 से श्रीमती अनीता मेवाडा ने   डॉ निलिमा वर्मा और डॉ शैलेंद्र कुमार शर्मा के निदेशन में " मालवांचल की लघुकथा  परम्परा और सन्तोष सुपेकर का प्रदेय " पर श्रीमती अनीता मेवाड़ा द्वारा  विक्रम विश्वविद्यालय में शोध कार्य जारी  है।  , 2023 के अक्टूबर में सरल काव्यांजलि की एक लघुकथा गोष्ठी डॉक्टर वन्दना गुप्ता के निवास पर हुई जिसमे   वरिष्ठ लघुकथाकारों  डॉ बलराम अग्रवाल( नई दिल्ली), मृणाल आशुतोष, ( समस्तीपुर, बिहार) और हनुमान प्रसाद मिश्रा ( अयोध्या) ने लघुकथाएँ सुनाइं l डॉक्टर क्षमा सिसोदिया ने उज्जैन के रेडियो दस्तक पर डॉ.बलराम अग्रवाल का लघुकथा  विषयक साक्षात्कार   लिया है l  रेडियो दस्तक, उज्जैन  पर राजेंद्र नागर ' निरंतर' , सन्तोष सुपेकर और आकाशवाणी इंदौर पर सन्तोष सुपेकर ,गिरीश पंड्या ने  अपनी  लघुकथाओं का पाठ भी किया है। 


    लघुकथा जगत के प्रमुख हस्ताक्षर श्री विक्रम सोनी (अब स्वर्गीय) भी उज्जैन से सम्बद्ध रहे हैं। संस्था 'सरल काव्यांजलि' ने वर्ष 2013 में उनके निवास पर जाकर श्री सोनी का सम्मान किया था। उज्जैन के ही डॉक्टर प्रभाकर शर्मा,सरस निर्मोही, ओम  व्यास 'ओम' (दोनो अब स्मृति शेष) मुकेश जोशी,स्वामीनाथ पांडेय, शेलेंद्र पाराशर, भगीरथ बडोले,सन्दीप सृजन,श्रीराम दवे,डॉक्टर क्षमा सिसोदिया, प्रवीण देवलेकर, रमेश  करनावट ,समर कबीर,दिलीप जैन,आशीष 'अश्क,के.एन शर्मा,रमेशचन्द्र शर्मा,पिलकेन्द्र अरोरा, आशीषसिंह जौहरी,आशागंगा शिरढोणकर, गोपालकृष्ण निगम,  गिरीश पंड्या,बृजेन्द्रसिंह तोमर,डाक्टर घनश्यामसिंह,गड़बड़ नागर ,डॉ रामसिंह यादव,रमेश मेहता 'प्रतीक',गफूर स्नेही,डॉक्टर हरिशकुमार सिंह,योगेंद्र माथुर,श्रद्धा गुप्ता , चित्रा जैन, मानसिंह शरद ,  राजेंद्र देवधरे, डॉ राजेश रावल,  दिलीप जैन और झलक निगम ( अब स्वर्गीय) ने भी अनेक लघुकथाएँ लिखी हैं।  गिरीश पंड्या की लघुकथाएँ  आकाशवाणी पर प्रसारित हुई हैं।इसी प्रकार सतीश राठी और श्याम गोविंद  ने भी उज्जैन में रहकर लघुकथा क्षेत्र में काफी सृजन किया है।उज्जैन जिले की तराना तहसील से डाक्टर इसाक 'अश्क' और श्री सुरेश शर्मा  (अब दोनों स्वर्गीय) के संयुक्त सम्पादन में 'समांतर' पत्रिका का लघुकथा  विशेषांक  2001 में निकला था जिसमे 9 आलेख और प्रतिनिधि लघुकथाकारों की रचनाएँ शामिल थी।


 कनकश्रृंगा नगरी में अभी भी लघुकथा को लेकर अनेक  सम्भावनाएं हैं।

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संपर्क : सन्तोष सुपेकर, 31, सुदामा नगर,उज्जैन

गुरुवार, 24 नवंबर 2022

लघुकथा में विक्रम-बैताल शैली | डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

बैताल पच्चीसी (वेतालपञ्चविंशतिः) की छोटी-कथाओं की तरह ही लघुकथा में भी इस शैली का प्रयोग किया जा सकता है. बैताल पच्चीसी के शिल्प की बातों के अतिरिक्त इस शैली में मेरे अनुसार निम्न बातों पर ध्यान दिया जा सकता है:

  • मूल बैताल पच्चीसी में बैताल द्वारा कहीं छोटी कहानी तो कहीं लघुकथा भी कही गई है, लेकिन इसमें बैताल द्वारा कही गई लघुकथा ही हो (एकांगी स्वरुप हो.) हालांकि इस बात का एक पक्ष यह भी है कि चूँकि बैताल कह रहा है अतः यह अपने आप में एकांगी है और तब उसकी कथा में छूट ली जा सकती है, ठीक उसी प्रकार जैसे फ्लैशबैक तकनीक, डायरी शैली आदि में रचनाकर्म किया जाता है. आगे जो पहली रचना है उसे कुछ ऐसा ही रखा गया है.
  • बैताल द्वारा सुनाई जा रही कथा स्पष्ट हो.
  • बैताल द्वारा सुनाई जा रही कथा को बैताल द्वारा ही अंतिम स्वरुप न देकर उसे इस तरह से आगे बढाना है कि अंत तक आते-आते वह रचना एक प्रश्न का सर्जन कर ले.
  • उपरोक्त बिंदु में कहा गया प्रश्न ही बैताल विक्रम से पूछे और विक्रम उसका उत्तर दे. इस भाग (उत्तर) में जो विशेष बात मुझे समझ में आती है कि लघुकथा का एलिमेंट ऑफ़ सरप्राइज़ या वास्तविक विषय विक्रम के उत्तर में उजागर हो सकता है.
  • बाकी रचना के प्रारम्भ में विक्रम द्वारा बैताल को पेड़ से उतार कर कंधे पर लादना, बैताल द्वारा मौन रहने की शर्त और अंत में फिर उड़ जाना, वो तो हो ही सकता है.

किसी भी शैली में सुधार सतत प्रक्रिया है. लेखक/लेखिकाएं केवल उपरोक्त बिन्दुओं पर ही निर्भर न रहें, स्वयं भी सोचें व प्रयोग करें. निवेदन है. उपरोक्त बिन्दुओं में कमियाँ भी हो सकती हैं. आप सभी की सलाहों का स्वागत है.

यहाँ पहले विक्रम-बेताल शैली की लघुकथा व शैली का थोड़ा सा प्रयोग कर एक अन्य लघुकथा का प्रयास किया है, यह दोनों रचनाएं निम्न हैं:

बातों के पीछे / चंद्रेश कुमार छतलानी

(प्रथम ड्राफ्ट)

बैताल को पकड़ने विक्रम फिर श्मशान में पेड़ पर लटके बैताल के पास गया। उसे उतारकर अपने कंधे पर लादा और ले चला। बैताल ने हँसते हुए एक कथा फिर, विक्रम के मौन रहने की शर्त के साथ, कहनी शुरू की। कथा इस तरह से थी,

एक राजा ने उसके राज्य में सोने के सिक्कों का चलन बंद कर ताम्बे के सिक्के शुरू कर दिए। दोनों धातुओं की मुद्राओं का मूल्य और वज़न बराबर था। राजा और उसके मंत्रियों ने जनता से कहा कि एक तो सोने के सिक्के महंगे पड़ते हैं और इसका संग्रह कर लोग इस चमकती धातु से काला धन इकठ्ठा कर रहे हैं। अतः यह बदल दी गई है। सभी को आदेश दिया जाता है कि दस दिनों के अंदर-अंदर सभी पुरानी मुद्रा को नई से बदलवा लें, उसके बाद जिस किसी के पास भी पुरानी मुद्रा पाई गई उसे दण्ड मिलेगा।

राजा के कुछ विरोधी बहुत धनवान थे और उनके पास बहुत सारे सोने की मुद्राएं जमा की हुईं थी, उन्हें चिंता हो गई क्योंकि अब उनका धन जब बदलवाया जाएगा तो सभी को पता चल जाएगा कि उनके पास बहुत ज़्यादा धन है। राजा के एक मंत्री ने क्या किया कि, किसी को कानोंकान खबर हुए बिना उन विरोधियों से पुराने सिक्के लेकर नए सिक्के दे दिए।

लेकिन यह बात किसी तरह राज्य दरबार में पता चल गई। राजा ने पूरी बात सुनकर मंत्री की तरफ देखा, मंत्री मुस्कुराया, उसे मुस्कुराते देख राजा भी मुस्कुरा दिया और राजा ने मंत्री को सम्मान के साथ इस दोष से मुक्त कर दिया।

यह कथा सुनाकर बैताल ने विक्रम से पूछा कि, "बता विक्रम! मंत्री ने उसके विरोधियों का पूरे का पूरा धन नए में बदल दिया, फिर भी राजा ने उसे क्यों छोड़ा? अगर जानते हुए भी उत्तर नहीं देगा तो तेरे सिर के सौ टुकड़े हो जाएंगे।"

विक्रम ने उत्तर दिया कि "बैताल! वह मंत्री ताम्बे के सिक्कों के बदले में बराबर भार के सोने के सिक्के लाया। अगर राजा के विरोधी उस सोने को गला कर ताम्बे के सिक्के खरीदते तो बहुत ज्यादा मूल्य के होते और वे पहले से अधिक धनवान हो जाते। मंत्री की बुद्धिमानी राजा और राज्य के खजाने के लिए लाभदायक सिद्ध हुई।"

बैताल हँसते हुए बोला, "सच कहा विक्रम! काले धन की बात केवल डर के लिए फैलाई गई थी लेकिन असली मकसद विरोधियों का स्वर्ण निकालना था जो पूरा हुआ। राजनीति में कहा कुछ और जाता है और उसके पीछे मंतव्य कुछ और होता है। तूने कहा तो बिल्कुल सही, लेकिन तू बोल गया इसलिए मुझे जाना होगा।"

और अगले ही क्षण वह विक्रम के कंधे से उड़ कर श्मशान की तरफ चला गया।

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उपरोक्त रचना पर एक टिप्पणी

उपरोक्त रचना में बेताल जब कथा सुनाता है तो, राजा के दरबार में मंत्री को बंदी बना कर लाया गया, यहाँ से भी प्रारम्भ कर सकते हैं और तब कोई अन्य दरबारी उस पूरी घटना का उल्लेख करे, जो  फिलहाल  दरबार  में लाये जाने के पूर्व में कहा गया है. 

यह तब किया जा सकता है, जब बेताल द्वारा कही जा रही कथा को भीआधुनिक लघुकथा की तरह ही न्यूनतम विवरण के साथ रखा जाना हो.  हालांकि इससे कथा में तो कुछ फर्क नहीं पडेगा, लेकिन लेखन का तरीका कुछ बदल जाएगा. 

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एक अन्य लघुकथा जिसमें इस शैली में ही थोड़ा परिवर्तन (बेताल का प्रश्न पूछना हटा कर कथ्य में थोड़ा बदलाव) किया गया है. रचना इस प्रकार है:

गुलाम अधिनायक / चंद्रेश कुमार छतलानी

उसके हाथ में एक किताब थी, जिसका शीर्षक ‘संविधान’ था और उसके पहले पन्ने पर लिखा था कि वह इस राज्य का राजा है। यह पढने के बावजूद भी वह सालों से चुपचाप चल रहा था। उस पूरे राज्य में बहुत सारे स्वयं को राजा मानने वाले व्यक्ति भी चुपचाप चल रहे थे। किसी पुराने वीर राजा की तरह उन सभी की पीठ पर एक-एक बेताल लदा हुआ था। उस बेताल को उस राज्य के सिंहासन पर बैठने वाले सेवकों ने लादा था। ‘आश्वासन’ नाम के उस बेताल के कारण ही वे सभी चुप रहते। 

वह बेताल वक्त-बेवक्त सभी से कहता था कि, “तुम लोगों को किसी बात की कमी नहीं ‘होगी’, तुम धनवान ‘बनोगे’। तुम्हें जिसने आज़ाद करवाया है वह कहता था – कभी बुरा मत कहो। इसी बात को याद रखो। यदि तुम कुछ बुरा कहोगे तो मैं, तुम्हारा स्वर्णिम भविष्य, उड़ कर चला जाऊँगा।”

बेतालों के इस शोर के बीच जिज्ञासावश उसने पहली बार हाथ में पकड़ी किताब का दूसरा पन्ना पढ़ा। उसमें लिखा था – ‘तुम्हें कहने का अधिकार है’। यह पढ़ते ही उसने आँखें तरेर कर पीछे लटके बेताल को देखा। उसकी आँखों को देखते ही आश्वासन का वह बेताल उड़ गया। उसी समय पता नहीं कहाँ से एक खाकी वर्दीधारी बाज आया और चोंच चबाते हुए उससे बोला, “साधारण व्यक्ति, तुम क्या समझते हो कि इस युग में कोई बेताल तुम्हारे बोलने का इंतज़ार करेगा?”

और बाज उसके मुंह में घुस कर उसके कंठ को काट कर खा गया। फिर एक डकार ले राष्ट्रसेवकों के राजसिंहासन की तरफ उड़ गया।

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आप सभी की राय अपेक्षित है. सादर, 

 - चंद्रेश कुमार छतलानी

मंगलवार, 22 नवंबर 2022

लघुकथा के शिल्प पर एक प्रयोग

कुछ माह पहले लघुकथा के शिल्प पर एक प्रयोग यह भी किया था. सफल-असफल तो पता नहीं, केवल छोटा-मोटा प्रयोग है. आप सभी की सलाहों का स्वागत है.

इस रचना में काफी कालखंडों को भी समेटने की कोशिश की है. अतः थोड़ी मेहनत तो करनी पड़ी और असफल होने की गुंजाइश भी पूरी है. उसका डर नहीं है. यह तो केवल एक प्रयोग सा है. मेरे अनुसार भी इस लघुकथा पर बहुत सारा काम बाकी है.

(‘गणितीय टेबल शिल्प में बढ़ती लघुकथा’ के प्रयोग का दूसरा ड्राफ्ट)

टेबल के बाद... / चंद्रेश कुमार छतलानी

टू वन जा टू : दो साल की हो गई गुड़िया आज, चलना सीख रही है, माता-पिता बहुत खुश हैं.
टू टू जा फोर : आज चार साल की होकर माता-पिता को रिझा रही है. पढ़ना सीख रही है.
टू थ्री जा सिक्स : छः साल की हुई और स्कूल में फर्स्ट आई है. माता-पिता घमंड से खड़े हैं.
टू फोर जा एट : आठ साल की घर पर उसके दोस्त ही दोस्त हैं. माता-पिता उसके साथ एन्जॉय कर रहे हैं.
टू फाइव जा टेन : दस साल की हो गई, इस बार दोस्तों के साथ बाहर है. माता-पिता घर में अकेले हैं.
टू सिक्स जा ट्वेल्व : माँ की दोस्त बारह साल की हो गई, आज दिन भर फोन पर व्यस्त रही. माता-पिता से बात भी नहीं कर पाई.
टू सेवन जा फोर्टीन : स्कूल के एक दोस्त के साथ आज जन्मदिन मना रही है. रात देर से आई. माता-पिता इंतज़ार करते रहे.
टू एट जा सिक्सटीन : आज कह दिया कि अब उसकी ज़िन्दगी वह उसके हिसाब से ही जियेगी. माता-पिता कुछ दखल नहीं देंगे.
टू नाइन जा एटीन : व्यस्क होकर अपने किसी दोस्त के साथ लिव-इन में चली गई. माता-पिता देखते रह गए.
टू टेन जा ट्वेंटी : जिसके साथ रह रही थी, वह किसी और लड़की के साथ चला गया, माता-पिता की आँखें पत्थर जैसी हो गई हैं, और गुडिया...
वह अब आगे गिनने के लिए नहीं है.
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(इसमें हालांकि //टू वन जा टू// वाली पंक्तियों में 'जा' सही न होते हुए भी अब बोलचाल में आ गया है, इसलिए उपयोग में लिया.)

- चंद्रेश कुमार छतलानी

शनिवार, 19 नवंबर 2022

लघुकथा में साक्षात्कार शैली का एक प्रयोग | डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

एक मिश्रित शैली की लघुकथा को साक्षात्कार शैली में भी ढाला जा सकता है. एक उदाहरण का प्रयास किया है. यह एक साक्षात्कार और विवरण शैली की मिश्रित लघुकथा है, जो लघुकथा कलश के अंक 10 में प्रकाशित हुई थी:


प्रश्नशून्य काल/चंद्रेश कुमार छतलानी


"जब आप मुख्यमंत्री थे, तब तो आपने राज्य के विकास के लिए कुछ नहीं किया और अब विकास के यही सवाल आप वर्तमान सरकार से क्यों पूछ रहे हैं?" एक टीवी चैनल पर इंटरव्यू में सवाल दागा गया।
पूर्व मुख्यमंत्री मुस्कुराने लगे।
यह देख प्रश्नकर्ता का हौसला और बढ़ गया और तेज़ आवाज़ में उसने फिर पूछा, "चुप क्यों हैं सर? बताइए कि आपकी सरकार ने क्या किया था?"
पूर्व मुख्यमंत्री के चेहरे की मुस्कुराहट और गहरी हो गई।
अब तो प्रश्नकर्ता चीख ही उठा, "मेरे सवाल का जवाब नहीं है ना आपके पास, कि आपने राज्य के विकास के लिए कुछ क्यों नहीं किया?"
"क्योंकि जब मैं मुख्यमंत्री था, तब किसी भी मीडिया ने मुझसे प्रश्न नहीं किए।"
उत्तर देते हुए पूर्व मुख्यमंत्री का चेहरा गंभीर हो गया। एक क्षण की खामोशी के बाद वे फिर बोले,
"काश! आप सरकारों से भी प्रश्न पूछते।"
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इस लघुकथा को हम साक्षात्कार शैली में कुछ इस प्रकार से ढाल सकते हैं:


प्रश्नशून्य काल/चंद्रेश कुमार छतलानी

प्रश्नकर्ता: "जब आप मुख्यमंत्री थे, तब तो आपने राज्य के विकास के लिए कुछ नहीं किया और अब विकास के यही सवाल आप वर्तमान सरकार से क्यों पूछ रहे हैं?"

पूर्व मुख्यमंत्री: ...(खामोश) मुस्कराहट।

प्रश्नकर्ता तेज़ आवाज़ में: "चुप क्यों हैं सर? बताइए कि आपकी सरकार ने क्या किया था?"

पूर्व मुख्यमंत्री: ...(खामोश) गहरी मुस्कराहट।

प्रश्नकर्ता चीखते हुए: "मेरे सवाल का जवाब नहीं है ना आपके पास, कि आपने राज्य के विकास के लिए कुछ क्यों नहीं किया?"

पूर्व मुख्यमंत्री: "क्योंकि जब मैं मुख्यमंत्री था, तब किसी भी मीडिया ने मुझसे प्रश्न नहीं किए।"

एक क्षण की खामोशी।

पूर्व मुख्यमंत्री: "काश! आप सरकारों से भी प्रश्न पूछते।"

खामोशी।
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(इसमें कोई सुधार लगे तो कृपया चर्चा ज़रूर करें,)
सादर,

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

बुधवार, 16 नवंबर 2022

लघुकथा विधा में समाचार शैली का नवीन प्रयोग | डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

इन दिनों योगराज प्रभाकर जी सर ने लघुकथा कलश के आगामी (11 वें) अंक हेतु रचनाएं मांगी हैं. यह एक विशिष्ट अंक होने वाला है, क्योंकि इसमें उन्होंने नए और अनछुए (कम-छुए) शिल्पों में ढली रचनाएं मांगी हैं. 

मेरे अनुसार यह हम सभी के लिए प्रयोग करने का अवसर होने के साथ-साथ एक चुनौतीपूर्ण कार्य भी है. कई मित्रों के दिमाग में आ सकता है कि चुनौती कैसी? यह तो बहुत आसान कार्य है. जी हाँ! आसान हो भी सकता है लेकिन मैं अपनी बात कहूं तो, लघुकथा कलश के पिछले अंक में मैंने 'समाचार शिल्प' की एक रचना कही थी. मुझे काफी समय लगा तो मेरे जैसे कुछ अन्य लेखक/लेखिकाएं भी होंगे ही. इसी कारण इस लेख का विचार भी आया. 

यहाँ मैं अपनी 'समाचार शिल्प' की एक लघुकथा के सर्जन के बारे में कुछ कहना चाहूंगा. इसके सर्जन के समय सबसे पहले दिमाग में यह आया था कि वह लघुकथा उत्तम नहीं कही जाती जो किसी समाचार सरीखी हो, मतलब उसका कथानक समाचार जैसा हो. लेकिन शिल्प के लिए तो किसी ने मना नहीं किया. यह विचार आते ही इस पर काम शुरू किया. समाचार पत्रों में समाचार बनाना मैंने थोड़ा-बहुत सीखा हुआ था, अतः शिल्प की जानकारी थी ही. फिर आगे बढ़ा तो समस्या आई - कथानक की

आदरणीय सुधीजनों, हम सभी जानते हैं कि, हर कथानक हर विधा के लिए उपयुक्त हो यह संभव नहीं. इसके एक कदम अंदर की तरफ,  मेरे अनुसार, हर कथानक हर शिल्प के लिए उपयुक्त हो, यह भी संभव नहीं. और, यही समस्या मेरे समक्ष थी. जो कथानक दिमाग में आते, उन्हें समाचार शिल्प में ढालने की कोशिश करता तो असफल हो जाता. एक तरीका था मेरे पास कि समाचार पत्र पढ़-पढ़ कर उनमें कोई कथानक ढूंढूं. वह कार्य भी किया, लेकिन जो कथानक मिले, उनमें नवीनता नहीं मिल पाई या फिर यूं भी कह सकते हैं कि मुझे ठीक नहीं लगे.

कई बार किसी काम के लिए महीने बीतते वक्त नहीं लगता है. सो इस बारे में कभी सोचते तो कभी न भी सोचते कुछ महीनों बाद एक कथानक का विचार आया, जो कि 'समाचार शिल्प' में ढाला जा सकता था. (यह लघुकथा अंत में दी गई है.) 

कुछ सोच कर उस पर काम शुरू किया और फिर धीरे-धीरे वह रचना बनती गई. ईश्वर कृपा से योगराज जी सर को ठीक भी लगी और लघुकथा कलश के 10वें अंक में प्रकाशित भी हो गई.

यह लेख का एक भाग था, आगे के भाग में मैं, समाचार शिल्प के बारे में ही कुछ बात रखना चाहूँगा, कि इस तरह के शिल्प में क्या-क्या हो सकता है. यह केवल प्राथमिक जानकारी हेतु ही है, अधिक के लिए आप अधिक अध्ययन कर ही सकते हैं.

समाचार

अपने आसपास से लेकर सूदूर अंतरिक्ष की घटनाओं की जानकारी प्राप्त होने को समाचार कहा जा सकता है. जानकारी प्राप्त करने का सबसे पुराना माध्यम समाचार ही है. लेकिन अनौपचारिक चर्चा या कुशलक्षेम पूछने में समाचार शब्द आए तो भी वह समाचार की श्रेणी में नहीं आता.

समाचार के गुण 

1. नवीनता: जो समाचार एक बार कहीं से प्राप्त हो जाए, वह अन्य किसी बड़े माध्यम से प्राप्त हो तो भी वह पुराना हो जाता है.

2. विशेषता: समाचार नया होने के साथ विशेष भी होना चाहिए. जैसे, मंत्री जी ने चप्पल पहना. यह बात नवीन हो सकती है, लेकिन इसमें क्या विशिष्टता है? यह हम सभी अच्छी तरह समझते ही हैं. हाँ! मंत्री जी बिना चप्पल पहन कर उबड़-खाबड़ रास्तों पर चले. यह बात ज़रूर विशिष्ट हो सकती है.

3. व्यापकता: समाचार के अंग्रेज़ी नाम NEWS के अनुसार ही समाचार का क्षेत्र हमारे आसपास से लेकर सूदूर अंतरिक्ष तक हो सकता है, जैसे पहले यहाँ लिखा भी है.

4. प्रामाणिकता: सत्य और तथ्यों पर आधारित ही कोई घटना समाचार बन सकती है. कोई भी अफवाह या प्रतीकों का इसमें स्थान नहीं होता. यह बात अपने लेखन से पूर्व ज़रूर ध्यान रखें.

5. रूचिपूर्णता: समाचार लेखन इस तरह का होना चाहिए, जो पढने में रुचिकर हो.

6. प्रभावशीलता: जो समाचार जितनी दक्षता से प्रभावशाली होता है, वही बेहतर कहलाता है.

7. स्पष्टता: यह समाचार का विशेष गुण है, लेखन-शैली अलंकारिक/क्लिष्ट आदि न होकर किसी भी प्रबुद्ध पाठक से लेकर कम पढ़े लिखे व्यक्ति तक की समझ में आ जाए, ऐसी हो. भाषा ऐसी हो जिसमें अनावश्यक विशेषण, अप्रचलित शब्दावली आदि का प्रयोग न हो. किसी के नाम से पूर्व श्री, श्रीमान आदि भी नहीं लगते हैं. 

समाचार कैसे लिखे जाएं?

छह ककारों (क्या, कौन, कहाँ, कब, क्यों और कैसे) का ध्यान रखते हुए, अधिकतर समाचार उल्टी पिरामिड शैली में लिखे जाते हैं. यह इस प्रकार है:

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\  क्लाइमेक्स (इंट्रोडक्शन)  /

  \         बॉडी                /

    \       समापन          /

       \                        /

क्लाइमेक्स (इंट्रोडक्शन) : समाचार का शीर्षक भी कहा जा सकता है. अधिकतर बार इसमें क्या, कौन, कहाँ और कब इन चार ककारों के बारे में 10-20 शब्दों में कहा जाता है. शीर्षक एक से अधिक भी हो सकते हैं. निम्न उदाहरण से समझते हैं, यह एक ही समाचार के मुख्य व उप शीर्षक हैं:

मंत्री जी बिना चप्पल पहले जैसलमेर की तपती रेत पर चले

देश-बचाओ यात्रा का तीसरा दिन गर्म रहा

बॉडी: समाचार की बॉडी में इंट्रोडक्शन की व्याख्या और विश्लेषण किया जाता है.  इसके प्रारम्भ में इंट्रोडक्शन को विस्तृत करते हुए 30-50 शब्द और बाद में महत्व के अनुसार घटते क्रम में सूचनाएं और ब्योरा होता है. यह 'क्यों और कैसे' दो ककारों के आधार पर लिखा जाता है. साथ ही अन्य चार ककारों का भी उचित प्रयोग (खास तौर पर प्रारम्भ में) किया जाता है. बॉडी में समाचार के किसी भाग को हाईलाइट करने के लिए उप-शीर्षक भी दिए जा सकते हैं.

समापन: जो बातें समाचार के इंट्रोडक्शन व बॉडी में छूट गई हैं. उन्हें समापन में स्थान दिया जा सकता है. इसके जरिए पाठक किसी निर्णय या निष्कर्ष तक पहुँच सकें. यह समाचार को पूर्ण करता हुआ, पठनीय व प्रभावशाली होना चाहिए.

'समाचार शिल्प' के साथ मेरी एक लघुकथा निम्न है: चूंकि शोध सम्बन्धी रचना है, अतः इसके प्रभावी होने के बजाय इसके प्रयोग पर ही मेहनत की थी। 

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हाँ! मैं हारूंगा / डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

खड़े होने की हिम्मत न होने के बावजूद जीत की हासिल

भीड़ हारने वाले के पीछे पड़ी

विशेष संवाददाता, नया खेल: शहर की दैनिक रेसलिंग प्रतियोगिता में आज एक रेसलर हार कर भी जीत गया। अखाड़े के मैनेजर ने नया खेल के विशेष संवाददाता को बताया कि आज रिंग में बिगहैण्ड नाम से मशहूर पहलवान से लड़ने के लिए चुनौती की घोषणा के बाद पहले तो कोई भी उससे लड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ, क्योंकि वह कभी नहीं हारा था। यह देख बिगहैण्ड रिंग में फुर्ती से टहलते हुए मखमली कपड़े की विजय पताका लहराने लगा। उसी वक्त एक दूसरा रेसलर बिगब्रेन चिल्लाता हुआ आया और उसकी चुनौती कबूल ली। रिंग के बाहर बिगब्रेन पर दांव लगने शुरू हुए। एक के दो होने पर भी कुछ ही दर्शकों ने उस पर दांव लगाया। लेकिन कुश्ती प्रारम्भ होते ही बिगब्रेन बिगहैण्ड पर भारी पड़ गया और उसके दांव का दाम बढ़ गया। अगले राउंड में तो बिगब्रेन ने बिगहैण्ड को ऐसा पटका कि वह खड़े होने में भी लड़खड़ाने लगा। अब बिगब्रेन पर एक के चार लगने शुरू हुए और बहुत सारे दर्शकों ने उस पर रुपये लगा दिए। लेकिन तीसरे राउंड के शुरू होते ही बिगहैण्ड ने बिगब्रेन के मुंह पर एक घूँसा मारा और उसी एक घूंसे में बिगब्रेन चित्त हो गया, वह खड़ा तक नहीं हो पाया और हर बार की तरह बिगहैण्ड विजेता घोषित कर दिया गया।

संवाददाता के बात करने के लिए बुलाने के बावजूद बिगहैण्ड अपनी मुट्ठियाँ ताने हाथों को उठाए हुए रिंग से बाहर निकलने को तैयार नहीं था। उधर अखाड़े से बाहर बिगब्रेन ने हार का कारण पूछने पर यही बताया कि वह चित्त हो गया था। संवाददाता कुछ और पूछे इसके पहले ही वह दौड़ कर भाग गया, उसकी जेब से कुछ नोट भी गिर गए, जिन्हें गिरते देख वह उठाने के लिए भी नहीं लौटा। काफी दर्शकों की भीड़ बिगब्रेन को देखती हुई भागती आ रही थी। 

भीड़ में कुछ लोग ऐसे भी थे जो गिरे हुए नोट को देख कर चिल्ला रहे थे – मेरा नोट-मेरा नोट।

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- चंद्रेश कुमार छतलानी

बुधवार, 12 अगस्त 2020

विश्व हिंदी सम्मलेन, मॉरीशस की पुस्तक विश्व हिंदी पत्रिका में लघुकथाओं के शीर्षक पर मेरा एक शोध पत्र

विश्व हिंदी सम्मलेन, मॉरीशस की पुस्तक विश्व हिंदी पत्रिका में लघुकथाओं के शीर्षक पर मेरा एक शोध पत्र।  इसकी जानकारी पूर्व में ही आ गई थी। अब यह विश्व हिंदी सम्मलेन के वेबसाइट http://www.vishwahindi.com/hi/default.aspx पर उपलब्ध है।


रविवार, 16 फ़रवरी 2020

शोधकार्य: मेरी कमज़ोर लघुकथा


लघुकथा दुनिया
iBlogger द्वारा Best Indian Hindi Blog से सम्मानित
ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 का सम्मान प्राप्त
Email: laghukathaduniya@gmail.com, URL: http://laghukathaduniya.blogspot.com
Cell-Phone: 9928544749





सम्माननीय साहित्यकार,
सादर नमस्कार।

आप सभी के महती सहयोग से लघुकथा दुनिया द्वारा लघुकथा पर दो शोधकार्य सम्पन्न किये गये हैं। पहला कार्य लघुकथा के शीर्षक पर लघुकथा लेखकों के दृष्टिकोण, जिसके आधार पर एक शोध पत्र लिखा गया है और प्रकाशन के लिये भेज दिया गया है। दूसरा 'लघुकथा 2020: नए लेखकों की नज़र में', जिसका संकलन कार्य समाप्त हो चुका है और योगराज प्रभाकर जी सर के पास विश्लेषण हेतु भेजा गया है। इनमें सहयोग हेतु आप सभी का हृदय से आभारी हूँ। इसी क्रम को आगे बढाते हुए एक और शोध योजना प्रस्तावित है। आप सभी से निवेदन है कि इसे भी सफल बनावें। यह योजना कुछ इस प्रकार हैः

1. 'मेरी कमज़ोर लघुकथा' नामक यह योजना वरिष्ठ तथा नवोदित दोनों के लिए ही है।

2. इस कार्य में लघुकथा लेखकों से उनकी स्वयं की एक ऐसी रचना देने का निवेदन है जो उनके अनुसार लघुकथा के किसी न किसी (एक अथवा अधिक) पक्ष/पक्षों में कमज़ोर है और जिसे उसी (उन्हीं) कमज़ोरी (कमज़ोरियों) की वजह से प्रकाशित होने नहीं भेजा। उस रचना विशेष को किस वर्ष में लिखने का प्रयास किया गया, यह भी साथ में देवें।

3. रचना के साथ लेखक से एक वक्तव्य भी लिख कर देने का निवेदन है, जिसमें वे अपनी उस लघुकथा की कमज़ोरी/कमजोरियों को इंगित करें। इस हेतु शब्द सीमा आदि लेखक स्वयं ही निर्धारित करें।

4. वरिष्ठ लेखकों से इसमें जुड़ने का विशेष आग्रह है क्योंकि मेरे संज्ञान में अब तक इस विषय पर कार्य नहीं हुआ है, अतः वरिष्ठ लेखकों के अनुभव का लाभ प्राप्त हो तो अति उत्तम।

कार्य का आधार: 

इस प्रस्ताव का आधार यह है कि (कुछ अपवादों को छोड़कर) लगभग हर लेखक/लेखिका ने अपनी कोई न कोई रचना खुद ही रिजेक्ट की है। वे रचनाएं कैसी हैं और लेखक/लेखिका द्वारा उन्हें रिजेक्ट क्यों किया गया है, यह जानने की जिज्ञासा ही इस शोध का आधार बनी है।

कार्य का उद्देश्यः
उपरोक्त विवरण पढ़ने के बाद आप समझ ही गए होंगे कि इस कार्य का मुख्य उद्देश्य यह ज्ञात करना है कि लघुकथा लेखन के समय किस तरह की ऐसी कमियां हैं, जो रह जाएं तो रचना को प्रकाशन हेतु नहीं भेजना चाहिये। यदि यह शोध सफल होता है तो लेखकों के नए व्यवहार को भी देखा जा सकता है। यह व्यवहार अपेक्षित है कि लेखक/लेखिका अपनी कमजोर लघुकथाओं को इन लघुकथाओं और वक्तव्य के साथ तुलना कर उन्हें प्रकाशन/प्रसारण को न भेजें।

समय सीमा:
आपकी रचनाएं और वक्तव्य आपके संक्षिप्त परिचय (साहित्यिक परिचय, संपर्क विवरण (डाक का पता, चलभाष (मोबाइल) नंबर, ईमेल आईडी) व चित्र) के साथ 15 मार्च 2020 तक laghukathaduniya@gmail.com पर ईमेल करने का कष्ट करें। ईमेल में विषय "मेरी कमज़ोर लघुकथा" ही रखें। ईमेल निम्न प्रारूप में भेजिए:

नाम (हिंदी और अंग्रेजी में):
संक्षिप्त साहित्यिक परिचय:

संपर्क विवरण
डाक का पता:
चलभाष (मोबाइल) नंबर:
ईमेल आईडी:

रचना का वर्ष: 
रचना (शीर्षक सहित):
वक्तव्य (रचना की कमज़ोरियाँ):

कार्य का आउटपुट:
फिलवक्त एक ई-बुक बनाने का विचार है, जिसके ISBN हेतु अप्लाई कर दिया है।  

टैग लाइन 
इस शोधकार्य में वे सभी लेखक व लेखिकाएं सम्मिलित हैं जो अपने लेखन से समाज की कमज़ोरी इंगित करने के साथ-साथ लेखकीय समुदाय के हित में अपने लेखन की कमज़ोरी को इंगित करने का भी साहस रखते हैं।


इस योजना के अपडेट पाने एवं लघुकथा सम्बन्धी सामग्री पढ़ने हेतु लघुकथा-दुनिया ब्लॉग को फॉलो एवं सब्सक्राइब ज़रूर करें।

साभार,    

For लघुकथा दुनिया 


डॉ0 चन्द्रेश कुमार छतलानी
लघुकथा दुनिया
iBlogger द्वारा Best Indian Hindi Blog से सम्मानित
ब्लॉगर ऑफ द ईयर 2019 का सम्मान प्राप्त
URL: http://laghukathaduniya.blogspot.com   

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

शोध पत्र: प्रेम सिंह बरनालवी की लघुकथाओ में व्यक्त लोकजीवन एवं साम्प्रदायिकता | डॉ हेमलता राणा

दृष्टिकोण Vol 11 No 4 (2019): Vol-11-Issue-4-July-August-2019




Abstract

प्रेम सिंह बरनालवी जी का  जन्म  29 अक्टूबर 1945 को हरियाणा प्रांत के अंबाला जिल के बरनाला नामक गांव के एक गरीब परिवार में हुआ। वह बचपन से ही अपने पारिवारिक रिश्तो से बहुत जुड़े हुए थे। साहित्य में अपने आगमन को लेकर बरनालवी  लिखते हैं कि "जब सेना में रहते हुए वे हाई लॉन्ग पोस्ट पर गए तो काफी समय होने के कारण समीप के पुस्तकालय की तमाम पुस्तक उन्होंने पढ़  डाली।" वहां के प्राकृतिक सौंदर्य तथा एकांत वातावरण ने बरनालवी जी को काव्य सृजन के लिए प्रेरित किया।  देवताओं का निवास कहे जाने वाली उस धरती पर पता नहीं कब क्यों और कैसे बरनालवी जी के भीतर से काव्य स्त्रोत फूट पड़ा।  वहीं पर उन्होंने अपनी पहली रचना 'मेरा मंदिर´ लिखी जो कि उनकी सबसे बेहतर काव्य रचना थी परंतु 30 पदों की लंबी रचना होने के कारण यह अभी तक अप्रकाशित है। इसके बाद बरनालवी जी हर समय प्रकृति का मानवीकरण कर कुछ ना कुछ लिखते ही रहे और धीरे धीरे एक प्रतिभाशाली और अनुभवी लेखक के रूप में उभर कर सामने आए।  उन्होंने मानव मन की गहराइयों में उतर कर समस्याओं के मूल शुरू की खोज की। उनके पूर्वजों ने उन्हें जो संस्कार दिए समाज ने जो अनुभव दिया और ईश्वर ने जो कौशल दिए,  वह इन सभी विशेषताओं का खुलकर इस्तेमाल कर रहे थे।  उनकी रचनाओं में विषय की मौलिकता व भावुकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उनका साहित्य सृजन उनकी लोक कथाओ के माध्यम से ज्यादा उभर कर सामने आया जिसमे लोक कथा के माध्यम से  सूक्ष्म मनः स्थितियों को प्रभावी रूप से उकेरा गया है । लघुकथा के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. सतीश राज पुष्करणा के कहा कि "लघुकथा मानव मन की अभिव्यक्ति को कुछ शब्दो में प्रभावशाली ढंग से कहा देने की विधा है।" बरनालवी जी की लघु कथा के साथ साथ लोक चेतना प्रमुख रूप से उभर कर सामने आई है।  लोक चेतना से अभिप्राय उनकी संसार को देखने की दृष्टि है जो कि  उनके अंतर्मन में पूरी तरह छाई हुई है। बरनालवी जी ने समाज की यथास्थिति और उस पर कुरीतियों के बढ़ते प्रभाव को भलीभांति स्पष्ट किया।  .... 

Source:

https://hindijournals.org/index.php/drishtikon/article/view/1611



गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

रामकुमार आत्रेय : काँटों में से राह बनाने वाले साहित्यकार | राधेश्याम भारतीय

रामकुमार आत्रेय जी का राधेश्याम भारतीय जी द्वारा लिया गया साक्षात्कार | लघुकथा डॉट कॉम पर 
(हरियाणा सरकार द्वारा रामकुमार आत्रेय जी को बाल मुकुन्द गुप्त पुरस्कार  दिए जाने के अवसर पर राधे श्याम भारतीय द्वारा उनसे लिया गया साक्षात्कार)



रामकुमार आत्रेय 
हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ कवि एवं कथाकार रामकुमार आत्रेय को हरियाणा साहित्य अकादमी की ओर से बालमुकुन्द गुप्त पुरस्कार मिलने पर मैं उन्हें बधाई देने उनके घर पहुँचा। रामकुमार कुमार आत्रेय का व्यक्तित्व जितना अनुकरणीय है, उतना ही उनका साहित्य। वे केवल साहित्य में ही आदर्शवाद की बातें नहीं करते बल्कि वे स्वयं उनका पालन करने वाले भी हैं। आज साहित्य क्षेत्र में जिस तरह गुटबाजी कायम है, वे उससे कोसों दूर रहे हैं। आज देश की ऐसी कोई पत्रिका नहीं है ,जिनमें इनकी रचनाएँ  ससम्मान प्रकाशित न होती हों। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र के बी.ए.प्रथम वर्ष के पाठ्यक्रम में इनकी कविताएँ  (हरियाणी बोली) में  पढ़ाई जा रही हैं। प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त होने पर भी खुद को साक्षर मानते हैं। पिछले कई वर्षों से इनकी नेत्रदृष्टि बिल्कुल साथ छोड़ गई है। इसके बावजूद ये साहित्यिक -साधना में रत हैं और उसी साधना के बल पर इन्होंने  हिन्दी एवं हरियाणवी भाषा में 15 पुस्तकें पाठकों को देकर एक अनुपम कार्य किया है। अनुपम इसलिए क्योंकि जिन विकट परिस्थितियों में आम आदमी हार मान बैठता है, ऐसे में आत्रेय जी लड़ते रहे और अपनी लेखनी से अपने मन के भावों एवं आम आदमी की पीड़ा को शब्दों में पिरोकर समाज को एक नई राह दिखाने को प्रयासरत हैं। आत्रेय जी मूलतः स्वयं को कवि मानते हैं। मैं समझता हूँ कि इनके मन में काव्य के उपजने के पीछे कहीं न कहीं वेदना का प्रभाव रहा है, क्योंकि 6 वर्ष की आयु में जिनके सिर सेे पिता का साया उठ गया हो । घर में एकमात्र पुत्र होने के कारण परिवार का सारा बोझ जिनके कंधों पर आ पड़ा हो और आगे चलकर 30 वर्ष की अवधि में जिनकी धर्मपत्नी छोटे- छोटे बच्चों को छोड़कर इस लौकिक संसार से विदा हो गई हो तो ऐसे में मन दुखों से भर ही जाता है। संसार मिथ्या नजर आता है, और फिर पीड़ित मन संसार के यथार्थ की खोज में भटकने लगता। वहीं से कल्पना लोक में विचरते मन से उपजने लगती है कविता। सुमित्रानंदन पंत की वे काव्य पंक्तियाँ  –

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।
उमड़कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।।

आत्रेय जी पर सटीक बैठती प्रतीत होती हैं; आइए , आत्रेय जी के व्यक्तित्व एवं कृत्तित्व से रू-ब-रू होते हैं-

राधेश्याम भारतीय


राधेश्याम भारतीय: आत्रेयजी, आपने साहित्य की अनेक विधाओं में लिखा है। लिखा ही नहीं बल्कि उस साहित्य ने हिंदी साहित्य में अपनी एक अलग पहचान भी बनाई है। आप स्वयं को मूलतः कवि मानते हैं । आपके कवि बनने के पीछे क्या कारण रहे हैं ?

रामकुमार आत्रेय: मेरे कवि बनने में मेरी माँ की भूमिका विशेष रही है। साहित्यिक जीवन की शुरूआती दिनों में जब मैं जे.बी.टी का कोर्स कर रहा था, तो पुण्डरी कैथल में फौजी की एक दुकान थी। जिस पर 25 पैसे में नॉवल किराए पर मिलते थे । मैंने नॉवल किराये पर लेने शुरू कर दिए। विष्णु प्रभाकर और रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य पढ़ डाला। मुझे विष्णु प्रभाकर के नाटकों में और रामधारी सिंह दिनकर की कविताएँ  में बड़ा आनन्द आता था और दिनकर की कविताओं से प्रेरित हो मेरे मन में काव्य के अंकुर फूटने लगे। वैसे ये अंकुर बचपन में ही फूटने लगे थे । जब मेरी माँ और दादी सोते वक्त मुझे कहानियाँ सुनाया करती थी। उनमें से अधिकतर पौराणिक संदर्भो पर आधारित होती थीं। कुछ कहानियाँ बिल्कुल कपोल -कल्पित होती थीं। जिनमें परियाँ और राक्षसों के आश्चर्यजनक कारनामों का वर्णन होता था। परन्तु उन सब में नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता अवश्य दी जाती थी। बस, वहीं से मैं अपना दुख- दर्द भूलकर दूसरों के दुख-दर्द को समझने, जूझने, थकने तथा टूटने लगा और अन्तःकरण से फूटने लगी कविता।

राधेश्याम भारतीय: क्या आप कवि ही बनना चाहते थे ,या साहित्य की अन्य विधाओं में भी रूचि थी?

रामकुमार आत्रेय: भारतीय जी, मैं एक कवि एवं कथाकार तो बन गया पर, एक नाटककार न बन सका यह टीस मेरे मन में रही। मुझे धर्मवीर भारती के नाटक ‘अन्धायुग’ ने इतना अधिक प्रभावित किया कि उनकी प्रशंसा के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। बाद में निराला जी से प्रभावित हुआ और उनकी शैली का अनुसरण करते हुए मैं मुक्त छंद में कविता करने लगा। बस, अब तो मैं स्वयं को कवि कहलवाना अधिक प्रसन्द करता हूँ।

राधेश्याम भारतीय:आप साहित्य से जुड़ाव के शुरूआती दिनों के बारे कुछ बताइए ?

रामकुमार आत्रेय: मुझे रचना लिखने की सीख 1980 में आई। पर, मैं गाँव में रहने वाला व्यक्ति किसी वरिष्ठ साहित्यकार के सम्पर्क में नहीं आया इसलिए परिस्थितियों से अकेला ही जूझता रहा । मैं अपनी रचनाएँ  धर्मवीर भारती की पत्रिका ‘धर्मयुग’ में भेजता रहा । रचनाएँ  न छपी । इंतजार करता रहा। एक दिन एक पत्रिका पढ़ी । उसमें लिखा था कि यदि किसी साहित्यकार को अपनी रद्द हुई रचनाओं बारे पता करना हो तो जवाबी लिफाफा साथ में भेजें । मैंने भी ऐसा ही किया।

एक दिन धर्मवीर भारती का पत्र आया कि आपकी रचना हमें मिल चुकी हैं, हम रचना के बारे सूचित नहीं करते और उसके बावजूद रचनाएँ  भेजता रहा फिर रचनाएँ  छपने लगी। मैं तो इतना ही भेजें कि हमने साहित्य में अपना स्थान यूं ही नहीं बनाया बल्कि साहित्य की उबड़ -खाबड़ राहों से गुजरे हैं…हरियाणवी में कहूँ तो ‘‘हाम् तो वो राही सै जिनहै डल्यां म्ह तै राह बणाई सै।’’ उसके बाद कविताएँ  ‘पंजाब केसरी और ‘वीर प्रताप’में छपने लगीं।

राधेश्याम भारतीय:- 1987 में आपका प्रथम काव्य संग्रह ‘बुझी मशालों का जुलूस ’ प्रकाशित हुआ । उसके बाद‘ बूढ़ी होती बच्ची’, ‘आंधियों के खिलाफ’, ‘रास्ता बदलता ईश्वर’ और सद्यः प्रकाशित काव्य संग्रह ‘ नींद में एक घरेलू स्त्री’ आदि काव्य संग्रह। आप अपनी कविताओं के बारे कुछ बताएँ ?

रामकुमार आत्रेय-इन संग्रहों में संकलित कविताएँ  मेरी अपनी अनुभूतियॉँ हैं और अनुभूतियाँ कभी असत्य नहीं होती । बचपन से ही इतनी विपदाएँ , विषमताएँ  एवं कटुताएँ  झेली कि मैं यथार्थ का पुजारी होते हुए भी अपने आपको भावुकता में डूबने से बचा नहीं पाया। एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि भावुकता के आवेश में चाहे मेरा मन आकाश में उड़ता रहा हो लेकिन अपने पाँवों को मैंने कभी धरातल से ऊपर नहीं उठने दिया। इसलिए इस धरती का दर्द, धरती पर ‘धरती’बनकर जीने वाले लोगों का दुखदर्द भी मेरा अपना ही दुख दर्द रहा है । इसी दुख दर्द को मैंने अपनी वाणी देने का प्रयत्न किया है । मैं नहीं जानता कि मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ । संभवतः एक यही कारण है कि मेरी ये कविताएँ  बिना किसी आडम्बर के सीधी-सरल भाषा में लिखी गई हैं । हो सकता हो इसीलिए इन पर सपाट-बयानी का आरोप लगाया जाए। मात्र कला के नाम पर लिखी गई कविताओं में भाषा की जटिलता और सर्वथा अप्रचलित बिम्बों की बोझिलता एक गुण हो सकती है, लेकिन दुख-दर्द की भाषा किसी आडम्बर की मुहताज नहीं होती। फिर मैं तो उस कविता को कविता नहीं मानता जो पाठक को दण्ड पेलने पर भी उसकी समझ में न आए।

राधेश्याम भारतीय:- आप लघुकथा लेखक के रूप में भी अपनी एक विशेष पहचान रखते हैं? अभी तक आपके चार लघुकथा संग्रह- ‘इक्कीस जूते’ (1993), ‘आँखों वाले अंधे’(1999) ‘छोटी-सी बात’ (2006) और (2011) में बिन शीशों का चश्मा’ प्रकाशित हो चुके हैं। मैं समझता हूँ कि इस विधा पर इतना कार्य हरियाणा में शायद ही किसी ने किया हो। आप लघुकथा बारे बताइए ?

रामकुमार आत्रेय– प्रथम लघुकथा संग्रह ‘इक्कीस जूते ’ हरियाणा साहित्य अकादमी के अनुदान से प्रकाशित हुआ है। लघुकथा का स्तरीय रूप टेढ़ा काम है। जितना इसमें लाघव है उतना ही टेढ़ापन ; जिसे साधना कठिन है। कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा सार्थक बात कहना ही लघुकथा की विशेषता है। लेकिन जब रचनाकार शब्दों से खेलने लगता है और सिर्फ कहन मानकर ही रचना का रूप दे देता है। इससे उसकी गम्भीरता एवं सार्थकता पर आघात पहुँचता है।

इसके बावजूद हिन्दी लघुकथा पर बहुत अधिक कार्य हो रहा है। इसके पीछे पाठकों द्वारा लघुकथा को महत्व दिया जाना है क्योंकि आज पाठक के पास लम्बे-चौड़े उपन्यास या लम्बी कहानियाँ पढ़ने का समय नहीं है। इसलिए वे लघुकथा में ही उपन्यास और कहानी का आस्वादन लेते हैं। आज लघुकथा के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग हो रहे हैं, जो उत्साहवर्धक तो हैं ही, भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करते हैं। लघुकथा एक अचूक शस्त्र बनकर वर्तमान में व्याप्त बुराइयों पर बड़ी सार्थकता के साथ आक्रमण कर रही है। इस प्रकार लघुकथा का भविष्य उज्ज्वल है। भविष्य में निश्चित ही एक प्रतिष्ठित विधा के रुप में इसका अध्ययन एवं अध्यापन होगा।

राधेश्याम भारतीय:- किसी रचना का आधार क्या होना चाहिए?

रामकुमार आत्रेय– किसी रचना का आधार यथार्थ होना चाहिए । पर, उसमें कल्पना से परहेज नहीं करना चाहिए। यथार्थ-बोध का मतलब यह नहीं है कि कैमरा उठाया और फोटो खींच लिया। यथार्थ यथार्थ लगे इसके लिए सूत्रों के योजक से कल्पना का सहारा लिया जा सकता है। और वह कल्पना से रचना को नीरस होने से बचाया जा सकता है।

राधेश्याम भारतीय:- लघुकथा की शब्द संख्या बारे विद्वानों के विभिन्न मत रहे हैं , आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

रामकुमार आत्रेय– कोई रचना शब्दों में नहीं बांधी जा सकती है क्योंकि रचना कोई गणित नहीं होती । गणित की अपनी एक सीमा होती है । रचना संवेदना होती है; भावना होती है और भावना, संवेदना को शब्द सीमा में बांधना उसकी आत्मा को मार देना है। लघुकथा में लघु विशेषण जुड़ा है इसलिए इसमें शब्द सीमा संख्या कम से कम हो। और कम से कम की भी कोई सीमा नहीं हो सकती।

राधेश्याम भारतीय– अच्छा यह बताइए ,आपकी पहली कहानी कब और किस पत्रिका में छपी?

रामकुमार आत्रेय:-वैसे तो मैं कहानियाँ आठवें दशक के मध्य में ही लिखने लगा था। लेकिन वे सभी कहानियाँ  सर्वथा काल्पनिक और भावुकता की चाश्नी में लिपटी होती थीं। आठवें दशक के उत्तरार्ध में एक कहानी ‘टपकती जहरीली लारें’ चंडीगढ़ से प्रकाशित होने वाली जागृति नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इस कहानी के प्रकाशन से मुझे 50 रूपये पारिश्रमिक के रूप में प्राप्त हुए थे। परन्तु इस कहानी को मैंने बाद में नष्ट कर दिया था क्योंकि यह भी सर्वथा काल्पनिक और भावुकता की चाशनी में लिपटी थी।

राधेश्याम भारतीयः– आप कहानियाँ क्यों लिखते हैं?

रामकुमार आत्रेय:-मेरी अपनी जिंदगी आपदाओं और असफलताओं से घिरी रही है। दुर्भाग्य मुझे हमेशा ठुकराता रहा है इसलिए व्यक्ति के जीवन के अभाव ,उसकी असफलताएँ , उसका दर्द और संघर्ष मुझे आकर्षित करते रहे हैं। किसी भी दुखी व्यक्ति का दर्द अपना बनाकर मैं कहानी के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाता रहा हूं। ऐसा करने से मुझे लगता है कि मैंने किसी के दुख दर्द को बंटाकर उसे किसी हद तक कम करने में सहायता की है।

राधेश्याम भारतीय:- अब तक छपी कहानियों में कौनसी कहानी आपको अधिक प्रिय है। क्यों?

रामकुमार आत्रेय:-इस प्रश्न का उत्तर देना बहुत ही कठिन है। मेरी हर कहानी अनुभव की गहन आंच के बीच से निकली है। कहानी लिखने के उपरांत एक लम्बे समय तक मैं उस आंच में तपता रहा हूं। फिर भी प्रश्न का उत्तर यदि देना ही है तो मैं कहूंगा कि ‘आग, फूल और पानी’ कहानी सर्वप्रथम हंस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। राजेन्द्र जी ने इसे लघुकथा कहकर प्रकाशित किया था। इसी नाम से मेरा एक कथा-संग्रह ‘बोधि प्रकाशन’ जयपुर से प्रकाशित हुआ है। वैसे‘पिलूरे’ कहानी को दैनिक भास्कर की रचना पर्व प्रतियोगिता में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ था। और अब तक का सबसे ज्यादा पारिश्रमिक दिलाने वाली यही कहानी है।

राधेश्याम भारतीय-क्या लेखन के कारण आपको व्यक्तिगत जीवन में कभी संघर्ष का सामना करना पड़ा? कोई अविस्मरणीय घटना?

रामकुमार आत्रेय- लेखन की वजह से जीवन में कोई संघर्ष तो नहीं करना पड़ा। परन्तु कहानी लिखते समय मैं पात्रों के साथ इतना अधिक जुड़ जाता हूं कि मैं टेंस हो उठता हूं। कई बार कहानी में सुधार करने के लिए उसे बार-बार लिखना पड़ता है। ऐसे में दुखी होकर उन पात्रों से पीछा छुड़ाने के लिए कहानी को अलविदा कहना पड़ता है। यही कारण है कि वर्ष भर में 2-3 कहानियाँ  ही लिख पाता हूँ।

राधेश्याम भारतीयः- नए कहानीकारों की कुछ उल्लेखनीय कहानियों के साथ कथाकारों के नाम भी बताइए अपनी दृष्टि से?

रामकुमार आत्रेय- मैं हर वर्ष नई से नई पत्रिकाएँ  पढ़ता और देखता रहता था। परन्तु 2008 में आंखों में फंगल इंफैक्शन हो जाने पर मेरी बाईं आँख को हटकार उसकी जगह नई आँख लगाई गई। लेकिन मेरी देह ने इसे स्वीकार नहीं किया। और फलतः 6’6 देखने वाली आँख एकदम अंधेरे में बदल गई। चिकित्सकों के अनुसार फंगल इंफैक्शन को तो निकाल दिया पर वे दृष्टि को नहीं बचा सके। दाईं आँख में लैंस डालकर उसे धूंप-छांव देखने के लायक बनाया गया। परिणाम यह हुआ कि मेरा पढ़ना पूरी तरह से बंद हो गया। अब मैं दूसरों की दया पर आश्रित हूँ। थोड़ा-थोड़ा लिखने का प्रयास अवश्य करता हूं।जो कि काफी कठिनाई भरा एवं मंहगा पड़ता है। अतः नए कहानीकारों की कहानी सिर्फ एक आध ही सुन पाता हूं। वैसे संजीव, उदय प्रकाश, स्वदेश दीपक, राकेश वत्स और बहुत से रचनाकार है जिनकी कहानियाँ  मुझे यदा-कदा कचोटती रहती हैं।

राधेश्याम भारतीयः– कहानियों में कथ्य और कलात्मक संतुलन की कोई सीमा तय होनी चाहिए या कहानी कथ्य प्रधान होनी चाहिए?

रामकुमार आत्रेय:-कहानी बिना कथ्य के तो लिखी ही नहीं जा सकती। कथ्य होगा तो कहानी होगी। लेखक कथ्य में जितना अधिक डूबकर लिखेगा, उतना ही कथारस उस रचना में उत्पन्न होगा। कथारस की उत्पत्ति के साथ-साथ कलात्मकता अपने आप उसी में गुंथकर प्रकट होती रहती है। सच कहूं तो मैं कलात्मकता के विषय में ज्यादा कुछ जानता नहीं हूं। सिर्फ कहानी कहने की कोशिश करता हूं। जिसे कभी-कभी पाठक पसंद भी कर लेते हैं। यहाँ मैं आठवें दशक में दैनिक पंजाब केसरी में प्रकाशित मेरी एक कहानी का जिक्र करना चाहूंगा। दुर्भाग्यवश उस कहानी का नाम मैं स्मरण नहीं कर पा रहा हूं। लेकिन मेरी अपनी जिंदगी में पहली बार उस कहानी पर पचास प्रशंसा पत्र प्राप्त हुए थे। एक पत्र उस समय लुधियाना शहर की महिला नगर पार्षद का भी था। पत्र लिखते समय वह इतना रोई थी कि आंसू की बूंदें पत्र के अक्षरों को फैला गई थी। उसका नाम तो मैं नहीं लूंगा लेकिन उसने कहा था कि यह कहानी मैंने उसकी असली जिंदगी से चुराई है। बाद में मैंने इस कहानी को भी नष्ट कर दिया क्योंकि वह भी भावुकता के आवेश में लिखी गई थी। कहानी की लोकप्रियता मेरे लिए कलात्मक संतुलन है। लेकिन कहानी सामाजिक सरोकारों से जुड़ी होनी चाहिए।

राधेश्याम भारतीय:- आत्रेय जी, आपने हरियाणवीं बोली में साहित्य रचा है उसके बारे बताएँ  ?

रामकुमार आत्रेय: हरियाणवी भाषा में एक दोहा संग्रह ‘ सच्चाई कड़वी घणी’ प्रकाशित हो चुका है। दैनिक ट्रिब्यून में खरी खोटी के नाम एक स्तम्भ रविवार को प्रकाशित होता था जिसमें उस स्तम्भ की समाप्ति पर स्तभ से मिलता-जुलता हरियाणवी भाषा में एक चुटकला दिया जाता था। अपनी बोली में बात कहने का आनंद ही कुछ और है। 

राधेश्याम भारतीय – आत्रेय जी अन्य राज्यों में उनकी क्षेत्रीय भाषा में साहित्य प्रचुर मात्रा में है परन्तु हरियाणा में इसकी कमी दिखाई पड़ती है क्यों?

रामकुमार आत्रेय: इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि किसी भी सरकार ने हरियाणवीं को महत्व नहीं दिया। स्वाभाविक बात है कि साहित्यकार भी उसी भाषा की ओर आकर्षित होते हैं जिससे सरकार महत्व देती हो। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि उसी भाषा में पुस्तक लिखने, छपवाने का लाभ होता है जिसे सरकारी आश्रय मिला हो। जब तक हरियाणा पंजाब संयुक्त थे तब तक किसी भी मुख्यमंत्री ने इस ओर ध्यान देना उचित न समझा। हरियाणा बनने के बाद अखबारों तथा सरकारी पत्रिकाओं ने हरियाणवीं रचनाओं को सिर्फ दिखावे के लिए मामूली-सा स्थान देना शुरू किया, इसलिए हरियाणवीं भाषा में काफी मात्रा में साहित्य नहीं रचा गया। दूसरे राज्य की बोलियाँ  जिन्हें भाषा के रूप में 8वीं अनुसूची में स्थान प्राप्त है वहीं उन भाषाओं में साहित्य लिखा जा रहा है। अपनी हरियाणवीं को भी 8वीं अनुसूची में लाने के प्रयास हो रहे है उसका असर अवश्य दिखाई पड़ेगा।

राधेश्याम भारतीय:-आत्रेय जी, आपने बच्चों के लिए ‘ भारतीय संस्कृति की प्रेरक कहानियाँ ‘ ‘समय का मोल’ और ‘परियाँ  झूठ नहीं बोलती’ और ‘ठोला गुरू’ आदि पुस्तकें अपने बाल पाठकों को दी है। बाल साहित्य की रचना करते समय हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

रामकुमार आत्रेयः– बाल साहित्य में रचना करते समय भाषा की सरलता, सबसे महत्वपूर्ण बात है। मतलब बच्चे के मानसिक विकास के अनुसार भाषा का उपयोग होना चाहिए। रचनाएँ  रोचक हो और इसके साथ-साथ ज्ञानवर्धक भी होनी चाहिए। रचनाकार के द्वारा सीधे उपदेश झाड़ने की आदत से बचना चाहिए। आज कम्प्यूटर का युग है तो लेखकों को नई-नई जानकारी के साथ बाल साहित्य की रचना में आना चाहिए।

राधेश्याम भारतीय:- साहित्यकारों द्वारा आत्मकथा लिखी जाती रही है आप भी अपनी आत्मकथा लिखिए न?’’

रामकुमार आत्रेय: अरे भाई! हम इतने बडे़ साहित्यकार नहीं हैं। अभी तो बहुत कुछ करना बाकी हैं। आत्मकथा तो महान साहित्यकार लिखते हैं ।

राधेश्याम भारतीय:- आत्रेय जी, आप एक प्राथमिक शिक्षक से लेकर प्रधानाचार्य के पद पर रहकर बड़ी ही कर्तव्यनिष्ठा से अघ्यापन कार्य किया है और आपके पढ़ाएँ  विद्यार्थी जो ज्यादातर उन्हीं के गॉव (करोड़ा, जिला कैथल ) के हैं, जो उच्चपदो पर विराजमान हैं। इसके बावजूद आप खुद को साक्षर मात्र मानते हैं। क्यों ?

रामकुमार आत्रेय: राधेश्याम जी, इंसान सारी उम्र सीखता है। मैं भी सीख रहा हूँ। और अन्त तक सीखता रहूँगा। अब भला सिखने वाला खुद को शिक्षित कैसे मान सकता है। और बात पढ़ाएँ  छात्रों का उच्च पदों पर सेवा करना तो, मैंने कर्म को पूजा समझकर किया है। मैंने कभी नहीं चाहा कि दुनिया मेरे काम की तारीफ करें। मैं निस्वार्थ भाव से अपने काम में लगा रहा। मैं समझता हूँ अब मेरे कर्म का फल मुझे मिल रहा है क्योंकि जब मेरा पढ़ाया कोई विद्यार्थी मेरे पास आकर कहता है कि गु रुजी मैं इस पद पर कार्य कर रहा हूँ तो आत्मिक सुख का अनुभव होता है। मैं तो इतना ही कहूँगा कि हर शिक्षक को मन लगाकर पढ़ाना चाहिए ,क्योंकि उनके पढ़ाएँ  विद्यार्थी ही देश के सच्चे नागरिक बनेंगे, वे राष्ट्र का नाम रोशन करेंगे और उनका भीे। एक शिक्षक के लिए यही सबसें बड़ा पुरस्कार होगा।

राधेश्याम भारतीयः– आप साहित्य से जुड़े रहे हैं ,कोई ऐसी साहित्यिक घटना जो आपकों बार-बार याद आती हो ?

रामकुमार आत्रेयः-‘‘ नहीं, ऐसी तो कोई खास नहीं पर, एक बार अपनी नासमझी कहँू या अप्रत्याशित होने के कारण यादगार बनी। मेरी एक कविता ‘मुफ्त में ठगी’ ‘अक्षरपर्व’ पत्रिका में प्रकाशित हुई । वह कविता केरल में पढ़ी गई । उस कविता में क्या ताकत थी कि एस.सी. ई. आर.टी की तत्कालीन निर्देशिका ने उस कविता को पढ़ा, समझा और दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में प्रकाशित करने की अनुमति चाही। लेखक तो चाहता यही है कि उसकी रचना का आस्वाद अधिक से अधिक पाठक ले और मैंने अनुमति प्रदान कर दी। महीने भर में ही उनका फोन आया कि आप फाइव थाउजैंड़ की पावती रसीद भेजे। मैने कहा, मैडम मैं पॉच सौ रूपये की रसीद भेज देता हूँ। उन्होंने पुनः कहा, पाँच सौ की नहीं; फाइव थाउजैंड यानी पॉच हजार की। यह सुनकर एक बार तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि मेरी एक रचना के पॉच हजार मिल रहे हैं पर विश्वास करना पड़ा। यह घटना मुझे अक्सर याद आ जाती है……..’’

राधेश्याम भारतीय: आपकी नेत्रदृष्टि आपका साथ छोड़ गई हैं ऐसे में आपका लेखन कार्य कैसे चलता है ?

रामकुमार आत्रेय: नेत्रदृष्टि जाने के बाद लेखन कार्य में बड़ी बाधा आती है। जब मेरे मन काव्य संबंधी विचार उमड़ते हैं तो मैं कागज पर टेढे़-मेढे़ रूप में लिख लेता हूँ और बाद में अपने पोते विकास से उन्हें लेखनीबद्ध करा लेता हूँ।

राधेश्याम भारतीय:- नव लेखकों के लिए कोई संदेश ?

रामकुमार आत्रेय- वे अधिक से अधिक पढ़े और निरन्तर लिखते जाए। साहित्यकार बनने का कोई शॉर्टकट नहीं है। साहित्य साधना की मांग करता है। और जो साधना करते हैं वे जीवन में अवश्य सफल होते हैं।